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स मण्डनाग्यो भुवि सूव्रधारस्तेन)द्छतौ भूप्रतिवज्ञभीऽयम् ॥ ४२॥'7 च्रष्णायः १४॥
वास्तुराजवद्धभः । ओीमण्डनसूतधारविर चितः । काशीस्यदिन्टुवि्रविद्यालवाध्यापकज्यौतिषाचाय- |
पण्डितगरोरासयवन्रोभाविरवितभाषाटीकोपेतः। विक्रम-संवत् १९९१ । `
1. श7+ प 01404. परा8 वध ^
2. एप्ाशोन्त् 10 6 द्धक अला. वििपव2क्ुा 07658) ` |
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2151 स्पमण्डन, 2152 राजवछछमरित्प, 2153 वस्तुशाख्रशिस्प. (1118 00०६
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4150, 1252118 [पाद लाच : 4 4८42८८1८ 4८८0 ६4 |
12८2567४ -0 22545, 0 07व ए परार, 21. 1927. ए. 103-5 |
8. 175६ 70 प्व्ल्वे एष ©. एप्पल; (100 [58 9 921151६ 2488. 70 ।
2, ¬. ‰, @, ४01, 42, 538 ‹ ।
०. 86€ चि०४€ 1 5472, वाद्व 9 2210411 ए्ा2 213 00179; त्ाातप् तापापर
10. , 28810 > 2. +* 17086 {८206८ 2 5411520 = 155, |
८ ८ 2,162.८ 2 (८८, 3142, 1297 ; 3147, 2253 ५ #
| 2, ६. ^ वाव : (20 ८) 2, 102. ८
12. कवौन््राचायसूचीपतम् [6वणाा7ताव्लव्य 2 [15 ए५१४८त ण्ण [पध्0वपल्प्रम |
एष १. ^ पवाद्वञ्ा2े ऽव प्त 2 एगलफगत् एष [7 ति व्272003 108. ७008,
` ०. दषा, 1921. ( सूची ) सवैविद्यानिधानकवीन्द्राचा्यैसर खतीनाम् ( गन्थस्य } वैदान्तौकौ वाग ष
~--वदङ्णोतर--व॑नारसं |
धात क05रछव्त् [तात्ृल्पदट 7 सा वकृत्पकप्लाहि जं सिवशपप प्र
28 (द), व्वृद्वाफन भात् एल्माप्रपि. 4 00 ऽता 6
{00 {0 01011 क5द, प्राणऽ 810 115 वालि 6१९6 ॥0 6 फठपत
09 75 वलाण8ऽ€ [8 [रवप [पक पः 01810686
पाक 9 6 168 फ 116 सिपप्ववा {20408 0०4 ४1९8
लाता {9 -11410कतत ना ४16 86036 म 4८०० शतात् आ 1 एं
7171]003ह1916, पवः स ऽ पजन [पत् जपहासीङ् इपला टः. 00 106
छाल [क्त् 6 [ल्वत्ास्व् (र पणप्वाद्ल्छयय [ताल प्ट (द्युलदपप्द्तः कात्
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016 भवः 0 (द्र (कालापहल्लपाष्टो, पप धल गाल पकः जा 6110
(दपए).
(1८ तदक तात् इताह गलाः (ह क
` पसितृत्यावे+ कल्ला 10 [तष्ट [द्ल एलन गुप्त, = चा {० व्ल,
पिला ल्पी, फट [पित् ल्लः ग [5 {ल वलत् [फ 6
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0 कविता, {प्रात् प्रलाः पसप ६0 एलाता€ः, € एष्टा ला एटलला९
(1171105) क [ताश लतहपता6,
` | शिण उल्ल, व्कृतकेपद् ऽ शठावुरः [0100 16 {0 06
[01१९९ प्रण्डपसत्३"२ वड एल् ३ लकार, कड. [र फएकारह वा
880 लः पाध आ घोल छपा पल6 पङ्क गा 18१6 966
` धवगः दवाव पलप 6 (दत्थ पता. (प्य 1 2 €प्तलणः पा
धमात्" 12007008 प श्लााल्लपा6 = ऋणत् = इल पा& कण रल्
-द्गाश वल [णपा पाध 2117518 296 ला{506).
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` | एए उष्म २६ 8876042, 1891} 866 2. इ. ^ 0ावा2 ; 2. ल 2. 103
4 = -106€ ९८264024 28 पडत एक दिस्य रस्वाशप्ााध्य्
| 0€९ प ऽ एकुल्नव्ल्वात ल्जपश) शन्द्कल्यदुस् 92642640 4-4८४4, §66 = |
८ पतल 01444057 शिलयशस्म् 1. | | व
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^ (सत्पात्र 11 १20 : तल म दक 2८000604, 2{24125, `
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घा ग {लापल-पालाव्लापा€ फवड कल्कवृक इतण वाट 10 € रर०ना
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नि कपा, 0 [णु [18 (0116. पशत प्ाताल्व् लारर्लरि
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९एला' प्र118€त्) 58 च्ि' 25 18 €ष्पवृला 116 (तत जिकाणः 0 #वाह्दप् |
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एव0नतत् पप्कड०गाऽ कात् गाशृश्पषटा6 म € ्ला० पतारड श्त |
1000015 पलु6्तव् ४6 पज वजा 9 कलाह ऋआ करणत्ालण,
पिया 50 (जणथ् [ताद ^ पत्, प्र6 पथकः इकणातड पलाठ आम6 |
77 18वृ प्रर प्ल प्रधा 6 एकलः [षनाहा68 0" ध6 = शंमाह-फव50ा8ः |
11065 कपत [लालह. ` 1
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` अह्व) 1922 ; 1६६0. एव र. तात् 0 प्न ९. तदपा0व्ञ ४8 98) 1929 =
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मगुरति्वरिष्टश्च विश्वकर्मा मयस्तथा |
नारदो न्निव विशालाक्षः पुरन्दरः ॥
ब्रह्मा कुमारो नन्दीः शौनको गर्म एव च|
वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा य॒क्रो बहस्पतिः ( युक्रवृहस्पती ) ॥
अष्टादशैते विख्याता वास्तुशाशरोपदेशकाः ।
संक्षपेणोपदिष्टं यन्मनवे मस्स्यरूपिणा ॥ |
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विष्ण्वादीनां प्रतिष्ठादि वक्ष्ये ब्रह्मन् शणृष्व मे|
प्रोक्तानि पंचरात्राणि सप्तरात्राणि वे मया ॥ १॥
व्यस्तानि सुनिभिखके पच्विंशति संख्यया |
हयशीरये तन्तमाच्रे तन्ते तेलोक्यमोहनम् ॥ २॥
वैभवे पौष्करं तन्त प्रह्वादं गार्ग्यगालवम् ।
नारदीयं च संप्ररनं शाण्डिल्यं वेदकं तथा ॥ ३]
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सत्योक्तं शौनकं तन्त वासिष्ठ ज्ञानसारं | ५
स्वायम्पुवं कपिं च ताक्षयं नारायणीयकम् | ४ ॥ '
आतियं नारसिंहाख्यमानन्दाख्यं तथारणकम् ।
बौधायनं तथाभे तु विद्वोक्तं तस्य सारतः ॥ ५॥
च 0्ालाः उद्८्छपफ( कष्ला 1 € (्व्तकुतकष्यवदरव व्
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५०१८ :--
इति भोक्त वास्तुद्ास्तं पूर्व गर्गाय धीमते ।
गगातराशरः पापस्तस्मास्ाप्ो बृहद्रथः ॥
बृहद्र थाद्विश्चकम प्राप्तवान् बास्तुखाख्नकम् ।
स एव विश्वकर्मा जगतो हितायाकथयत्पुनः
वास्तुदेवादिषु पुन्टोकं भक्तितोऽत्रवीत् |
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आदौ चन्द्रमसं वन्दे महादेवं ततः परं चृडायामिन्दुशकरं मूध यः संविभर्ति वे ।
दिष्णुभयेन्द्रं सूय जलाधिपाग्री तथा वायुं ततोऽमिवन्देऽहसमेष पजापति-विद्वकमाणौ
घतः परं नञ्चजितं पादयोः प्रणतोऽस्म्यहं सवीनपि तथाचार्यान् कताज्ञटिपुटैः करः |
यथानुक्रमतधितसास्नाणां वर्णमाश्चितं यथामति यथाशक्ति मया किञ्चित् प्रवक्ष्यते |)
सम्यक् परीय सक्षेपान्मर्तानि विश्वकम -प्रहाद-नञ्नजितानां
ततो धीमतां कृते हि जिज्ञासूनां समासाचित्ललक्षणे मया उक्तम्
तेनाधुना शण्वन्तु तचिव्रलक्षणें हि मत्तः पण्डितानां धिवाम् अवे | ये निषाताः |
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विश्वकर्मा च विश्चच(शः) विश्वसारं(रः) प्रवोधकः ।
बरतश्चेतर मयश्चव त्वष्टा चव सनुरनकः ॥ ५ ॥
मानविन्मानकत्पश्च मानक्ारो वहूश्र॒तः। क
परा च.मानबोधश्च विश्ववोधो ना(नोचश्च तथा॥&॥. क
आदिसारो विशाखश्च विश्वकरादयप ए(ग्रेव च|
व।स्तुबरोधो महातन्त्ो. बास्वुविद्यापतिष्तथा ॥ ७॥.
पार कसरीयकश्चव कारयूपो महा ऋषिः(दपश्च) |
चत्याख्यः चित्तकः आ(शावयंः साघकरसारसदहितः॥
मानुश्वन््रध लोकज्ञः सोराख्यः शिचपिवित्तमः
तदेव ( ते एव >) ऋषयः प्रोक्ता द्ालिंशतिः संख्यया ॥ ९ ॥
| अध्यायः ६८ ॥
गङ्खारिरः-कमलमू-कमलेश्चणेन्द्र-गीवाग्र-नारदमुखेरखिलमनीन्द्रः |
मोक्तं समस्ततरवस्वपि वास्वुशास्त तन्मानसार-ऋषरिभापि हि लक्षयते स्स | २॥
( २ अध्यापः ) संग्रह
पितामहेन्द्रपधमुखेः समस्तैः देवेरिह शास्तवरं पुरोदितम् । |
तस्मात्समुद्धत्य हि मानक्तार शास्त खोकदहिताथंमेतत् ॥ ५८ ॥ अध्याव्रः ७० ॥
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० (रलणाका८९, 18 वव ध ^ धकर २ ६२९6 01086 [पर्छ
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(1 1 0
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। -- ल (तमप), क कण्व द्ईक5 ८5,
` 35. प्छ 455. 9 44007004) 966 (र्द पए, व, 0 165.
, 0) 2124725. ए. 87550. 08. 12032, 13033. 4150, ला : 5 ण
ध 0 ~ त 9762८ 188, 20४ ४८ 207202८5 ए 9०४0 ब, ७0०1, 1, 2, 395) ०, 6336
36. ` 45/60; ००४६ एष सवासा ा2, एवल्वे 10 = वश्रछ्द्वशव
। । उ, थ प्रिमा ००8,
37, 96€ ‰. ‰. वाद छव 1८८८८006 2८८0702 20 0050 ।
~ (दक, 0. 100. पठः 65. ५ धाह पजा 56 0८16, 155. 101.
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185 य8 © 60016 पक्रत्ल क्ङ 00 0एष्लष०प, 18 सलृपर्जण्लृग 00 6
इपणल् ग इलाः च (९076668 फ्ाप् #्€ पल्य र्ण अव्ा©ह ;
। एप 7 15 380 तर्ी३6९, वीणा 7 फ९ इपफ088 . ध6 प्न्ठ पजर #0 1९ फपल |
718, णाकः 516, 1# कप्डा तातल ९९०6 धल णपा ग |
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पाद्वत #10 वलक०फदल्वछः 15 46४ 0 जालः 4८715, 8110109 = |
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सण.
णात
38. थि रिष्ट ; 255) 02 24 47८4८72 म 4८ 7८5) = ([.0100,
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सतश्चतमरतप्रबोधकं चतुष्व(ष्प)षटवध्यायात्मकं भरतशाल्न भगवता गणपतिना
त विरचितम् ॥
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एवं नखचित्र-केल चित्र-शत्यचित्र-अङ्गचिल-भावचिल-आढृत् चिल-शिर। चित. लोह्-
चित्राचेकोननवत्यु्तसरतचितभ्रवोधकं द्ार्तिंशदध्या[या]त्मक चित्रकर्मशाल्ल भीम-
` विरचितम् ॥
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भत {€ क्प्ल ज २ एनक्राणयर ,०(|7 द ;
|| ७. शिस्पशास्रम्
एवं य॒क्चदिल्पि गन्धर्वरिव्पि-किन्ररिदस्पि-किंपुरषदिस्म्यसुरशिसि-देवशिस्पि-मानुष-
शिल्म्यादि-पसोत्तरत्तिरतसिद्पप्रमेदान्पप्रहेम निरूप्य मूलोकसंव्र धद वविग्रहदेवार्य-
राजग्रहगरडस्तं मङुञ्यमटपावेकोत्तरद्तविधरचनावि धिगर्भितं कदयपद्यायापुरषरमारुतिमय-
विश्वकमेत्वष्टमनुबाणरिद्िवधनवटकशद्यातिप्र तीनां परस्परद्िसपप्रमेद मामप्रदशनपूर्वकं
ष छ द्विचस्वारिशदुत्तरेकसदलप्रबोधक द्वाविश-गुच्छपरिमित शिखद्याल्ं मगवता कदयपेन
म्रणीतम्।
वयौ सद्यं योगः पगपतिमतंर्यवमिति प्रसितं प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यं हितमिति च ।
` रचीनां त्रैचिच्रााद् छजुङुटिलनानापयचुषं बृणातरेको मम्यस्त्रमसि प्रयसामयैव इव ॥
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अथोपवेदाः ॥ आयुवदो, धठुवेदो गान्वर्ववेदोऽथैशाख्रे चेति चत्वार उपवेदाः ॥
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एवमर्थेशाख्र च बहुविधम् । नीतिशास्र [अश्वशास्र] शिस्पजाखर सूपकार]
शास्र चवुष्मष्टिकल।शाख्र चेति। अपि च मोतिकादिमोतिकशाल्नाण्यपि | नानामुनिभिः
प्रणीतं तत्सर्व । ] तस्य सर्वैस्य च लोकिकत(ब)सपरयोजनमेदो दषटव्यः॥
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`... ` पवठ्पञ्€, प्व. (मल्पत्तः8, 1934). ए0ा पिधा पणित गल्भ ह3161-
&दष्ना) 56 प्ल षल्ञ्लयाद पल्ला (पभय कध) ; रवद व्रि 07512
| 4.5.25. (रकः इन्मरमे, प्न. उका, 935. 50. या, € प्ण्वलः दिष्ण्त- =
` €4५212.
भ. - र - पदसा; ल क दादव्फदय ल एञत् 7,
१. ६०8. (ह 2१०९6 2583826 185 एष्टा) गलातलल्व् पिल्ल] २0 एह, स्न
18 0061, एष धट ए्ठ्छला पला, | ।
72. श. ्रएल्लःप्रध्य 1. ८2.) 2. 532 (766 (वण9]व्०प). - 8651465 ` 4
` प्ल -ल्भोजः ग इपत्तच्पधं = 6 06६ (र्वा) 1882) पलाल 15 3180 रज
` -[ग्0062 1042522 (वदप, 1882) ते 5€४ल2] [पताद्प 109६5 पद
भव्णञाश्प्ज् पप एतष्य) कथं आत तक, वक; उछाल ९ ४४ 28. £
` अव्य (न्मा एषण 1975); एदु, वकण्ञन ए छट उपल (्वाष्नव्त), 09
| % |
1, 8 छाल. लल प्र€ कलाप्व्ा0ाऽ 9 आ 0ात् ^ 1195018: 11दए६
एल्ला) [कलएह्त् 70 #€ सिपाह ज पज का 06 एकततत पम
1116 जिततद्पोत् 10 व भूतल विवा पावक 6 वर्रालितंणः (0 (6 11045)4-7
` फाला ्लाा8 जिपातद्वल््फव्, 28 गाल त 116 लंय - वणान #68
11. 1 1/1 1
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३. 1050-7 द व, (-477वव7 20.) 1907); 000, 252. 966 0६6
25. 52८02.
० पव. 2. . ^ वाथाप2 : 4 2701707 मा त 464.) ए. 799 ; 2150 566
४ उक्ल; 2त ध6 ए]. 251. [ङ ए. ए. उभार
४ 75. - 4. दला ; © ८0४ त) 2. 567. | व ।
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[9]
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न खाघं हसतयं चेव कथितं विश्रकमखा ॥ २९ ॥
मप्रास्ादलच्तणमिदं कथितं समासाद्
गगणं यद्विरचितं तदिद्ासि खवम् ।
सचादिसिदिरवितानि पृथूनि यानि
तत्संखति' प्रपि सयाव हतोऽधिकारः ॥ ३१ ॥ षटुपच्चाशोऽध्याचः ॥
अष्टो सोषखकभागाः कांख्ख दो तु रीतिकाभागः)
| मथकथितो योगोऽयं विच्तेयौ वचपंघातः ॥८॥ सत्तपद्धाशोऽ्यायः॥
` सरहृलप्रमायैर्दादथ विसीय॑मायतं चसुखम्।
॥ नग्रजिता तु चतुदश दष्यण द्राविडं कथितम् ॥9।
` चतुरङ्ल वसिष्ठः कथयति नेवान्तकणंयीवित्ररम्
अधसोऽङ्लप्रमायससयाधनोचरोष्टश्च ॥ ८॥ `
अन्धत्वं ष्वा करोति विनामधौसुघी इषि
सभप्रतिमाखवं शुभाम भाकरोक्तसमम् ॥ ५२ ॥ अटपच्चाशोऽध्यायः
(1.0),
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` ©) णवा (10) उसाणद्च, (11) रषदा क्रय, (19) दै वातीएदा
` (13) दिव्णानव, (14) तु (15) सपण [एहय, (16) 4 प्रापतत्
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तेनेदं पृञ्चरा च्च प्रवदन्ति सनौषिणः ॥ आः १।१; नारद्पञ्चराच्म् ।
[ ॐ |
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शून ोख ररत मश्वृलैख । वीमटङ्ण्टय (७८८) रिषत कुक चद्वाल्लि। रविर् `
यद्घ ¡ शररत (द्रौछ, कखन) । नन >२१8६ मोन;७२ याब । 220770८4. (वुक्न् तब (यम् । `
मन >००० मोन । “स।ख्िट्कोगूपरौ ७ कोलिमकघब्र ” यीप्दगैमोशव शोब्दब्र॒कर्टुकं गङ्षनिङ | `
कृषक स्च । सम् >२०० मान्, कङ्न् |
( ॐ6 )
€ पालकः 8100 ए 16 का-धा0व(ह, दद्द 5 ६1५
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ष्<€ ४] कलुर्णल्त् 5८४ ज [तवाक पप्रिः 98 वलाः -जाप्रतलाः
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३4160 ₹उ्रप्रलालः ईप्ला उ5 11€ तल्वालसछा त कव 1028 रा कछया
वल्ल 00 {26 [क 0 {€ वला, 2/7 प/तप.०० = र क काप्रडट कात्
तिति मिनि जानि नम ०११०७१५०१७५०अ१
“सूवघरौ दिजानान्तु शपेन पतितो सुति ।
शौ प्रद्च यज्नकाष्टानि न दष्दौ तेन हेतुना ॥? 1; 3
“निग्ात्! यद्कष नष न्। कटुत् लुक्रटम्।
मृ[टभ ग्त्वेत मं भडिक 4 काद्र!" 2
“व्यक्गि(ति) क्रमेण चितां सदयथितकमर्स्था ।
पतितो ब्रह्मशापेन त्राद्मणनाच्च कोपतः ॥? 1, 2
शरभुत | कमञ्प्रि एिलट्तदद छनि श्लिक्ट्द् |
{शिं भिस कद्िन रि्थ॑वट्् |° 9
98. , पण 6वव016 866 ४१6 वका जति वावा, (55) वदप
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90०. तथा हि--ग्रौगोपालमदटक्रते “खौ इरिभिक्तिवि तास" १८ विलासे-गीमूरचयाविभीवमाहा सा--
'विषुर्मौ चरे! दवस प्रतिमायान्त थावनः परमाणवः ; तावद रैसडखाणि विलोक महीयते ।
तथा--श्यौ इरि०-- १९ विलासे--पौमूति प्रति्टामादहात्--
माछ । प्रतिष्ठायाः सुराणं च दैवताश्षनुकौत्त मात् ।
| दैव॑यन्ञमद्छवाञ्चौपि बन्धनेन विसुचखते
तथा--स्तवंद्भाषित-प्रतिसालकच्चण -विवरण्यास् |
| यावन्तः परमाखवो भगवतस्तु पेषु शिस्वषु वा ।
तत्वात् दिवि भतस च नियते तावन्ति--॥
---रुषदोऽदखिला |
9 भुक्ता च सवे सुखम् ।
प्राने जग््जराविपत्तिरहितं `
प्राप्रोति वद्धं पदम्
(भ)
0411602 18१6 णश] लल &1006** शुत्नगादशौा € काा58 अत्
25706 = त्ला१६५ १९३) = वपवातप्ञाङ = शा०पट), (दला = $ १६2९५64
{00811018 10 800
{008 € [ट्छल^ए0ा 0 614८ (लक्§ 1 116 04168 ग ५6
0नण््तवा स्क क55 80 दार्ध्िलो 16 फए€ा€ 1007र6्व वा पुमा, 8
06860 11 8006 कालाप, = एषणाः डया कात् [पु9888 1 6 1188.
व16 {नपाल 8९८10110 ९117075 रक (०ाणा०551017. वत 0 8 शिकत) पाके
96 वपल 0 10८ 50068. = (0ल्डड वात् पात्र [रल = 76कता0६5;
ऽप]00ा्त् 0 उपाएडनि#2 शाठपात्र, (वा) 06 5प्६९६6(6्व् 1६ 18 एत
2]0क]< ४0 पलुल्छ गृच्ण््लाालः पा€ जप धरास्र पट प्र्ल्ा एल्छ प्राह
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0०१, (006 विशाता्ल्दरक्ा2)5 4640 (1८ १.4. ० ४6
6८ पद [प्त्ठ्त्न वदवञन ०७ 20 [ाप्ञ्ठप्जा8, एए धद्ाजाप० दय
(110811., (¢, 5, 5८-7८5, 9. ४ .); [शन 15 ६] < † 09--119 (2110 2.11.
1121191} व्क 0
पजा ० 52/1८ -दकेड+ ९६८.) = 2180, 1४ 28 (00896 ८0 हार पप्र्ला0पञ |
€221111165, ग ऽप्८ €पा८द्् | | (
92. 1४ ए०पुत् ०६ एल 0ण(ः ० (146) ४० ल्प 026 066, ण सदवपा6
{16 प्प0ला5ऽ€ प्ल) पणता 6 एण्ठ्ञलणौ फणाः वर्तत्, पि ऽपणुल्लवह
ध1€ एवल व्छपिप्ष् 1601185 ६0 264704८ 20 0८4८1666
638, €{8€प्11€16, 91116 एलु 9110& 115 लतातला ज (116 पगा ७4८ (क्छ
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वण्डोपलेन कव्ये) ब्रह्यकुमंशि(ले)रस्त(सोथा ।
प्राल्तादाऽनलङ्कण्डादि कमे ङयाद्धिदक्षणः ॥ ९ ॥
यदि च “'प्रासाद-तख-कुव्यवादि' पाठोऽपि दभवत् तथापि "प्राक्षादाऽनरङ्कण्डादि” पाठः
साधीयान् इति मदिरस्माकम् ।
<. 8, विमरूमिति पारश्चिन्तनीयः । मन्ये--““"सविष्टम्ः' इति भवितष्यम् । वणं विपर्यस्य,
सकार-मक्ारथोः परसूपरश्रान्तेश्च स्व॑र अदशेपुल्तके सम्भवात् । मयमते “'्नविरावयवा?
पाटोपखम्भात्, खविरुरिलायाः प्रतिसादावनुपयोगाच्च । 1
अपरं पारिभाषिकं 'विमरूमप्यस्ति । किन्त्वेतत् विरेष्यवाचि, न तु विशेषणम् । एतच्छनब्द्-
स्यार्थह्तावत् °विष्णुधर्मोत्तर,, वृतीयलण्डे, ९०अध्याये द्श्व्यः । मन्ये- तदुग्रन्थीय-३य-खण्डस्य
९०अध्यायल्य ८,९्टोकद्रयात् अस्य शछोकल्य च उद्धारः कृषः । तथा 'विमरू-पदन्याख्यानम्--
अग्राह्या ज्वख्नारीढां - --- ॥
-- ~~ - --- ॥ & ॥
---- --- ---- ॥
तिरः सम्भूषिताः या ठु विचित्रेबिन्दुभिश्चिता ॥ ७॥
रेखामण्डर्षङ्कीणां षिद्ध विमलसंयुताम् ॥
विमलं त्रिविधं जेयं रोषं कास्यं च देसजम् ॥ ८ ॥
या रोहविमरुजंश खा जनक्षयकारिणी ५
काँस्याभविमलोपेता जनसमानविनाशिनी ॥ ९॥
हेमेन युक्ता दुभि्चं तथा ऊर्यादवप्रहम् ॥°
विजः सन्दरूषिवा' दति वाप्रादः। =
+. (3 `
[ 42 ]
<. 0 ल्छागण्छः 1200141 १ {0 विष्ुधरौत्तरम् + ३अ-खण्डम् , २१२३ शोकाः ।
वेत पन्चवरणश्र कुखमोपणसद्निमः ॥
पाण्डुरो युदवणंश्च कापौतये श्द्घसन्निभः ॥२९॥
लेयाः प्रशस्ताः पाषाणाः अ्यवते न संसयः? ॥
<. 1:5-194 लजासपृात् (3 (1१1110८7 (७), (त
11200. (त 11), (६, 45 ५. 1-
<, १९क} श्लोकार्धं परित्यक्तमिति मस्थे) तस्य '्ारं विभज्य इद्धा भाग-
मेकं परित्यजेत् 1 इत्पेवंरूपौ हि पाणो मविठुमहति ।
<. १९1 महाप्रतिमादीना भूयः, रमश्षाने, चतुप्पध्रे च पुजाविधिः लाच
लोकिकव्यवहाराच इयते } कोषेषु च वलत्मंवाचकल्य ""पद्या'श्राब्दल्य सतत्वात्तथा हिपिदाच्लानु-
सोधात् , “्चतसणं पचान समाहारः चतुप्यद्यम्ःः इति पाटः संघटते ।
त्था शिल्पशाखादौ भूयः धातूनां विकरण-व्यत्ययदर्चनात् “पूजयेत् इस्यत्न
“पूजयेत्, इति च पाटः सम्मवत्। तेनास्य श्ोक्ताघंह्य पाठ एवञ्चातः-
““वाणवेदकरानू यावच्चतुप्पये पूञ्पेत् छष्ीः ॥ १९ ४
'महाप्रतिमाशप्रमाणं च शिल्पप्रन्धान्तर, नेपाख्देशादस्महुपरन्धे “आात्रेयतिरूके ०५
एवडुपदिषटम् :- 9
| ““महाप्रतिमाविन्यासं प्रवश्याम्यधुना श्रणु ॥
दशपन्चाधिकेंस्तेः प्रतिमा कन्यसी स्ता ¶
| ` दवियुणा मघ्यमा केया ज्चरेष्ठातु चरिगुमा स्ता ॥
अतः परनन वीत यदि(दी)च्छेत् श्रेयभात्मनः ॥१
तथा शुक्रनीतोः, ‹ “कर-उरी-पेशाघीमूत्तिन्यवल्था ऽपि द्रष्टव्याः> ॥
2] 26--81 'मत्स्यपुराणीग्याः, अ= २९९ श्योर १८-२०, एते ।
^. ` अ. 36-43, एते, सवऽपि शोकाः "बहत्संहिता"तो यथा-यथम् उद्धृताः । ब्र सं°
25. { 0117011८ 111८ }) अ० ४६ ८ सिद्वेकते >) शो १--८ . ५150;
[ललाप दमण 14) ( (1811.1(1110111011641410) [, 44. 13, <. 5-9
18.48...
५ मात
9, 70 वर्दा16्व णिव गटदुगाताषट ध6 -4दट)व- द्रव 566 {6
01656 फपल $ 22/01/6102 (45014. 1116 (ददद ददद्द् सलपर `
ध 9९25 ०. 48. एलावा65) 1933, [प 0तपल््रलम, ए). 5--8
5, [प्रणिपपात धा (ठ 18 10{ १८८65896 7 (6 [क5लाा, ॐ वृ्छध-
{100 दवा ७९ हषो, वद, (1, ४) दद्दा त
[ 43
<, 1. मन्येऽ, वृक्षवेङृतमथिह्त्य किच्िद्कमासीव्। ८ 10). 1,
4471. . 136, ०4. 4. 5 ; 6, 40 ६८. ; त 4. 410. 46, 6८. 28 = €[८.
तथाल्य शछोकल्य प्रथमादधंस्य पूर्णमेवं भवित शक्यते--“स्वदेश्चध्वंसः स्कोटे भवेत्तथा
देवपादपानाभ् ॥ ४४ ॥
<, 45--{7. (०ण0< 1. 1, 4८174 135, 5. 1-5)
त् 7, 40. 144 <. 1-2. व | | पि
€. 50-57. ८ गः 70. [ा, 47. 135, 7, 18. बहतसंहिताः-
मनुखत्य संशोधनं कामिति पुनः पाश्प्रदशेनेनाऽखम् । एतेऽत्र शोकाः अपपाघ्वहुराः ।
"विश्ालणहतावत् ल्कन्दल्येव चतुभदल्याऽन्यतमः । 3९९ 149. [1], 440. 71, <. 3
| <. 58. मन्ये-“वत्से नाऽभिघुखे याह यात्राद्वार च ॒वास्तुनः । इति
भवितव्यम्! तथा “शुविणीनाम्् इति, श्ृह्ारम्मे बत्सचक्र'विचारस्योपयोगात् । वथा
यात्राकारे, “"धेनुवत्सप्रयुत्ता"दिवचनेन धेचुवत्सप्रश्टतिदशंनस्य च माङ्गङिकत्वात्
(10111086, २१80 5/४. 1, 44/॥. 1 €. 6 £
तथा वाल्तुराजवद्यमे १९साध्याये “यृहारस्मे वत्सचक्रम् ।
सौरादिकं त्रितयसल्य शिरःप्युक्तं भानां ततो हितयमग्रपदे च दक्षे ।
कुक्षौ चतुष्कमपि दक्षिणगे प्रश्सतं प्रष्े तनयं त्रितयमप्यथ पुच्छमागे ॥ २३ ॥
पाश्चाच्यपादुयुगरले द्वितयं इयं स्थाचत्वारि भानि च ततः खदु वामङ्क्षौ । `
द्रे चाग्रवामचरणे द्वितयं च वक्त त्वेवं वदन्ति सुनयः खलु वत्सचक्रम् ॥ २४ ॥
शीषंस्थिते छखनिदत्तिरथाग्रपादे शूल्यं च दक्षिणकडुश्चिगते घनं स्यात् । `
पृष्ठे छुभं भयकरं खल एच्छे मे पाश्राच्यपादयुगरे विविधा गुणाः ल्युः ४२९ ॥
दुःखं मयं स्यात्किर वामङ्क्षो भयं चिनादरश्च सुखेऽग्रपादे ।
विद्वद्धिरेवं खुं वास्छुखाते वत्छल्य चक्रेण निरीक्षणीयम् ॥ २६ ॥
<. 597. ''विशेषकाश्चःः इति मवेत् । -
द्वितीयोऽध्यायः । ( (धयः 11. )
<. 1, (1 (251८1100, 4 ८, 1
छाया-वा-ग्रेणु-केञग्र-रिक्षा- `
यका प्रोक्ता स्यायवस्त्वद्रूधं ।
छायादिभ्योऽषघ्रमानस्य बुद्धि |
प्रोक्तो हस्तो नेनसंख्याङ्खेशं ॥१॥ `
| 44 |
<. 2 (0ानछना)०५्5 ६0 87. 11, 4} ५ च 2 21
<. 4. “क्ीक्तिनरुलं त(ता)रयुखम्ः' इत्यपि पाठो भवितुमर्हति । कीत्तिुखं तावत्
सिहमिवापरम्ः, व्यात्तसुखोऽखट्करणदिकशेषः । तल्योत्पत्तिः प्रयोगश्च शिस्पलास्त्रेष्वनु-
°"नर सं
सन्धयः |
<. 1138. (जावा 87. ए, 1. =+ =. 37-30.
& 79. “नीला” इति भवितम्यम् , ष्टीलेःति नान्नाः देव्याः कुत्रापि अनुपलम्मात् ।
तथा '्पाञ्चरान्रागमेःः नीला श्रीः, युरिश्नः पर-विष्णोः शक्तिरूपेण निर्दिष्टाः ।
नामेकदेशग्रहणेन यदि च 'नीरश्ढ्देन नीरक्षरस्वतीति नाम्न्याः तारायाः र्णं भवेत् तथापि
ताच्त्रिकरेवतानां नाल्ति भन्न प्रखङ्कः । | | |
` छल्यं ब॒हट्बहमसंहिताशया रय-पादे एधऽध्यामरे १४४ --१९९छोकेष 'टीलखद्ेन्याः८)
प्रघङ्धोऽस्ति। तत्राऽपि 'लेखाः-पदल्यं 'नीखा' इति पाशान्तरं हस्यते ० ।
27} 99. "जिनेन्द्राश्न" दति पाठः स्यात्, (तकारः-'नकारः
अत्रैव ग्रन्थे निनप्रतिमानां च स्थापनविधानात् । र््ाघ्याये २५-्ोके दषट्यम् ।
योश्रं मसस्भवात् ;
तृतीयोऽध्यायः । ( (६])< 1. )
<, 1-2 त्छपलगात् {0 1.1. 1.4, 33, 4. 88-4
5}. 9-17. अथ देवताहि
("416 112॥. 411. 7, $. 80, पद्देवताविन्यासः ।
“समानि यानि भागानि चतुःषष्िवदाचरेत् ।
असमाल्यपि सर्वाणि चेकाशरीतिपदोक्तवत् ॥ ३० ४
इत्यारभ्याष्यायान्तरपयन्तं द्टम्यम्
[1
| (0. (€. (4191 : ८ यादव, 2 तल वसा (10 वर्प),
80. 1, [€ 7०, §०८. न (01६21 47, (वला द,
८ 07. 866 ?. (00 लगवा ; नद 2 रट -2्८वद स्य
८ 44044010, ववा) 1916; ए, 5353-5;
| | | 98 सुहद्बरह्यसंष्िता ॥ नार्दपञ्चरातान्तगैता {10424 ,५ ९, 6८5, 0. 68
1912, 2. 68--09. तदेव १७६३-खोकः-- ` न ५. -
ध “मोपायति जनान्धस्मात् प्रपत्रानेब दोषतः |
अतो गीपौति वियाता शलौलाखया परवता ॥*› ` |
| ध ` श्नौला०। `
पानम् ।
५.०५८.५५८ ४१ १०५१५ ताता ना १ ५५
[ 4; 1
<. 18४. “वाक्यभेदो न क्तव्यः" इति मनसि निधायेकवाक्यताञ्च अनुसस्धायैवं
दिङ्निणेयः ] |
` (गफएक्षः€ द्धाकसकाःव, 1; 887, ; 80, (ककु कपत00त ४, 13
` “्रह्मविष्ठारितरन्दभास्करगुहाः पूत्रापरास्याः छमाः
प्रोक्तो सर्वदिकयामुखो शिवमिनो विष्णर्विधाता तथा ।
चायुण्डाग्रहमात्तसे धन्पतिदवैमातुसे मेरो
देवा दक्षिणदिङ्युखाः कपिवरो नेकरेत्यवक्तौ भरत् ॥ १३
5. 28. ` यथाशक्ति पा
युद्धि प्रदश्यंते ङिपिक्षाश्चदीननुखत्य ।
“(ज्ञात्वा क (मोघ्थापि पेन रीलया
देवा दैत्या मानुषाश्च सवं ।
ह(ष्टा)त्मानं व्यापकः खुशिकारं
स्थापी(पि)-दष्टा (दष्टा9-विक्वकमं माणं) श्च(तं) बन्धाः ॥ २८ ॥
इष्टः, आत्मा येन त् । ष्थापी स्थपकः, सिल्पी । दश कविः, विश्वकरमा । स
र्या; । सवत्र िल्परास्ं चु विकरणन्यत्ययः पद्ब्यत्ययश्च ।
चतुर्थोऽध्यायः | ( (शुणध्टः भ. )
1. 1. इ्ट' शिषस्यैव चन्द्ररेखरत्वम् । तथा मन्ये, अन्थमध्ये छत्र कुवित् "द्-कार-
"र-'कार-योभ्न्विद्नात् , ““ह्तीकमान्ना संशचदधि०-रिति न्यायात्; “वास्शेखरः इति पाठः `
ाधत्तरः। ६
1 &. 2. त्यं हपमण्डने१०० शप्रमदेनेःति पाठोऽल्ति ! तथापि म्रन्थकारः यथेच्छं परिव
| कृतवानिति मत्वा श्प्रभेदो्तयाः इति पाठोऽल्माभिरङ्गी क्रियते । |
। 9. 8-4 (णगण्छडुणत् 10 हूपनण्डनम्
प्तं कमण्डलुः घतते सक्वः कमरासनः ध"
तामा १९५ क
(ताता ००५१५०५ मन
99. ग्ल वस्कणदृव्क 185 एदल वप्मल्त् २६ [कणत एए 7. |4. जण ८ |
0213 २६0 : 2 (दाद 0 4४ 7८०४0९0" ४४€ 112४€ 46060480 तरल `
प प्6ऽ€ वृप्जदप्र०ाञ, पाल एल उपकलाप कपत एठण्ताक्रह 210
[| 46 |
तेन च, ग्रन्थमध्ये न्त--कार-"नः-कारयोर्वम् (उ -कार-'क"-कार-'रः-काराणां परस्पर
५, 3) 5, 6, 7. ब्रह्मणो हष्तेएु युगपत् शति(धद्-)पुष्तकयोरकत्रायुपयोगात्, त्तथा
"स्पमण्डनीयेः पूरवद्ोके 'लवरि'तिपाण्द्शं नाच्च श्रुतिः? छदिःरिति उभावैवाऽपपाहो, इत्यल्माकम्
आशङ्का । श्लुचिश्शवब्दः कोऽपि कोये यदि र्यते, स एव पाठः साधुतर इति मन्ये ।
. 1. नविप्गधभोत्तरः तृतीयखण्डे ७ अध्याये 'विददक्छमणोः ध्यानद्ुपलस्थते ।
<, 8. “हपमण्डने”ऽरि अधिकरूष्ति ।
, 14, 15. श्हपमण्डनेः प्रायेणाऽविकर्मल्ति ! तथा "णेश्चः स्यात्? ध्यहाश्रेव...
न्थसेत्ः 'देशाल्ये करखादेवीसः इति पाषमेदाः 1 किन्तु ब्रह्मायतने श्याम व्युहार्माः चात्र क्षिं
प्रयोजनम् १ तेन, "गुहेव ८ का्तिकेयम् ) इति पालेऽवश्यमेव भविता ।
91, 16---20. प्राय्ेणाऽविकलं "रूपमण्डनाुणरुताः । प्रघानपारमेदाश्च प्रदर्यन्त-
“पद्यं खक् पुस्तकं दण्डं सत्यो वामेऽथ दक्षिणे ।
सन्थापसभ्ये करके प्रारूतूलधमंकः ॥ (17) `
अक्षं पद्मागमौ दण्डं करेधत्ते प्रियोद्धवः ।
--खक्फख्कयन्तः स्थादाथुधः शुभः ॥ (18)
--सूत्र-- खेटदण्डविजयनामकः ।
---------- खेटकं ------- ॥ (19)
-----ः पाश्चाङ्कशौ दण्डो भवे स्यात् सार्वकामिकः ।
---- पाशप्चेविभवस् ----- ४ (20)
तेन पाण्मेदाः। (श्लोके) दण्डं सत्य-(१८)-पश्चागमदण्डान् ; करतरेरद्वेदवः ?
-सुवाफठेः यश्च ; (१९) भरेत् (२०)--ुरदण्डान् भूयश्र(--ङ्ान् दण्डं ), --ङ्कशे
--त्परे धिभवः-- ।
८. 21{--34 [अथ द्वादश सूयंडत्तयः| 1प (र< {011 [15८ 1111111/1- (1८100
८८707, तत्र प्रधानाः पाटसेदाः-- (२१) जगत्प्रकारकस्सूर्यौ जायते -यंथा ५
(२२) सा धात्री-- ॥ (२३) चास्या -- । मंत्री --- ४ (२४) -- सश्च; पाणिपहवेः
(२९) --सन्ये- -- ! (२७) -भवेत्सम्पता-- ॥ (२८) यस्या दक्षिणतश्दरूलं -
खदशंनः । भगमूतिः-- - ञ्युभा जय ! ॥ (२९) विवस्वन्मूत्तिरिषा स्यात् ॥ (३०) -स्थ
न माता तानामा ाााााा
= १००. {16 एकदस 45 एला तृध८षट्व् एष , 4, 60028
280: 00. न, पाह णपा [95 एष्ल) प्ाअल्व् प्रस तिल ९०६८ 27} `
1/1
({ 47 |
भवन्मरूतति- । (३२) खं च -- होमजकालिकाम् । -मनेत्सा स्यात् पञ्च-- ॥ (२३४ एषा
स्याह --॥ (३४) -- सविता द्रामल््तः ॥ पुकादस्तथा त्वशा विष्ण्कीद्श
उच्यते । ए |
अत्र भन्ये ` 'विक्वकम॑लाखयाण्त् छत्र इत्रचित्पारमेदो दश्यते । तेन अस्माकं मते,
(रर्रलोके) उधा(ज्ञी) तथा (३२) होमज-नीरकम् इति पार्मेदौ भविष्यतः, छकार
(लः-कारयोश्र॑सददंनात् ।
1. 38-89. यथादक्ति श्लोकयोः पाटोद्धारः क्रियते ।
त शहिरम्न(म)तङ्खङ्ष्णाः ॥ ३८ ॥
भरीकण्ठसूरयौः श्द्रस्तथाम्बिका (उ)(त्र)-- ।
---ते (दलन्ति विघ्नानि परसंस्था ॥ ३९ ॥'
एते देवाः स्वल्यानल्थाः अभीश्ानि परस्थानत्थाः विघ्नानि प्रयच्छन्ति दस्यथंः ॥
<. 42-- 46. "हपमण्डनभत् किञ्चित् पस्विरित्ता
८ ४४श्छोक्ते ) तजनी द्रौ ब(ज्ोरना--- । ८४९) तर्जन(क)द्ौ पद्यानां चिच्रको- ० |
(४६) तजनी दौ किरणं दण्डमक्षकिरणो भरेत् । |
२ इति संशोधनानि क्रियन्ते “रूपमण्डन'मनुखत्य
<. 47-5?. शशिल्परत्नेः उत्तरभागे रद्अध्यायस्येते १४१ १९रश्लोकाः
कुत्र छत्रचित् मेदा अपि इष्यन्ते । तयथा-
( ४८रोके ) -- एथदरीम् । (५०) पुस्तक-- । (५३) ततो -- श्॒क्श्च-- । ध
(५५) सौरिं नीर -- चतुसंजम्
तत्र (४ ९क्छोके) "मेषंगमः" इति पाठो भवितुमहति ।
<. 59. श्ञिल्परत्नेः उत्तरभागे २दअध्यायस्य १४७दरोकः । तत्र गगृधाः -- `
का्या-- ! इति पास्मेदौ । श्युधाः" पाठत् श्रहाः? साघुतरः।
| दति नवश्रहाः
7. 59-66. शरूपमण्डनभत् त्र त्र विशेषाः सन्ति। मन्ये, सव॑ऽपि शरोकाः
तस्मदेव उद्धृताः । . (ैर्रोके) --- कतिक -- । :-श्वानारूढ-- । (६३) नक्रा-- ॥ `
इति पार्मेदाः प्रधानाः, सर्वत्र कारकन्यत्ययश्च ।
इति दश दिक्पाखः
पोतन व "ल
पन्चमोऽध्यायः । ((4])॥८' \. )
<, &--13. (पापु (१4१11111 101400, = + "ता 4८८ कुत +
40014. 10, ( (11 [तदक 11. 127; (५८416 01111
1107740, 4114. 19 ; (+, 1104. 1; ; {0 वल्लः ग {€
91171101.
<. 15-20. @पम€त् कणो = ८4्वद- 01 पक
1110101" ९1811९6६.
<. 21. दोप्जल्त् शल 1147 पी पठा
(11722६६.
९. १2. निप्ठ॑ल्व् ठ न १111111 1१, 1 ।
(1171226;
<, 2८. णता {16 (तद द1॥1- 5410111, (71211111 1 10169
४ # 11/01 (17111 01 (11.111 त20 व 1111 021 {02
““शुद्धाभश्वातिकोणम इति कवित् पाठः । नान्तरीयके संहे 1
०१. 27, @०६€त् किण 101८4८41 11211020. "9
आ, 2६, किपल शल (वाद 1112401,"
आ. 29. @कपज्॑व् वणा ए लकलनदव ; (7 4कवदध्रकू-(.१५
"पलान्रयपरिवतो देवः पथ्येन रान्छितः ।* इति पाठः
<}, 50-51 "मादो दिष्णुध्रोक्तोःः 1 03 |
इति स्तोकमात्नं मरन्थान्तरेभ्यो दशितम् । मन्ये, आक
सवंऽपि श्लोकाः प्राप्स्यन्ते । समयाभावात्, काहुल्यभिया च, अर्म
101, 566 (रिक्त लप८१त्6 ५६०७ 9466 कक 7) पैलः (9 त4दताथ °
102. 866 ` /प0405 व (57, ), 2 तवहा एप उपप्लव |
7८17744 26 व402} 0 = रि 200६2108 चतवव ्ता3 पीतल {06 क वा्ल)3९6 ०
2 ४18४8 9 4424) 90 (6 ७4068 (50114). िता21052102
प28 (116 ह€व(-हा ववज (०1११८ 06.442} ना 16 (लला 26व 4 ६9३६8
9 ` (16274748, 16 वजाः ज दवद) गा6 9 176 ०65 लला तदव
` ए. 348--57
` 70 बकञ, व्छप्लपताप्कोऽ 0 एजतो वपते कहत }8. ६6 7. लणलकब-
द्वृ) (वदाण = -लववणदद) (वकवद्क्द्ा6व क) (दव छतर);
, | ०३. 8० ए, ए. 357. “शवसेभव वर्यमेदेन पूजने सूरि.विशेष उयते ईमादौ
^ विदि 1 | ६
५ . ।
तथा, (मत्य संबन्धीय-९ शदरोकस्थले (जनादन संबन्धीय-९रदरोकपाठे कमभङ्दोषस्य ।
परिहासे भवेत् ।
<. 64, 65, 67, 6 [वद्मा (0) {€ 4). वा, (), 24.
^ 180, (01016 [लादहता, 1 2111014.417क(101. "०94
तथा 'विष्णुधमोत्तरे' पाढमेदाः ( वि० ध० । ३ेयख० । अ० ९४ । )
-- मारकत०- -- ~ -।
-- - - - स्ततः॥ ६४॥ (२ वि° धर)
~ - - -श्छयविभूषणः। (३?)
-- - - करापेन विवर्जितः ॥ ६९ ॥ (४क)
-- पूणंङ्ग्मञ्च - - ५ (ब) ..
- ग्रमे त -- -- तथास्य रचिता०-- ॥ ६७ ॥ (पक)
तथास्य १ भगवान् -- -- "धरो करौ । (ख)
१८यदा इति पाडः । )
[ न कत्य कर्तव्यौ देवपादधरौ । &क ]
फिल्चि०- क -- ६६८१५ (६ख)ः
तथा ष्देमादरौ दानखण्डे' उद्धूताः पाठाः -
ूस्यजानूद्धं जानुश्च ~~ ` ~~ ४
परभारसंस्था तु सौवणंकखयेन विवभितः* ॥ ६९ ॥
| % विवधितः क्चित्पा्टः |
छत्रन्ते ~ ~ ~ । 3
विष्णुः पुरशरेत् कार्योऽसौ द्विभुजो रचिताञ्चसि"रिति पाठः
कल्पितः ! 'प्षदरधविभूषितः+--०विभूषणो? वा गर्डः कथं "करापेन विवर्जितः" स्याच् ।
इति पाठ एव साधुः ।
वथा ` यद्ल्व .. ~~ (६८ क)" पाठः साधः।
1.1
एवं पालान् विचार्यं (६प्ररोक्े) "कलापेन विव्भितः” इलयतल्माभिः श्चद्रत्येन परि- ५ |
पूवं सति च तस्य सोन्दथंहानि्मवेत् ¦! न हि गरुडो हुदंशंनशच कदापि, पक्षान्तरेऽसौ मीम- `
कान्तश्च हर्यते । एतद्विवा्, एकवाक्यता चानुसन्धाय, अस्माकं मते “कलापिन विवर्तः |
तदनन्तरं इकोकार्ध॑ः परित्यक्तः--“¶ न करव्यो कर्तन देवपादधरौ । ] ” समीचीन = |
1034. लप्यत (4 क० 2१ (62010८4 ८८्द 77047८2), ^. 9, त |
{9
मवत्, यदा ग्ड विष्णुयुष्ेत् तदा चाऽल्य पादौ भियरेतेति । द्िहस्तस्य गर्डस्य युगपत्
छन्नक्ुम्भघारणं विष्मोभरवहनं च हस्तसाष्वाघ्यं विनाऽखम्भवात् तेनेवमल्वधौ भवितुमषति-
| भ्यदास्य धृष्टे भगवान् भवति, तदा गदडस्य करौ छनरङ्कम्मघरो न कर्तव्यो ` इति ।
| क, 71. दलया एला पा 4.4 वातै [4 (1. 25 ई
111, 1120. |
तत्र पाठमेदाः --° जिन्युपवीती -- छृतकसण्डलः ।
| ~... -- `. महोवुरः ५१८ ॥ ७१
वु्पो वामनाकारस्तथा ८ ब्राह्मण~)बदः सहोदरः एव भवि
९. 72. शहूपमण्डनेः "०५५ रामल्य दादरभरेल्तथा बरङरामस्य एवं वणनं प्रप्यते--
(रामदशरेपुषटकुख्यामः ससीरसुसलो वलः । तेनाऽल्माकं मते प्रासस्य ॒शछोकाघो- |
` दुनन्तरं ८ ७दभ्छोके ) बररामल्य अनन्तबलरामस्य वा वर्णनमासरीत्। तत्य च रलोकार्ध
भ्रमात् परित्यक्तं, मन्ये । बलरामल्येव आयुधौ सीरसुषलो । `
। ५. 72-74. "शिस्परलाण्ुतं "४१ मन्ये 1 ६1९. 1, 1111. 27; <. 11211;
तत्र पाठमेदाः- क
(७२) --कोभिवम्। (७३) --फुष्टखोचनां । |
| ५1. 76. शजिल्परलेः 1०; ७४कखोकत्यानन्तरं दखोकोऽयं विन्यस्तः । तेन प्रसागा-
` स्तरमिदम्, अघ्माकं मते स्थानव्यत्यासल्य । ,९1. [[, %;, 4. 116.
9. 7-80, 82. श्ञिल्परकाुद्धुताः । 5.0. [[, 27, 4. 117-1214.
„4. 83-85. “क्षिल्परलसंयोजिते कषमिशचिद प्रथेः? *०५, तत्र पाठमेदा-
(८२) प्रमत्तवदने०-- ! (८४) -- न्छम्बिनौ -- ।! -- वासे शंखं -- ॥
(८९)--( गदां रम्यां ) ङिखेचित्रविक्छारदः ॥
ध 0313 प पपप्म [1/1
८11. | | [ष
^ 4. १086 1656 तृप्णव(ना३ आत 2150 हृष्टा पा क, 4. (कुर्म 1२80;
क 00. ८26.} [ऽप 91 {0 3161116 $€ा51010 र ^^ ५ | . "न
` 1038. 87. 4. 6. 1२०; 0. त न | 1
10०38. @प्ण्धत्व्) ब5०, एष क. &. ©. [२०0६ 06, ८, वकल त्ता ध, ४
| गाणलः श्लञ्चनगा ज ०.९.) पणता इ0पालप्पा@ हा ९०8 एन्ला पदवतप्ठुऽ, --न्नोच्नां ^
1 १ १ 5[0पात् 1€2 ष एलहिः ६0 16. 96४, पा16 15 35६00्79्त्व्, पाध [ला [क्त् ऽ [तप८6, । ॥
1.1. 1110 ॥ ८ ^ ५. ~
| 1036, ` 300} व, 4. ©. 26; 6, ८८; पत् ९९२.
` 10 {* ` €प01ल्व् 11. , 4, 0. 220 14. ८. ५
९. 86.99. विष्णुधर्मोत्तरे यखण्डे ८ १अध्यायादेते ( इटोकाः, २--७) गश्धतः ।
तत्र पाठभेदाः- 4 (9; ^ ^.
(८६) -- शेषपत्नगतसर्पगः *५५५। फणादुञ्ु०--दुनिरीद्यशिसेधरः ५०५२ ॥
(८७ख) विष्णुघमात्तरं रेय-ख० ८१-अ्र० (३--४)्)कयोः पादैकेकं परित्यक्तम् ।
तद्यथा- |
(८०) स्वस्वरष्षम्युत्सङ्गतः प्रमो
तथापरश्च कतव्य स्वल्वप्रभो ०५४ ।
(८८क) एको अुजोऽस्य कतंन्यस्तत्र जानो प्रसारिदः 1०८९ 1
` क्थापर्च -- - प्रसाधितः ५०८ |
(८९्क) तथा चान्यः करः कायौ देवत्य तु विरोधे ५०८५।
तथैवान्यः - - धरः 1०८? |
(८श्ख) - तथेवाल्याप्रो क १५१९.
(९०्क) सव॑पृथ्नीमये देव्याः प्राग्वत् कावंः ~ 1०६९ ।
-- परथ्वीमयो देवः ~ 1087 |
(रन्ख) नाल्रनौ -- - - +०२-४।
९. 91.98. श्ह्पमरण्डनभद्ि्ेषो नाल्वि । केवलं ऊत डतर कारकन्यत्ययः हृतः । = `
संख्या-कमयोवा व्यत्ययः दृश्यते ।
<. 94.115. श्टपमण्डनगत् छत्र छुन्र विषाः! तेषां च प्रदर्शनं श्रीमद्भिः `
टीकाकारः चिष्परेण कतम् । इत्यर्मधिकेन ॥
116. एतदनन्तरं चहु दश्यते “दति विष्णुप्रतिहाराः”, तस्य स्थानन्तु पू्टोकाच्च =
(११५)अनन्तरं मविषुदुचितमेव 1 यतोऽगरम् भन्यश्छोकस्तु भाशीवेचनख्पः धथक् वत्तते ॥
षष्ठोऽध्यायः । (47 ४1.)
&1. 1, 2४, 2९. शडपमण्डनगइ गृहीताः 11०, छत्र कुत्र विधेषोऽप्यत्तिं । “खः = ।
| इत्यंशो नास्ति तत्पुष्तके तत्र पाठमेदाः-(१)--°युतं कुर्यादा क०--\।
पि मा न -------~-~---------~- 7 0)
त .-५०५५,-५५१४ ५५
1040--1099. २6प४5 वप्०ाल्ते, विछ, (16 = ८2. पणा जल धात्
| ` एाल्छपपा्रर एलः एलअं०ा), 7 ¶, 4, ©, 1२0: 00. न. ध
110--115. {1686 ` पृपरव05 276 211 कणर 1, & (01211188 ` ‰20 >.
| ` 1 1049--1092. {२681788 १८०६९) ` ग्य पल कषत 4. न ४6 10. ( (1... 1
(1 ) | अ ५
[{ ॐ |
` (रक)-- -ङण्डराभ्यामल०--। 'खपमण्डनेः (रख) नास्ति |
(रग) सद्योजातं-- ---पाणिकम् ५२॥
८. &--. श्ड्पमण्डनेः 11 छत्र कुचर विशेषः । तचथा--
(४) जटाचन्द्रधरं ङुर्यात्-- --। वामदेवं--॥ (५) सर्वाल०--र्त०--॥
शरूपमण्डने" प्रथमवतुथंपादौ न स्तः!
<. (6-- 12. “स्पमण्डनेः उतर इत्र भेदः 1 तयधा-- |
( शोके )- वदनं - - -कुण्डर्मण्डित्ताम् ॥ (जख) | यो वत्त-- . ।
गले--नकमािकाम् ॥ 3 व
(<ख) पिद्धाक्चं-॥ (९) -०कः -- ०कध्ेव पादस्तस्य नषुरो ।- रूपकं इूर्यात्कार०--॥
| (१०) - रिपोस्सह्ं -॥ (१?) -च कपारञ--पाश्च एव च 1--शव्यमिदं
श्०--॥ `
(१२) ~~ परशः खड्गो दण्डश्चवारिमदनः । शख्ण्येतानि चत्वारि दक्षिणेषु करेषु च ।
भस्माकं मते, ( ७म-ष्ठोके) '्योऽनिशं वथा (१२) "दण्ड इत्युचितो पाठभेद ।
( ई-श्लोकल्य प्रथमपष्ं ) छन्दसश्च पातः परिहर्द॑ग्य |
७. 18; 14, शश्पमण्डननद्धेढो > नास्ति | द्वितीया-स्थटेषु तत्र प्रधमान्तपार
इति विरोषः \
५1. 15; 16. हपमण्डनभत् 1 1"; छत्र कुत्र भेदोऽस्ति |
(१९५ख)--गरत्युज्चयं--०न्दरमूषितम् ॥ (१६) --०मक्षमाख च दश्चयोः करयोरस्छ्तः ।
~ --°कां वामे--सुद्राकरट्वयः ४ | ४ ` ।
` ल. 19. (खपररण्डनभत् +: किंचिन्मात्रं भिन्नः तद्यथा-
(१९) रसनो -०बाहुः--०पादाक्षपाणिकः \ -->हर्तोऽसौ किरणा्स्िकोचनः ॥
5. 20. “~ ( भक्षयन्तं >) महद्वयम् ॥ २० १ इति सतेऽल्माकं पाहः कायः ।
<. 21, २०५. शहपमण्डनगत् 1 > कुत्र छत्र विदेषः 1 |
(२९) --गव्ल० --कुर्याचित्र°--) (२२) खड्गं धनुः शरं सेरं श्रीकण्ठं विध्रतं सुनः ४
<. 25, 26. अस्माभिरनेकानि 'सदा्चिवश््यानानि समासादितानि 1५ ।
छन्तु ध्यानमेतत् न इपूवंमासीत् । अपरध्यानान्यनुसुत्य संशोधनं क्रियते । |
५५५ ण [1 ०७ त त ५१०५५ यणा मन
र नण म ०४ नण
ध क कन
व
0111 | 0४. ८; पापल, पलु्क्ञला४8 चल (स वावषव्क) का साठप्रह्या उरत् ऽप
1 तािलप्ला रला्०ा), 9 | 3 ५
1 छ 116. 566 {€ [लला प्रलाः कजणन्टावा), उदलकण्व करक 2 दवः 0.
५ ॥ 1 ॥ 2९" { ८40 2 50) स वमक (रदा, 7. 2. 4. 9, ल. (पदल्ण क
1 ( -इल्प6)) एण् का 935, पण = ५
[ 58 1
(२५) पद्यासनं शिवाच्छायं०--। पञ्चवत् अभीःशक्ति०--॥ (२६) --°सृत्र्च--\ `
इच्छाक्ान[क्िया]स्टक्चएतिनेत्रं 0सानतोऽणवम्
| शिवह्तावत्\ “गि रिजाऽभिन्नदेहः,” ^" दच्छान्तानक्रियाशक्ति-च्यसंक्टष्वलोचनः,* `
ध्यानान्तरेषु प्राप्यते । तथा (जानन्तु शद्धरादिच्छेत् मोक्षरिच्छेत् जनादेनात्ः इति स्मयते,
तेन सदारिबोऽपि (ज्ञानाणवःः भवितुमषटंति ॥
&. 304. ५ विष्णुघमोत्तरे ॥ )* इति गोपौनाथपादेरक्तम् !1° । किन्तु दुभौग्य- = `
वशात् भूय्रशोऽनुसन्धानं इृतवद्धिरल्माभिरेतहु ध्यानं तन्न अन्यन्न वा सवं न समुपरन्धम् । =
ङ्त्र ऊत्रचित् (२७--३०)द्लोकानाम् आभासमान्रं वत्तते ।! तथापि गौपीनाथपादानां वक्यं
व्रासाभ्यस् ॥
५८. 31, 32. 'खपमण्डनेः "5 अपि । छत्र कुत्र मेदी ह्यते--
(३९) “वध्ये उसया-। मातरिद्धं-घत्ते-॥* एतदनन्तरं 'रूपमण्डने' श्लोकान्तरं
ह्यते सोऽत्र परित्यक्तो यथा-
भालिङ्न्वामहतस्तेन नणेन्दरं द्वितीये कर ।
हरस्छन्थे उमाहल्तो दपंणं द्वितीये करे ॥
(३२ख) “छङ्धिरिटि-°न्निमौसं रत्यसंस्थितम् ॥°
<. 38, 31; 3:54. ्ृष्णश्च्कर ध्याने तथा ष्णकारिकषेयश्व्याने तु प्रन्थ- `
स्यतघ्य महद्र शिष्व्यम् । नेदम् अन्यत्र कुत्रापि अल्माभिदटपवस् ।
[॥
५1. 36-- 1. भमत्स्यपुराणगदु" ° विशेषोऽल्प एव । तथयथा-
(३२८)-- -दयाद्रदाग्वतः । शाङ्कञेवेतरे --॥ (३९) - | --मभणिभूषणम् । दक्षिणध-- | क |
--०मदधन्दुक्ृतभूषगम् ॥ (४१) -- कव्यं छृत्तिवाक्तसम् ।
9, 9 “3 -[-{-- 46 ; -47--(~.. धयानन्नमेष्वेतेषु च म्रन्थल्य वेशिष्य्य |
वर्तते। छत्र ऊुत्रापि पाठानां संशोधनानि कार्याणि । तदयथा-- `
[००1
एञन्लव) 00 रक [, शििर्पवणंनानि, 20050८0 ८८ क् । |
` 9. 225--2.{2 ; वत् {60८४ च. 4. 50007 क ७0४4 (06८८)
2. (22०८2८८ वरा ध [0 व) न क ७वणरच्छय. पुराखेक्ता ५
1 सद।शिवपूजापद्धति । (27475402) 0, 253; 54 ¦ ^
11. 4. 4.6. 226 0" ८
118. . 2 |
ध 119. 10240407 00 व (81) ष्डं 24.) €.) 4, 260) 4, 219४-2 ५ , (|
. , 279 15 01721६64
॥ |
हि| |
^
.॥
॥
|: 84...
( एर श्लोके }) तनुव्येक-नि--` (४४) "ऋ(ज्वाोसुखगतःः *-५ ।
(४६) “एवं विधोऽयं कर्तव्यः -->प्रदः # (४८) "(षटेगालीद्ध ` इत्युचिताः पाडः स्युः ।
कारकाणां कमभङ्गश्च परिडरतन्यः। = ` ॥
| छ. 22, 53; 0, 55. स्ह्यमण्डनेषऽपि : <: प्रायशः प्वंस्पाः सन्ति।
दीक्ाञ्द्धिरपपालयः क्लोधिदाः ¦ |
<. 56, 57. भविष्णुधर्मोत्तरः ५२ धयानमेतत् यथायथं प्राप्यते !
<. >. अघ्रापि ग्रन्थ वं शिष्व्य" दत्तत । कृप्णशद्रयौः संयोगमूर्तीनामन्य-
त्रा्द्नात्) मन्ये, ९८ख-दलोकाद्धं श्तेया द्विजन्मनो बुधं; ॥ इति परो भवेत्। तत्र
"द्विजः इत्यक्षरदयं हु निश्चितपेच । | |
<, 59. 60. शशिल्परत्ने" उन्तरमागे, अ० १ दइखो० २० आरम्य, अनन्तरं, तथा
अ० २ शो १३; १४ इत्यत ष्टव्या
7 ५. 65, 66. शशि ₹० उ०) अ १ रखोर ४२ आरभ्य अनन्तरं, च द्टन्याः । 3
` तत्र "्वीयंकः इतिनामा कोऽपि बरृक्ठौ नास्ति। भवीरिः, चीरः, चिरश्चः बिल्वान्तरम् आयु॑दीय-
(वैचक- )निषण्टषु' `» प्राप्यते । तेनाऽर्मामिः व्वरयक-पाठः प्रामादिको न वा निशरतुं नेव
ष शक्यते । अत्यः 'वीरा'-तामल्की-तमालौऽप्यस््ति निषण्डरषु | घुपविकेषोऽयं तक्षणकरम॑णि ध । |
अनुपयोगी ।
| <, 732. श्छत्युञ्चय-विजय ॥ } क्रमात् । इति पाहः स्याच् ।
4. ३५.86; 81-89. "मवसतेः अ० ३३२को ४०--४२, तथा ४३--४९श्लोकाः
तुरनीयाः । भन्ये, तस्मषदेव बन्धात् एते गृहीताः । तत्र पाठमेदा
| (८४)--श्िवायतम् 1-~- भानानि || (८६) भूतगङ्खाश्निर न ] | ---सावंकामिष्छं- ॥ क. 4 ५५
| 1. 98, 99. शश्षि> २०२ उ० ८२८, अ० र इलो ११३ ११०क-भ्लोकाः; तथा
भयमतेः भ० ३२-ो० ६र्ल--६३-श्छोकाः छखनीयाः । मन्ये, पुरुतकयोरेतयोः रोका एते
गृहीताः! शशिर्परत्ने एकोनतिशाध्यायेः ( ११३--११७क )स्सोकानां च उदेखो हम्बते \
120, € ऋजु (0 पात् ब्राञ्चुष - 17८४644 216 (110 पा८5 ०६ सधान 06९5 वातु
. , स्थानक ८५८८1८6 0 11 ददु, ~ नवाथ >, 1 -444, 16, 9 64.
"नु स्यात् ससुखं स्यानम्. ` १ 91 | ।
121. (1. 4, @001 (24 1९५५: (0. ८
422... 20 (4. ८2८
(^ ध : ५ 1 123 ०66 ` । राजनिकण्टसहितो घन्न्तरीय निघण्टः { ` आनन्द गमस तयन्धावंलि, (4
: ग्र्ाई. ३३। शक् १८१८ ^ 180 566, वनोषधिद्प॑ण ॥ अभिनवनिघणर्ट् । राजव्दय ओमिरजाचस्ण
. गष कान्यती् कविभूषणक्तत! दिती संसरण । वङ्गाब्द १३२४ । ध
124 ‰18० व८०६6 प 7, 4, उणूप्वपत (०० : 2. ८, (षा) पठण (3
श । 0;02-60 ४ {51011 19१३ 921000८) <4 4, 2४
<. 122. 139. (मल्स्यपुराणेः२८५ अ० २६२, रो० १३--१६क, दरषटव्याः
<. 134.138. आद्छपुस्तकं चिना यथाशक्ति शोकानां पारञ्ुद्धिः क्रियते, केवरं
सिपिराखं वास्तुदाल्त्रं च विचायं । तद्यथा--
(१६श्छो०) क्ण ]कं साध्यं मागं [मोगं]कञ्चि(कं भि)त्तिका मता ।
द्विभागं चान्तरं कपोता विद्धि(द्धि) साधेकाः ॥ (१३६)
अधंपंचस(चं) ध्रास्(साय्रोपहि - १ (१३७)
-- ऽपि कार्या कृणके तु भारं(ग) [धं] क् ।
-- -- १ तत्] म(स)कषद्धिते (सरितम्) ॥ (१३८)
कपोत ! 23 स्तावत् तत्पक्षिविकेषाकारोऽल्ङकरणयेदः बन्धविशेषो वा । तस्य वर्णन- `
ठग्रवहारादुयः वाल्ठुशास्छषु भ्नु्न्ययाः ल्थमध्ये भूयशः (त-कार- नकार ९,काराणां
परस्परश्रान्तिरिव अस्साकं पालोद्धारे मानम् ।
=]. 1111-6. म््स्वषुराणेः अ० २६२, ६--१२ शोकेस्यः उदटृताः एते। `
विशेषस्तु अस्प एव । तद्ग्रन्यमवरम्व्य संशोधनानि क्रियन्ते । तथथा-
(९४ छोके) "्वेरी पाटः प्रामादिक एव, स्वतो वंरस्यजनकत्वाच् । तथा भमत्स्यपुराणेः
वेदी-पाष्दरनात् वेदी पाटोऽस्माभिर्ड्ीक्रियते। (१४४) सद्राणीसंतोषप्रिया |
=. 147, 148. (सस्स्यषुराणेः अ० २६२, १६-१८ शोका एते । १९क-ष्टोकाध- | . ध
ख्तावत् त्यक्तः तदहुयथा--द्देवस्य यजनार्थन्तु पीठिका दश्च कीत्तिताः? ।
६1. 119, 150. तत्रेव प्रन्थे, १९-२० तथा १३-१६ श्टोका एते । भयमत्य, = `
` च, अ० ३४स्थर, ३श्छोकौ अत्र स्थित-१०९-श्टोकल्य छायामावहतः । ष
=]. 151, 152. शह्पमण्डनदुद्धवाः किन्तु तस्माद् प्रथमश्छोकाधेः परित्यक्तः
तथयथा-- |
श्ुलटिङ्ं त्रिवक्' स्यदेकवक्तू' चुम खम् ।
“सन्मुखं चेकवक्ु' स्यात् श्रिवक्त पृटकेन हि \
-- -- जतरे। -- --०कराषं स्या्प्राच्यां -- ॥ १५१ ॥ ` |
-- --- तत्पुरुषं -- । -- -- ॥ १५२ ॥""
&]. 167. मन्ये, “धृपमस्य ( विभोरन्ते ) िद्धे ठं नियोजयेद् * इति पाटः ` ५ |
1258. 11८ (४2:18) 2.0.) (21). 4८14. 262, < 1.3-- 16. (
12६0. पताः क 00) कपौत् ४ व् ०012-5 व8८क लाात्रप्ला६ ता तप्त |
| एऽहत् उ &्लुहल्लप्राल, 8द्€ १, (९. दतान2 ; 4 2270700क1 क 7 4८6. |
^ - 11६, $+ त 4 1
[. -56. . }
=]. 169. त्रा “पादं जाचु-- -- । स्थाननादं-- ॥ इति पाठः कार्यः,
=}, {69. पााद्चद्धिबहखल्य शछोफस्य संशोधनं, प्रतीकस्य चा आदृशपुरतकष्य
दशनं विना सम्यक्तया कन्तुः नेव शक्यते । तथापि केवलं छिपिशास्च' विचायं आदयद्टितीय-
पङ्ततयोरेषं परोद्धारः करियते -““धात[] दितं प्रति(थोऽ)तः कल्पनेऽल्य रूपं
तत्पादयुग्समगमद्र्था (लौ) हरिं रश्र ।»
सप्रमोऽध्यायः |! (वुल प)
अध्यायोऽयमेतल्य ग्रन्थघ्य महान् विशेपः! नजननहरिवंशाष्दो शासन्देवीप्रश्तीनां
बणेनानि प्राप्यन्ते । तथा नल् चास '** प्रसुलाणां शुरोपीय पण्डितानां ब्रन -परवन्ेषु
जेनसूती ना वर्णनान्युपरम्यन्ते । तेनालं पिेषणेन । वाहुल्यभिवा च विरम्यते ।
अष्टमोऽध्यायः । ४१11.)
` ग्र्पमण्डनेष्पि "<> किञ्चिद्धिन्नमेतद्रपं ध्यानमस्ति। पादमेकं तस्मात् परत्यिक्त' च।
` ्दययथा--
गोः -- -- --° निणयम्
-- ~~ -- - - - - -- ॥
५ अक्षसूत्रं तथा पद्ममभयं च वरं तथा) भ +
--०नाभिता मूत्तयु हे पूज्या भिये सदा ॥
| <]. 3, 4, 2, 7, 10. खूपमण्डनभत् 12० कुतर कुत्रापि भिन्नानि ध्यानानि ! मन्ये,
तत्र ( १०ख-श्छोकाधं ) एवंरूपः पाठो भवितुमहति--
| ` 'अप्रतीतोहुमवारपा ८ अप्रतिमोदुभवसूपा )-- -- ॥ १० ॥
&. 13, 14. 'खपमण्डनेः "2, किंञ्चितुभिन्ने ध्याने ।
3. 157, 16, 17}. “रूपण्डनयत् '%० किच्िदभिन्नानि ।
€]. 16-20. शह्पमण्डनगत् ५५1 कियन्म्राघ्रो विशेषः! र
&. 21 ; 22-23 ; 22. ख्पमण्डने'ऽपि २ सन्ति। तत्र तु रश्छोकल्य
` ` विषयत्तावद्धिनायकः । कारकन्यत्ययश्न कृतः । देरस्बध्यानन्तु किञिदभिन्नम् । वक्रत॒ण्डल्य
५ ` तावहं ध्याने विशेषो नास्ति |
3]. 29 ; 30-34 ; 35. शह्पमण्डनेः 1५४ ऽपि सन्ति । विशेषेण भेदौ नाहित ।
126. `. ए0ः (16 पाम धल ज भऽ पाद्व; शकल तवक
ध १ (0 , 566 क, 47264. गदा, 4559, 2त् 75८० छ 0श्वकण्छकय 1
1: ५ 70174 {05 कका 14050225, त्क, 10. 222, 464
127--33. @प०६् 1 ¶, ^. तगु ९20: 6,
णीन
[ & ]
<, 26-42४. सरवंऽपि श्लोकाः 'सत्त्यषुरागाद् गृहीताः ५० अ० २६०, शोकाः
४९ख--९१। तथा शशिल्परलेः 1५५, उत्तरभागे अ० २९, १२८ख--१३०ष्टोकानां कुत्र
कुत्रचित् ३६ श्रोकाः छारा अपि आदधते । 'मत्स्यपुराणयत् छत्र डत पाठभेदाः सन्ति ।
तदयथा--
(३६). कमखोदरवर्णाभं-- ॥ (३७)--दण्डकश्चीरकय्॑तं-- ।
स्थापयेत् स्वेष्टनगरे भुजान् हाद कारयेत् ॥ (३८)- खवटे-- । शक्तिः पाश्तस्तथा
खड्गः-- ॥ |
(३९)-- स्याद्य चाभयदो-- । -- केयृर-कटकोज्ज्वलाः ॥ (४०)- प्रसारिता ।
(2९)-ण्वामे स्यात्-- । - --"पाशो--त्वलिः ॥ (४२क) ~~ वापि दक्षिणः
स्यात्-- }" ग्र
=], 12-471). पञ्चलीलया(जा१) न अस्माभिर्हश्पूर्वाः । सन्न, म्ल्थल्य चान्यद
वेशिप्व्वम् । च्वृददुवरह्यसंडिताय? > कानिचिद् वचनानि सन्ति। तत्र 'छरिता"दिदिवीनाम्
उद्धेखः प्राप्यते, नतु तासां नामानि
~]. 50 ; 52.58. “रूपमण्डनेःऽपि ५५५ सन्ति ।
<], 61-7::, श्विष्णधर्मात्तरः >` यथाथथमेव सन्ति । तत्र भेदा अक्रिित्छरा
एव् तद्यध्रा-
(६) -- रड्ञुजा --॥ (६२). पिङ्गला भूषणोपेता - 1 -- सुवं --॥
(६रक) -ङण्डी वि्नती-- । (६०) छश्ठेन्दु०- जटा जह्ध--°डखप्रदा । -- वरदा --॥ `
(६९क) शरख्वण्टा० -- । (६ क्ल) पताका -- पात्रं -- ॥ (६७) -- -- षण्टां --
कुककुःटन्त्वधः ।
गामि त मिता न क् कभभ
1312. 14 00.010 द) 12, 260 ( 1 प. €१।८प12\.
1340 20007705, 55. 1 47. 25... ध, 9,
735. नारदपाचरावान्तगैता चहृहुब्रह्यघंहिता । पाद> र, अ० ४।
तद्यथया-- । ष 1
॥ “व्योषं साममलीलातु या लोला सौऽखम्रहं पुनः ।
„ अन्तरं नेव पश्चामि यथा तै शेषशेषिणोः ॥ १५२ ॥ `
नित्याय शक्यो चसा ललितायाः सुमङ्लाः
अथौ नित्यविद्ारख रसन्नाः कोतुकौच्चलाः ॥ १४५९६ ॥*? = (५
= ` वावा 6, 9611658) 0. 68.
४ 136. &66 {, 4, ७ 00112112. २20 0, ८2४
7, (८५४९ 1 2. ८. (१) कमलेमिति कां । (र) वर्गि-- पान्-- ||
दति “शीतखनिधिःपाठः । "दिष्ुधर्मौत्िर'पाटः।
५.4 ८.९ |
9 ००५५१ १५००१०१० ५५०० १ +
॥ + ॥
"~~~ तक्ष्णां ~~~ ~~ ॥ | (६ ८ख) न गद्धिनीं न निश्रती चाभ्तुज० क |
(६९) -- ऽभयान्वामे सा वेयं --) - - महोदरी ४ (ऽन्ख) -- ऽमयान्वामे ॥
(७९) -- -- रत्य -- । क्लं १ -- ॥ (रख) द्द्रो्या -- -- -- ५ (२) -
कवचं शरम् । अङ्कुशं -- [ दक्षिणे ] स्वध -- ५ -- --°रण्डं ~- चेति ।
(७४) -- सा हिवरूपा च विहगा । - वर्तरब्यक्षा -- ४(७५क) -- -- न्विता )
एतेष सध्ये ( ६८श्ोके ) विहितपारेव समीचीनो । तथा (७२, ७३ गयोः
विद्धितपाटाः एवोविताः । (७२ेख) [दक्ष] चाप्यधः इत्यपि साधुः पायेद्धारः ।
=]. 76, विकरणम् इवि पटं न साघु मन्यं! ( विकरालम्) इति
भवितुञुचित एव ।
शु. 771), 73. 'र्पमण्डने*: ०५" एवं पाटो ऽस्ति । तथ्धा--
| “व्वीरेन्वर्च -- - धनुधंरः । (1771)
ीणादष्तव्रिशयूय ( वीणात्रिदयुटदश्त्च > (7)
(7 ेमातणामग्रतो भवेत् ॥
सध्ये च मातरः कार्या अन्ते तेपां विनायकः ॥ (173)
` (मत्स्यपुखणेः "४६, अ० २६१, शोर ३८ख--३२ एषंर्पाः शोकाः सन्ति } यथा-- |
““व्रिनायकञ्च कुवीत मातणामन्तिके सदा ।
-- ~ ~ जटाधरः ॥ (1)
वीणाहल्तच्िश्चूटी च (182)
(1 8)मातुणा -- -- ४
'अभिरपिता्थेचिन्तामणोः ५५०८ ३ेय-प्रकरणे, अर ?, शोर ८३७ एवं पाशाः सन्ति ।
यथा--
| 'वीरेदवमे विधातव्यो मातणामग्रदस्छदा ।
वीणान्रिश्ूटहस्तश्च वृपाख्डो जयाधरः ॥
तत्र 'वीर्दवरःस्य कुत्रापि धनुर्कणधरत्वं न सिध्यति । तथा वीणावादने हस्तटयस्यापि
उपयोगात् , चतुहंस्तर्विरिष्टस्य व्वीरेरवर स्य बाणधारणासम्मवाच्च, अल्माकं मते--श्वनुधरः
` जाणे' इत्यपपालो । तेन शलोका्ंयोः पामेद्भारस्त एवं भवेत--
५ (७७ख) (वोरेदवरश्च भगवच् -- जटाधरः ॥ |
(७८कः) वीणाहस्तच्िद्ूलन्च वरं चेव प्रका{श्षयेत् ।
1
` 1348. 3८€ . ^. लला 6 : ` 0.
1389. कवक (ग्ट एव. 81.)
। 1386. कयन, 33, पि 63 (43०6) 1926). ए्र,
[ न
[ 59 1
>. 79 ; 80: ; 8170. (खूपमण्डनेः :ॐ० वतन्ते । तत्र ८ <ज्क-श्लोक्षे ) `
“अक्षाज्जवीणापुतल्तकंः इति छन्दोऽनुरोधात् स्षमीचीनः पाहः |
1. 84] ; 8, अक्षपश्चपुस्तकाऽभयाः हि विन्यासमेदेः मह्मरुदमी-महाकाली-
महासरल्वतीनामायुधानि । तेन पद्योत्पर्योहभयौरव एकत्र अनुपयोगात् ( <४ख-ररोक्ाधं )
'अमयाक्षेः इति पाठो भवितुमुचितः! देवीमाहात्म्ये साकण्डयपुराणीयेः च देवीत्रयाणीं
छक्चणानि अनुस्न्भेयामि । |
31. 86--80. 'विप्णुधरमो्तरः ५५० इेय-खण्डे अ० ५१ श्लोकाः ८--१९१ प्रायो
यथाययथेम् उदुताः । तन्न पारठमेदाः यधा--
५५८ ८६-श्छोक्े ) आरीदल्थानसंस्थाना*१ चलुःसिहै स्थे स्थिता ॥- (८) १ खड्गं
धमं च याद्वन । बाणचापे च कतंव्ये*-- ५
(८ क) हर्तानां -- -- °च्छान्तिकरः करः१ 1 -- महासागर -- प
५ भविष्णुधर्मोततरेः+^ पाध्येदाः यथा-(८दख) -गस्वासनल्था च चतुिवे-- ॥ ` |
(८७)- खड्गश्चन्दशच यादव ! । ~ शङ्कपदये -- ॥ (८८क) सक्खवो ~ तथोदककमण्डह्।
(८ रख)- महाभाग ! ~ ॥
नरसिहप्रासादरपाठमेदाः यथा -^(८६ख) --°स्थानसंतस्थाना ॥ (८छक) खड्गं चमं `
चे सदृ 1 (८८क) तथा दिव्यकमण्डलः । (<६क) भनेच्छान्तिकरीऽचरः* । तेन अल्माक
ते, पासेदान् सस्यक् विचाये, एते समीचीनाः पाठोद्धारा यथा--
०(८७)- खड्गं चमं -- ! बाणचापे च कर्तव्ये -- ॥ (८नक) छुत्खूवो -
धोदकमण्डलुः 1
(८६) ` हैस्तानां -- करस्तु -- । ~~ सहसाय {-- ॥"
&, 00--09-4. '"विष्णुधर्मोत्तरहुगृहीताः "५ किन्त्वन्तराऽन्तरा श्लोकाश्च केचन `
धरिव्यक्ताः । यथा-- | व
(९०) ~~ चण्डी हेमाभा सा --।
तिनन्ना योबनल्था च -- -- ~
चारपीनपयोधरा ॥ -- - - `
ना
139. 8 व. ^. उणा ९६०: ४. ८
140, ष्ट} @॥. न + (१) 50 - वृप्ठ॑ल्त् व {116 ऽतप. १ 72, 18
४]0{02+@11$ 2 011616६ ४6810. |
141, (2००६6 एङ 1 ^, लन 20: 00. व.
(९१) ` -- -- -- -बाइविक्षतिसंयुता ।
-- -- शद्धः --बाणशक्तिपवीनपि ॥
- - - ~
(९र्क)-- -- सा सदा श्चुमा । ५
(९२ख) --०करल्छन्ध० ~~ ~~ ॥
(९३) -- - रक्तभ्र॒०- ।
- ~ ~ -\
(९४) याम्याङ्घ्रयाक्तान्त०-- -- गङ्घ्यारीढगाघठरे ।
-- -- ° शेयं चाशेषरिपुनािनी ॥
<. 95-- 100. 'रूपमण्डनगहुगृहयैताः '+>: किन्त्वन्तराऽन्तरा व्यक्ताः! ङुन्न
उुश्रचिह भेदोऽप्यल्ति। तथथा-- ` | | ५
(९५) -- ण्याः प्रतीहासस्कथ०-- ज्क्रमात् | |
` वेतालः करटश्चव-- -- -- ॥
(९६) - कड्दश्व - -- । । ह
ेटाननविकटास्याल्स्फुरदशनोदय ॥ |
।-- -- ~ -]
(९७) -- चेव साङ्गमूध्व-- । [ ॥ ]
~~ -- --०तोऽपष्चव्ये करटः पुनः ॥ [ । 1
(९८) -- नखरं च - - । [५]
घामाप०-- -- --°नामकः ॥ [ । ]
(९९) तजंनी वज्नाङ्ुरे च दण्डं धू्क ईरितः ! { ॥ ]
--ग्योगेदं --°त्कङ्दनामकः ॥ [ । ]
(१००) तजनी च चिश्यूरं च खटा द्ण्ड एव च । { ॥ |
-- नामभेदेन वासे दक्षे त्रिलोचनः ८) ॥ [ । |
[~~ ~ ~ =
| ध्गोपीनाथ "पादोदधुतानां “र्पमण्डनीयः-पाडर्ना निभेरयोग्यतया वयं तानु्तरमः
तेनात्मन्मते एवंस्याः नासमेदाः चण्डीप्रतीहाराणाम--
न
(००६९५ ४ {, 4. 00112112 {२२0 : 2. 2, |
[ 6 1
(९५ख) वेतालः करश्चैव पिङ्गाक्षो शदुटिष्तथा ॥
ष्य । छ
(९६क) धु्रकः कट्कदश्वव रक्ताक्ष छरोचनः ।
९. 101-- 100. दमपद्वितखण्डे' ५५ विप्णुमर्मात्तरथहुद्धताः । इत्र ङत्रापि
पाश्नेदाः श्चन्ति। केवन श्योकाल्त्यक्ताश्च । तत्र पाठ्मेदाः-
( १० क-भधेश्छोके >) दिव्यरूपाम्बरधरा-- । (१०२) पएयक््वतु---- सिह्यसना ~
सिहासनस्थं कतन्यं-- ॥
।
--°स्थितम् ॥
(१०९)-- --ण्स्था राजन् -- । तस्याश्च द्वौ ~ द्विज ! ॥ (१०६क) ~~ ततप
ऊङरद्यम् ।
5. 107, 108. भविरवकर्मशाद्लभत् समुद्धत इति प्रतीयते । तत्र मेदोऽप्यस्ति ।
शकारं परित्यक्तं च । तद्यथा--
(१०७क) को्धापुरं विनाप्यत्र -गेच्यते ।(१०८) --०्की ततः । वामोध्वं -- -
[ बिश्रती मस्तके रिं पूजनीया विभूतये । ]
5. 109--117. ध्यानमेव प्रायेण भ्स्यषुराणीय १५८ अ० २६२० कात्या
थनीः-ध्यानमनुवत्तते । सदशध्यानानि अस्यत्र च हरयन्त, तद्यथा 'अभिरुपितार्थचिन्ता-
सणोः८५५ “मयदीपरिकाय्रामःपि (> । तेन मूलण्यानल्यास्य सा्वंमोमिक्रता ज्ञायते । पाठमेद्-
वरदन पिषटपेवणमरात्रमिति मत्वा तल्मात् विरमामः । केवरं ( १०९ख-शछोकार्धोक्तल्य >) `
श्रयाणामपि देवानामनुकारानुकारिणी' इति विशेषणं, (अमिरुपिताथविस्तामणो' धतं
'दिवनारायणात्मिका'-विरोषणमं च मनसि आकारयतीति प्रद्यामः।
5, . 118. श्स्तकः-शन्दल्याथल्तावव् पारिभाषिकः । "करणः चुद्याः काऽ्त्य =
` छमाना्धकशब्दौ । विनियोगश्च 'इत्तकानामभिनये । तेन ममस्तकरेति पो न कदापि :
अनुसोदनीयः
ता
1.12, प्टपातता : (८८८६८76 द10४ (व, 56620८८्द व ८द)
144. 566 ¶. 4, लद 20 : ४. ध
145. 21146410, = 4, 262. (74/64 तॐ 24. (21.)
146. 4201745710/400८70 4701. १8६. ०, 69 (59806, 1926), = 22-442/८- । ५ |
` 0 3, 44, 1) 54 8063-8 16, 1 ४ । |
1. 4. ७0012118 20 : ¢. ६,
( १०३क )-महाभाग !-- सा स्थिता ।(१-४) ---- तस्याधः-- ! -श्चर्ट!
[ 5 ]
04. 119. 120. 'अभिनयदपंणे '+5 नन्दिकेश्वरविरविते' प्रथमद्खोको द्विराधृत्ती
वत्तते! तथा द्वितीषाधेपरिविस्था श्लोकान्तरं वारकमस्ति । श्छोक्वयस्येतस्य उद्रिण
अस्मन्मते दक्षिगात्वमूलकत्वं द्देवतामूतिप्रकरणत्य प्रमाणीभवति, प्रकारान्तरेण ।
यथाशक्ति सवषामपि अनेकेषां वा, पालानां विचारं स्वा, अन्थक्तो लिखनरीतिमधि-
छरत्य किचित् वक्छ्पमस्ति। द्देवतामूतिप्ररूरणंः खडलनमानत्रमेव । यथेच्छं हि म्न्थङ्रता
पुल्तकान्तरस्थानां ध्यानानां परिवत्तनं परिव्ध॑नं च कृतस् । तन्न तन्त्ोपासना-द्लाछ्नादिभिरनु-
मोचते समथ्य॑ते वा। तेनाल्मन्मते शिल्पिनां कृते वण॑नात्राण्येतानि, न तु ध्यानसूपाणि ।
तेन च सर्वथा बेतानि प्रव्यक्षरं म्रहणयोग्यानि ।
अन्यदपि वक्तन्यमस्ति-आदशुस्तकं प्रतीको वा भूल प्रमादबहुखोऽपपास्पूणेश्च
दभ्यते ! मन्ये, द्वितीयस्य भद्ंस्याभावात् पाडोद्धारो न सम्यक्तया सिध्यति ।
॥ | 148. = दि वातल वा28 ददवव (व, 21100037 1105) 1 1
. । ©98. ०, 5) $¢ 37 20 247 ; 36 ६
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0117008 81295 0 1140268 कत् कला दीह (८. 45--47) ; ला [तपतः
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तृप्ता ~ लाः < 40) $ 6 [णुत 07 [वल0ल्व्मा
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{18{71ल7008 {जः (तणा्रलाल्टफरला† त = ०पा्ल्ल३ कत् [07 {€ लश |
1714968 &८, (58) ? ; {€ वरञलामगफादछ (ताशातवलद्पनाईः 0 {6 1प5दद- |
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तला ज 6 (ल्शुल्लौ एह [लट06 01 11718268, ९0181815 0 83,
11111 - 11166 +€15868 ॑ ।
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(1८110117. (1115{.- 3111 1117, वा लस छा श्ला (४. 9-2). 11८ वाल्ला
(ॐ 111९ ललास) {0 पला {16 कल्या रएठ वला तपत् चिल्ल 1)
{ला1])]९9 ११९ प्९{ छाल (५. 2.{--27). |
(116 1४ (0ा)ञ 379 0{ 64, हा -86्ला पलास ५८८1६
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1211६ पदाता 0 ता) (4. 16-20)
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{16 [000 ग [८ इलव तवल् 416 06६१९1१) ८. 3585-3)
कात् प्)€ शलाद्या{8 ग सत्ता (४. 38--4(6).
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(4. -{5--38) ; घः २1:0 {€ ला छपव्वाप्रऽ 0 तप्धान॑ला ३, 0व-111/८-112/615
(117 ४ ०६३8 शाना पी ५ रणा 8ा9त् लकरः ज 118,
016 [पता.स्व् २४् असल गलाः, = |
116 7 {लए एटा (ई. {--6) शतप 1116 उपात्त ज वा
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पपद्रा्मल्त् 108065 916 {0 96 शद्व्लुत्तव् छः ए6ुद्ल॑6त्, च१६ पल ९1एल) (ॐ. 7)
1116 1168{ 86९1101 0 {176 (हठा 1ठातााई ` ज = $, (त
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वत् इदद्ग ग इत वका 5101068, = 5742/12114-511द-/01:/182 ; (अ. 15)
116 ऽपता{8016 {ज वपते 6 उप्ाछि06 868 (८ 16, 17) 101 8{0068 216
छाल ; कड 2180 106 पऽ भ6 क 06 (&. 18--20) एधा वलक्ष
1110ता0दकी0ा)8 (54. 21) ; 116 वािष्का९८8 7 लना कफ 10 एवाव)
1 ९०105 (&. 22) ; शत् प्ल कल्शृृल्लक$ठ पद ९ चद्ट्गतृण2 0 पथा =
0 (००8 (ई. 23, 24) ; 1 176 [गणगौर #6€ काव्या, (कव '
1114411171044008. ४१५
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1त1116 द८८ठ्ता7् {0 (गछतां शत् तला व्यत्य ल (५. 87-40) ;
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1७5८19८ (द. 52--60) ; ` ध€ [तप्र लपृज्डपा€ ग ८५॥१८९ (&. 61) |
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16 5741-0 81006 8 प्लस एकल, 1.
{1 (€ गाठपंपह इव्लौता, कद्कीलपाक्षः धाह जा ाद्प कपु
16 008८106 -- शद्रा (&, 69-71) ; क्वाय, (&, एद) ; (वपि
एतवप्छ्षय, (इ. 78) ; दोरु (अ, 22 - 74, 77-8१, 88--85) ; ध्यव
१२, (4. 76) ; वशग्डक्ति० (&. 86--90) ; शणपाा> (अ. 91-93) ;
#1६ष्वाना0९ (अ. 9--97) ; 4 पवि (४. 96-101) 11/91 3/1 1101 111,
(८. 102-105) ; † व्राता (६. 64-686) ६त ६06 ताऽप [पठा
रज वप्स्ताशत वल्ल 1 एए (द (. 106--109) वणते 6
तल८न]000 0 फादापह वर्लातुद्8 (8. 110- 115)
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द्विता भात् प्र भत, {04 | |
त प {लप रलय७९३ १९ तद्दि § 0 सिवत णुद (&॥, 1, 9) ; 4
| रज शद्वपादवछत (#. 8--5) ; ज 42108, (&. 6--12) ; 0 1 वपा ॥
` `. 13); ग {62 (४. 14) . 1
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(&. 17, 18) ; [दापएल्य६ (क. 19) ; 4९10, २ (<. 20) ; सिपीवपृीति
८ 2) ; ¬1410दव०ा (छा, 23, 94), रिवत्र (<. 25; 26}
| [ला का6 दएला वल्छल00008, ८८6 श्ल]¶, = 10140 5115928
(<. 27--30) ; 91 [1द्र- यास्या (51. 81, 82 ) ; एतदित्य्
(५. 33, 34) ; 1९150 दा ्ाप्ला8 (५. 352) ; जिर्य-पि दाद्रफष्णाय (४. 36--
41); प्प] (2८. 44, 43) ; (उठा 2) पन्तय
द्वाव (५८, 4-4-46) ; = (वण्ताक्रा्व- करणाद (७८, 47, 46) ;
40411 का18९8, (०८. 49--51) ; भात (०. 54, 535) ; (कका कय
(५, 54, 55) ; (विधात - प्रभवता (७, 26, 57).
ठ) € पाणा ग दिव्द्त्पातः ऋत [कलाया छाप 52; पात
{0 तकालिला कघातला€इ. ण 1018068, भा1द]1 ०6.०0४ 4६६८१19६, प्य ४१८६
६0.06 [00 {णारा [रत्र
1116 171५5 णिक {€ इत्र] ग चा लाक्नाषह [लाटा 8€८ागा
(1. 59--15>) ; नट तारलिष्लणाः फलद उपृ्प्पल्लः {0 पल्ष
1100.11005६5 816 8४ हाष्टा (9. 59) ; = प्र6 [णु्रजाऽ ग ऋरलय)]1€
1200८/(1६८5 (०८, 60) 8 [लाः एसा € (०५, 61) चत 1८८10२८5 0
169१8 (¢. 6%) ०6 पशा.
(16 [गग ्०पः = 004008८5 1त्€ ० पण (७4, 63) ; ॥प्ल
ष्छा16168 (७५. 64) ; प उप्सिह वः त पणय (4. 69.66) $ प्रलाः
लाका्लला8८ः (5, 67) ; 06 इपाप्म16 08 ° एणाताषट् ज ४८ श्ण
05 [त1त्5. 0 10४८5८5 (.&. 68) ६८ व८६८५।0९्व्
| (ला, 96, च्ल [णगा्गाऽ 9 (116 81006 ॥॥८(4४८८> (५८. 69
70) ; ला पएथप०प क्ा68 (७. 70-- 74) ; ध एष्णृमक्रजफः ० ६६
111011115९5 {0 {116 8४6 ° प्र (लपु (७५. 75--८8) प्त (0 पट ५८/९८
11/00} (९. 79 -- 80) ; प1€ 8126 9 ॥€ 212111५ (<. 81, 82) ; € वाण-
8075 ग घ षाणड (<. 82, 88)
व्ल परल्क-0, 118 ७6 लृप य्त् [ष्णृमठयः (७1
84--86) ; 6 (करक -वव, 165 लुपः प्फत् [णग (५. 8८--
88) ; ५6 ए ८६०-८-401(0८8 16 ०6६ ९856९106 |
| € 4^शणण्ड्कटम् ल्छञवलयक0ऽ 88 एटटुधात्ः वला 06 0 116
` 101४4९5 . 6९. (€. 90--94) ; ध्र कप्रुरलं०कः 25 (<. 95) ; ५८
` लन्ल-एंऽ6€ शू पत् 106 दनतपाली काट (०ाववलंएढ 0 वदप्लः
(€. 96) ; ध€ पल्लव ग ऋशनवतष्ठ 17765 00 व 11105 ; 16 शीघ0€ |
भक्ष पणाजः एषठ म वयाण्ण्छ (ङ, 98, 99) ; ४७ ष्व् ब्धः णं
| 1004८5८5 (०४. 100) णत् 6 णगकीजा३ म लङः] कमत ए००व
५4५५८ (<. 101) {जा०फ, इप्ल्त्छञएल्
(^ 67 -.
(1116 € इप78द्ला०प 38 लछणट्लाक्रह 0 271-11411/48. = 1116 [1868
0 01010 ७ (क्व 14८4८5८5 (६1. 102, 103} ; {€ ऽलघ्लला ० 7126
(1141५ (]. 104) ; (€ [ष्व् @एत्0८45 (६1. 105, 106) ; 1176 (छती
{1018 11 €शला। [16९68 र 8६016 € ३०८1€त (8). 107} ; 116 5घ्८6त्-
1688 0 दल, {ताप वका 1१८९ प {80ल्षला (६. 108) ; (€ शद्06
(0715 1161 21४6 द्ध), ५९. (4. 109-110) ; (€ अवलष्वालः ग
(1670/1.5, एक्रतल' ६11 लगाता; (६. {1 1- 114) ; ६५16 काला ° 10509
{17725 (81. 115--121) ; {€ धमक ण जणा 62125 1109179 06
{0 पाला ८5145 (1. 122) ३16 ५७8८+6त्, 10 (तल, |
116 (ाशावल(ला8्टउ ० इच्टानट्तव् धाऽ ६४४६116 {0 =} 811111168
(‰, 123) ; प< परलाह ग पथतण४ [षवप्रो 10 ध€ इवा6 (अ. 1219) छात्
४116 51118 {0४८ 5†दुणुणिणष स्लातञड फाल, पाति मलौ सिष्य 1 वःव
(ॐ. 1%4}) ; चष्ट [ष्न्ट्ल्वृपाऽ ग लंप्ल्पपासताषट इव्लत्त् अ ज
11116; (ई. 125) वप्त् अृष्लंष् कठञतललाऽ प्रा एद् #0 वृ 18, 81111168
(४. 126} 16 वााद्ल{0ाऽ {0 ला (6 पवः व्गातता 1414106
51101110 14९6 (9. 127) ; {€ लात्ावलल#द ० ष्तच्छ॑थु$ 6८.) ( 128, = `
129) धक्त् ल्वा ५८.; ` ६. 129-- 13 804 150) ; पात् ज अपाल्छ
(ॐ 1:33) 6 ण्ट.
1116 वाष्ल €. 118 01 २ (7/4 € (¢. 134--138) ; ॥€ वाष्ट्ट- = `
1100; दक्षाः पह धल (10/40 1८ 100 त] 0" 112 (&. 189)
वत् त्यः 0 (७5€ (. 1-{0) २१6 १६६९५०९५
{116 पतल ० एल्वलडयऽ (4. 141, 142} स्यात् प्र6 लावान ह॥८३
0 {16 तार्वलालणा एल्वल्छ्णऽ (&. 142--1-46) यत् प्रलाः कृल् वगा
(ॐ. {7--146) ; (€ व्कल्ट्०छउ 07 - फारत हद €९51१्5, (0 06 कग €
सवा नुव पत चठ व्षः (अ 149) ; पाल लवालल्यऽपछऽ 01
11111041 (ॐ. 151) ४0 #€ श्म ग € तारि 1266;
(५. 132) € (९5८ ६्त् क | |
हद, 96 पच्छल१८त्, सिए२ (ल्फ पप्रा ०06 4001. 153, 154); = । 4
६८ पाध, प्रा 40०8 (५. 15 5--157) ; तात् (16 कपवातात्ाऽ 608 प्ल
` लक (. 158, 159), 6 -इ०प् (&, 160, 161), ४6 फः (६4. 162, 168
२१ {€ मर (४. 16 ))5 , 6लद्दण्लक्क ; कत् वशङ्कः ॥€.
[0प्तगाड 0 #€ यप्रफ्म् एलृल्@ः, ८2१५१८5 {0 तत0७३ (&, 166, 16)
` +€ [ल्ह 9 प्ट पणव) 10 ला, पला प68एत्स्र १4145 = शकाोत् = ५
10 ण @&. 166)
[ 68 |
(लः $, लास ० 24 5कलपक-0णाः एलाम& छः
पट्स्लाप्माह 0 (ट कला्ठपाः व्प्ठ (वत तात् पाला
वलतः कतवर कात् 4६ (16 क्षालः रा प्ल {एला कणिता
तोपा (4. 1--3) ; पाल कल्यृल्खाष्छ [तता व्गजपाः (, 1), (लाः
` (1011८105, वधः (+. 5, 6) चत् (6 [नाकः ॥धा810108; 00045 0 19110
(&८. 7--9) 0! ५१€ तारलिलण च ढः ; पत् प्रलाः षा-करल्ड8, ददर
` & 10, 11) ता€ शष्ट
€ जानक, 16 प्रलणलह ग {€ #तइद5, (व वलात् पज ४16
६९ा*ए16€ 9 {16 41/1८48, 42110125 044.04-4/1/4545 (5. 12, 13) ; {116 लपतत
{021९ वरल॥&ऽ {0 {16 4711015, 6201141८ 05 (४. 1-1-16). \,
11€ ल इपःऽल्ला०ाो तलत पात्री तललाा्राः 116 1/4॥ह८5
धरत {116 0579075 01" ल्ली कक्लादाः 18, 11 तइत~] 51007-
10211 05--1116 तप€ पात् 416 लिट पलातन 0" (€ {लाक कपा
१।८४ [06118 छा एला 1 [वः (६, 17-68)
(लए 18 ‰ 8८८० {एलुरल-द्ात्ट्त् पवपालक्क ज (पपक्थ, वलः
ल0ल्व् (+. 66-68६) ; 88 8}80 {1८ 01 {07 116 लशा स्लातृक्छि
10 ॥€ {7141 ढ/4+ = ध्र16 कन{-ट०प्ा्णिल्व् 006 (&, 687, 69) ; वत् 6
ला वा्सलाा5८8 ग 16 लए कलवान ६0 वृ्लातवाय (&, 70-73).
(व # 1 सात् प्ल [वरौ (छपा 112, 0प्रलीपाातकट्व् वपात्
{५१८ गला ६९६) (0ट्ल वा 15८ साका प्ल पतती तटहलतजा६ त
` {ला} 4665. 1/८1{-111701.11-((८/50.4118
व< गुघणाद्ठ एला (, 1) €< 116 एदल वल्लनएप्०ा
` 116 [11908 (लात, (त1 0100 5 त1/4-1015012401 ~ {ला {गाठ
{6 पाः ग [ल] तालिला( गप्ला€ऽ ०. (लवणे (अ. 2), ४8 एल्
98 लाः वर्छलतमाऽ (+, 3--14) ; प्ल कललः आ २ शान76 0 (वणन
(51. 15--17), 204 {76 कौ{दतवद्ा5 10 (वपते ( 18--20) [वष्ट ल
2708 1661 ५९६९१९५ | ,\' |
| (€ ` प्ट इटलला (अ, 21{--35) पल्ला 0९ दष्फद् (६. 21) तपत्
४ वार्छिल फिनः प्रलव्ना]0 & 29, 28); तपनाय (&. 24),
एशातपपफतृत (+. 25), ल्लाहव-हयएथुवा) (, 26), प्रल्णणोत (&, २7)
ए एध-एवाव08४ (५, 28) ; चा6 तलत6ऽ 1 8 शाल ज (कवल्दध ; #6
4 | प्यति म तष, (४, 30--85).
[6]
106 10110 शव्लाना (&, 86--42) वल्म३ पी (रक्तकाले
118 (एलृरएल-1क्पत्लत् षा (=. 36--40) ; ध"6 कठनशात्लत् मप (#, 418)
` ध्रव प्ल एिप्फनऋ्त्न्त् जला (अ. 411, 49) ३16 तञ गम €
(116 चलः व्लीन तकल (&, 48--468) € € तलि `
{छपा ता वा सदष्ठ]र् पत्ता लप तलक, पववद (2) पा
{16 शुरच्लप] लावारकलन6ः ज व्ल [क्प्ल न) (&. 44--478)
11716 पलप इल्ला आ 4758) ल्ह ज 116 इण) ग
116 लिप तवला्ठः, -पकहवता् ; वालाः पव्168 ( 47}-- 409) ;
[ला 1्ताप्ववपव वाक्ाललकत्टः (&. 49--238). पोः + 10106 प्र
त6इलन0प्०प ग [९ इलाकुत्च (अ. 59, 60).
1116 € 5861100 (ॐ. 61--76) वल्वइ पाध् 11€ भनाालःः
11 2--ए110 पाल लटा (<. 61-72), वारव (. 76), (81668
(8८. 76) धाव छालपधा त (&, 77-78)
[16 € र्ल्लाता वचला068 6 {एलृर्ठ वारिण 0
(५. 79--55) 0 छिवारष्वं ; काला" एजलाल लृाका्चरलालः (४, 79) चरत् 116
वा (पाता लाकाललनर68 0 व्वल, [प्वारातपाक (॥ 80--85). 1116
लशोप्छा-क्ात्ट्व् {ताना 9 वतात्रसछय 18 तरलन०९त्, पलप (४, 86--89)
1116 € हव्टाता) त€हलन्0€8 116 [एला वतवल्व् का ग (गाता
(६. 90--94) त् {16 व्दातक्ऽ गं (त्तु (४. 95-- 160). |
{116 तल, वल्डला0ल्व् €, 18 [वष (८. 101- 106). 11115
73 {910 क {गद्या (४ 107, 108). वाला, 28 कएल, २
0९सया]011010 त € वलति (र द्वक्दप्पण, ात् (ला [द्तव्5 (क. 109--117). |
(16 पऽ€ ग [डपाठः वत् हठञापाठः (#. 118) ; वात् ग कल ण्ह =
पऋला{8 गं 1116 [वप्त्ः धात् लु€8 [0 € कषपाु०€ ग (वाक्याद्) च्ल = |
णा (8४. 119) ; श्त {€ शृव्लघ] प््लामा ज 6 तारिप ए0वा{5 (1
1116 तप 17 12411९6 (ई. 120)--0ि्) (€ दलडाण्ट् एश, = व116 [वः {फ्0
(^, 121-122) एला३€३ (काका 106 वप््ाला8 20010 9 1111 (€
(0 अकत; 804 € फि् [लल्वालमा,
(0 ता.एडाठ
८५३ 145 ल्ल लुलव एम प्ाल्त् तफ, #ल लवन -014110414-
2001010 0 ` 1144 1दरत19; 16 4101414 स0 मा सितरईल79, 18 8
ध 1111 13 |
(116 क्राप्रणः 1848 प६९त् पाका (€ एल, 06 178 ल्ल] 1006106,
` परां 78, कौ [5 पता 16 पलम् पला एलवता0०४३, = सिप् वाधा९३, 98 धि
88 {1९ 00प८छना 16 0001220 &404त5, 8८ 106 वप्णालनऽलस्त् [$ 6 वकत
01" [1083818 1148, - {ए6 0011, व्रलार्ललल [र्ठ प्€5€ एला 2४ एवमा
छकग व 66 तठसलपीम§ क 1024268, 0 16 दपावत्माल€ 0 का्ा88 वात
111€प 416 201 ६0 16 #षप्ला {00 नहगतडङ, 01 {0 06 10110 त्त {00 [लङ
{116 छपर वलाा०ारावल8 5 सपिद गु 9 14/70 लला
01 1 द्रा] व्रडडा71112{00॥ जा 116 का त {€ वारिना इलाह ; छली
1116 वद्षा18, वलः पा८ प4नल्व् च (कौशूलाणतड 1८८. = (5 ए€ [186
101 01] 6 प्रला-काठप्ता तलत 11*011016 द्ध वालदवात तात्
1116 ^ वााव-दि द्र्वा [05 एष 2150 इपलौो = लकफणल।९ णिहि 985 {6
| ९ 111 › {116 [९1६15 र वाद.
करि जण, एत [वक्ट इप्ला तल्ला 88 सिर्वरिदवाप्तवए0,
पतनं प्रपवत्, (त्क 2) पपन -व-न प्ता, (त्राता
सि्नितासापज विका --16षलाप ८0३6 वतणोकसपपा€ 0 सएव, पाह्य,
कषा, रक्ताय, वात् (वप्ता; [णा ए6 काह (णत् ज पक्ति ~0
तवालिला( 1108068 त्त् एष 6 लगफण्राीणा त ए8 पप्रत्
वोता द्--णपला [र्ठ 101, पाठिपत्वल्र, [दल वललम१त्त् (107 {सवा 0
[0 [पा प्ला चाड 06 [लाक पता) द्याव). [६ 18
{0एलषल, तगर 1 फ ॥आ€ तल्डलनल्तव् 108 पलट वर्टापक्षाङ फणः
` शग]7])ल्त्, सिव्तदवाषव +ला इल वव्लतवृङ {0 16 € प्ल 7 प्ल णर
पिव) ककु त्वार 16 व्ठ 10 च्ल ]ल्ल्नाल्व् एता वत् 16
एतालालः ग व्णऽ एल्] -1ता0्ा दलः, 10 16 106 10 पफ16 छपा
{1118 [{(तलाना ६0 {€ 0410. = [६५४6 त्रल् {6 १० पार फुर, 28
€ 88 00881016, [आ 8918 ग € [0116008 रज 6 कत् 10९९३
लट. क पु वरु0०8्य्. 1 अवा]. 06 [द्टणङ्ग 29996 1 1४ पा] एद म भप
इलयक८्€ 10 इत्वलाछ ग #6 इपष्लं
318६ 12119) 1241 8.
` प्^रा745 11111२५
2.4 7एवापार 214 प न | |
आसनल्थमध्यमाधमप्रतिमा-
देवतामृत्तिश्रकरणस्य
दिषयासुक्रमणी
विषयाः प्राज्ञः
१.। शिलापरीक्ञाध्रतिमप्रमाणगुणदोषा-
धे,
इताधिकाराख्ये प्रथमध्यये [ १--३५।
ङंछाचरणस् | +
शिकापरीक्षा न
शिकामेदेन कर्मभेदः = ..“ ४
शिखाव्थितिक्रमेण प्रतिमा- क
हिरोविधानम् ~ ७
भाङ्तितो भराह्यरिदाकथनम् ,.. ९
व्याञ्य-शिलाकथनम् „^
` वणतो ्राह्यशिलाकथन् 9
गर्भ॑गृहमानेन ज्येष्टादिप्रतिमा-
| बहिरायतनल्थाप्या देवताः ,. २३
अ्भप्रतिमालक्षणम् = = १
शिकादाहरणक्षणः ` .. श्ट
प्रासादमानेनोदधु स्थज्येषप्रतिमा- |
~ चक्षणम् ~ १३
स्थप्रतिमाया मध्यमाधम- +॥
` मेदक्थनम् ध ५
` भासनस्थोत्तमप्रतिमापरिमाणष् ... १९
एषां श्रान्तिनिवस्यानिवस्यत्व-
परिमाणम् ५ द
द्वारमानेन ज्यष्प्रतिमापरिमाणम्, = | १७ | उतपातविशेषल्य प्राणिषिषेषे
मध्यमप्रतिमापरिमाणमर = „> १८ ` फर्दायकत्वम् = ३२
| ५ कनिष्प्रतिमापरिमिाणम् | | 1 99: | उतपातानां फङ्कालः =" ८ 4३ 4
गृहपूल्यायाः प्रतिमायाः परिमाणम् ९९ | एतेषां शान्तिः = * =»
देकगृ्ोचितप्रतिमापरिमाणम् „.„ >? | चान्तिकम् = = ग ` % |
| विषयाः “~. प्रङ्घः : |
बहिरचेनीयप्रतिमापस्मिणम् ... १९ `
तत्रचििषः ^ २०
देवगृहमित्यादिनिेयः =. १:
कथनम् [ ति ५ ४ १ | ।
| छभप्रतिमारश्षणम् न १.
अद्धतम् ॥ १ ०;
| भन्तरिकषाद्ुतम् = „+ = » `
भोमाद्भुतम् व २७ ्
1
देवोचपाते राज्ञो विशेषः „ड रद `
शिद्गादिवेक्ृतं ततल = „~ =»
| तत्रविंशेषः 4
| अर्ाविकृतं तत्फल == „~~ = `
अन्यानि वैतानि ~ ३१ । ।
न
वस
` कमरासनः
पितामहः |
+: | | | मह्या ` | ००७ | ५
| २ ] व
विषयाः पत्रा
२। प्रतिमातालनिर्णयाधिकाराख्ये
दवितीये-[०२-- ५१]
माननिणेय | ४२
तारूमानक्थनम् प ४४
ताख्मानेन मूत्तीनां क्तव्यता .. ४६
तालाञ्सारेणावयवमानम्-
सक्ततारेऽवयवमाननिरूपणम् ... ४८
|
मध्यमसक्चतारेऽवयवमाननिरूपणम् ` ४९ |
अष्टताङेऽवयवमानम् =
` मध्यमाषटतालेऽवयवमानम् ... ९०
नवताठेऽवयवमानम् ध
३ । प्रतिमापदस्थानद्रषिस्थानाधिकार)ख्ये
॥ तृतीये-[ ५२--५८ ]
देवतापदस्थानम् ४. “ध
देवताहष्िस्थानस् ४ ~
देधता्थापने दिङ्निणं श, |
ध | सुयप्रतीहाराः
` ४। ब्रह्मसूयंनवग्रहदशदिक्पालाधि-
` काराख्ये चतुथ--[ ५६--७३ ]
विर्वकमा 9 ९९
धिरिः ४ स ६
नाकिनरी
# 00
यद
र यशि (अनिः
---------------------------------------------
विषथा
बह्मायत्नेऽन्यदेवतापदम्
ब्रह्मप्रतीहाशः
द्रादश्च सुयंमुतंयः
(१) उधामा
(२१ भिन्नः
(३) अथेमा
(४) शः
(५) वर्णः
(& सयः
(भगः
| | (८) बिवस्वाय्
९) पूषा
| (९०) सविता
(१९) त्व
(१२) विष्णुः
सूर्थायतनम्
नवग्रहमाः-
चस्् ४
मोः
बुधः
बृहस्पतिष्ुकरो
शनिः
राहुः
केतवः
अमूर्त साधारणविधिः
वशदिक्पालाः-- |
प्राङा
६२
च, (१९) अधोक्षजः
ईशानः
५। विष्णुशालग्रामशिलापरीन्नाभेदाधि-
काराख्ये पञ्चमे-[ ७४--&६ |
व्णविशेषेषु मूर्तिभेदेन दिष्णोः छ्युम- `
अवल्थामेदेन यूर्तीनां प्राद्याप्राह्यत्वम्
विष्णोश्वतुर्वि शतिमूर्वयः-- `
(९) केशवः
(र) मधुसूदनः
(३) सङ्षणः
४) दामोदरः
(९) वादेवः `
` (&) पथकः
(५) विष्णुः
८) माधवः
(र) जनिक्ढः
(१०) द्बोत्तम
क्ख
(९) जनार्दनः
(१३) गोविन्दः
(१४) नरिविक्रमः `
५ (१५) श्रीधरः
। (छेकः
(९५) शसि
[ ३)
पन्नाङ्ञः
1
विषयाः
(१८) अच्युतः
(श्दोोवामनः ` ^
(२०) नारायणः
(२१) पद्यनाभः
(२२) उपेन्द्रः वा
(२३) हरिः ००० ८, १
(२४) छृष्णः (
चतुधिद्ातिमूर्तीनामायुघन्यासक्रम
शाटप्रामशिङापसेत्ता-
आछ्ृतितो ग्राह्यज्िखालक्षणम् =... `
प्रमाणतो ग्राह्य्चिखलक्षणम् ...
| त्याज्यशिलालक्षणम् स
| तत्र प्रतिप्रसवः 4
। | वणंमेदात् फलमेदनिरूपणम् =...
र वणभेदात् संक्ामेदः ^
| चक्रप्रमाणम् „^
चक्रविशेषरखन्षणप्-
बाखदेवः `
सडषंण ६ । ध | | | । 1.8.
एतेषां पूजाधिकारिणः = + `
तनिचक्ररष्रीनारायणः = `... ` <
| मधुसूदनः ८
दामौद्रः 9
दिवक्रर्दमीनृसिहः = ~
" 9 | दिचच्छसवोत्तमः
| . (५ एकचक्र वर्णको विशेष | । ५ 4 ४ |
पत्राङ्ाः
विषयाः `
यथाक्रममेतेषां एकम्
॥ हिचे चक्रनिबन्धनो विशेषः
यथाक्रममेतेर्षां फलम्
चक्रान्तयणि
ष्रिः
एततपूजाफलम्
` न्षिहः
ध कपिरनृसिंष्टः
छदनम्
हयग्रीवः
मत्स्यः
जनार्दनः `
&
श्व
कामनः
जामदग्न्य ४
कोश्चल्यानन्दनः =
ध.
चक्रप्रतिषटानिषेधः
` चक्रविक्रयादिनिषेधः
चक्रप्ररंसा
` प्तगाशनः
मिन
| । ^ नरवराहः ५ त
प्रकारान्तरम्
[ ४ 1
पत्राङ्ाः | विषयाः `
८२ । नरि
,, | प्रकारान्तरम्
, । जङक्ायी
८३ वेङकण्ठः
,; | विश्वश्पः
,; | अनन्तः
99 त्रेरोक््यम्योहन $
८४ | विष्ण्वायतनम्
५ | विष्णुप्रतीहाराः
9 # 9
१ | [ &७-१३० } `
८५ | शिवसरूतंयः-- `
> | क्षद्योजातः
अर्धनारीश्वरः
८ उमामहेश्वरौ `
0 कृष्णदह्रः : १
। » | हष्णकात्तिकेयः `
। शिवनारायणः `
„ | ६। रुद्रमूति-लिङ्धाधिकाराख्ये षष
विषयाः |
इरिहरपितामहः ,
सूर्यहरिहरपिताम्ः |
चन्द्राङ्पितामहं
धातुलिद्धनामानि
धातुलिडे विशेषः
रलङिङ्धम्
दारविङ्मानस्
दारवशिङ्गनामानि क
जिह्ोचितच््षाः
दक्षाणां रक्षणोद्धारः
लिज्ञोचितयृष्टाणि
शेरुलिङ्मानम्
शोरुषिद्धनामानि
प्रासाद्मानेन छिङ्मानम्
ग्भगेमानेन शिङ्गमानम्
लिष्विष्तारः
िङ्स्य ब्रह्मादिभागा
नागरलिङ्ानि [स
ध द्राविडङिड्लनि
वकरणिदगानि 4 ९९
` लिङ्गप्रासादौोचितनक्ष्नामयनम्
| तस्करा््॑ानयनम् १ = |
धनर्ण॑-योन्यानयनम् क
धारानयनबर “ ` ~ ` ११८। पी
विषयाः प्राङ्क
२ | तिथ्यानयनम् „~ १९९ ॑
| अ््वचिषठष् ,` "`
शिद्धे देखाकरणद् ` ` `... >
छिङ्शिरोवत्तेनम् | | 9 १.
दुष्टरिङ्ल्षणम् ०० ०
स्फाटिकिषिड्िमानम् =. »
बाणरिङ्गोतूपत्तिल्थानानि =. >» `
बाणलिद्िपरीक्चा „= १२१
वज्यजाणखिड्नि त 2
घ्थानविशेषोतवन्नपाषाणल्यापि पूल्थत्वम्
यथातथाऽवत्थितस्यापि बाणस्य प्राशस्त्यम् ,›
भोगदबाणरश्षणम् ८
सर्वावल्थास्वपि बाणस्य पूज्यत्वम् १२२ |
बाणस्थापनप्रश्चंसा 0.
-एकाखादिबाणमाहात्म्यम् „~ १२
शिवतीर्थोदकरक्षणम् 8
शिवतीर्थोदकस्यं पुण्यजनकल्वम् ... =,» `
शिवती्थोदकखहुने प्रत्यवायः „~ +» `
प्रदक्षिणनियमंः ॥ ०००. ॑ 9 ५
नेनदेवाख्ये विशेषः =. +» `
| प्रणारुदिङ्नियमः व,
पिण्डिकालक्षणम् “=
तस्याः स्वजातिकततन्यत्वम् ... ए
-अतान्तरव् -
| पीठानां सन्विस्थानम् = = »»
(प
` | प्रगाख्मागक्थनम् = ~ »» |
लातविषानम् ~ ` 9 |
५61
विषयाः | पत्राङ्ः | विषयाः पत्राङ्ाः
किङ्यी्योन्यू नाधिक्यनिषेधः ... १२९ । जिनानां वर्णाः ` व
सयौन्थंनाधिक्ये दोषः ... ,, । जिनानां धवजाः ए. श
पीक्किमेदास्तन्नामानिच .. १ | जिनानां नक्षत्राणि ०१५, ॐ
| जिनानां जन्मराश्षयः भ 1.
जिनोपासकवक्षनामानि ५
जिनानां श्ासनदेवताः श
` पीठिकारत्तणम्-
( स्थण्डिरा .., १२६
` पूणंचन्द्रा क
व्रा ` ट. व
ष्द्मा | शि च
अर्धचन्द्रा क
` पीषकिनां स्वजातिकत्तव्यता ... १२५ |
प्रणारन्यवल्था श ५.
अपराजिता र
शकद्वारक्षिवायतनम् ..* +
चसुंलक्षिवायतनम् ~ १२८.
४ | पूर्व्॑रतीहारो | 1 \ इयामा 4 १३७
६ दक्षिणप्रतीहारो र % | मातङ्खः ् ५9
पृ्रिमप्रतीहारौ » | श्ञान्ता | (1
उत्तरप्रतीह्ठरौ | „ १२९ | विजयः ४ ५
काहनविधानम् | ०० ,» | शकटि प
बाहनट्ठकथनम् ... १३० | अजिवः 4
७। जिनमूति-चतुविंशतियक्ञयत्निण्य- वं
धिकारयाख्ये स्तमै-[ १२३११४२ | न ४
एतितीषङ्राः - 0१ | प
अत्र ४वाचकाः शब्दा यल्ाभिधायकाः सरौवाचका! शएसख्नदरैवताभिधायकाः । `
नि ध
[ ७ |]
विषयाः | पन्नाः | विषयाः पत्राङ्कः
शात ध मूत्तिलक्ञणाधिकारवख्येऽष्रमै-- `
मारः | त क | १४०--११८] |
प्रचण्डा ( टी० )
विदिता
वात्ताः
५ भृदटिः (यक्षः)
गान्धारी
गोमेवः
ध अम्बिका
५ पावः
पद्मावती
` ` सिद्धायका |
` द्ितीयभेदेन च श्वरो
निनप्रतीहाराः `
/ एषां स्वरूपम्
| गोरीमूर्तीनां सामान्यरक्षणम् =...
» | गोरीनामानि-
१३९ | उमा
% | पार्षती
99 तौर
%» | छङिता
99 भिया
9 क्ब्णा
99 हिमवन्ती
श्म्भा
| स्ाषित्री
` | किष
| ो्यायतनम्
98 | लयः प्रतीष्ठाराः
गणेक्ञः
99 हेरम्बः
। 9. गजाननः
| 99 वक्रतुण्डः
उच्छिश्गणपतिः
हेरम्बः
99
१४२
४7 क्िपरगणपति
+ | गणेश्ायतनम्
, | गणेक्प्रतीष्ठाराः
„ + | कार्तिकेय
^ १५२ | दादशुनकारकियः = ~ `
द्िुजकातिकेय
श्ट
विषयाः .
चतुभंजकातिकेयः 1)
पद्चरीख्याः
| नवदुगाः-- ।
चण्डिका
` दादश सरसखत्यः--
` महावि्ा
| | | - |
=“ ११६
१९४
4
भ
9
[इ १, ध १ ४ ९
९
महावाणी
मारती `
| सरस्वती
आयौ
राह्मी
महाधेनुः
वेदगर्भा
| रवर
महारक्ष्मीः .
सह्मकाली
महासरस्वती
भद्रकाली
चण्डी
चण्डिकाप्रतीहायः
छक्ष्मीः
महार्क्मीः --
कात्यायनी
रत्ये संस्थानवेशिष्व्वम्
हस्तादीनां रसाभिव्यज्चकता
नृत्ये आस्यादीनां प्रातिल्विकपिषय- `
निरूपणम्
¢ %@@ :
8.21
्न्थकृतः स्वाहृद्धारपरिहारः „„*
ग्रन्थलमािः
बिषयायुक्रमणी समाता |. `
विनो न शि
`®
ग्रन्थकततेमंङ्खाचरणम्
[आदो यः सूत्रधारच्िभुवनस्चनासूत्रल्यस्य(स्व)रूपो
येनेदं देवदेत्योरगधरणितले पवैताकाशरूपम्। `
खष्ठं चितं विचिक्लं जगदिति सकट जन्तुड्त्तादिसवं
वन्योऽसो खष्िक््ता सुरदनुजनरेः स्विद्याधरादेः ॥
4 कृङ्यवक्िल्पै ह ^'वृष्टाघ्वनिखमोन्नादे”"ति (अ० ४९, ९९ छोर ) पाटः ।
ˆ“ कंसं कल्यन्न पर्यायकब्दो । ययपि--
प्रथमोऽध्यायः ` ८
` च्य 2@फञ्
ॐ नमो गः शाय
| [ अथं शिलपरीश्षा 1 | 1
धातुरलशिखाका्टचित्रलेपसमुद्धवम् । ~ 44
` यद्रूपं विधिवत्तस्य विधिं वक्त्यामि वस्तुनः ॥१॥ 4
एकवर्णा घना ल्लिग्धाऽऽमूलाम्रादाजंवान्विता । ४
` अजघण्टारवाघोषा सा पु शिखा प्रकीत्तिता॥२॥ ।
स्थूलमूला छृशा्रा या कांस्यतालसमध्वनिः। |
श्लीशिला छृशमूखाऽभस्थूखा षण्डेति निःस्वना ॥२॥ |
न क
"= -----------------------------------------------------------------------~-~---~- ~~~ ~ ५
` २1 अजकण्टारवाघोषेति । अजगरुरम्बिन्या घण्टाया रवं दवाऽऽ्वोषो रवो यस्याः सेत्यथः। =
स्रा च किद्धिण्यपरपर्याया श्चुदरा वण्टिका । यच्च मयमते गजघण्टारे°ति (अ० ३३, ८ शो) ` 1
पाटर्तस्यापि क्षुदवण्टेत्य्थः, गजगठे तादृश्या एव धण्टिकाया बन्धनप्रसिद्धेः । अत्र च |
क मयमतीयपाख्दर्नाहु गजवण्टेव ेखकम्रमादविहाजवण्टात्वमापन्ना, अत्रत्यपारल्वरसादन- `
घण्टेव वा मयमते गजवण्टात्वमापन्ना, उतोभयमेव प्रथक् प्रमाणमित्यपि च न छनिेयम् । ` 1 |
३। स्थलमूषेति। काल्यतारसमध्वनिरिति कस्यनिरमितेन पाठेन वाच्भाण्डविशेषेण ` |
समस्तुल्यो घ्वनियंस्याः सा । तथाच मयमते-- (1
स्थल्प्रखा कलाया या कंसतारुपसध्वनिः । 1 1 |
खीशिखा १ इति । (अ० ३३, ९शो) 4
तारः करतरेऽहु्ठमध्यमाम्या्र सम्मिते। == - =
गीतकारुक्रियामाने तालः खद्गादिधु्षि ॥ =
9 ेवतामूर्हिभकरणम्
५. [क्षिखमेदेन कर्ममेदः ]
| स नि प्रतिमा मिभ क्यात् 3 शिरया य"
युञ्ज्यात् खीशिखया सम्यक् पीटिकाशक्तिमृत्तेयः ॥४॥
तामा ०.०.५५१
दुमभेदे करासूफाटे तार्स्तु हरिताखके ।
वाद्यभाण्डे च कल्यिष्य ... ॥
इति विश्वदर्शनात् ताख्ब्ेनेव कंस्यनिर्मितवाचविशेषराभात् कास्यपदं ( मयमते च कंसपदं )
ग्यर्थम्, तथापि सस्मेदेनान्यतरवेयथ्यंमि "ति ` न्यायात् . (नयनाश्चुः इत्यादिवहु विशेषप्रतिपत्यथ
वा तदुपात्तमिति क्ेयस्। स्पषटमाह कार्यपरिल्पे-
°“ताङश्चब्दसखमाकासय दीर्घा यासा शिखा खियःःः इति)
| (० ४९१ ५६ छोर) `
निःस्वनेति। नि्नास्ति स्वनो यस्याः सा निःस्वना शब्दहीना।
` व्यक्तम्--काभ्यपीये-- |
"अचिश्च श्चङरी इ(रू)श्चा स्वरहीना नपंसकाः' इति । (ज० ४९,९६ शो.)
मयसते त्वविकरोऽयं शोकः परिहद्यते ! एवं मिश्राभ्यामाकृतिस्वराम्यां मेद उक्तः । केवख्या
„+ आङ्कत्यापि द्वीपंनपंसकादिभेदमाह काभ्यप
: . चतुरता च वसवस सखीरिति प्रकीर्तिता ॥
` आयताखा च वृत्ता च दकाष्रादक्षकोणका ।
परिज्ञा सा शिखा ख्याता खद्ृ्ता सा नपुंसका 1 . इति ।
(भ० ४९; ५७-५८ श्छो>)
शिखानां ब्रद्धाबाखायुवत्यादिसंकला, अन्ये च विकेषाः काभ्यपक्िल्पे (अ० ४९) मयमते
| | । .(अ० ३२) आरेषे (अ० ९२) च द्याः
। ४1 लिङ्गं निविधं निष्कलं सकं मिश््नेति। तत्र निष्कलं लिङ्गालयम्, सकलं प्रतिमा, ॥
(९ ~ साच प्रस्तावाच्छिवस्येव । मिश्रञ्च तयो्िंश्रणादुत्पन्नं मुखरिङ्गाल्यम् । तथा चोक्तं मयमते--
` निष्करं सकं मिश्रं लिङ्गजेति त्रिधा मतम् ।
५. निष्कं लिङ्मित्युकतं संकटं बेरुच्यते पध. ्
` छखरिद्खं तयोमिश्रं छिङ्गाचाङृतिसन्निभेः ।
वेदवमू्तिस्वरु
बिम्बः शरीरामा विवूततसवरपकः ॥
प्रथमोऽध्यायः ` | 4 ध
` छन्देहपरतिच्छन्दप्रतिमाद्धेसतु नामभिः । 1
| हरयो देवसमाख्यातः ... ... ॥ (अ० ३३, १-६ श्लो०) १
पं त्रिविधमपि लिङ्क पुंशिख्या कायंमित्याह--लिद्गानीति । कारयपरिल्पे तु धुंशिकाभिः `
` तं छिष्धस्” (अ० ४९, ९९ शो) इत्यविशेषेण छिष्धमाघ्नोखेवः कतः । व्यक्तमाह मयमते- 1
। “लकं निष्कलं मिश्रं छयात् पंरिख्या खथीः इति। `
(अ० ३३४ १९ छो०) |
पीषिकित्यादि--पीटिका पिण्डिका गोरीपीर्मित्य्थः, न तु पादिका,
पंशिखाभिः कृतं रिदं श्चीशिखाभिस्तु पिण्डिका ।
| ` नपुंसकशिकाभिस्तु पादाधारं समाचरेत् ॥ (अ० ४९, ५९-६० छोर)
इति काश्यपश्षिल्पे, ` ` |
` चिम्बाथ पं्िखा प्राद्या पीटा चीशिला तथा ।
नप सकच्िखा पादक्षिखाथमखिले मता ॥ इति । (अ० १, २९ श्छे°)
` शिल्परलोत्तरभागे च पादश्िलापीटशिल्योदधंयोः प्रथगुजातीयश्चिासाध्यत्वेन निर्देशात् । लोकरिक- `
दष्व्यापि युक्तमचेतनलस्य पादाधारस्येव छीबरिख्या घटनम्, योनिपीरस्य च शक्तिस्वरूपल्य ` |
शछीशिल्या निर्माणमिति। ग्रन्थकृता तु वद्यमाणश्छोके ब्रहमकूमंरिरेरित्युक्वा पादाधारशिखा
संगृहीतेति जेयम् ।
शक्तिमू्तयः खीदेवताप्रतिमाः । तथा च मयमते-
दितीथा्ं प्रथमा ।
ध ५1 षण्डोपकतेेति। नपंसकलशिरया बरहमकुमं शिले कत्तव्य, तथा प्रालादतरक्ण्डादि कम॑ च ।
` इ्यादित्य्थः । एवज्च "तथे'त्यद्ान्तरितमेकं पदम् । तथा च मयमते-- | 1
वण्डोपलेन कत्तन्यं ब्रह्यकुमंशिरे तथा ।
नन्यादत्तंशिले वापि कत्तन्या तेन चाऽऽत्मना ॥
प्रासादतर्छ्ब्यादिकिमं डया विचक्षणः । (अ० ३३, १११२ छो) `
नहयनूमंशिले इति तत्तन्नामकपादाधारक्षिकाद्वयी । तथा चाऽ्धस्ताहुदुतयोः कार्यपरिल्परल- = `
वचनयोः नपुंसकशिलाकनतन्यतया (पादाधारः इति 'पादशिराथं'मिति च यदुक्तं तस्येवायं व्यासं |
इति मन्तव्यम् ! पादशिला हि प्रतिमाधस्तात् स्थापनीया शिखा, तस्याश्च बहमशिकेति दररमरिेति `
षदो भेदौ । द्ुमशिलेत्यन्न कमेशिलेशत्याग्नेधमास्स्यसमराङ्गणपूत्रधरिषु पाठः । तदेतहुभये `
अपि शिरे उपयंघःकरमेण पादयोरधः स्थापनीये इति पुराणादिभ्यः ससुपरभ्यते । तथा बप्नेये--
न ग क क १
त. | “शुञ्चीयात् खीशिराः सम्यक् नारीबेरच्च पिण्डिका" (अ०.३३; १० छोर) ` ॥ |
नारीषेर् पिण्डिकेति नारीवेशे श्लीप्रतिमायां पिण्डिकायां गोरीपीठे च इत्यथः । अत्र मूकतेय इति `
ब्ह्मभागप्रचेश्यश्च जात्वा छिद्धस्य चोच्छ्रयम् ।
न्यसेद् ब्रह्मशिखां विद्वान् सम्यक् कमेक्षिरोपरि ॥ (अ० ५२, १४ श्छो०)
इति । अत्र च कथं ब्रह्मशिरेवोपरिशत् स्थापनीया न कमंशिा, कमंशिखा चाधस्तादेवं
स्थापनीया न ब्रह्मरिछेति प्रश्ने तयोरौत्तराधये कारणं परावरत्वमेवेत्युत्तरयिष्यन् स्थापन
परिपाटीमाह मल्स्ये-- `
अधः कूमशिलखा प्रोक्ता षदा ब्रह्मिखाऽधिका ।
उपय्यंवस्थिता तस्या ब्रह्मभागाधिका शिखा ॥ (अ= २६६; ९ शछो०)
इति। अधः दमेशिवा परोक्ता (तस्याः) अधिका बह्ममागाधिका शिला बरहमसिला तस्या
उपरि अवल्थितेत्यन्वयः, वरह्मभागाधिक्यमेव तस्या उपय्य॑वस्थाने देतुरिति मावः । |
एवञ्च मूलग्रन्थे "कर्तव्यम् इति, बहयकूमंशिरेरि*ति चायपाठो ; शद्धः पाठस्तु कर्तव्ये
वब्रह्मदमंरिलेः दति, मथमते तथा पाट्दशनात् ; कोषादौ शिखार्थकस्य "किरशब्दस्यानुपरम्भा-
दर्थासङ्तेश्च । न हि ब्रह्मशषिख्या दूमंशिख्या वा किञ्चित् क्रियते अपिहुते एव क्रियेते इति
कमंकरणयोरविवेक एवाव्रासङ्तिः । तथा चानयोः कर््तव्यतामाह--समराङ्णसूत्रवरि-
| याताभिधेक (यावताभ्यधिक्छा ‰) ब्ह्यशिरा बर्यारती भपेत् ।
तावत्या १ ता)ेसम्यधिका कार्यां तस्याः कमि धं: ॥ इति ।
ट (० ७०, १४० शछो°)
अन्यत्र च--
+ “"नपुंसकल्लिखाभिस्त क्तव्या बरह्मणः शिलाः”
2 ` इति ब्रह्मशिखया षण्डोपलकत्तम्यतासुपदिशन् सर्वान् संशयानपनुडति ।
` ्रासादनल्कुण्डादीःति याणेऽपि प्रामादिक इव प्रतिभाति, अन्यन्न ताद्शपाटानुपलम्भा-
दर्थासङ्धतेश्र। न च नारूमिति पाटः निर्माल्यद्राररक्षणस्य तस्य पुंिख्या कत्तन्यतोपदेात् !
` तथाच काभ्यपे-- |
““पंशिख्या ठु कत्तन्यं नाकं तु द्विदखान्वितस्"ः इति । ( अ० ८० १२ शो )
तल्मादु यन्थान्तरसंवादात् "तलः इत्येव पाले बन्धनीमध्ये परिकल्पितः ५ 4
यद्यपि 'कुड्यादीःति मयमते पास्तथापि साघकबाधकयुक्तयभावाहु भवेदपि छङण्डादीत्यःपि पा =`
इति छद्धण पायन्तरं नोपकस्पितम् । मयमतेऽपि "नन्ावतंशिरेः इत्यपयाठ इव प्रतिभाति, =
~. ५ ह्ित्वानुपपत्तेः, (नन्यावत्तशिखाः इति शुद्धः पाठः
यथोक्तशिसामिर्यथोक्तकायोकरणे दोषमाह कादयपः--
कतल विपरीतं यत्तत् सदा कततंनाानम्' (भ० ४९, ६० शो)
विपरीतमिति यदुक्तं तदेव विव्रण्वन्नाह शिल्परब उत्तरभागे-- `
ख्ीदिल्ाकल्पिते छिद राष्ट राजा च नश्यति ।
पंशिङाकल्पिते पीर च ५ पीडे च षण्ठके॥
प्यमोऽष्यावः ७ |
[ सिलास्थिति्रमेण प्रतिमा रिरोविधानम् ]
पश्चादक्तिणे सोम्ये स्थिता भूमो तु या शिखा ।
प्रतमायाः शिरस्तस्याः कुयात् पश्चिमः तणे ।
सिया पुंसा च भूरपीटे कृते स्थाद्राषटूनाशनम्। |
एवं विन्नाय तहयोग्यामानयेदम्बराृताम् ॥* ८ १।२८-२९ )
ध्वनिश्च छेदस्षमथोतपन्न इति चेयम् । तथा च शिल्परत्ने- ` १८
पूवात्तरशिरोयुक्ता घण्टानाद्फुखिद्खवत् ।
श ५ | ॥ (० १४ । १६-१७ शले.)
६।. प्राक् पश्वादिति। या शिख भूमो प्राक् पश्चात् पू॑पश्चिमायतत्येन दक्षिणे सौम्ये
दक्षिणो्तरायतत्येन च स्थिता शायितेत्यथंः तस्यास्ततनिर्मिताया इत्यथैः, प्रतिमायाः किरः पश्चिम = `
दक्षिणे पश्चिमे दक्षिणे च ङयौत् । प्रा्पश्चादवस्थितायाः शिखाया पश्चिमे दक्षिणोत्तराव- `
स्थितायाः शिलाया दक्षिर्णांशे शिरः ङयोदित्यथेः । यच मयमते--
काक्थपे-
प्राग्रं चोदगयरां वा शिलां संग्राह्य दैचिषछः
प्रागग्र पश्चिमं मृख्युदगमग्रन्तु दक्षिणे ॥ ( अ० ४९६१ श्छ, )
`. ; इति पूवाद्ुतशचिल्परलपूवंभागवचने च ( अः १४, १६ शछो° ) प्रायुद्गमरत्वमभिहितम्, तत्त॒ `
शिरया उरीधोक्ञानाथ न तु प्रतिमायाः शिरःपादादिक्ञानाथंम् । एतच नेकः. तेश्चानकोणायताया
चहिवाय्वायतायाश्च शिल्यया व्यावत्तेनार्थम् । मयमते त॒ कोणायताया अपिं श्षिखया मूहाग्रमाह । =. `
त्थाच-- । ६
(नेकः त्येशानदेश्ष्रा बह्वाग्रा बहधिवायुगाः (अः ३३, १९ छो०)
इति । अस्यायमर्थः नेत्येलानदेशा्रा नेच त्यश्चा नायतनत्वेनावस्थिता शिखा रेक्ञान-
दशाग्रा रेद्रान्यां दि्ि तस्याः दिर इति रेशानपदस्य द्विरावरस्याऽन्वयः कायः ।
शिलायाः रिरःपादादिस्थानकथनञ् प्रतिमायाः शिरमपादादिहानाथेम् । तत्र च प्रन्थ- `
क्ृतोक्तः समाधिः- ` | |
“प्रतिमायाः शिरस्तस्याः छुर्यात् पिमदक्षिणे
इति, यच्च मयमते कोणायताया अपि शिखायाः प्रतिमां ग्राह्यता प्रतिपादिता नेक त्येशान-
देशाम्राः इत्यादिवचनेन, तच्छिल्परलवचनविरोधाचिन्तयमेव ; रिल्परतपूवंभागे दिगायतायाः `
` शिलाया प्राहमत्वं कोणायतायाश्न बज्य॑त्वमाह । तथाच -
““शिखामूरमवाक् प्रत्यगुदप्ं प्राुदगदिश्चि (भ० ३३, १८ शोः) इति,
=-= ------------- =-=
क दैवतामूततिघ्रकरणम्
ल्िरधा शखसहा गभीरनिनदा दियाहिताग्रा शिखा
प्राह्या बिम्बविधो "+. 1 |
(° १४, ११ शोर)
दिश्वाहिताप्रेति दिशि आहितम् अथादवस्थितम् अग्रं यस्यास्ताददीत्यथः । दिङ्
शब्दश्ुत्या जायमानं जनानां कोणश्नमभमपनयन् स्पषटमाह तत्रैव प्रन्थकारः-
` “ुःस्पसपदिशं निवेशितरिरोदेशषा विवज्या श्षिखा” इति । (षो १०)
अपदिश्चमिति अन्तरालं कोभमित्य्थः । तथा च अमरः--
` “्खीबाग्ययं त्वपदिशं दिक्योमध्ये विदिक् सियाम्” इति ।
कोणनिवेशितशिराः शिखा वल्यं॑यथं
` “कोणकीर्षा शिला याजा भक्तदःखकरी यतः? (अ० १४; ४ शछो०)
इति च स्यष्टात् स्पष्टतरं तत्रेव । ४
भ्न्थकृता कृतः समाधिस्तु न युक्ति सहते । तथा हि~ पूर्वाक्तेः काश्यपमयद्िल्परलादिवचने-
रेकमस्येन शिखायाः प्रागुदगग्रत्वं प्रतिपद्यते, एवञ्च प्रागग्रया शिरया प्रागग्रा, उदगग्रया शिखया
त चोदगयरैव प्रतिमा युक्तितः करणीयेति किमिति तं पन्थानसुत्खज्य भरन्यक्ृता नवीन इव पन्थाः
` समवलम्नितः कि वा तत्र प्रमाणं तेनोपरन्धमिति न जानीमः ।
17 यथप्यल्मतूसुषितेऽे स्फुटं कमपि प्रन्थान्तस्संबादं नोपरुभामहे, तथाऽप्येकन्न दष्टः शाख्नारथो
बआघक्मन्दरेणान्यत्रापि तथेति न्यायादयमर्धः समथ॑यितं शक्यते । तथा हि, दारवयप्रतिमाया `
उपादानस्य बृ्षल्य यथामूरं यथोर्द्ध यथापादवंच्च प्रतिमाया अपि शिरःपादादिकं छरयादित्युप-
। छृम्यते।॥ तथा चवृहवसंहितायाम्--
खिङ वा प्रतिमा वा यथादिदं यस्मात् ।
तस्माचिहयितव्या दिशो द्रमस्योडधमथ बाऽघः ॥ (अ० ९८, ७ शो) `
अघ्यायमर्थः--खिद्धं हिवरिङ्धं वा प्रतिमा अचा वा यस्माद द्ुमवट् वृक्षवत् स्थाप्या `
व | | ४ तस्माडेतोदर मस्य द््वि आशा श्विहू यिंत्या > एवमूद्धौधरो भागावपि चिहयितन्यो । अयमथंः---
द्मल्य यः पूवौभिसुखो भागः सएव प्रतिमायाः पूवभागः कायः । एवं दक्षिणो दक्षिणः । |
पश्चिमः पश्चिमः उत्तरभाग उत्तरमग एव कार्यः! वृक्षस्य योऽधोभागः स एव प्रतिमाया ` 6
अधोभागः कायैः \ बकस्य य उबदुभागः सोऽपि प्रतिमाया उ्ुभागः कायं इति तद्वित `
भद्टोतपरः । बृहत्संहिता विदृतिङद्ुतकाश्यपे च--
बृश्चवत् प्रतिमा काया प्रागभागा्परश्चिता ।
पादाः पदेषु कतन्याः शीषंमूष्वं तु कारयेत् ॥ इति ।
काभ्यपरिल्पे-
स
पथनोऽष्वोवः
[ आकुषिवो प्रा्यश्चिखाक्थनम् | |
कायपरिल्पे तु-
ब्षस्य पूंभागे तु सुखं धृषन्तु पश्चिमे । (/ 1
| दक्षिणं सन्यपारर्व स्यादवामपार्वं तथोत्तरम् ॥ इति । (अ० ७९, २३श्लो*) ` |
` परं तत्र तत्न शिया ऊद्ौधःकथनं प्रतिमाया अपि उदधौधोनिणयाभिप्रायकम्, अन्यथा ` |
तदुक्तेडपयोगो दुरुपपाद एव स्यात् । एवच्च मयमते शिरया अधोऽ््रादिकमभिधाय सुखष््टादि- `
निणयाथेमू-
8 “खमुदधरणेऽधोऽ"शमूदं मागं शिरो विदुः"
इति यदुक्तं तदपि निरा्करं सम्पद्यते । दतरथान्न शिकायाः शिरोुलादिवचनमव्यावत्तकं = |
भवेत् । शोके "उद्धरणेः इत्यस्य शिखाहरणे, “शिर इत्यस्य च मुखषृष्टमाग इत्यथः । व्यक्तमाह ` # ५
“अधोभागं सुखं ख्यातं धर्टमूदधभतं भवेत् इति । ( अ० ४९, ६८ शो० )
मरुश्टोके पश्चिमादिशिरस्कत्वकथनं शयानश्िलाभिप्रायेण । दण्डायमानशिरायास्तु भूमि
ऽशो मूलम्, अनु भागक्ना्मिति जेयम् । तदुक्तं मयमते--
| “अग्रमध मधो मरुं पाषाणस्य स्थितस्य तु" इति । (अ० ३३१ १८०) =
निविड खषश्िशाङ्षन्धिः, निव्रेणा स्फोरकाङृतिषिन्दुरहिता । बिन्दुमाह काश्यपः-- ष
.उ०.म म त्िरविधा विन्दर्ष हि 1
कुष्णोहनिभाकारा कृष्णघ्नरमरसन्निभा ॥
` रिखिपिच्छसमाकारा.....-.--.-. ॥ इति (अन ४९, ४६-४७)
खगन्धेति स्वभावदेव खरभिः न त्वौपाधिकगन्धवती । यथाह निन्दितशिलामधिक् त्य ` । |
कारयपः-
५ “"वर्षातपाञ्निगन्धाच्च खीणा क्षारवारिणाः इति (भ०४९, एर्श्ो-) |
अथवा व्षातपाश्चिभिरतपयमानो इन्ध एव न तु गन्ध इति तद्नेनमभिषितं कारयपशिल्पे। = |
वणं इव पाषाणेऽपि गन्धोदमेदोऽवग्डक्परोक्षोऽपि अद्ध्वश्षात् कदाचिह भवेदपीति नान्न १ |
विकल्पः करणीयः । मधुरा नयनग्रिया खददयेति भावत् । ¢
कके यक. 9. धः
“मधुरं स्सवत् स्वादु रिय मधुरोऽन्यवव्” 1। इवि विश्वः ।
सवर
देवता--२
1 १० छ -: ` देवतामूरसिप्रकरणम् |
‡ ५ ४)
1 | या च कान्तियुता क्जिगधा शिख सा सवोचलिङ्गपीटेषु सवोस्वचीछ प्रतिमा, सर्वषु सिङ्ग ॥
पीर चेत्यर्थः, शरेष्ठा । ४ |
द्री अर्क्चा, न त्वनायासच्छेदयत्वप्रयोजककोमकूतापरपर्यायटदुत्ववती 1 मयमते शिलाया `
ब्रालाुवत्यादिखं्ञाप्रस्तवे- |
टङ्धातादिभरद्ठी या मन्दपक्ं कोपमा ।
चिरा बाख मता तज्जः सर्वकमंख निन्दिता ॥ (अ० ३३, ४३ श्ो०)
1. ॑ ध | | इत्यनेन ताद्शक्षिाया बाहृक्नक्रत्वेनं वञं नीयत्वकथनात् । अस्यायं :--टड्धातादिश्द्री
` पाषागदारणाल्ञाघातविषये श्दरी कोमला तदष्ेणानायासच्छेद्या, अत एव मन्दपक्तेध्कोपमा
| भल्पपक्क्टकतुर्या । यदि च द्रीत्यत्र यथा्ताधंग्रहणे भाग्रहस्तदा “टइवातादिष्ी'त्यस्य
पर्छृतटङ्काघातेन द्री जजंरा इत्येवार्थः करणीयः । तदेतत् सर्व प्राह्यरिलाखक्षणमाइ मयमते-
लिग्धा गम्भीरनिचोषा छगन्धा शीतखा श्दुः।
नविलावयवा तेजःसहिता योवना शिख ॥ `
मध्या स्व॑योग्या स्यात् सवेकर्मर्थ॑सिद्धिदा । इति । त
| जअ ३३, १४-१५के)
विमंरूमिति !. षिमरं विरिष्टमल्युक्ं मटिनमिति यावत् › देमकास्यादिचिहम् ! यथान्य- `
1. दिति यचान्यदित्यथेः । तथेत्याश्ष्धितपाटस्त॒ निःसन्देहथंम् । काल्यपशिल्पे--
, - “स्लाचिन्दुकर्ङ्कादिसंयुकतं परिविजेयेवःः इति ! (अ० ४९, ४४ शछो०)
९ । हिरा ताबद्रणं तश्रतुविधा--श्वेता, रक्ता, पीता, कृष्णा चेति । तथा चं काश्यपरिल्पे
6 ` ` *“वेता रक्ता च पीता च कृष्णा चेव चतुविधा इति) (अ० ४९३२ शो)
| एता च बाह्यणादिवणक्रमेणोपयोगमाह तत्ैव-- `
“धवेता र्ता च पीता च विप्रादीनां क्रमा मवेत्” इति । (अ० ४९, ३८ष्ो-) = `
न क पये इष्णदिखया खया वजेनामिप्रायकं तदुपादानं तदपि मसीङष्णापरम् , तत्रैव-- ` ` ४. ^
` ` “ष्णङकष्णा विनादाय इवेत्ष्णा तथेव हि (अ० ४९, ४९ श्ो०) | 0
[ शिलाद्यहरणक्षणः | 1 क |
दि नेशः शुभनक्तत्रे शकुने शान्तचेष्िते । 0 |
प्रतिमाखहकाष्टादिकमं कार्यं न चान्यथा ॥१० 1
इति शिकापयीक्ञ = १.
मा
इत्येकान्तकृष्णाया एव दोषध्रुतेः, = ` ४ 1
क (रिता कृष्णा शिखा भ्रह्मा सितवा विरोषतः इति (अ० ४९, ९० छो) ` ५
वेषतकष्णाया प्राह्यत्वविधानाच्च । अश्चिषुराणे त्ु-- | 5.
"पाण्डरा ्यह्णा पीता कृष्णा शस्ता तु बणिनाम्2 (अ० ४३, १२ श्षो०) (५ | ५
इत्यविशेषेण स्वेषामेव ब्राह्मणादिवणौनां सर्वाऽष्यरणपीतादिश्िखा प्रशस्तेत्याह । इह तु |
कासाञ्चन कृष्णानां कासाञ्नन पीतानामविशेषेण च दवेतानां छभावहत्वमाह--कपोतेत्यादिना । |
तथा च कपोतादिवत् कष्णशिका, घृतवत् पद्मवच पीतरिला वेतदि च सर्वच प्रयुक्ता = |
` कत्तु: खखमावहतीति शछोकाथः । |
| १०। छदिन दति । छमनक्त्रे कतु रिति ्तेयम्›, छदिने इति सामान्यतोऽभिघाय विशिष्य `
एुनन्षत्नोपादानल्य फलाभावाव्। छदिनज्र ज्योतिःदाख्रादाववलोकनीयम् । विषिष्याह |
१ “ष्टमासतिथिनक्षत्रलप्नवरे शिलां ग्रहेत्” इति ! (अ० ४९, १८ शोऽ१
भयमंते चं किलाधाहरणं प्रकत्य-
उत्तरायणमासे तु छक छभोदये } ५
` प्रशस्तपक्षनक्षत्र ुहूततं करणान्विते ॥ इति । (अ० ३३, १९-२० शो<) र ॥
शङ्ने शान्तेषटित इति । शकुने छभाश्चभादंखिनि निमित्ते शान्तचेष्टिते शान्तं सौम्थ॑ = |
कमनुद्धलमिति यावत् चेष्टितं थत्र ताहे सति । शङ्नमाह कादयपशिल्पे-- = |
| वायसं दक्षिणे बामादागतन्न तथैष ` ` :
श्येनं वे दक्षिणे वामे युधं मांसेन संयुतम् ॥
कन्यागोदश्चेनञ्चेव गावस्त्वाबाहनं तथा ।
दधिना पूणङुम्भच्च क्षीरङुम्भं तथेव च ॥
पुष्पं पुष्यटतं वापि छतवतीयु(वदुयु)वतिधियः। `
` ` अन्नजच मांसहास्व (हारञ्च) शिवभक्तिपरायणम् ॥ ` ५
। ज्वारानलर दीपञ्च जरः पूणवाद्ृतमू {== `: ` `
| १९ 1 रः देवतामूततरकरण्
उल्कापातं दिशं दाहं महावातप्रवत्तेनम् ।
अलयुमान्यन्तरीक्षाणि -“ “* ॥ इत्यादि ।
(अ० ४९, २०-२५ श्यो)
शुभरङनजेद् गच्छेदश्चभजे न्न गच्छेदित्याशयः । तदुक्तं काश्यपे-
| , “्ुमञ्ेद गमनं ऊर्यादशयुभञ्ेह विजयेत्" इति । (अ० ४९, २८ शोर)
। ऋालातिपाताकषमे कर्मण्यञचभराङनदरने प्रतिप्रसवमप्याह तत्रैव
श अञ्ुमे त्वश्निमास्ती्यं शिवेनैव शताहुतीः ।
समिदाज्योदनेः छुर्याननागान्नं नागभूषणम् ॥
द्वा शिवं नमल्कत्य गच्छेदा्चायंदिल्पि च । इति ।
(अ० ४९; २९-३० श्छो०).
ध प्रतिमे ति । एतदुपलश्वणम् , छिङ्पीराद्यवितशशिखाचाहरणेऽप्येतद् योज्यम् । तथा च कान्यपे-
| |“ आचायः शिल्पिखंयक्तः शिराग्रहणमाचरेत् ।
1 दिव्यान्तरीक्षभोमानि मिमित्तान्युपर्षयेत् ॥ (अ० ४९, १९ शोर)
इति सामान्यतः क्षिखाहरणमुक्तस् ।
ममते च-
प्रशस्तपक्षनक्षनर युहृत्तं करणान्विते ।
गच्छेिड्ं समुद्य वनं चोपवनं गिरिम् ॥
| | | निमित्तैः शकुने्योग्येः स मङ्खरशब्दैः ॥ इति ।
1 ४ ५ (9. (अ० ३३, २०-२२ शोर)
ओ अन्न लिङ्मित्युपल्क्षणमर्चादीनास्। वनं चोपवनमिति परतिमोवितद् मोदे्कथनम् ?
गिरिमिति शिङ्खाययुपयोगिशिकास्थानकथनम् ।
| कषिरागरहणमन्परमाह तत्रेव--
ॐ अपक्रामन्तु भूतानि देवताश्च सयुद्यकाः
युष्मभ्यन्तु बखिभूयात् कराश्च वनदेवताः ॥
कमेतत् साधयिष्यामि क्छिवितां ववा !1स्तुप्ंयः । इति ।
(अ० ३३, २७-२८ छो०)
शः स्यात्॥ इति! =
५ मय॑मत-(अ० ३३१ ऋृहतसंहिताख (५८ वनसम्प्रवे्ाध्याये) द्रव्यम् ।
| ५ एकत्रिरादङ्कखा, चतुहंरते एकचत्वारिशदङ्गरा भवेत् ।
। दला बृ्धिः, तेन पञ्हर्तप्रासादे तरिचत्वारि्दङकुल प्रतिमा, षड्दस्तप्रासादे पञ्चत्वारिश- ८ |
नि
2 [ प्रासादमनेनोदध स्थज्पेष्टप्रतिमालश्षणम् | न | न
एकदस्ते तु प्रासाईे म्तिकादशाङ्कखा ।
वशाङ्घुला ततो इद्धियोवद्धस्तचतुषटयम् ॥१९॥
व | [ उद सथप्रतिमाया मध्यमाधममेदकथनम् ]
` द्ववङ्कलखा वृशहस्तान्ता शतारद्ान्ताऽहुरस्य च ।
अतो विंशदशांशोना मध्यमार्चा कनीयस्ती ॥१२॥
एवञ्च तत्रेव ग्राह्याग्राह्यदश्चानमिधाय तदभिमन्त्रणमाह--
अचीथंससुकल्य त्वं देवस्य परिकहिपितः ।
नमस्ते बश्च पूजेयं विधिवत् संप्रगृद्यताम् ॥ न
यानीह भूतानि वसन्ति तानि विं गृहीत्वा विधिवत् प्रयुक्तम् । `
अन्य॒त्र वासं परिकल्पयन्तु श्चमन्तु तान्य नमोऽस्तु तेभ्यः ॥ इति
ह (अ० ९८, १०-११ शोर)
"त
य
द र.
शृहका्टाहरणग्रकारोऽ्ेतवनुरूपः समराङ्गणसूत्रधारेः परशिकषयते । तन्राहरणमन्त्रल्ठु-- ` = |
अपक्रामन्तु भूतानि यानि बरक्षा्रितानि हि । 1
॥ कल्पनं वत्तयिष्यामिः क्रियतां वासपयेयः ॥ (अ० १६, २७ छो०) २.
। तदेतत् सर्वं शेषतो जिक्वमिः समशाङ्गणसूत्रधार-(अ० १६) कर्यपरिल्प-(भ० ४९) ` 4
१९। अथ प्रथमं प्रासाद्मानेन उुस्थायाः ( दण्डायमानायाः >) प्रतिमायाः प्रमाणम् = |
उच्यते-एकस्त इत्यादिना । एकदस्ते प्रासादे मूत्तिरकादसाङ्ुखा भवेत्। ततो इस्तचतशष्यं |
यावत् प्रतिहस्ते दशाङ्कुख व्द्धिः । अर्थात्, द्विहस्ते प्रासदे मूर्रिकर्विरत्यङुराः च्रिहल्ते |
१२1 ततो दशहस्तान्ता दवाङकरा बरद्धिः, अर्थात् पञचहस्तादिदशदस्तान्तपासादेषु प्रहिहस्ते ` |
वङ्कुला, सकतस्ते सप्चत्वारिरादङ्ख, अषटहस्ते उनपञ्चाशवङ्कखा, नवहरते एकपन्नाशदङगु, ` ह
दशहस्ते व्रिषञ्चाहदङकला प्रतिमा स्यादित्यथंः। = ` 1
| शतार्खान्ताङ्करस्य च--शताद्धौन्ता शताद्धहस्तान्ता चद्धिरित्यस्यं विशेषणम् । इद्धरङ्खल्य `
। पकाङरल्य ; पकादशस्तादिपन्राकदधस्तान्तप्रासादेषठ॒प्रतिदस्ते यकरेकाश्ुला बृदधिरित्यथः । `
४ केवलामर
षटूषनारदङ्ला, चतुदशस्ते सस्षपजाशवङ्ुखा,
` पुषेकमेण बृदधप्ा पञ्चाद्धस्तप्रासादे त्रिनवत्यङ्कख प्रतिमा भवेत्! इत्यूदध स्थाः पञ्चाशत
प्रविमाः।' | | |
भत उक्तमानावधि विशंशोना विरेनशेन न्युना मध्यमा सध्यम्रतिमा, दशंशोना
दमाशेन दीना च कनीयसी क्षुद्रतरा अर्चा कथितेति शेवः । एवञ्च एकटर्तव्रासादे एकादशञाङखं
जयेष्टपरतिमायाः परिमाणम्, दशाङ्रं विंशतिविभक्ताङ्लल्योनविशसाश्च मध्यमप्रतिमापरिमाणस्
कशां दशधा विभक्तस्याङुरस्य॒नवांशाश्न कनिष्परतिमापरिमाणमिति । एवमन्यास्वपि `
` प्रसाणथिकप्रतिमाड के् ।
परासाद्परिमाणेन उदुस्थग्रतिमापरिमाणम् ।
गप्रासादल्य प्रतिमाया प्रासादस्य प्रतिमाया
इस्तमानम् अङ्कक्िमानम् हस्तमानम् अङ्कुखिमानम्
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य रकहस्ताह् वेदहस्तान्ते चलुद्स्तपर्यन्तप्रासादे षड्छृष्धिः षट् षट् इदिर्थस्याः प्रतिमायास्तारश्षी `
स्यात् । संख्याशब्दल्य वृत्तिविषये वीप्सा्त्वं सषपर्णादिवदि्युकते अथात् एकहस्तप्रासादे मूतः
षट्रिशदङ्खा, नवहर्ते उनचत्वारिंशवङ्कुला, दशसते द्विवत्वाररिशदङ्ुखा मूत्ि्वेदित्यथैः ।
इत्यासनस्था द्वितीयाः प्रतिमाः पञ्रादातसंल्याकाः 1
पथमाऽध्यायः ` स ८ १ ॥ ५
५.५ [ आखनल्योत्तमप्रतिमापरिमाणम् ] (4 ॥ ध |
दु (| दशहस्तान्ता जयङ्कला शृद्धिरिष्यते |
एका + भवेद् बद्धर्यावत् पथाशहस्तकम् -:
प्रतिमाया प्रासादस्य ` प्रतिमाया
अद्गुिमानम् इल्तमानम् अद्गुखिमानम्
१. 1
०. =“ ४ ५ ५ ४, द. | 8.
व व न
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४२ ध त ८९ (2 क
४६... , क
8. ८७ ९० 8 (4
१३। इदानीमासनल्थमूर्तीनां परिमिाणमुच्यते । (षडडुल्ा भासनस्या मूतिः हस्तादे- = |
षडड्ुखा, दिहस्तप्रासादे द्ादक्ाङ्गखा, तरिहस्ते अशदकाङ्कखा, चतहंस्ते चतुविशत्यङकला ` 1
मवेत् । तदूदधं पहस्तप्रासादमारभ्य दशहस्तान्ता त्रयङ्खखा वृद्धिरिष्यते । तथा हि-पञहस्त- ` |
प्रासादे सक्तविशत्यङ्करा मूतिः, पड्ढस्तप्रासदे न्रिशदङरा, सप्तहस्ते त्रयक्िशवङ्खा, अष्ल्ते |
ततः प्दास्तकं यावत् . एकादशस्तादिपञ्चाशद्वस्तान्तमित्य्थः, एुकाङ्ला प्रिहस्ते ` ५
एकेकाङ्करा बद्धिभ॑वेत्। तेन॒ एकादशहस्तप्रासदे त्रिचत्वारिदादङ्गला मूत्तिः, द्वादशदस्ते ` ५
` चतुश्रत्वास्शिदङ्गलखा मूत्तिः, एवंक्रमेण बृधया पञ्चाशादरस्तप्रासदे द्यशीत्यङ्गख मूत्तिभवेदित्यथः। = ५
य
। ` प्रासादपरिमाणेन आसनस्यप्रतिमापरिमाण्म्। . `
प्रासादस्य प्रतिमाया भ्रासादस्य ध .. : पतिनावा.
` हस्तमानम् अङ्कुकिमानम् हस्तमानम् = ` अद्कुछिमानम्
९८ ६.
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| 8 ॥ । ९ ए ०० 2.0 | 8 ३९ ४५। # ककः ३.१. | 8.
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1 4. 1 1 1
८७. ष ९० .. -..(अरतविमासद्कथाः) ८२
| विशत्येकेति । रविशत्येकत पुकविंशत्यङ्खाद़ अधिका द्वावित्यङ्ुरादिपरिमाणा
परतिमा ज्येष्ठा! धिशत्योना विदात्याङ्कलेन हीना कनीयसी प्रतिमा भवतीत्यथैः। एवच्च `
कण्ठतोऽनुक्तमप्यन्न मध्यमप्रतिमापरिमाणं पारिशेष्यादुन्नेयम् ; तथा हि इाव्कित्याचङ्रूपरिमाणा = `
विदात्योना योना क कनीयसी विोकविदात्यङ्रा च मध्यमेति पयंवसितो छ)
रतिः मापरिमाणनि्ंयप्रकारो ्रन्यङुपक्लमेव नान्यन्न शिल्परास्न उपरुभ्यते ।
प । प्रथमं ज्येष्रतिमापरिमाणमाह--द्वारोच्छेय इति । अदौ दवारस्यौननत्यम् अष्टवा विमन्यैकमं = `
| हस्ता प्रतिमा भवेदिति निष्कर्षः! एतच “एकहस्ते तु प्रासादे मूततिरिकादशाङ्ले"(१९१ शछोगेति
1 ` यथोक्तमागवदात् प्रतिमाया अश्टाविश्चतियवपरिमाणत्वप्रसक्तेः । `
६ शयनिऽष्या 9
[ हवारसानेन ज्येष्टप्रतिमापस्मिणम् ] 8
दरारोच्छुयोऽश्या कायां भागमेकं परित्यजेत् ।
सप्तभागं त्रिधा कृता दहविभागा प्रतिमा भवेत् ॥१५॥
पा ~ ------------------------~----------------------- ~+
१९। पं प्रासादमानेन प्रतिमामानमभिषितम्, इदानीं प्राल्ादद्वारमानेनापि तह वत `
परित्यन्यावशिष्टान् स्तान् तिधा विभज्य द्विभागेन प्रतिमाः ऊ्यत् । एकेन च पीक्कित्यनुक्त- ५ |
मप्यत्रोद्यम् । तथा च बहतसंहितायाम्- | |
देवागारदारस्यार्॑सोनस्य यतस्तृतीयोऽ शः ।
ततपिण्डिकाप्रमाणं प्रतिमा तदष्टिगुणपरिमाणा ॥ इति (अः १७, ३ श्छो०)
दवारमानाष्टमागोना प्रतिमा स्यात् सपिण्डिका
द्रौ भागो प्रतिमा तत्र तृतीरया्राशच पिण्डिका ॥ (अः ९९, १६ छो)
इति च । अर्टशोनस्थेति कृताष्टमागस्य दइारमानत्याष्टमभागेन हीनस्येत्यथः । द्वारप्रमाणमाह = `
तत्रेव प्रास्ादलक्षणमधिकत्य- | 0
यो विस्तासे भवेद् यस्य द्विगुणा तत्समुन्नतिः ।
उच्छ्रायाद् यत्तृतीर्यागस्तेन तुल्या कटिः स्ता ॥
विस्ताराद्धं भवेह गर्भो भित्तयोऽन्याः समन्ततः ।
गभंपादेन विष्तीण हारं दहियुणसुच्द्तिम् ॥ (अः ५९; १-२ शोर)
इति । तथा च दश्स्तविष्वृते प्रासरदे गभं: पञ्चहस्तः गमंस्य पादेन वु्यौशेन द्वारविस्तारो भवे- ` ८ । |
` दिति सपादहस्तप्रमाणा द्वारस्य विस्तृतिः उन्नतिश्च साद्द्िहस्तपरिमाणा । एवच्च-द्वासप्तिहस्त- `
विवृते प्राखादे षटूतरिशद्धस्तमितो गः, गर्मपादसममानतया च नवहस्ता दारस्य विस्तृतिस्तद्- =
द्विएणोऽधद्शस्तश्ोचरयः तस्य चाऽ्टधा विभक्तस्य एकमंशं षडङकुराधिकहस्तदवयं परित्यन्य `
` शिष्टानामष्टाद्शाङ्लाधिकपञ्चदशदस्तानां च्रिभागीकृतानां भागद्वयपरिमिता इाद्राङ्खधिकद- `
` यदुक्तं वतोऽन्यादकमेवेति मन्तव्यम्, निरकतद्वारमानत पुकहस्तविस्कृतप्रासादे हारस्य षडङ्गरत्वेन =
ससराङ्खणसूत्रधारे तूत्तममध्यमाधममृत्तीः प्रकत्य-- `
(भव १ तच्च) हारं त्रिधा (चत्वा मक्ता) पीठं भागेन कल्पयेत् ।
(ता ? ह) भ्यां (त) प्रतिमा काया ज्येष्ठा (ल्या ? या) मानमीददाम् ॥ ८.
9 | (अः ७०, १४७ छोर)
ध र कु तत् प्रकृतग्रन्थस्य कनिष्टप्रतिमामानानुरूपम् । तथा कनिष्टमूरि ध मूत्ति-
1 (0 देवतामू्तिप्रकरणम्
6 ४ [ मध्यभप्रतिमापरिमाणम् ]}
` रं विभज्य नवधा भागमेकं परित्यजेत्
अशो भागांलिधा छता दिभागे प्रतिमा भवेत्
| [ कनिष्टप्रतिमापरिमाणम् 1
लिभागेभाजिते दवारे द्विभागेऽ्वा भकततिता ॥१६
इति प्रासाष््धारमानेन प्रतिमप्रमाणप् |
ता तान ०५०१.१ ०५५०२५९ न
| ए(व १ क) सुत्स्स्य शेषेण ०२ | (भः ७०, १४९ शछ० ) |
इत्यपि यदुक्तं तनु प्रकान्तश्ठोकानुसारीति हर्यते । एवम् अल्माभिर्परिात प्रदर्शधिष्यमाणं `
तदुक्तमध्यमप्रतिमापरिमाणमपि वक्ष्यसाणमधघ्यमग्रतिमापरसिमिणानुसारीति स्तेयम् । न चेवं
` स्माद्गगसूजनारपरामाण्याद् प्रकृतेऽपि ग्रन्थे वेपरीत्येन अधममध्यमोत्तमप्रतिमापरिमाणरक्षकतया `
शोकानां परारी; स्वीकृत्य तदेकवाक्यता करणीयेति वाच्यम्, व्हस्संहितायां मध्यमाद्विमेद-
मनाहत्य कैवरमेतच्छोकोक्तपरिमाणस्यैव ग्रदणेनास्येवोत्तमत्वस्वीकारात्। मत्स्यघुतगेऽपि--
पि द्ारोच्छयल्य यन्मानमष्टधा तत्त कारयेत् ।
भागमेकं ततस्त्यक्ता परिरिष्टन्तु यहु भवेत् ॥ |
0 ` भागद्वयेन प्रतिमा... ( अ० २९८, २४-२९ छने° )
4 ॥ इति द्वारमानेनेकमेष प्रतिमापर्मिणसुक्तमिति सर्वं डसमञ्चसम् । ५३ |
| १६। मध्वमाधमप्रतिमापरिमाणमाह- द्वारमिति परिभानैरिति च । स्प्ोऽ्थैः। मध्यम
५ क - प्रतिमालक्षणमाह समराङ्गणसूत्रधारे-
५. मध्याया नवधा द्वारं क ( ते ? त्वे ) कं भागयुत्खनेत् ।
दोषान् भागांस्त्रिधा कत्वा पीठं भागेन कल्पयेत् ॥ 4
भचासुभाभ्याम्.......-.-. 1 इति । (अर ७०, १४८-१४९ श्लो° 2: । छ
1 अधमप्रतिमापरिमाणमप्याह तत्रेव--श्ीनायां विदध्याद् ारमष्टेश्त्यादि प्रागेवोद्धिखितम् । ४.१ -
८. हारप्रमाणायाः प्रतिमाया विनियोगमाह समराद्गणसूत्रवरि-- ` |
| चात्राथा परतिमा द्वाखप्रमाणेन विधीयते। इति) (अ ७-१४६ )
: बात्राथां उत्सवार्थं निभि ¦ |
| त म समराङ्णसूत्रधारतो जित्ामिर्षिज्ेया । ` ` ८
भ त्मानी सुलाचवयवपस्मि न णादिकं दि मत्स्यपुराण ( अ० २१८ )-वरहतूसंहिता ( अ० ९७ )-. ध ।
काभ्यपरिल्प ( भ ९० )-समराङ्गणसत्रधारादिषु ( भ० 1
[ गृहपूज्यायाः प्रतिमायाः परिमाणम् ]
प्रातमा पृञ्या नाधिका शस्यते ततं
[ देवगृहयोचितप्रतिमापस्मिणम् |
दान्नवहस्तान्ता पूजनीया सुराख्ये
[ बहिश्वनीयप्रतिमापरिमिणम् ]
वशहस्तादितो याऽचां प्रासादेन विनाऽर्चयेत् ॥१८॥
तातन ७५ ५००५१००५.००५५
९७। इदानीं त्र कीदशी प्रतिमा पूजनीयेति वकु प्रथमं गृहोचितायाः प्रतिमायाः परिमाण- `
| माह--आरभ्येति । एकाङ्लादारम्य उच्दापम द्दश्षाङ्खययन्ता प्रतिमा गृहेषु पूज्या । स्पष्टमुक्तः १५.
मतस्यपुराणे-
अङ्कष्टपर्वादारम्य वितस्तिर्यावदैव तु |
वितस्तद्ादक्ञाङ्ुरस् ।
। १८। देवाख्यषूल्यामाह तदृद्ौदिति । दवादशाङगुकतोऽटहस्तपरिमिणं यावत् प्रतिमा छराख्ये `
पूननीया। तथाच मात््ये-- ` 071
'आषोडस्ा तु प्रासादे कन्या नाधिका ततः? इति । ( अ० २५८ २३ )
'भाषोडज्ा" षोडश वितस्तिपयेन्ता अष्टहस्तपयंन्तेति यावत्, प्रासाद इति देवाय इत्यः । = _ ` ।
` पएतदेकवाक्यताविंधितूसलयेव (नवहर्तान्ता इत्यस्य नव हस्ताः. परिमाणं यस्याः सा नवहस्ता, = `
सा अन्ते यस्याः च्योदश्चाङ्खादयष्टहस्तान्तायाः प्रतिमायाः सा तथेत्यतदुगुणसंविन्ञानघ्यधिकरण- `
इबीहिणा ताहशोऽथेः कश्टकल्पोऽपि युक्त इत्युवपश्यामः ।
दरदस्तादित इति । दंशदस्तायाः प्रतिमाया भादिरादिभूता प्रतिमा ताम् भार्य नबहस्त- = `
प्रतिमामारभ्येत्य्ः, न तु दयहस्तप्रतिमामारम्येति यथाश्रताथेः करणीयः, पूाक्तमतस्य- ` |
घुराणवघनेन नवडस्तायाः प्रतिमाया. अपि प्रासादे परूलननिषेधात्, सम्भवति च तद्वचनेन |
` सहेकवाक्यत्वे वाक्यमेदस्यान्याय्यत्वात् ! इत्थ्न-(दसादिकिखृदधया चः (१९) दति वक्ष्यमाण- |
` वाक्येन दरहस्तप्रतिमामारभ्य पञ्चचत्वारिशद्धस्तां यावचतुष्क्यां पूजनविधानादियमेकव नवहस्ता =. |
प्रतिमा वत्तते, यत्याः पूजास्थानं किमपि नोपदिष्टं मन्थक्ता ।
। इदमत्र मनस्यापततिः- प्रसादेन विनाऽचंयेदित्यनेन सामान्यत भासां दशस्तादिप्रतिमानां
` भ्रासादे पूजां निषिध्य क्र तदहीमाः पूजनीया इत्यपेक्षायां द्शादिकरङधति विश्ेषोऽभिषहिती अन्थ- `
( कृतेति । अत्र च पक्षे 'नवहस्तान्ता इत्यस्य 'दशहस्तादितः इत्यस्य च यथाश्रुत एवाथ करणीयः
गृहेषु प्रतिमा कार्या नाधिका शस्यते बुधे: ॥ (अ० २५८ रर श्लो)
4 ५५ देवतामूततिप्रकरणपे
[ तत्र विक्ेषः ]
शादिकखृद्धया च षट्विंशत॒परतिमाः प्रथक् ।
बाणवेदकरान् यावचतुःषष्ट्यां(्त वापय ये
८ देवगृहभिच्यादिनिणंयः |
कृते तेल दशधा भिनति |
स्यादन्यथा नवहर्तप्रतिमाविषगरे किमपि विधानं न स्यात्तेन च ग्रन्थकूतो न्यूनता प्रसज्येत । यथा-
श्रता्थंपस्थिहपक्चे द॒ पूर्वाक्तमतघ्यपुराणवचनव्याकोपो मतान्तरवादेन प्रतिसमाधेय इति दिक् ।
` प्रज्वचत्वारिशतं हश्तान् यावत् एकरंककरवधंनाजाताः पृथक् षटृत्रिशतं प्रतिमाः चतुष्क्यां `
-बहिश्वतुरस्देशे पुष्करिण्याकारनिज॑रचतुरल्ललाते वा पूजयेदित्यथंः । तथा च दश्स्तेकादह्स्त-
१९। दशहस्तादिप्रतिमानां पूजास्थानमाह--दशादीति । द्ञहस्तत आरस्य वाण्वेदकरान्
` इदशहस्तादिक्रिमेण पञ्चचत्वारिशदधस्तौ यावद गृहा बिश्वतुरखप्रदेशे पूजयेत्! भवति
च द॑शदस्तां प्रतिमां मेरत्पेन कल्पयतः पञ्चचत्वारिंशदधस्ता प्रतिमा पटूत्रिशी |
ताश्च पञ्चचत्वारिशद्धरस्तान्ताः प्रतिमाः पूवंवर्न्थेष्ज्यादिकं भजन्ते । तथा हि--निर्त-
प्रमाणाः प्रतिमाः ज्येष्ठाः, स्वमानस्य वृतीयमागोना मध्यमा अर्धोनाश्च कनिष्ठा इति । तदेतत्
खविशेषमाह समराङ्गणसूत्रपर-
भाकारे (‰) प्रतिमा ( येष्टा १ ज्येष्ठा ) चल्वारिदाचच पञ्च च । |
हस्तान् कार्या त्रिभागोना मध्या हीना तदद्ध॑तः ॥ (अ० ७० १४९-- १४६ श्लोर)
` इति । इत ऊ प्रतिमाया विधानं नास्तीति इयमेव ब्रहत्तरा प्रतिमा ।
बरहतसंहितायां चतुहस्तावधिकप्रतिमाया एव छुभदायकत्वसुक्तम्-
सौम्या तु हस्तमात्रा वखदा हस्तद्रयोच्िता प्रतिमा
केमखभिक्षाय भवेरिचतुहस्तप्रमाणा या ॥ इति 1 ( अ० ९७, ५९ श्छो० ) `
६. अन्नादं चतुःषष्टवामिति प्रामादिकः पाटः, छन्दौभङ्दोषादर्थासङ्तेश्च । अष्ति च समानतन्त्रे
भरन्थक्ृतः कृतौ रूपमण्डने प्रायेणेतत्समानानुपूर्वीकः श्छोकः, तत्र च "चतुष्कासः इति पाह
उपरम्यते । छन्दःुधोऽप्ययं पाठोऽपपाढ एव मन्यतेऽथंदारिदरयात्, तस्मात् पूव॑ददितसमराङ्गण-
सूत्रधारवचनेकाथ्यात् रूपमण्डनीयवतुष्कदाब्देन साम्यवाुस्याच प्राङ्गणादिसमानाथकं चतुष्क्याम्ः = `
हति पदं छदधपारत्वन कलिपितमल्माभिरिति जेयम् ।
इति । अन्यथैव भित्यादिविधानमाह बृतंहितायाम्, तच पूर प्रद शितम् ।
२०॥ इदानीं गभगृहप्रमाणेन प्रतिमापर्मिणणं वक्तुमादौ गभगृहप्रमाणमाह--चतुरखीकत | ४
| मानः पाठः पर्तिुद्धिं विदम्पति, तथापि पञ्चाशेनाः इति विकृतपाखदशनात्तस्य च॒ |
प्र्त्यवुखन्धित्सया 'पञ्शोनाः इति पाठः प्रथमतः शुद्धत्वेन द्धिमारोदति, ततश्च मध्यमत्वा- ` |
दिक्रमान्यथानुपपतत्या सर्वत्रेव "उना" इति पाठः सम्यक्तया प्रतिभातीति स एवास्माभिरनुखतः। ` |
क्रमानुपपत्तिस्तु- ५
माध्यमिकत्वमूनप्रमाणायाश्न कानिष्ठ्यम् उपदिश् यथाश्चुतः पाटः क्रमदुःस्थ इति हेयपक्ष एव ५ ॥ ८. |
नियः
[ गभेगेहप्रमाणेन ज्यष्टादिप्रतिमएकथनम् ] क |
गेहत्रिभागेण ज्येशाऽ्चां कथिता बुधैः।
मध्यमा च दशांशेन(शोना) पथांरोना(शोना) कनीयसी ।
सलि गर्भगेहे तु द्वो भागो परिवजेयेत्। ` १
[ती भवेदेवः शयनस्थः सुखावहः ॥२२॥ |
अष्टरोहमयी मृत्तिःशेरलमयी तथा।
भरे्ठव्र्तमयी वाऽपि प्रवालादिमयी शुभा ॥२३॥
~~~ ५
4
२१ 1 गमत्यादि । च्रिमागीङ्कतस्य गर्भगेहस्य भागेनेकेन ता अचौ ज्येष्ठा, षोड्दाधा 1 |
विभक्तस्य गरमगृहल्य दश्षंशोना अर्थात् सादपादप्रमाणा प्रतिमा मध्यमा ; तथा पञ्चाशोना ` |
प्रतिमा कनीयसी कनिष्ठा इत्यथः । | १५
अन्न यद्यपि त्रिभागेण इति छुदपास्खमीपचयया "दशांशेन इत्यत्राप्यसन्दिग्धत्वेन प्रतीय-
अङ््टपर्वादारभ्य वितस्विर्यावदेव तु ।
गृहेषु प्रतिमा कार्या नाधिका शस्यते बुधेः ॥
इस्यादिवचनादूनग्रमागाया एव प्रतिमाया ज्येष्ठं प्रतीयते, प्रसागाधिक्रायास्तु कानिष्ठ्यम्
इत्थ्च गर्भयृहदशेन निर्मिता प्रतिमा प्रमाणाधिकेति तस्याः कानिष्य्ये प्रासे, प्चारेन निमिता = |
तूनप्रमाणेति तस्या अपि मध्यमत्वे प्राक्च तदुभयविपरीतं प्रमाणाधिकायाः प्रतिमाया `
तदेतत् स्वं विस्पष्टमक्तं स्वयं ग्रन्थकारेण तदीयरूपमण्डने--
वृतीयांशेन गभंस्य प्रासादे प्रतिमोत्तमा । |
4 मध्यमा स्वद्ांश्लोना पञ्चाना कनीयसी ॥ इति
` २३। अष्टलोहकिम्बानि, यथा-- |
^, सौवर्णं राजतं ताघ्नं पैत्तलं कास्यमायसम्। = . `
` सेखकं त्यापुषञ्चेति रोहं बिम्बं तथाऽ्टया ॥
बिम्बरलानि, यथा-- व
स्फरिकं पद्यरागन्च वञ्च नीरं हिरण्मयम् ।
वेदू्यं विद्म पुष्पं रलबिम्बं तथाऽटधा ॥
स्फटिकं सुयंकास्तच्च चन्द्रकान्तमिति त्रिधा
टिकस्यव मेदाः स्युः काममोक्षाधंदाः क्रमात् ॥
श्रियं कामं तथाऽऽयेग्य्द्ध पुत्रं जयं उखम् ।
कमते प्द्यरागादिविस्बानां कमोऽचंनात् ॥
बिम्बवृक्षा, यथा--
चन्दनं देवदार्श्च शमीपिप्पररिक्षपाः
हिरास्तनमाद्रमधूक्ा वञ्ुरस्तथा ॥
पद्यकं कणिकार्छ विप्रादीनां रयं त्रयस् ।
` क्मादारवविम्बानां विन्तेयास्तरवः शमाः ॥ 6
२४ इदानीं जी्गोद्धारविधिं संक्षेपेण कथयिष्यन् भदौ जी्ैत्वेऽ्यपरित्याज्यां प्रति-
। ` मामाह--भतीताब्द्दातेत्यादि ! महत्तमेम॑दाघुस्येः स्थाप्या स्थापनयोग्या या भूतिः देवताबिम्बम् ` ^
अतीताब्दश्ता विगतक्षतवर्षा सती खण्डिता भघ्ना, स्फुरिता विदीणापि सा अर्च्या पूजनीया,
गमे यदि परतिमा घ्रा स्फुटिता वा स्यात्, तथापि तां पूजयेदित्युक्तमनेन :,
व्यक्तिविशेषप्रतिष्टितानां मूतीनामत्याज्यतामाह शिवरिङ्गमधिह्ृत्याधिपुराणस्-- स (
अन्यथा नोचेच् पूजिता स्यात् दुःखदायिक्ा अष्युभप्रदा भवेदिति ओषः । शतस्य वर्पाणामप-
अरेसुं निभिेत्रसतन्त्रविदुभिः प्रतिष्टितम् ।
जीणं वाऽप्यथवा भग्नं विधिनापि न चाख्येत् ।॥। (अ० १०३, १९ शछो०)
भङ्धविरेषे ग्राह्याम्रह्त्वसुक्त ग्रन्थकारेण तस्येव रूपमण्डने-- क
0 ` इक्रनीतिसारे च
07. अभिपुराणेऽपिं सष्षषशितमाध्याये-- `
अड्प्रत्यज्गभधरं तु मूत्तिं धीमान् विसजयेत् ।
नखाभरणमाराख्मस्नां तं न विजयेत् ॥ इति ।
देवाख्ये मानहीनां मूकं भश्च न धारयेत् ।
ओीणोद्धारविधि वध्ये भूषितां स्नपयेद् गुहः । ४
` अचलं विन्यसेद् गेहे अतिजीर्णं परित्यजेत् ॥ १॥
व्यङ्घं भन्नाञ्च शेराव्यां न्यसेदन्याञ्चं पूववत् । |
संहारविधिना तत्र तत्त्वान् संहृत्य देक्षिकः ॥ २ ॥
सहस्र नारसिंहेन हत्वा तायुदरेह गुः! `
दारवी दार्येह बहौ शेरजां प्रक्षिपेजरे ॥ ३ ॥
|.
प्रथमोऽध्याय (५ ॥ि 0 २३
विः रोल ठ्यज्खा संस्कारयो ० काः। `
षाणजा भन्राः संस्काराहां न देवताः ॥२५॥
| [ बहिरायतनस्थाप्या देवताः ]
भैरवः शस्यते लोके प्रयायतनसंस्थितः। `
न मूरायतने काया भेख्स्तु भयङ्करः! = '
नारसिंहो वराहो वा तथान्येऽपि भयङ्कराः ॥२६॥ = ।
| [ अश्ुभप्रतिमारुक्षणम् ] 9 |
नाधिकाङ्घा न हीनाङ्घाः कलतेव्या देवताः क्चित्।
धातुजां रतजां वापि अगापे वा जलेऽम्बुधौ । ` क |
यानमारोप्य जीणा छाद्य वश्नादिना नयेत् ॥ ४ ॥ 1/1
वादित्रः प्रक्षिपेत्तोये गुरये दक्षिणां ददेत् ।
यतप्रमाणा च यहूव्या तन्मानां स्थापयेहिने । `
कूपवापीतडागादेर्जाणोदधाि महमफरम् ॥ ९ ॥
शिल्परल्ने च-- दोषे धुते बिम्बं नेव त्याज्यं कदाचन !
५: बाहुच्छेदे कश्च्छेदे पादच्छेदे तथेव च ॥
तथेव स्फुटिते भिन्ने यस्मिज्नवयवे गते ।
वैरूप्यं जायते यस्य तत्या्यं प्रायशो भवेत् ॥
अङ्गुल्यादिपरिच्छेदे बन्धनं शस्यते बुपरैः। `
महादोषसमायुक्ते सान्निध्यं रक्यते यदि।
तथेव बद्वा संशोध्य प्रायधित्तं समाचरेत् ॥
य
२६ भैरव इत्यादि। भैरवो कारभेरयो वटुकमैरवश्िषुरभेरवश्च महादेवस्य मू्तिविकशेषः, = `
` प्रत्यायतनसंस्थितः बास्तुबहिरवारीस्थः शस्यते प्रशस्तो भवति, बहिरावास एव स्थापनीय `
इत्यथः । मूखायतने न कायो न स्थापनीयः । नारसिंहो वराहो वा तथा अन्येऽपि ष 1
भयङ्करा देवता मूष्ायतने न कायाः । तदुक्तं मत्यपुराणे समानातुपूर््यी-- = ` 1
भैरवः श्ञस्यते खोके प्रत्यायतनसंस्थितः 4
` ` ` न मूलायततने कायौ भैरवस्तु भयङ्करः ॥ 4.
| नारसिहो वराहो वा तथान्येऽपि भयङ्कराः ॥ इति । (२९९अ० १४-१९ शलो
ख देवतामूर्चिप्रकरणम्
सवासनं घातयेन्नयना करालवदना तथा ।
अभि पका शिल्पिनं हन्ति छशा चेवाथनाशिनी ॥२९७॥
व्क नासातिदुःखाय संदिताङ्गा भयङ्करी ।
चि पिदा दुःखशोकाय आधिपत्यविनाशिनी ॥२८
दुभ्दा हीनवक्ता तु पाणिपादङ्कशा द्था
` हीनाङ्गा हीनजङ्गा च प्रमोन्मादकरी नृणाम् ॥२६॥
शुष्कवक्ता तु राजानं कटिहीना च या भवेत् ।
पाणिपादविहीनायां जायते नरको महान् ॥३०॥ `
जद्वाहीना तु या खर्चा शवु-कल्याणकारिणी ।
पुलमित्रविनाशाय हीना वत्तःस्थलेन या ॥३९॥
जात ७८५ तातो १ ५१ [त
` २७-३१॥। एते पञ्च इरोकाः स्वौत्मना मतूल्यपुराणीय (अ० २९९, १६-२० शो०)-ष्टोक-
पञ्चकमनुङकवते । यच्च कचित् कश्चिहु वणंभेदोऽस्ति तन्मात्रं प्रद्यते-आधिपयविनाशिनीः
(२८ श्लो) इत्यत्र मात्त्ये “अनेत्रा नेत्रनाशिनी" (१८ रको ०) इति पाठः, एवं "पाणिपादविदीनायां `
| (३० भ्छी) इत्यत्र शपाणिपादविहीनो यो" ( १९ ` भ्छो० ) इति पाठः । (जङ्हीनदेवता्चाः
1 (३९१ श्छो० ) इत्यत्र “जह्ाजादुविदहीना चः ( २० शखो० >) इति पाठः । समराङ्गणसूत्रधरि--
निहन्ति कारकं रोद्रा दीनरूपा च शिल्पिनम् ।
छशा च्या (धि ? धि) विनाश्चज्च कुयात् कारयितुः सदा ॥
६ कृशोदरी ठ दुभिक्षं विरूपा चानपत्यताम् ॥ ( अ० ७७, ७-८ इलो०
` इत्यन्यदेव फलं तत्तदङ्कविक्ृतायाः प्रतिमायाः प्राह ! तथा च्रहतसंहितायाम्- |
१ | नृपभयमत्यङ्घतायां हीनाङ्ञयामचछल्यता कन्त: ।
शातोदयो क्चुदभयमथंविनाशः कशाङ्ञयास् । `
(1 मरणन्तु सक्षतायां शश्चनिपातेन निदिशेत् करतुः ॥ ( अ, ९७, ५-५१ )
इति। परमन्र थ्यवस्थानादिभेदेनाप्यञयुभप्रतिमार्षणयुक्तम् । यथा-- `
वासावनता पतीं दश्िगविनता हिनस्त्ययु ) |
भन्धत्वमूदध दृष्ट्या करोति चिन्तामधोुली ष्टिः ॥ `
: ॥ ( अ० ९७, ९१-९२ कछो० ) इति |
शु
मत्ल्षुराणे मनोरदुतशान्त्यादिषच्छायां मतूस्यवचनम्,
रति मा काष्ठलेपाश्मवण्डचित्रादिरसंग्रहे। . `
मानाधिक-परीवाररहिता नेव पूञ्यते ॥३३
` अनेत्री नलनाशाय स्वल्पा स्याव् भोगवजिता
अ्थहृत् प्रतिमोत्ताना चिन्ताहेतुरधोमुखी ॥३४)
[ छमप्रतिमारक्षणम् ]
सस्पूर्णावथवा या स्यावायुखक्त्मीप्रदा सदा ।
एवं छल्षणमासावय कर्तव्या देवता बुधेः ॥३५॥
[ अथाद्ुतम् | ।
यानवेरत्पातान् गमैः प्रोवाच तानहं व्ये
तेषां सङ्क्ेपोऽयं ्रकृतेरन्यत्वसुतपातः ॥ ३६ ॥
३२। पीढ्यानेत्यादि । प्रतिमायाः पीटल्य यानस्य परीवारस्य च ध्वंसे नाशने सति
कतुरपि यथाक्रमं स्थानवाहनखत्यानां निशितं नाश्ञो भवति। तथा च पीर्ध्वसे स्थाननाह्ञः, `
| यानध्वंसे वाहननाशः, परीवारध्वंसे च गत्यनाशो भवतीत्यर्थः । ५. ६ ५
३६1 प्रतिमेति। काष्टादिनिमितप्रतिमानां कग्रदे हत्य्थः। मानाधिकैति। पूर्वं `
ह प्रतिमाया य म्ानद्युत्त ततोऽधिकपस्मिणा, परीवाररष्िता यस्याः प्रतिमाया यान्तः परीवारा
श्ाश्््ास्ततोऽल्यपरीवारविरिष्टा, ततश्रानयोः कम॑धारयः ! अथवा मध्यमणिन्यायेन परीवार- `
अ पदल्योभयत्रान्वयः, तथा च मानाधिकपरीवारा परीवाररहिता चेत्यायातम् ; एवञ्न-यस्याः `
प्रतिमायाः परीवाराः संख्यातो देष्यौदितश्च यथानिर्िषटपरिमाणाधिकपरिमाणतन्तः, यस्यै
कान्ततः परीवारा एव न सन्ति, ते उमे अपि नेव पूजयेदित्यर्थः । ¢
३९। सम्पूरणावयवेति। तथाच माल्ये `
सम्पूर्णादयवा या तु जयुरश्षमीप्रदा खदा ।
एवं रक्षणमरासा् कतन्यः परमेश्वरः ॥ ( अ० २५९१ २१-२२ शो० ) ८
इति किञ्िदभिन्नालुपूध्याऽं शोकः । परमेरवरो देवप्रतिमा । ५
गर्गैः अन्नः समीपे प्रोवाचेत्यन्वयः ! तथा च
1
मनुजानामपचारादपर्ता देवताः सृजन्त्येतान् ।
तत्षरतिघाताय तपः शान्तिं राष्ठ प्रयुञ्जीत ॥ ३८ ॥
[ दिन्यादुयुतम् |
दिव्यं मरहक्ैवेकृतम्
[भन्तरिशषादुसुतम् ]
... .** .*-उस्कानिघांतपवनपयििशाः
अत्र ते वणयिष्यामिं यदुवाच महातपाः
| अच्रये इ्रद्धगगस्तु सव॑धमंश्तां वरः ॥ (अ० २२९, रश्छो० )
इति । तेषाम् अद्भुतानां सङड्क्षपः समासेन संग्रहस्तु प्रकृतेरन्यत्वं स्वमावस्यान्यथाभाव
यमिति यावत् । ६
तथा च श्हतसंहिताविष्रतौ उतपरुमष्टतसमाससंहितायाम्-
यः प्रकृतिविपयासः सवः संक्षेपतः स उत्पातः । `
क ध्षितिगगनदिव्यजातो यथोत्तरं गुहतये भवति ॥ इति । |
| ३७। संसूचयन्तीति। सवाङ्क्षतमिदं शछोकाद्धं कथं परतिन्रियितेति पयाङरेरल्माभिर्मूरे
संशोधनप्रयासः परित्यक्तः! परम्गरहाथं॑संवादिप्रमाणयुद्धियते। तथा च इहव हितायां
. यथोक्तूर्वादीत् परम्- |
` ्व॑सुचयन्ति दिन्यान्तरिकिभौमास्त उत्पाताः, (अ० ४९, २ श्लो०)1.
स ` उपद्रवाः । क्था च गगः--
॥ ` अतिलोभादसत्याह्वा नास्तिक्याद्वाव्यधरम॑तः ।
1. नरापचारान्नियतयुपतरगः प्रवत्तते ॥ इति । 1
ततो दिव्यान्तरिकषिभोमा उत्पाताः सान् उपसर्गान् संसूचयन्ति दति तदविदृतौ `
इदानीमुतपातान् विभजन् विवयस्वरूपमाई-दिन्यमिति । ग्रहाणाम् आदित्या
ध ५ इति प्रकतादढसमाथंकः पाठः । "नराणाम् अपचारेण पापसञ्चयो भवतिं पापसश्चयादुपसगां 2
चरस्थिरभवं... ... -.*
[ एषां श्ान्तिनिवत्तंनीयत्वानिवत्तनीयत्वविकल्पः ]
1 =
दीनाम् ऋक्षाणाम् भर्वन्यादिनकषत्राणां यह् वृतम् अन्यथाभावस्तद दिन्यम् अद्धूतमिति शेषः । `
। अत्र प्रकृतोऽ्युतपातो लिङ्गमेदाह “दिव्येन न सम्बध्यते एवमुत्तर्ापि। यद्वा वैकृतमेवात्र॒ `
विशेष्यम् ; अ्हक्षकतं यदु वेकतं तहु दिन्यमित्यर्थः । `
आन्तस्छिमाह--उल्केत्यादि । उल्कास्वरूपमाह बृहतसंहितायाम्-
दिवि सुक्तश्वभफरानां पततां रूपाणि यानि तान्युल्काः ( अ० ३३, £ श्ची° ) ईति । ५ 1
केचित् पुनलाकानां छ्चभाद्युभसूचनाय रोकपालास्तान्यश्लण्येवोल्का इत्याहुः । तथा बोत्पल-
भट्टतगगः-~
| स्वाख्लाणि संखजन्व्येते श्चुभाड्युभनिवेदिनः ।
५ छोकपाहा महत्मानो लोकानां ज्वलितानि तु ॥ इति ।
निर्घात इति । निर्घातमाह बहतसंहिताविदृतो उवपरमहशटतग्गः-- `
यदाऽन्तरिक्षे बर्वान् सारतो महताषहतः ! ` `
पतत्यधः स निर्घातो भवेदनिरुसम्भवः ॥ ` इति। 1
पवनो विकृतो वायुः । परिवेश इति । तत्स्वरूपमाह बरहतसंहितायाम्- `
खम्मूच्छिता रवीन्द्रः किरणाः पवनेन मण्डलीभूताः
नानाव्गोकतयस्तन्वभ्रे व्योक्नि परिविश्चाः ॥ इति ।
गन्धवंषुरम् आकाशे इश्यमानं पुराति प्रविद्धम् । इन्द्रवापम् आकारे दश्यमानं =`
० धनुराङृति विहम् । तथा च ब्रहत्ंहितायाम्- . 1.4
सुयंस्यं विविधवर्णाः पवनेन विधद्धिताः कराः सन्ने ।
वियति धनुःसंस्थाना ये इर्यन्ते तदिन्द्रधनुः ॥ इति ।
प्रकारान्तरमाह उतवर्मद्टतकाश्यपः-- `
| अनन्तङ्करुजाता ये पत्गाः कासरूपिणः 1
तेषां निश्वाससम्भूतमिन्दरचापं प्रचक्षते ॥ इति ।
एते यत् तदान्तरिश्चम् अदुतमिति । गन्धव॑पुरन्दोत्यत्र एकं 'पुर्पदं ठेखकप्रमादात् ` |
पतितमिति प्रतिभाति, पासी । 1
। ४०। भोगता --मोममिति । चरस्थिरमवमिषि च्य
दव ` देवतोभूकरणम्
मवतीति ताइ यत् तदु भोमम् । उत्लभहृस्तु बरहवसंहितायाम्--श्वराणां वस्तूनां स्थे
स्थितां चरतवं तदुद्धवम्' इत्याह । `
भोमनामखयोः शान्तिकमंनिवस्थंत्वमाह--तदिति। तह भौमम् अवं कान्तिभिः शान्ति
` कमभिराहतं निवारितं सत् शमं शान्तिसुपंति । नाभसम् आन्तरिक्षम् अद्धतं श्ान्तिभिराहत- `
भित्येव, शुत मन्दीभावम् उपेति । भत्रे श्ुतासुपेतीत्यनेन भौमं यथा शास्येन्न तथा `
५ | क ंहितायाम्
भामसमित्यायाति।
थातीस्येके महषयो वदन्ति ।
तथा चोवपलमहदतकाभ्यपः-- | |
भोमं शान्तिहतं नाशमुपगच्छति मार्दवम् ।
नाभसं न श्चमं याति दिन्यमुतपातदशंनम् ॥ इति ।
अन्न शामीतेत्यपपाटः आदादिकष्य शमधातोरभावात् ।! राम्यतीति पलो ब्रृहत्-
प्रसङ्गादत्न दिव्याचुञुतमधिङ्घत्य सवस्यपुराणे यदुक्तं तदद्वियते--
भ्हृक्वेछृतं दिन्यमान्तरिश्षं निबोध मे ।
उल्कापातो दिशां दाहः परिवेशस्तथेव च ॥
गन्धवंनरार्ेव वृष्टिश्च विहृता तु या |
शवमादीनिं रोकेऽस्मिन्नान्तरिषं विनिर्दिशेत् ॥
चरत्थिरमवो भोमो मूकम्पश्चापि भूमिजः।
जेखदायानां वेङृत्यं भोमं तदपि कीर्मितम् ॥ इति
1 | (अ० २२९; ६-९ शोर ) ॥ि
५३। चवं दिव्यस्य शास्यत्वाक्षाम्यत्वे विकल्प्य सम्प्रति स्वमतमाह--दिन्यसपीति ।
1: ६ अन्रापिः सम्भावनायाम् इत्यहं सम्मावयामीत्यथंः । यद्वापिः खयुचये, प्रभूतततदद्यदानेनं केवरं `
“ भोम नाभसन्र शान्तिसुपेतः परं दिव्यमपि शान्तिसुपेतीत्यर्ः त ध
शद्रायतन इति रिवाख्ये। भूमेगोरदानादि्त्यपपाटः पूर्वं गोमदहीदानल्योक्तत्वात् । यद्रा `
८ पूवं स्थानानियमेन प्रभूतगवादिदानन्यवस्था कता, परतश्च स्थानविरोषे अल्पाया अपि भूमे- ॥
| सेक्या अपि गोदोनमभिितमिति परीदं रलपदोपादानादद्ध यिति गोरिषि चेकवचनो+ =
दूनादुवगस्यत “शदरायतने भूमौ गोदोह्यादिःति पाठो बृतसंहितासम्मतः। भूमौ गोदोहश्च 4.
विना भूमो गोः स्तनं नि पीः निष्पीड्य इम्धोत्सगं' इति शब्दकश्पदभः न
दिन्थोतपातस्य शान्तिनिवत्येत्वे विकल्पमाह--नेति । दिव्यं न श्नान्तिष्ुपेति न वा श्दुता ४ त
` अनिमित्तचलनभङ्ग-खेवाश्रनिपातजल्पनाव्यानि
लिङ्गादि वेहतं नामेति तदाह--भनिमिततेत्यादिना शिक शैवम् . अचौ देवप्रतिमा आयतनं सिद्धं
देवल्थानम् एषाम् अनिमित्तं चखनादिप्रयोजकवाय्वभिवातादिकारणं विनेत्यथंः । चरनं कम्पः,
< ` निपातः पतनम्, जस्पनम् भसम्बदोक्तिः । आचप्रहणाहु वमनं व्रसर्पभञ्ेत्युतपरभहः। एतानि `
जेशस्य राज्ञः देशस्य जनपदस्य च नाशाय भवन्ति! ` ५, 4
ध [ दबोवपाते रत्तो विशेषः ] 0
अ त्मभुतकोशवाहनपुरदारपुरोहितेषु रोके च
पाकमुपयाति देवं परिकल्पितमष्टधा नृपतेः ॥ ४२ ॥
[ लिङ्गादिवेकतं तत्कर ]
रिङ्कार्चायतनानां नाशाय नरेशदेशानाम् ॥ ४३ ॥
४ नी नो
४२। अत्र ठैवोतपाते राज्ञः फर्त्य॒व्यापकतामाह--आत्मेति। यद्रा येऽत्र प्रकरणे |
उक्तास्तेषां राजन्येव फरपाकं इति स्थिते तचघम्बन्धितया के के फएटभागिनः स्युरित्यपे्षायामाह-- `
भामेति! कस्योतपातस्य त कीशः फरपाके इत्युपरिष्ाह बध्यते । दृपतेरिति सर्वत्र `
` सम्बध्यते तथा च नृपतेरात्मनि शरीरे छते पत्रे कोषे धनागदि वाहनेषु इस्त्यश्वादिषु षरे नगरे `
दरिषु साणोड पुरोहिते भावाय कोके प्रजा चेत्यष्टपा अष्प्रकरिग परिकल्पितं देवमदुतं पाकं याति `
फलं ददाति । छक जनपदे" इत्युतपरभदः (अ० ४९१ ७ छो० ) । व्यक्तमाह मतस्यघुराणे-- ` ५
राः शरीरे छोके च पुरदारे पुरोहिते। = (4 ध
पाकमायाति पुत्रेषु तथा वे कोषवाहने ॥ ( अ० २२९, १३ श्ो० ) |
यसव स क य ध 9 1 ध = = सय न < =
२, सस योव स
स क स नो
अत्र देवोतपात एवायं राज्ञः एरविशेष उक्तः, पूर्वोक्तमतत्यषुराणवचने तु एवं विधफरुस्यौतः ॥
पातक्चाधारण्यमिति विशेषः । एतेन प्राङ्तजनविषय उत्पातः प्रातिस्विकफरु इत्यवधेयम् । |
४३। चरस्थिरभवमिति यत् स्थिरस्य चरधर्माक्रान्तिक्षणं भोममदयुतम् उतपरभटव्याख्या- ् १
स्वरखात् पूर्मुक्तं तदेव विचियते--भनिमित्तेत्यादिना । अथवान्यदेवेदं पूर्वोक्ते्य उत्पातेभ्यो
` चंलनादि्वेपदा्ेः सहेवानिमित्तमियस्यान्वयो न्याय्यस्तथापि सामथ्य न नभ ङ्न पते का
प
(त
रोदने नर्तने हास्ये देवतानां प्रसरणे
महद् भयं विजानीयात् षण्मासत्रि(सात्तिगुणं परम् ॥४६॥
५ यदा सुखन्ति देवताः ।
राजा तदा च प्रियते प्रसूते च धनक्तयम्
४४ । “नाज्ञाय गरेददेशानामिःत्युक्तम्, इदानीं केन कल्य नाश्च इति विषयविभागमाह--
| स्वदेशेत्यादि। स्फोटे भङ्गे स्वदेशध्वंसो मवेत् । अत्र केखकप्रमादाह अन्यस्य किरयाश्नन `
भागः पतितः।
४९ । नत्तेनमिति। उन्मीखनं नेत्रप्रसारणम्, निमीकनं नेन्रसङ्कोचः, यद्वा अङ्गानाम्
1 | आङ्क्नप्रसारणे । क (
। ४६। रोदन इति। षण्मासत्रिगुणमिति। शान्तो ङृताया षण्मासात् परं भवं श्रिुणं
भविदित्यथैः, तथाच “्वण्मासात् न्रिगुणःमिति द्धः पाठः ।
- षतचिन्त्यम्,-पएतेषासुतपातानाम् अष्ट॒ मासेष्वतीतेषु फर्पाकश्चवणात् कथं षट्
` मासेष्वतीतेष्वेव भयानां गुण्यं सम्भवदुक्तिकं स्यात् । तथा च बृहतंहितायाम्-- |
भमासेश्राप्यष्ठामिः सर्वेषामेवं करूपाकः” । इति । (अ० ४९, १४ शो) = `
पजर इदमत्र कथित् समाधानम्-भन्र सद्धोचदत्या स्व॑शब्दस्य देवतार्चाकृतोत्- `
। १ पातेतरपरत्वाभ्युपगमात् तथाविधोतपातल्य स्ःरखत्वेन “ण्मासात् त्रिगुणं परमिति सङ्गच्छते! `
॥ अन्नद शोकदवयं प्रायेण समानाथंकमिति स्थृणानिखननन्यायेन वा, पूंत्र भयल्य देश- `
४७ । भूमज्वालामिति । भूमं ज्वाखाज्त्यथः । ज्वाखा चाग्निशिखा । तदेतत् सर्व॑ `
ना
[ अन्यानि वैतानि] ` ४
भूमि्यंदा नभो याति विशेद् वसुन्धरां नभः।
श्यन्ते चान्तरा देवास्तथा राजवधो भवेत् ॥४८।
देवतायात्राशकटाक्षचक्रयुगकेतुभङ्गपतनानि। = ।
सप्यासनसादनसङ्नच न कशपयुमदाः॥०६॥ == |
देवताच प्रत्यन्ति वेषन्ते प्रज्वरन्ति व । ।
वमन्त्यस्नि तथा धूमं स्नेहं रकं तथावसाम्॥ = |
आरटन्ति द्दन्त्येताः प्रस्वि्न्ति हसन्ति च । = |
उत्ति्न्ति निषीदन्ति प्रधावन्ति धमन्तिच ॥ = ।
| भुञ्ते विष्िषन्ते वा कोशग्रहरणध्वजान् । ॥ 0
अवाङ्ुला वे भवन्ति स्थानात् स्थानं श्रमन्ति च ॥ 0
पुवमाचा हि इभ्यन्ते विकाराः सहसोस्थिताः ।
लिष्कायतनविप्रेषु तत्र वासं न रोचयेत् ॥ व
रा्लो वा व्यसनं तन्न स च देसो विनर्यति । (अ० २३०, १-९ श्लो) `
इति । सहसेति अनिभित्तमित्यर्थः । विरेषस्तु-प्रकृते शिङ्गावायतनानामित्यक्तम् अत्र लिङ्गः `
चौयतनविप्राणामिति। ५ |
भतरेदमवधेयम्-यययं स्थिरस्य चरधरमा्रान्तिर्षणो भोम उत्पातः, यदिवा विशिष्टएव ।
कष्डिदुवपातः स्यादुभयथापि विपेष्विति न सच्छे । न हि विप्रः स्थिरो येन तस्य चरधम॑ |
नत्त॑नादिकमौतपातिकं भवेत् । विरिष्टोऽपि न सम्भ्ेत् ताकोत्पातस्य कप्यश्रवणात् । तस्मा. = |
इन्र इृक्षेष्विति पाठे युज्यते न वेति छधीभिश्चिन्तनीयम् । अस्ति हि स्थिराणां बृष्चाणाँ । क|
चरमस्य नर्त॑नदेः प्रातिरूप उत्पातो श्रहतसंहितादौ निरूपितः । तथा च इतसंहितायां ` |
` इकषवे्ृतं प्रकृत्य-- द
"हसने देशध्वंसं रदिते च व्याधिबाहृल्यम्
धूमस्तल्मिर् जालाथवा भवेन्नपबधायेवः 7
स॑त तस्खु जलपव्ढ वापि जनसंक्षयो विनिः 4.
॥ 9 ५ (अ० ४९, २९,२९, ३० छो)
(५ । `इति तत्र तत्र भवौदिषदेव बृक्षाणारपि तत्तद्ेकृते दोष उक्तः । 1
४९॥। देवतायात्नत्यादि । देवतायात्नायां देवतोदसवे शकटस्य प्रहृतोतूसवनिर्वाहाथं समा
चक्रमध्यविदण्डल्य च, श्ाकटाक्स्येत्येकं पदं वा, चक्रस्य, युगस्य वा
(1 ( ४ दययो ¦ | । जककाष्टल्य केतोश्च भङ्म ह्फोरनानिं पतनानि वा। तथा सम्पर्यास तपः र
यौः अक्षस्थाने बुगस्य युग्थाने चकर्येत्यादिरूपं विपरिवर्तनमित्य्धः, सादनं विहरणं `
सहसेव जजंीभावः, सङ्ग आसन्नं गमनपरतिबन्यकीमूतः परस्परसंदकेषः ; यते न देश्य कृपस्य च॒ `
1 छ दाः । देवतयात्रेति पाठे बृहतसंहितायाम् ( अ० ४९४ ९ श्र ) । ५ |
९०। पू लिङ्गार्चायतनानामित्युक्तम्, (नतंनं जल्पनं हास्यम्? इत्यादिना च देववेङते `
1 ५ सामान्यतो (मयं भवेद" इति चोक्तम् । सम्प्रति कस्यार्चाया वेकते कल्यानिष्टमिति विधिष्य
वक्तमाह-बरविधमेत्यादि। धर्मो देवविशेषः, पितरः प्रसिद्धा भूतजनाः ङत्रचित् लेपसघाः
क्वियन्ते ; एतेषामचौख वत् प्रोदुभूतं वे्ृतं तद द्विजाती नासनिष्िम् अश्मप्रदम् ।
1 ` यच्च॒ रद्रस्य रोकपारानामिन्द्रादीनां च वेकतं तत् पञ्चू्नां राज्ञो वाहनीभूताना- `
मनिष्टमित्य्थंः। .
५१} द्विजातीनामित्युक्तम् , तत्रापि पुरोधसां विकशेषमाह--गुविंति । सितः शुक्रः । एतेषु
नरेन्द्राणां न माङइ्क्किम्।
९२ ! वेदव्यासे वेकतं मन्ज्रिणि, विनायके वेकतं
यड् वैकृतं तत् पुरोधसामित्यधः । स्कन्दः कार्तिकेयः, विशाखो देवविशेषः ; एतयोर्द्भूतं =
वैत नेन ५. (0
1 र ूनाधे सः सेनापतौ भनिष्टजनकस् । = `
त्यादि । देव (४ ५4 यहु वेकं तच्चपककमरे, पुवं ऊमारीवनितप्रेषयेष्वपि ` ध ५
प्रथमोऽध्यायः धः £ ३
उत्पातानां फर्कारः |
सवेषामेव फरपाकः ॥५४॥
[ एतेषां क्षान्तिः ]
छलनङुस्तु(सु?)माचलेषनवलेरभ्यच्चयेत् प्रतिमाप्
मघुपकेण पुरोधा भच्ये्बखिभिश्च विधिवदुपतिष्ठेत्
स्थालीपाकं जह्याद् विधिवन्मन्वेश्च तष्िङ्कः ॥ ५६
[ श्ान्तिषलम् ]
विबुधविचा(का?)२ शान्तयः सरार
` द्िजविबुधगणाचां गीतनरृलोतसवाश्च ।
विधिवदबनिपारयें (येः १ ) प्रयुक्ता न तेषां
` भवति दुरितपाको दक्तिणाभिश्च रुद्धः ॥५७॥
९४ । रक्षःपिशाचादि । एवमेवेति । एतदुक्तं भवति-यथा देवङ्कमारादौ प्रोदुभूतं
वक्त चपह्य कमारादौ अनिष्टजनकम् एवं रश्चःपिश्षाचगुद्यकनागानां पुन्नादावपि प्रोदुभूपं > 1 ॥ |
चृपस्य पु्रादावनिष्टसाधनमित्यर्थः । |
मासेश्चाव्यष्टाभिरिति । सवेषामेव वेकृतानाम् अष्टाभिर्मासेः एरुपाको मवतीलयथंः ।
अष्टाभिमसे रित्यपवर्गं तृतीया, तथा चा्टमासाभ्यन्तर एवाद्ुतानि फल्सुपदशयन्तीत्यथेः । एवञ्च |
` पूष्रं ण्मासात्तिगुणं परम्” ( ४७ ) इति यदुक्तं तदपि साधु सङ्धच्छते । मक्ह्यपुराणे-
भ्नरिभिवंषल्तथा ज्ञेयं छमहद् भयकारकम्? ( अ० २२९, शरश्छो० ) | |
इतिं वर्ष॑न्रयाभ्यन्तरे प्रपाककार उक्तः! अत एवोतपरभटोऽपि “अष्टाभिमसेरिष्त्यघ्य
सष्टाभिमौसेरतीतेरित्यथमाह ८ बृहतसंहिता, अ० ४५, १४ श्ो० ) । ८
९९॥। हदानीम् उत्पातानां श्ान्तिमाह--बुु ति। स्नानं स्नानीयं जलम् । त्यहोषित- ` ॥ | |
शखयहोपोषितः दिनत्रयं कतोपवास इत्यथः । प्रतिमाम् उतपन्नविकाराम् ।
९६। मधुपकेणेति । स्थारीपाकं चर' तशिङ्ेस्तत्तदेवतानुमापकमंन्त्स्तत्तद्देवताया = |
` इवनमन्त्रजहुयात् ।
९७। श्ञान्तिफलं शान्त्यवभिन्नाह-दइतीति। विबुधविकारे देवङृतोतपाते जाते `
देवता-५
इः ` ` । दतामूिकरणम्
दीनां गुविणीनां विरोषत
सतीत्यथंः, इति पूर्वाक्तप्रकारेण स्तरत्रं साहं शान्तयः, तथा द्विजविव्रुधगणार्चा द्विजदेवगणपूजा
गीतनृत्योत्सवाश्च येरवनिपाे; विधिवत् प्रयक्ताल्तेषां दुरितिपाक उतपातजनितानिष्टफलं न भवति,
दक्षिणाभिः एतवका्याङ्मूतदक्षिगाप्रदानादिभिश्च दद्धो निवारितो भवतीत्यर्थः ।
एतदन्त उत्पाताध्यायः सवथा व्रहत्संदितीयोतपाताध्यायानुरूपः ८ शहत्संदिता अ० ४९ ) ।
केवलं पञ्चचत्वारिशश्टोकादूनपञ्चाश्छोकान्तोऽ"शस्तत्र न श्यते !
९८ । बतूसे इत्यादि । तथा विकृतपाडः शोकोऽयं यथास्य प्रकरणमपि न उविक्तानम् ।
एवमपि द्वारादिपददशंनात् स्िवेश्तविरेषाच डारसम्बन्ध्येवायं शोक इत्यस्माकं प्रतिभा । इश्यते
न, ०
हि प्रधानद्भारस्य तेस्तेवधे कत्तरश्युभादिवणनम् । तथा च बृहतषंहितायाम्-- `
मागंतस्कोणद्ुपस्तम्मश्रमविद्धमञ्युभदं द्वारम् ।
उच्छरायाद द्विगुणमितां त्यक्ता भूमिं न दोषाय ॥ इति । (अ० ५२, ७8 श्षोर)
| अस्यार्थः-- मार्गः पन्थाः, तख्वृक्षः, कोणोऽखिः, कूपस्तम्भौ प्रसिद्धौ, ध्रमो जलनिर्गमन-
प्रदेश्षः। पतैः सम्सुखेद्ररं विदधमछभदम् । कियति दुरे स्थितो वेधने न दु्टफलूदो भवतीत्याह
उनच्छरायादिति। यावान् द्वारस्य उच्छ्राय उचत्वं तद्िगुणप्रमाणां भूमिं त्यक्ता बहिः स्थिता
दोषायेव एते दोषा न भवन्ति इत्युतपरभट्ः । सयमते--
वृक्षकणावधःस्थृणकूपविद्धं तथेव च ॥ ,
देवायतनविदधञ्च विधिविद्धं तथेव च । व
वल्भीकभस्मविद्धञ्च शिरामर्मादिविद्धकम् ॥ इति । (अ० ३०, ३८-३९ शो) 1
विधिविद्धमिति बरह्मणा विद्धमित्यथः, स च बास्तुमध्यस्थो वा प्रतिमात्मा वा|:
शिल्परत्ने च-
मागकुपतरस्तम्भकोणपीडमनश्लोभनम् ।
युल्यद्वारस्य देवानां नराणाञ्च विशेषतः ॥ इति । (पूव अ० २२, २१-२२ शछो०)
4 पवन््व-- `
अक्षे नाभिुखे ङर्याह याघ्राद्ारन्च बास्तुनः ।
1 इति पूर्वादौ कृतशचद्धिः पाटः । उतरा समानम्। तथा चायम्थः--वृक्षे अभिमुखे सम्बुख- = `
` चत्तिनि सति, प्रतिमादीनां विशेषतो युविणीनां प्रवेशे गृहे च अभिमुखे सति वास्तुनो यात्रा्मारं
प्रधानं द्वारं न ङ्यात्। प्रविशन्त्यस्मिक्निति प्रवेशो गृहम् । प्रतिमादीनामित्यादिपदादयुक्तानां `
प्रथमोऽध्यायः | ३४ `
ऋत्लाणि विशोपकाश्च८) एते विरोक्याः प्रतिमाविधाने
इति श्री्तेत्राव्मजसूज्भ्रन्मण्डनविरयिते बास्तुशा्े देवतामूत्तिप्रकरणे
शिरापरीक्ञप्रतिमाप्रमाणगुणभवाद्धताधिकासते नाम
प्रथमोऽध्याय
स्तस्भादितत्तदवस्तूनां ग्रहणम् । एतच्चातिखाष्सेन यथाक्तानममभ्युद्य॒ समुपस्थापितमस्माभि-
व्याख्यानम् , निणये तु पाकाः प्रमाणम् ।! शूपमण्डने तु-
वतसेनाभिमुखे ऊर्याट याच्ना दारच वस्तुनः ।
पवेदाप्रतिमादीनां गुर्विणीनां विशेषतः ।॥ ( अ० १, १५ शो )
इति विशेष |
५९ । नक्चन्रयोनिश्वेखयादि । नश्चत्रयोनिः योनिवंरम् › देवादिकक्षाणि देवनरराक्चषसगणनक्षत्राभि
विंशोपकाश्च प्रतिमाविधनि देवतामूततिगएनकार इत्यथः, एते नक्षत्रयोन्यादयः, विरोक्या विचार्या
इत्यथः । अत्र विदोपकाक्ष्वेति कि शयुः पाठः कि वापपाढस्तदपि निर्णेतमसमथेरस्मामिस्तष्णी- `
मास्यते ।
नक्तव्योनिबिचारः--क्मकततुः कम॑दिनल्य च नक््योः परस्परं योनिगतराुता नक्नयोनि- `
प्रतिमाया जन्मनक्ष्नं ्तेयम् । एवमन्यत्रापि ।
अभ्विन्याः--
शतमिषायाः-
स्वात्याः--
हृस्तीयाः-
पूवंभीद्रपदल्य--
धनिष्टायाः-- `
भरण्याः--
` रेवत्याः--
इतिकायाः--
पुष्यायाः--
पूर्वाषाडायाः-
श्रवणायाः --
रोष्टिण्याः--
श्गरिरसः--
अश्वयोनिः
99
महिषयोनिः
सिहयोनिः
6,
हस्तियोनिः
99
| । मेषयोनिः
99
वानरयोनिः
११.
सपंयोनिः `
ॐ
ज्येष्ठायाः-
अनुराधायाः--
आद्रीयाः-
मूलायाः-
उत्तरफल्गुन्याः--
उत्तरभाद्रपदस्य-- `
चिच्रायाः-
विश्ाखायथाः-
अश्लेषायाः-
युनवंसो १.-~
` मधायाः--
पूंदल्युन्याः--
अभिजितः--
हरिणयोनिः
99
श्वयोनिः
गोयोनिः `
१9
99
99.
` मूषिकयोनिः `
उत्तराषाढया ˆ ++:
व्याघ्रयोनिः
विडाख्योनिः ४
३६ ,, : ॥ि देवतामूत्तिप्रकरणम्
` गोव्याप्रयोः इस्ि्सिहयोः अरुबमदिषयोः श्वहरिणयोः नङरसरपयोः वानरमेषयोः
विडल्मूषिकयोः परस्परं वेरम् अन्यदपि लोकाचारतो वेरम् अवगच्छत् । एकयोनिश्रेच्छुभम् ,
मिन्ञयोनिश्रेव् मध्यमम्, उक्तरूपगणनया वेरयोनिश्ेदञ्युभं फं भवेत् । इति ।
वडघ्कविवारः--
कमंकनतंजन्मरारिमयेध्य कमेदिनरारिश्रेत् षष्ठो बाऽ्टमः स्यात् तदा षडष्टकदोषो भवेत्?
अत द्रमौ राशी त्याज्यो ।
मेषः वषः मिथनः ककटः सिंहः कन्या तुखा बृशिकः धनुः मकरः ऊुम्भः मीनः
१ र र ५, ५ 8 9 ८... 4.६ १
कततुमषराशिः कमेयोग्यो रक्षिः कन्या ठुला वा ; अत्र कनतुजंन्मराशेमषात् कमं दिमस्य
कन्याराशिः षटसतुरारारिष्डमः, अतः षदष्टकदोषादवपि त्याज्यो इत्यादि ।
वर्गाष्टकगणनानियमः- |
रविश्वन्द्रो मङ्गरो बुधः ब्रहस्पतिः शुक्रः शनिखम्नश्वेति वर्गा्टकम् । उदुटकगणनाका
राक्िचक्राष्टकं पथम् विरिख्य तेषां मध्ये यथाक्रमं रव्यादि रश्चान्तं वरगाटकं ख्खित् । जन्म-
काले रारिचक्रे कथिता ग्रहा खच्च यत्र यत्र राशो वत्तमानास्तषाम् एकेकस्यावस्थितिस्थानाह
ृथङ्निदिे रारिचक्रा्टके अधोरिखितप्रकारेण रेखा बिन्दुश्च पातयेत्
प्रथमती रवेवंगाष्टकगणनाभिलापश्वेद् रवि्य॑स्मिन् राला वत्तमानस्तन्न, तस्मादितीय-चतुथ-
` सप्तमाष्टमनवमदशमेकादशरारिषु एकंकां रेखां पातयेत् । तथा चन्द्रमद्धखादीनां यत्र यत्र श्लाः
पातयितभ्या उपरि्निरूपितेरङ्ैस्तत् खधीभिरबगन्तव्यम् ।
प्रह्मणां बगाघ्रकरेखाचक्राणि
सूर्या रेखाः ४८ चन्द्ा्टव्भ रेखाः ४९ |
रविः १।२४।७८५।९ १०११ = रविः २।६।०।८1१०1११
चन्द्रः ३।६।१०।११ चन्द्रः १।२।६।०१०।११
मङ्खः १।२।४।७।८।९।१०।११ ` मङ्खः २।२।९।६।९।१०।११
बुधः ३।९६।९1 १०११९१२ ` ञुधः ?।३।४।५।७।८।१०१११
| यहः ९।६।९।११ ` | गुरः शभगनट्गरहाहर
क्न | ५ १ | ज्यु ३।४।९।७।९।१०।११
८ श्निः १।२1४1७८1९)१०।११ ष ^ र > शनिः ३।५६।११
रपः ३।४।६।१०।११।१२ = | सपः ३।६।१०११॥१
ऊुजाष्टवगं श्खाः ३९ |
रविः ५।६।९।११।१
रविः ३।५।६।१०।११
चन्द्रः ३।६।११
द्रः १।२।४।७।८।१०।११
चुधः ३।५।६।१ १
गुहः ६।१०।११।९२
क्छ: ६।८।११।१२
शनिः १।४।५७।८।९।१०।११
रप्नः १।३।६।१०।११
गर्वष्टव्गं रेखाः ९६
रविः १।२।३।४।७।९।१०।११
चन्द्रः २।५।५७।९।११
मङ्गरः १।२।४।५।८।१०।११
। धः १।२।४।९।६।९। १०११
हः १।२।२।४।७।८।१०।११
शुक्रः २।५।६।९।१०।११
शनिः ३।५।६।११
लसः १।२।४।५।६।७९।१०।११
| शन्यष्टवगं रेखाः ३९
रविः १।२।४।५।८।१०।११
चन्द्रः ३।६।११
मङ्रः ३।९।६।१०।११।१२
बुधः ६।८।९।१०।११।१२
गुरः ९।६।११।१२
शुकः ६।११।१२
शनिः २।५।६।११
| प्रः १।२३।०।६।१०।११ `
बुधा्टवर्ग श्खाः ३९
चन्द्रः २।४।६।८।१०।११
ङ्कखः १।२।४।७।८।९।१०।११
वधः १।३।५६९।१०।११।१२
गुरः ६।८।१९१।१२
शुक्रः २।२।२।५।५।८।९।११ `
दानिः
ख्म्मः
शुक्राष्टवगं सखा; ९२
रिः ८
चन्द्रः १।२।२३।४।५।८।९।११।१२.
सङ्गखः २।९।६।९।११।१२
छधः ३।५।६।९।१९ | (1.
गुरः ५।८।९।१०।११
खकः १।२।३।४।९।८।९।१०।११
शानिः २।४।५।८।९।१०।११
खञ्नः १।२।३।५।५८।९।११
ष्य
टघ्नाष्टवगं श्लाः ४९
रविः ३।४।६।१०।११।१२
चन्द्रः ३।६।१०।११।१२
भङ्गरः १।३।६।१०।११
बुधः १।२।४।६।८।१०।११ `
गुरः १।२।४।९।६।०।९।१०।११
शुक्रः १।२।३।४।९।८।९
दानिः १।३।४।६।१०।११
पराश्रीयषहोरायां रुप्नर्लाः ४९
, अरन्थान्तरे३७ ` |
क देवतामूत्तिकरणम्
उपयु॑तनियमेन स्खापाताड् ग्रहां छदिमछुद्धिव्च निणयेत् ! व्गा्के केनोपायेन ग्रहाणां `
छद्वा्चद्धिविचारं फरनिणंयञ्च छुर्यात् तदिदा नीञुच्यते । दशाफलं विचारसाध्यम् , महाषटवर्गा्ट-
वर्शफरन्तु न तथाविधम्, एतदु गणितागतमित्यव्यथम् ; गणना चेदन्नान्ता स्यात् तदष्टवगं-
निरूपितफरूमवश्यमेव घटत ।
अष्टवगे श्रह्मणं श॒द्धयश्चद्धिषिचारः फटनिणयश्च |
ग्रस्य ग्रहस्याष्टवगं येषु येषु राशिषु पञ्चभ्यः अष्टं यावत् फररलास्ति्ठन्ति, स ग्रहस्तपु तेषु
राशिषु कऋमश्षः श्ुभफलवद्धंको भवति । चतस रेखा यदि तिष्टन्ति, तदा समफरप्रदः ; तिखो
रौ एका वारेला तिष्ठति चेत् कऋसेणाञ्भफर्ल्य वंको भवति । रेखाभावे अर्थादषटदल्यस्व,
तद्राशौ तु सातिशयमञ्चभं ददाति । अतो यस्य ्रहस्याष्टवर्गं गणयेत् स ग्रहो यस्मिन् गहे स्थास्यति
तद्गृहे यदि चतखस्तदधिका वा रेवास्तिष्टन्ति तदाऽसो ग्रहः छदः छमफरप्रदश्रेति जानीयात् ।
किञ्च-गृदे यल्मिच् रखाचतुष्टयस्य न्यूनता भवेत् तद्राशिगतथेदङ्ुदस्तथाऽद्युभफर्प्रदश्च !
ग्रहगणो वर्गा्टके विशुद्धः सन् यद्यपचयगतो भवेत् ; अर्थाजन्मरार्वां जन्मलग्नाद्ा तृतीय-वष्टदश-
| मेकादशस्थानगतः स्याद्, अथवा भित्रगृहगतः क्रिवा उच्चस्थानगतो भयरेत्, तदासौ प्रहश्रातीव
| श्ुभदायको भवेत् । किञ्च ग्रहगणोऽश्युद्धो भवय् यथयपचयस्थानगतो भवेत् अर्थात् तृतीयवष्ट-
दशमेकादशान् विना अन्यरारिगतः स्यात्, शरघररा्ञौ नीचराशौ वाऽवतिष्टते तदातिकषय-
मद्युभप्रदौ भवेत्) य॒त्र यत्र राश्चो ग्रहा व्गाष्टके छुभदा गोचरे तत्तद्रारिषु आगच्छन्त-
स्तातक्राटिकश्चुमदा भवन्ति । तत्. स्थानं चेजन्मरारितस्तस्य यरहस्य गोचरनिर्िशचुमस्थानं
भवेत् तदा शयुभफरवद्धेकः स्यात्, तस्य राचर्जन्मलघ्नात् प्रश्ठति यो भावस्तेन तद्भावोत्थफलं
तहभावनिरि्च ्राव्पित्रादीनां तात्कालिकश्चुभसोख्यं कल्पनीयम् । इषटान्तो यथा--
रवेर्वगे मिथुनराश्चो फरुरेखाः ड् भवन्ति ; तदवस्थायां रविश्रन्मिधुनरारिस्थः अर्था-
दषाढमासे विशेषञ्चुभसुचको भवेत् । यत् कमणि रविशचदधेरावश्यकम् आषाढमासे तत् कर्मा
` रम्भेण श्चुभफरं निशितम्
| यावती यावती रेखा ग्रह्मणासश्टवगके ।
तावतीं हविगुणीङ्त्य चाश्टमिः पर्दतिधयेव् ॥ १ ॥
अष्टोपरि भवेद्रेखा अष्टाम्यन्तरबिन्दवः |
अष्टाभिश्च खमो यत्र समस्तत्र निगद्यते ॥ २ ॥
ूर्वाक्तनियमानुसारेण प्रत्येकशश्च यावदरेखापातो भवेत् ता रेखा द्वियुणीक्य
ततोऽो वियोजयेत्, ततो याबदवलिष्टं भवेत्, तावदङ्कं तत्तद्राश्िषु रक्षेत् । यदुयद्वा-
॥ शिषु द्वियुणितरेलासमषटिरशास्यो न्य॒ना भवेयुः तततद्रारिषु अष्टसंख्यातो यावती न्य॒ना भवेत् ` |
तावतो बिन्दून् स्थापयेत् यदयद्राशिषु॒शियुणितरेखासमष्टिरौ भवेदुस्तस्मिन् रक्षौ समं `
^ खित् 1. ५
प्रथमोऽध्यायः ` . , - ३8
विन्दुपातस्य रेखापातस्य च नियमः
शल्ये तु बिन्दवश्रा्चौ रेखेके रसविन्द्वः ।
चत्वारो बिन्दवो युगे ह्िचिन्दू शमरेखके ॥ ३ ॥
समो रेखाचतुें तु पञ्चके ने्रशेखके !
षड्रखाख चतू रेखाः सक्मे रसरेखिकाः ॥ ४ ॥
ूवोक्तप्रकरिण द्ियुणितरेलासमष्टिकाष्टो वियोजयेत् । तेन शूल्येऽवरिष्टे विन्द््टकं ` १
रक्षेत् । एकरेलायामवरिष्टायां विन्दुषट्कम्, रेखाष्रये बिन्दुचतुष्टयम्, रेखात्रे चिन्दुद्रयं `
रक्षेत् ; शखाचतुष्टये स्थिते समो भवेत् ; रेखापञ्चके रेखाद्रयम्, रेखापष्के रेखाचतुषटयम्, रतासके
रेखाषश्कं भवेत् । ०
इत्थं रेखाविन्दुपातेन फलं विचार्यम् ।
हेखाभिस्तु श्चुमं जेयं विन्दुभिरश्ुमं एरम् ।
यत्नररेखा न बिन्दुश्च तत् समं परिक्ीत्तितम् ॥ ९ ॥
रेखायोगेण बिन्दुयोगेन वा प्रहाणं फलम्
स्वोचमिघ्रादिवर्गस्थाः केन्क्तदिबल्संयुताः !
अनिष्ट्दाः सवं ल्वल्पतिन्दुयुता यदि ॥ ६ १
दुष्टस्थानत्थिता ये च ये च नीचारिह्रिगाः। | ५
ते सवं श्भदा नित्यमधिचिन्दुयुता यदि ॥ ७ ॥ 0
दिनेशसुख्यग्रहवगकेषु यदा शनिः शूल्यगृहं प्रयातः ।
करोति पित्रादिकभावजानामतीव रोगारिभियाङलनिं ॥ ८ ॥
एतेषामथैः--उचस्थो मि्रादिवगगतः केन्द्रादिस्थो वा बख्वान् ग्रहो वर्गा्टकचक्ते `
एकादिस्वल्पविन्दुयुक्तराशिस्थ एकादिस्वल्परखायुक्तराशिस्थो वा चेदनिष्टफर्प्दः।
वडादिदुःल्थानस्थो नीचराशिनर्वाँरास्यः शचरक्ेत्रनवांशस्थो वा नितरा दुबंखोऽपि ग्रहः बिन्दु- (9
यक्तरारिस्थो रेखायुक्तरारिस्थो वाचेत् श्चुमष्र्प्रदः ।
र्यादिग्रहाणामष्टव् रेखादीनेऽटशल्ययुक्ते वा राशौ शनिर्गोचरव्रत्या गतश्रेत् तद्राशिनि्ट- ` 1
भावषरुल्यानिष्टम् , रोगम्, शुषद्धिम् , तथा भयाङ्रुत्वादिकम् › तावनिदटव पितध्रात्रा- ` | 1 |
॥ दीनामपि तद्रपमश्चमं परिकल्पयेत् ।. अवमे रव्यादधग्रहाणां विशेषफरं भ्रन्थबाहुल्यभयादिह ` 4 |
परित्यक्तं ज्योतिषगरन्ये तदनुसन्धेयम् । | 1
क | ४ ेदामूरयम् = |
नाडीगतऋक्त--( नाडीवेध- ) वि
चरः
नाड्यस्तिलः ; प्राङ्नाडी, मध्यनाडी, पृष्टनाडी च ।
प्राङ्नाडीस्थनक्षत्रणि- |
९ ६ ७ १२ १३६ १८ १९ २४ २५
अश्विनी, आद्र, पुनवंखः, उत्तरफल्गुनी, इस्ता, ज्येष्ठा, मूलय, शतभिषा, वूवंभाद्रपदच ।
| मध्यनादीस्थनक्षत्राणि--
॥ ९ ८ ११ १४ १७ २० २३ |
भरणी, शगशिराः, पुष्या, पू्ंफल्युनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढा, धनिष्ठा,
२६ |
उन्तरभद्रपर्दच्च । ८
क पष्ठनाडीत्थनक्षत्राणि-
॥ ४ ९ १० १९ १६ २१ २२ २७
कत्तिका, रोहिणी, अष्ठेषा, मधा, स्वाती, विक्ञाखा, उत्तराषाढा, भ्रवणा, रेवती च
एकं त्रिनाडीचक्रं विरिल्य तत्र नाडोवेधविचारं इयौत्। यदि करतुः कमंदिनस्य च | |
नक्षन्नमेकनाडीस्थं भवेत्तदा नाडीवेधदोषो भवति । नाडीवेधदोषगते नक्षत्रे प्रतिमाघटनं |
निषिद्धम् ।
प्रतिप्रववः--
एकराक््यादिथोगे ठु नाडीदोषो न दिते ।
कतत: कम॑दिनस्य च सत्येदरादो दोषोऽसौ न स्यात् । इत्यादि ।
अिनाडीचक्रम् |
। || मध्यनाडी | पृष्ठनाडी |
१ ३
` ६ ४
७ ९
१२ | ११ १०
१३ | १४ ९१
१८ | १७ | १६
| १९ । २० `
` ४ | ५ | ५ |= | |. १8. .
प्रथमोऽध्यायः =
देवादिश्पज्ञ( गण- ) विचार :
गणल्निवरिधः, देवगणः, नरगणः, राक्षसगणश्च । जन्मनक्प्रेण जातकस्य गणो निरूप्यते । तद ५
यथा--
हस्ता, स्वाती, शगरिराः, अभ्विनी, श्रवणा, पुष्या, रेवती, अनुराधा, पुमरव्॑ठः 1
एषु जातो देवगणः
आद्री, रौिणी, उत्तरफल्णुनी, उत्तराषाढा, उत्तरमाद्रपदम्, भरणी, पूवंकद्युनी, पूर्वाषाढा `
पूवंभाद्पदम्
एषु जातो नरगणः |
ज्येष्टा, अश्लेषा, विक्ाखा, मूरा, शतमिषा, धनिष्ठा, कत्तिका, चिन्ना, मघा ।
षु जातो सक्षसगणः
यस्मिन् नक्षत्रे प्रतिमा निर्मीयते तत् प्रतिमाया जन्मनक्षत्रम् । तेन च नक्षत्रेण प्रतिमाया
गणनिरूपणं स्यात् । कम॑कतत्गणेन स प्रतिमागगमिलनदिवसे प्रतिमाधटनं कु्यौत् । मिंरनन्न
वश््यमाणरीत्या जेयम् । |
गणञ्युमाञ्चुभक्थनम्
` स्वजातौ परमा प्रीतिमंध्यमा देवमानुषे ।
दवारे विरोधश्च श्त्युमानुषराक्षसे ॥ इति
` देवता `
द्वितीयोऽध्यायः
[ माननिणयः |
लाया रेणु(?) बाखाम्र-लिक्ल-यूका यवो कटः
करमादशगुणं मानं ज(जि?)नसंख्येः करा(रोऽ) हरेः ॥१
~~~
ता ५०५०१५५०१००१५ न ५
१। छयेति । एतेषां छाया्द्धुलान्तानां सक्तानां पदार्थानां यथोत्तरं दशगुणं मानरित्यथैः
त्था चव--छायाया दक्षपुणं रणोरमानम् , रेणोदश्नगुणं बाराग्रल्य केशकोटे्मानम् , ततो दशगुणं
शिक्षस्य, ततो दशगुणं यूकस्य, ततो दशगुणं यवस्य, ततो दक्लगुणज्चाङुलल्य मानमिति स्पष्टार्थः
अन्न छायापदाथनिणंयो दुष्करः, कापि तादशार्थकपारादुपलन्धेः । बृहतसंितावाम्-
परमाणुरजोबारायिक्षयूकं यवोऽङलं चेति ।
अश्गुणानि यथोत्तरमदुरमेकं भवति संख्या ॥ (अन ९७, २ श्य)
इति छायाल्धाने परमाणपर्दमाह । अन्यत्र परमाणुल्वसूपयुक्तम्-
जालान्तरगते भानो यत् सूष्यरं दश्यते रजः ।
| प्रथमं तत् प्रमाणानां परमाणुं परचक्षते ॥ इति ।
कस्मादन्न छायापदं परमाणुखमानार्थकमिति प्रतीमः । रेणुशरान्यत्र रजःफरेन व्यपदिद्टसप्रस
= णुकूपः। कथा च शिल्परतपू्व॑भागे मानमधिहत्य--
| परमाणुरिति प्रोक्तो योगिनं इष्ियोचरः ।
तरसशेणुर्टमिः स्यात्तेशव परमाणुभिः ॥
तदष्टमिस्तु बालाग्रं रक्षा बाटाग्रकाष्टमिः । इति ( अ० २, १-२ श्छोर )
(4: एतदपि हत्यन्तरविसुदम् ; "अणुहो परभाण् स्यात् त्रसरेणुस्त्रयः स्षतःः ( स्क-३, अ० ११,. ४ 0
| शोर ९) इति भागवतीयात् । |
६ यथ इति यवोद्रम् ; तथा च शब्दकस्पद्रुमश्त-लीलावत्याम्-
| | 'यवोदरेरङ्लमष्टसंल्येहस्तोऽदुरुः षड्गुणितेश्रतुमिः । इति ।
शिल्परलभूवंभागेऽपि ्ववोद्रेः षड्गुणाः इत्युक्तम् । शब्दकल्पद्रुम तिथ्यादितस्व्त- व
८ काषिकापुराणमपि
यकानां तण्डुल रेवमङ्खलं वा्टमिभंवेत् ।
अदीवयोजितः ,,. ` "“ ॥# ईत्या्।
दवितीयाऽभ्यायं . "42
कमाहशगुणमिति ! पतचिन्त्यम्, पूरवोद्धतद्हततंहितादिवचनेष्वषटमिः परमाणुभी रज |
इस्याक्क्रिमेणष्टगुणन्ुद्ेशव श्रवणात् । रिरपरलपूवभगे-- `
यवोद्रैः षड्गुणेवां स्तभिर्वाऽ्चमादिकम् ।
क्मादषणुणर्बाऽथ मानाङ्रमिति स्तम् ॥ (अ० २, ३ शछो°)
इति मानविकल्पञुपदकशंयताऽपि तहुमन्थक्कृता दशगुणस्यानुङेखात् । ` एतेनेतन्मतसम्मत्तश्चतुविश्च-
` त्यङ्रकः करः कमादष्टयुणमानस्वीकत्त मते षडङ्रेनाधिको भवतीति जेयम् । तथा च एकस्मि-
बरे यवदधयगरधया चतु्िशत्यासङरषु भटचत्वारिदयववरदधिर्ियता, ते चा्टवत्वारिंशह यवाः `
षडङ्रम् इति तेन सह मिरनातिकशदङ्कः कये मवति! सत्यपि प्रकारविरोधे नेदमपि
करमानमप्रमाणम्; तथा च शिल्परलपष्चमगे-
अङ्ककत्नितया युषटिषितस्तिद्रीदशाङ्कलिः
टुद्रथं हस्तयुषदषटं तच्च किष्छुरिति स्तम् ।
एकेकाङ्रदधयाऽतो भवन्त्यष्टौ कराः स्युटम् ॥
प्राजापत्यं धनुमुषटिशरापग्रहमतः परम् ।
प्राच्यां वैदेहकं नान्ना वेुस्यञ्च प्रकी तितम् ।
इत्थमेकोत्तरत्रिशदङ्कान्ताः कराः स्मरताः ॥ ( अ० २, ९-११ छोर )
इत्येकश्रिशदङ्करान्तमपि करमाह । तस्मान्मतान्तरमिदम् इति ज्ञेयम्। क
जिनंख्येरिति। जिनाश्रतु्विरातिः, चतुर्विशत्याऽङ्खेः करो इस्त इत्यथः । तथा च
बरहृत्संहितायास् ( अ० ५७) र श्छो० ) उत्परमभषटटतववनम्- 9
तस्माद् रजः कचाग्रज् शिक्षा यूका यवोऽङ्गकष् । `
कऋसादश्णुणं ज्ञेयं जिनसंल्याङ्रुः करः ॥ इति ।
तस्मादिति परमाणोः, तस्येव तत्र प्रकृतत्वात् । अङ्कुरध्य च मानाङुरं मात्राम् इतिद्वौ
मेदो । अधल्तादु यदुक्तं तन्मानाङ्खम् । मात्राङल्युक्तं शिल्परलपू्ंमागे--
तद्धत्तदक्षिणकरमध्यमामध्यपवेणः । | `
देध्यं मात्राङ्लं श्रेष्ठं नीचं तद्न्यासक्षभ्मिततम् ॥ इति ( अ० २, ८ शो)
अस्या्थः--कनुंदंक्षिणह्तस्य सध्यमाङरे्मध्यपवंणो यद देयं तच्छर्ं मातराङख्म् , तस्यैव = `
मध्यपवणो विस्तारसम्मित्च कनिष्ठं भात्राङ्रम् इति । अनयोश्च कमभेद षिनियोगमेदमाह `
` तत्रब--
। मानाङ्रः केवरपेव कुर्यादु देवाख्यादीनि गृहाणि वा चृणामं ।
कण्डादिकानामथ मण्डलानां सवत्र मात्राङ्रमिष्यते बुधः ॥ इति (अ० २,१७शछो०) ५
अत्र 'देषाल्यादीनिः इत्यादिपदाहदेवप्रतिमानामपि ग्रहणम् । कादयपशिल्पेऽपि-- `
(मानाङ्कुलन्तु वा प्रोक्तं पुरप्रालादमानकम्! ( अ० ९०, ३७ छो० )
इत्युक्तम् । =
8&
छविचच मानाङ्खं प्रतिमापरिमिणेनापि निर्णीयते । तथा च--
| “स्वेरङ्रुप्रमाणेद्वीदस विस्तीणंमायतच्च सुखम्” ( अ० ९७, ४ छो )
ईइत्यादित्रिहतसंहितावचने '“स्वेरित्यल्य विंवरणप्रसद्धेनोक्तयुतूपरमह --“यल्मात् काषात्
पावाणादिकाद्ा प्रतिमा क्रियते तरै पीटप्रमाणविवजितं दादशभागविभक्तं इत्वा तत्नेको भागो
नवधा कायः, सोऽदुरलंक्ञा भवति । यस्मादष्टाधिकमदडुर्शतं प्रतिमाप्रसाणं वक्ष्यति (अर
९७, ३० श्लो° ) 1 प्रतिमायाः सवैरात्मीयेरङ्रप्रमाणेः'› इत्यलं प्रसङ्कादागतस्थ प्रपञ्चनेन ।
२। तस्येति । अदम्थ॑मपीदं पदमगतिकतया 'अङ्लप्रमाणेनेण्तयस्यंकदेक्तेनाङ्खपदेन सासा-
माधिकरण्येनान्वीयते ! तथा च तस्य प्रकरान्तल्याडुरुख्य प्रमाणेनेत्य्थः । तत्समेति गोरूकसषमा
इति। द्रवङ्ुख्मानेत्यथेः। द्वास्यामिति कर्यं गोर्काभ्थं वा मागो भवति, अतस्तस्य
चतुरङ्रं सानमियथैः । तदुक्तं समराङ्गणसूत्रधार-
दयङ्खो गोखको त्तेयः करां घा तां प्रचक्षते ।
दै करे गोलको (वाहो १ वाद्व ) भागो मानेन तेन तु ॥ ( भ० ७५, ३ शो
३। पभिरिति । एतादशेभानिस्तारमानम् एकतालस्य परिमाणं भवतीति शेषः । एवञ्च `
। दादक्षभिरड्र र्कल्तारो भवतीत्यथंः । तदुक्तं शुक्रनी तिसा
स्वस्वमृष्टश्तुथोऽ"े ह्यङ्रं परिकी तित् ।
तदङ्छदरदशशभिभवेत्तारुत्य दीघंता ॥ इति । ( अञ ४, प्र° ४, <२ छोर )
इदमश्र विवेवनीयम्-द्ादशाङ्रुं तालस्य परिमाणमिति स्थिते दह्यताख्प्रतिमा चिरत्यधिक- `
` शत्ताङ्गुरूपरिमाणा भवति। दशतालप्रतिमा च-- ` |
दश्षताछः स्तो ससो अलिविंरोचनिल्तथा । ` 5 |
वराहो नारसि्श्च ११ ¢ ( अ० २५९; १-२ छो क
. | (1 ईत्येनेन मत्स्यपुराणे उक्ता, भन्थक्ृता चोपर्ित्-
द्ञतालेमबेद्रामो बर्विंरोचन(नि ! स्तथा । (॥ ~
सिद्धार्व जितेन्द्राश्च उर्ध्वास्ते च प्रकीत्तिताः॥ (अ० २; ९ श्लो)
7 इत्यनेन वक्ष्यते । एषामङ्ीसंख्याऽ्यक्ता इतसंहितायाम्-
द्षरथतनयो रामो बरिश्च वैरोचनिः श्वतं विश्षस् । 1
दादशषाल्या शेषाः प्रबरसमन्यनपरिमाणाः ॥ इति ( भ० ५७, ३० शमे )
द्विवीधोऽभ्ययः 4.
एवञ्च रामादीनां प्रमाणं दश ताङास्ते च विंश्रयधिकं शतसङ्ख्य इत्यायातम् । पतेन-- = `
“उत्तमं दशतारु स्याचतुविंशच्छताङ्गुरम्
( शि० उ० ४ अ २७ श्छो०, कादयप० ९० अ० ७७ श्छ )
इति यच्छिर्परल-काश्यपरषिल्पयोरु्तं तच्चिन्त्यम् । पतन्ते ताखादीनसु्तममध्यमाधमभेदेन
्ेविध्यसुक्तम्, तथा च काभ्यपरि्वे पूवोदतादद्धीत् परम्-
मध्यमं दहता स्याह भायुपड्न्त्यङ््ं भवेत् ।
कराधिक्शताङ्भुल्यमधमं दशताखकम् ।
सद्रादशहातं भागं नवतालोत्तमं भवेत् ॥
अष्टोत्तरशातांडान्तु मध्यमं नवतारूकम् ।
कन्यसं नवतारं स्याह देधा( स्यष्टेदा >धिकशचवं मवेत् ॥
तारं प्रत्येवमेवं तु क्रमाट् वेदाङ्गं हरम् ( अ० ९०, ७७-८० शोर )
इत्युक्तम् । शिल्परलोत्तरभागेऽपि यथोक्तायथेकादद्धज्नितयात् परस्-
"ताछ प्र्येवमेवन्धु करमाह वेदादिष्टानितःः (अ० ४, ३८ शलो )
इत्युक्तवा स्वेषामेव तालानां बतुश्वतुरङ्गकहाल्या उत्तममध्यमाधमत्वं प्रतिपादिषम्। तत्र
मतल्यषुराणे यदशतालप्रमाणत्वसुक्तं रामादीनां तन्मध्यमं दशतारुमादायेबेखभ्युषगमेन जातेऽपि `
कथञ्चित् समाधाने, ब्हतंहितायां द्वादशषान्ये( अ० ५५७, ३० शो त्यादि यदुक्तं तेन॒
त्वसामञ्धस्यं दुष्परिद्रमेव । श्रादशहान्ये"त्यादिपरादस्य त्वयम्थः-शेषा अन्याः प्रतिमा
द््ाहान्या ह्ादशकद्वादशकहीनत्येन प्रवर्तमन्थूनपरिमाणाः भमवत्ति। विक्षत्यधिकादङ्ल- `
रता द्वादजञाङखान्यपास्याष्टाधिकं शतमङ्खनां प्रतिमा प्रधाना भवति । ततोऽपि दवादशक- 4
` मपाल्य षण्णवत्यङ्कलसमा मध्यमा प्रतिमा, ततोऽपि द्वादशषकमपास्य चतुरशौत्यद्ुरः न्यूनपरिमाणा = `
प्रतिमा सवतीत्यथैः, एवमेवोत्पलमङ्राः । एतच्च परिमाणं काश्यपरिल्पादिमते मध्यमनवतालादि-
सघताखान्तप्रतिमाया इति ज्ञेयम्, मध्यमनवतारुस्याष्टाधिकशताङ्रत्वादन्ते सघ्ठताकल्य चतुर- ` |
` शीत्यङ्गरुत्वाच्च ! परं सक्षभिस्तारदेवप्रतिमाया विधानं नोपरभ्यते, तेः "पिशाचाः सक्षमेन वु" ` (५
(अ० ९०, ८७ श्चो० ) इत्यादिना पिद्षाचानामेव कारयपरिल्पे कर्तव्यतोपदेश्षात्। समराङ्गण- |
सूत्रवरिऽ्पि- ` ५
| देवादीनां शरीरं स्याद् षिल्तरेणाश्मागिकम् ।
त्रिश्दभागायतं चेतद् विदध्याचित्रह्ाश्चवित् ॥
इति भागमानेन यत् प्रतिमाया मानसुक्तम् › तेनाऽपि विंशत्यधिकरताङ्ुलमेव प्रतिमायाः परिमाण = |
। मवति, भागस्य चातुराङ्ल्याभिध्रानात्, चहतसंहितायाञ्च देवप्रतिमाया एव चतुरशीत्यङ्ुल- = = ` ॥
मानायाः कनीयस्त्वकथनाच
स लावान
स
यः
र
[न
४ | दैवतामूर्तिपरकरणम्
[ ताख्मानेन मूर्तीनां कतन्यता ]
1 १ थ त ता ~ ५0० --~ प 4
` य॒च्च शिल्परल-काश्यपश्िल्पयोः “कमाह् वेदाङ्लं हरम्” रमाह वेदांशहानितः' इत्यादिना सर्वत्रैव `
ताठे चतुरङुलहान्या प्रतिमाया उत्तमादित्वसतिदिष्टम् › तदपि नवताखविश्रान्तमिति प्रतीयते ! नव-
५ | 2 (१५ क भ ०
तारुस्येव कण्ठत उन्तमादित्वकथनात् । कियद्धिवां किंविधेवा उत्तमादिभेदभिन्रस्तारुः क्य
प्रतिमा कायैतयपक्षायामपि त्रिधा भिन्नेनवततालेः प्रतिमाविधानस्थोक्तत्वाहु अषटतारः घुनरेकविधरव
तदु्िधानस्यामिषितत्वाज्च । कित्च- यदेवं सवत्र तटे वेदाशहान्योत्तमादिभेदः कल्प्येत
तदेकताटेऽपि तथात्वप्ाेमध्यममेकतालमष्टाङ्लम् अधमन्चकतालं चतुरङ्धलं भवेदिति पूर्वाक्तम्-
'तदड्लद्रीदशभिमभयेत्तर्स्य दीघंताः
इति वचनं व्य्थमेच स्यात् । न चेतदयप्युत्तमंकतारूपरमिति कल्पने नार्थक्षतिरिति वाच्यम् ,
ताहृशकस्पने मानाभावात् । न च वैेदशहानितःः इत्यादिवचनयेव तत्र मानमित्यपि वाच्यम् ,
तस्य नषतारूपायंन्तिकरस्वस्वीकारेऽपि क्षस्यभाषादिति दिक्
४। कीतीति। ताल्घुखमिति तालानां सुखम् आचाचयव एकताल इत्यथः, यत्र तथाभूतं
| ` कूमयुखं भग्रदित्य्थः। (युकतारन्तु कुंकम्' इति काभ्यपिल्पे ( भ० ५०, ८९ टो 0
` म्ताकात् दुरमा्ृतिष्टरिःरिति शिल्परलोत्तरभागे च ( अञ ए, ९० शो ) अविजञेवेण कूर्मस्येव
` षिघानादत्राद्धविरेषकट्पना निष्प्रमाणान्तराऽपि युक्तिसदेति कुम सुखःमिति पारार्तरं कलिपतम् ।
तथा हि यदत्र प्रकरणे तारेन प्रसाणमभिषहितं तहु दव्यमभिप्रेस्य, आयामस्तु ्रस्थान्तरादवगम्यते !
तथा च समराङ्गणसूत्रधारे दशतालमूत्तिं प्रकृत्य भागमनेनोक्तम्-- `
¢ देवादीनां शरीरं स्याद् विस्तारेणाष्टमागिकम् ।
त्िंक्षदभागायतं चेतद् विदध्याचित्राष्लवित् ॥ ( अ० ७९, ४-९ श्छ )
। इति। भागक्रतुरद्धरम् ! एवश्च गोरछ्तेः कुमंस्य तालेन देष्यंकथनपेक्षथा दीर्वाकृते-
स्तन्युखस्य तदुकतिरयुक्तिबाहुल्यं भजत इति साध्वियं पाठकल्पना । यद्वा--ुमंस्य मुखमिव सुखं
यष्येति विग्रहात् ुमवतारी हरिरित्यथ; ूादुतशिल्परलवचनप्रामाण्यादवसेयः
नच-- ` | |
(कू्मीवतारिणं देवं कभटाङतिमाखिखित्ः ( अ० २५, १२३ श्छ )
1 ‡ इति शिल्परललीतरभागीयपद्दश्ंनात् दूरमावतारल्य हरेः सर्वाण्येवाङ्गानि द्मंसद्शानीति कथं सुख-
मेव दुर्माहृीत्युच्यते इति वाच्यम्, अत्र सामात्येन विशेषो रक्षणीयः, तथा च सुखपदमन्नावयव-
सामान्ये क्षणिकमिति न काविवदुपपत्िः। अत्र मूे बिन्दू अपि ्रामादिकाविति केयम्, कसात ` |
।
द्वितीयोऽध्यायः ४७
कुब्जाश्च पञ्चभिस्तालेरपकविष्टो जनस्तथा ।
उपविष्टाः प्रकतेव्या ब्रह्मविष्णुरिवा वृषः ॥ ५॥
करं पञथतालेश्च षट॒तारं स्याद् विनाय
मध्यमं शूकरं ज्ञेयं दृषभ तथेव हि
मनुजाः स्तभिस्तारेत्र षभं शूकरन्तथा ॥ ६ ॥
अष्टाभिः पावती प्रोक्ता मातरश्च तथेव हि ।
गां लीला महारचमील(ल) मीरा तु सरस्वती ॥॥ = `
काटिन्दी चेव सावित्री नदा(नन्दा?) पद्मावती तथा ।
कालयायनी समाख्याता भगवत्यष्टकाख(ताङ))का ॥८॥
नवतालेभेवेद विष्णुब्रह्यार्मा देवतास्तथा ।
नि 1 ताति ना ०१७०१०५.०८०००.०५००.०८
0 ७५७५
कनि प्रत्ययस्यैव स्वारलतिकत्वेन “कीर्मिञुखस्तारमुखोः इति पार्स्येव भाव्यत्वात्। =
, एव मिष्टा्मष्टमिकयेव बिन्दुषिसर्गयोव्यंत्ययस्तत्र तत्र समह्वसन् पास्केः ल्वयं विचायः । सूपमण्डते 0
तालमधिक्रत्य--राखवक्मेकभागे हौ पक्षी डञ्चराख्लयः' इत्येतत् समानार्थं प्यमाह ।
अत्र किवद्भल्तालेः के के कर्तव्य इत्यत्र शिल्पशास्लकृतां बहवो मतमेदा दृश्यन्ते, ते च प्रमूत- = `
स्थानसग्यपेक्षा इति सव॑मनुदत्याष्टतारुत पएकताखान्ता विरोमेन कादयपरिल्पादुद्धियन्तेः
एतेषामेवाघ्राधिक्येनोपयोगित्वात्! अत्र चादक्षप्रा्तमश्युद' पाठमपष्ाय सम्पादकेः कश्यः =
पाद उद्धियन्ते-~ |
अषटताठेन सार्यास्तु पिद्ाचाः समेन तु 1
रखताठेन कन्जास्तु कारयेदेदिकोत्तमः ॥
पञ्चतारोक्तमनेन वित्तेशं कारये इधः।
तन्मध्यसाधमेनेव सर्व॑भूतगणान् कुर ॥
बारन्तु वेदताठेन तनरिताखेनेव कारयेत् । | |
द्विता किन्नरचेव एकतालन्तु मकम् ॥ इति । (अ> ९०, ८७-८९ श्छो०)
६। मध्यसमिति । प्रथमाद्धं पञ्चताटकन्तव्यतवेन यः शकर उदः स मध्यम इति क्वः
नोत्तसो नापि वाऽधमः। एवं तृतीयाद्धं सक्ततारकततव्यत्वेन यो वृषभ उद्ष्टः सोऽपि मध्यम = `
मध्यमेततर इति व्याख्येयम्, अन्यथा पौनद्क्षयापत्तेः । ` ।
एवेत्यधंः । सषतालकर्तेन्यस्तृतीयशयूकरश्च मध्यमे
वृषभदूक्रयोः सा्ततालिकत्वकथनं मतान्तरणेति जेयम् ।
स
त , देवतामूतिप्रकरणम्
ता हं श्तुदेश प्रोक्ता देत्यन्द्रा मुकुरयंता
तिथ्या समानतारेश्च भृगुरूपं ४ कारयत
१०--१२ । एकादशादिपदशान्तास्ताला नान्यत्नोपरम्यन्ते ।
श्पमण्डने तु- |
व (करकाः कररदेवाः स्युरत ऊद न कारयेत्? । ( अ० १ २३ श्रो )
इत्यनेन घोडा तालः क्रदेवानां मानमित्युक्तम् । य कान्यपरिल्पे--
एकादिनवहस्तास्तं नवधा हइस्तमानकम् ।
ताखदिनषतारान्तं तथा नवविधं भवेत् ॥ (अ० ९०; ३४ श्छो ) #
५ इति नवताखान्तं पारमानयुक्तं तत्त सामान्यत इति जेयम् । एवच्च सत्यामपि पवाद हस्त- |
` मानत्य नवधात्वोक्तौ यत् पूवंम्-- । 8. 1.
| दश्लादिकरबृद्धया तु षट्र्तधिशत् प्रतिमाः णथक् । ५५
॥ ५. बाणवेद्करान् यावचचतुष्कयां पूजयेत् उधीः ॥ (अ० १, १९ श्ो०)
इत्युक्तम्, तत्यापि विशेषान्तःपातान्नासामञ्चस्यमिति ध्येयम् । कि
` १३। इदानी कियतताानां प्रतिमानां कियन्तयङ्गमानानीति वक्ुमादौ सततालग्रतिमाया = `
| ध `: अङ्गमानमाह--सक्षतालमिति । रूपमण्डने तु षट् तालप्रतिमाया अप्यङ्विभाग उक्तः ; तथा ब-- ध
1 ॥ ५ सुखं ताल्दयं तस्य जटर ततस्लमरं भवेत् । | 1
५ ५ गुह्यं वेदाङ्लम् उरू स्त जहा च ततूसमा ॥
द्वितीयोऽध्यायः ४९
वक्त तारश्रमाणच ग्रीवा स्यादङ्टलयम्। `
साद्धंसतताङ्लं वक्तो मध्यं नवभिरङ्कलेः ॥ १४ ॥
ससाद )नाभिमेदमूरू अष्टादश स्प्रताः।
जान्वद्भललयं प्रोक्तं जहे अष्टादशाह्ले
पादोत्संधन्तिखि १मालन्तु(स्तु १) मनुजाः सत्तालये (के १)।९५॥ `
[ मध्यमसक्तताटेऽवयवमाननिरूपणम् ]
सषसाद्धं प्रवच्यामि तालं मङ्कल-गुकयोः।
बुधसोरयोस्तथा ज्ञेयं केशान्त त्रिमा्रकम्॥ १६ ॥
वक्तः' द्वावशमाघ्रन्तु ग्रीवा चेव त्रिमाच्रत्रि हका ।
दशमालं भवेद् वन्तो नाभिमेदू' तथोदरम् ॥ १७ ॥
अष्टादश भवेदूरू(रुः ?) जानु मालावयं स्परतप् ।
अष्टदशाङ्लो मन्थी ग्रहाणामङ्टो पदो ॥ ८ ॥ `
[ अष्टतारेऽवयवमानम् |
अष्टतारं प्रवच्यामि देव्याश्चण्डस्य८ण्ड्याश्च १) र भ
मालात्रयं स्यात् केशान्तं वक्त द्र।दशाङ्लप् ॥ १६ ॥
म्रोवा च अ~य ङ्का कार्या हृदयं नवभिस्तथा ।
मध्यं ह्ादशमालं स्यान्नाभिमेद् नवाडले ॥ २० ॥
एकविंशद् भवेदृरू(रः १) जानु चेव गुणाह्ुलम् ।
जक्ाऽइृलेकविंशलया पादमूलं गुणाह्करम् ॥ २१ ॥
भणण १ ०७५० ^
[०1
| गणाद्लं भवरलनाजु पादुः काय गुणाङ्टः । ५
` ` गखतारमिति प्रोक्तम्. 1 इति ( अ० ९१, २४-२९ श्छो म.
शिल्परदलोत्तरमागे च दशादिवतुस्तास्ान्तप्रतिमाया अद्गविभागः प्रदर्शित इति विशेषः| = `
१६। सक्षसाद्धमिति मध्यमसक्ततारमिव्य्थः ; ततप्रमाणञ्चेतन्मते नवत्यङरम् , मतान्तरे ध
। त्वषटाश्षत्यद्रमिति ज्ञेयम् । प्रकरणेऽस्मिन्, मान्नामागादिशब्दोऽदुरमानबोधकरः । |
५० ५५ देवतामूर्सिप्रकः णपु
[ मध्यमाष्टतालेऽवयवमानम् |
प्रीवा च अ्य)हला कायां हृदयं नवभिस्तथा ।
योदश भवेन्मध्यं तालेन नाभिमेदके ॥२३॥
द्र दृश्जानु चेव लिमालकम्
ज्वं उररुसमे भक्ते ऽयद्क्टः पाद् एव च ॥२४॥
[ नवमताठेऽवयवमानम् |
नवतालं पवत्त्यामि बह्याया देवता यथा ।
केशान्त लिमालन्तु कतव्यं देवरूपकम् ॥२५॥
यावन्मानो भवेत्तारो विभजदरविभागकेः।
1 सु्ं(१२)राम(२)वशा(२०)का(१२)च्धि (४)वसु (<) जेन(२४)
# युगा(र्हताः(२४) ॥२६॥ `
वेदा(४) वक्तगखो वज्ञो नाभिस्तूदरगुद्यकम् । =
तथोरू जानुनी जङ्घे चरणो च यथाक्रमे(कमप् ) ॥२७
` विस्तरस्तेन(विस्तारः स्तन)गभें च द्वादशाङ्गलमीरितम्
तद्वाद्ये वेदवेदांशे कन्ते एकान्तरे ततः ॥२८॥ श
सततसताङ्कलो वाहू दीदे) स्थात् षोडशाङकषछो । ह
` करोऽादशमात्रत्ः१) च विस्तरे(विस्तारो)ऽगे गुणाह्खलः ॥२६॥ `
` दीष सूर्याह्लः पाणिविस्तरे प्चमावकः । `
नाभिः सू्याह्लो व्यासे कटिः भोक्ता जिनाद्घखा ॥२०
नाम
२८--२९। सतनगर्म॑हतनयोरन्तर । ईरितं कथितम् । तद्वाह्ये स्तनगभौद् बहिः कक्षे `
9. कक्षद्रयं बेदतेदीशे अष्टाङ्गखे । तत एकान्तरे एकमान्राव्यवधने वा सक्तसघताङ्गलो विस्तारे एक
सषाङ्ुकस्तथा अन्यश्र सक्षादुटः । करमानान्तरमाह--करोऽधदशमात्रः, अग्रो अग्रस्य विल्तारः = `
` शुणाङ्गलः षडङ्गरुः । (1 | न
0
द्वितीयोऽध्यायः
ति श्रीक्तेनात्मजसून्रन्मण्डनविरचिते वास्तुशाख्े रूपावतार देवतामूत्तिप्रकरणे
प्रतिमातारखुनिणयाधिक्रायो नायर हितीयोष्भ्यायः ॥ २।
0 0 0 |
३०। शुनरपि करमानान्तरमाह--दीधं इति । पाणिरद्य सू्ाङलः द्राद्ाुलः, विस्तारे
पञ्चमाश्रकः पञ्चाङ्लछः। ज्यासे विषति निनाद चतुविंशत्यङ्ख ।
३९--३२ ! उनप्रमाणमाह--मू इति । अ्मूरमेकादश्षङ्गरं स्थादित्यथंः । जहका प्रान्ते
युङ्ुल चतुरहुला । पादशरदशाङलः, तदू युगाङलः, ककर युगाङुलः! तवृ ह॒ =`
अष्मान्नकः स्कन्धः कत्तन्यः |
३४॥ अश्र य इत्यभ्याहायैम् , नानाविघरूपमावम् उ दण्डजस्वेदजरावुजाब्यं विभ्वस्य रूपं
यो जानाति स उखेतवेऽस्तवित्यन्वयः । उं उपरिस्था उदुमिद् इत्यथः, ते च अण्डानि च |
तेभ्यो जायन्ते इतयूद्ौण्डनाः ; द्वन्द्वात् पूर्व परं वा यत् श्रयते तछ्धभते प्ल्येकमभिसम्बन्धमिति =
न्यायाहु उदुभिजा अण्डजाश्चत्यथः ।
तृतायोऽध्याथः
«८८209 @
| [ अथ देवतापद्स्थानम् |
करता षडशकं तच चमेध्वश (वाम दवय श?) व्यपोह्य च ॥१
तन्मानमग्रती नीला प्रागुदग्रातत् श्रागुदगगत ?) ) सूक ्।
तद् व्रह्मसू्रमिद्युक्तं तत् सूलं शिवमध्यगम्
५५
2 (>)
नि 1 न
|
१-२! इदानीं देवतापदस्थानं वक्तं रिद्धस्यानोपयोगि व्रह्मसूत्रमाह--तिःसक्षाश इति
द्वास्याम् । सूत्रसध्यमे वास्तुसध्यभागे ब्रह्मानि तदंशमाश्रिव्येत्यथः, साने द्वारमाने च्रिःसक्तामे
छते एकर्थिशस्या मागेविमक्ते मागं यन्मानं सवतीत्य्ः › तत् पडंशकं कृत्वा वामं वामतो हं
व्यपोह्य परित्यज्य, अग्रतो दक्षिणत इत्यथः तत् तादशं मानं द्वयशमिति यावच्, नीत्वा अपनीय
प्रागुदगगतसूत्रकं पष्वंदिग्गतसूत्रम् उत्तरदविगगतसूत्रं वा यहु वत्तते तह बह्यसूत्रमिस्यथः । तथा
च मयमते-- | करा
त्रिःसप्त कृते हरि बराह ऽ शे मध्यमे भवेत् |
करत्वा पडंडकं तच वामे दरंवशं व्यपोह्य च ।
` तद॑शमभ्र' नीत्वा तु प्रागुदग॒गतसूत्रकम् ।
तदु ब्रह्मसूत्रमिन्युक्तं तत् सूत्रं रिवमषध्यमम् ॥ (अ० ३३, ३८-४० श्रो)
इति । सवघ्यपुराणे तु-्वारमानमेकर्विदत्या विभज्य विभक्तानामेकविरातिभागानामरड ुनस्तिघा
विभजेत् ; तत्तस्य मागत्रयस्य वामदक्षिणयोर्भागह्यं विहाय मध्यभागे ब्रह्मल्थानं कल्पये-
` दित्युक्तम्। तथा च-- |
| हारं विभज्य पूखन्तु एकविशतिभागिक्म् ।
ततो मध्यगतं ज्ञात्वा ब्रह्मसूत्रं प्रकल्पयेत् ॥
तस्याद्टन्तु त्रिधा क्रत्वा भागजओ्ोत्तरतस्त्यजत्
एवं दक्षिणतस्त्यत्तवा ब्रह्मह्थानं प्रकल्पमेद् ॥ ( अ= २६३, ५-६ शोर )
इति! ततश्च मयमतीयपाढदरशंनाइ यदस्माभि्वामि दमम्" इति पाटः शुद्धत्वेन कल्पितस्तन्मता- ॥।
॥ न्तरमिति कृत्वेति ज्ञातव्यम् । "वामे चाशम्" इति पारुस्त्वक्षरसंवादाभावात् स्वसमानतन्त्रान्तरा- ` । |
` सम्मतेश्च न गृहीतः। अन्यचच-मतस्यपुराणे ब्रह्मसूत्रस्य दहेयांशयोश्च यन्मानयुक्छम् अत्र च॒ `
तेषां तहु्िुणं मानमुक्तमिति दभ्यते! तच "वामे द्मः इति पाठ एवोपपन्न भवति, नतु
तृतीयोऽध्यायः ` श्ल
मध्ये य द ब्रह्मणः सूलं तस्य वामे शिवस्य च
मध्यं वेष्णव सूत्र तत्सूत्र(लं १) सवेद वतम् ॥३॥ `
९१ (4) | विल 0)पुरुषं (त आदो ब्रह्मा<न्तगो हरिः
तत्तस्या च उमा देवी सुखदा सर्वकामदा ॥५॥
भाग एकोनप्ाशव् गभाद्धं मितितो भनजेत्। `
गर्भाशो ब्ह्यसंस्थान(नं १) देवं भागाष्टकं ततः ॥६॥
"वामे चाशम्? इति पष । तथा हि-मतत्यपुराणोक्तक्रपेण एकर्विशतिधा विभक्तस्य (रस्या
त्रिधा करते साद्धंत्रयो भागा भवन्ति, एवं प्रकरतग्रन्थोक्तक्रमेण--एकविशरातिधाऽशितत्य द्र्य
समग्रस्य षड्भिर्विभागेऽपि त एवंसा भवन्ति । ततश्नदधीत् साद्त्रिभागं स्यजतः समगात् सर्ाक- = `
त्यागो गगितागमानुगत्या नार्थान्तरकोरिमिरोहतीति, मूले दवलत्यागो मात्त्ये चकात्यागो |
वल्तुगत्था एक एषेति न काचिड विप्रतिपत्तिः । एवं ब्रहमस्थानेऽपि दवयुण्यादि ज्ञेयम् ।
तत् सूत्रमिति । तह बह्यसूत्रम् , शिवमध्यगम्--शिवो मध्यगो यस्व तादृशम्, तन्मध्ये ध.
` रिङ्क' स्थापयेदित्य्थः, वक्ष्यति च स्वयमेव श्र्शे लिङ्घमेश्वरम्? (९४ धर० ८ शो०) इति
३। मध्य इति । मध्ये यदु ब्रह्मणः सूत्रं पूषसुक्तम् , तस्थ वामे वामभागे व्यपोहितदवंयशे 1
इत्यर्थः, शिवस्य सूत्रं मेद् , तन्मध्ये दक्षिणे इत्यथः, वंष्णवं सूत्रं भवेत्; तत् सूत्र सावंदेवतं
` सर्वदेवतास्थानम् । वक्ष्यति च-- "देवांश ब्रह्मविष्ण्वंशाः सवं देवाश्च' (७ शो०) इति ।
४। मध्य इति ! त्रेषुरुषे ब्रहमविष्णुरदाणामाश्रयभूते सूत्रे, द्वा त्रिष इख्वेषु मध्ये, द्- |
स्ततूसूच्रस्य मध्ये भवेत्, आदौ ब्रह्मा भवेत् , इरिश्रान्तगो भतरेत् ।
जमेगेति । एवंक्रमेण वर्तमाना पते सौल्यदा भवन्ति, विपरीताश्च भयमावहन्तीत्य्थः। `
तथा च॑ सम॑राङ्गणसून्रघारे--
स्थापयेत् ( पुरषनत्रया ? ) शि(वा!ं) सध्ये निवेशयेत् ।
णं दक्षिणेनाल्य वामतः पुरबोत्तसम् ॥
५ अन्यथा स्थापनदिषा प्रत्यवायो महान् मवेत् । ( भ० ७०, १४१-१४२ शो०) = `
इति! अस्फुटा्थाऽपीयमदध्रयी प्रङ्ृतोपयोगिनीत्यत्र नास्ति नः स्तोकोऽपि संशयः । ` 1 ४
| दर्यो
५} र्द इत्यादि | खण्डितत्वादु दुय
ऽस्याथंः । `
६-८ 1 गभ॑मानेन देवानां ल्थानमाह--भाग इति \ अत्र च मागं इत्युवितोऽपि पाठे ` ५
न
4
म
ताता मा न
भजेदिति क्रिया निष्टेकत्वनच्यपेश्चया न छतः, आमूलं श्ोधितश्न वेरस्यमावेदित्यवधयभ् । मितितो
सानेन एकोनपन्नाश्चद भागो गर्भाद्ध नेत्, गमाद्धम् एकोनपन्चाशता मागविभनदित्यधंः ।
तत्र गर्भा मध्यम एकांशो ब्रह्मसंस्थानं बरमशिः, ततोऽष्टो भागा देवानाम्, षोडश मागा
मानुषाणाम् , चतुविशतिभागाः पिक्षाचानामिति समदिता एकोनपन्चारदु भागाः !
िङ्खस्य प्राधान्यात् पश्रातिरदैशममिप्रेत्य॒बरदमाशमपषामेव देवांदामाह--देवांश इति ।
बरह्मविष्ण्वंशषास्तत्परीवाराः सवे देवाश्च देवाश स्थाप्याः । अत्र सवं देवाश्नः इत्युक्तत्वाद्वध्य-
माणे भूतछरादय इत्यत्र खरपद देवयोनिपरम्, तथा च ये तावदतनोक्तास्ते तदित च देवयोनय
इत्यथः । मानुषे अशे मातरः स्थाप्याः, पैशाचकेऽ शे यक्षगन्धर्वादयः स्थाप्या इत्यथः
ब्रह्मश इति । रेष्वरं ङ्ग हिवलिषङ्खम्, एतदुपरक्षणं प्रतिष्टाप्यदेवता्चीमान्रमित्यथंः |
तथा चाऽऽनेये--
पिण्डिकात्थापनाथन्तु गभाीकारन्तु सकचा ।
विभजेद् ब्रह्यभगे त प्रतिमां स्थापयेह् बुधः ॥
५ देवमाचरुषेश्षाचमणेषु न कदाचन । ( अ० ६०, १-२ शछो० )
` ईत्यविक्ेषेण ब्रह्मभागे प्रतिमास्थापनं देवादिभागानान्न ततकमंणि निन्दनीयत्वदुक्तस् । अत्र द
| देवादि कस्य कियन्तो भागा इति न विक्षिष्योक्तम् । यदि च सधे?त्यस्य वीप्साथत्वमङ्गीहृत्य
` पकोनपन्नात्रदित्यथंरभाय (सक्षसपभेःति व्याक्रियित,ः तदा प्रङृत्रन्थानुगृहीता विभागरीति-
स्तत्रा्याद्रणीया स्यादिति विभावनीयम् । इति देवक्तापदस्थानन्याख्या । `
९। देवानां द्टिस्थानं वत ्ारविभागमाह-द्वारादय इति ! सत्राऽऽदिपदग्राह्य" किमिति
| जानाति कत्रभवान् सूत्न्मण्डन एव । चतुःषषटिविभागेषु मध्ये विषमेषु मगेषु हसो दषवः ञ्युभाः। `
4
धाप्या उ(न्यु एदुम्बरादृदर शिवलिङ्गानि धीमत्
पथविंशे सुखं लिङ्गं देऽ(दच ?)धिके जर्शायिन
धनदस्य द्वथाधिक्ये मातृणां तहुथाधिके ॥१९
(य ^त्ाणां टक अयश पथ्रिंशे बराहदक् ।
सप्तविंश उमेशस्य वोद्धस्य तहयाधिके ॥१२॥ `
एकाधिचलारिशे त॒ स रकया बरह्मणो इशः ।
दुर्वाससो दयाधिक्ये नारदागस्त्ययोरपि ॥१३॥
पथवेदपदांरो तु खच्मीनारायणस्थ च ।
दथाधिक्ये विधेधांतुः सरस्वत्या दयाधिके ॥१९॥
सारदांशे गणेशस्य द यधिकेऽजाक्तनस्य च ।
इरसिद्धिखिपांशे कर्तव्या सवेकामदः (दा ?) ॥१५॥
उद्धांरचाटषि्स्थानं ब्रह्मविष्णुजिनाकयः
पथपञ्चाशन्नागे स्याद्रोद्री तस्माहयाधिके ॥ १६॥
~ ~~~ ~ -----------------~----- ज त ~+ भ
१० । शिवशिङ्कषष्िल्थानमाह-त्रयो्विक्नतीत्यादि । एकादिन्रयोविशतिपयन्तं विषमां-
दके एक-त्रि-पञ्च-सपेत्याधयुग्मांशे, उदुम्बराह् देहल्या उदं शिवरिङ्गानि स्थाप्यानि, यथा तत्तद- ` ४ |
युग्मांशे लिङ्ञानां हृष्टिः स्यात्तथा तानि स्थापयेदिल्यथंः ।
११। सलं लिङ्गमिति छिविक्ञेषः। द्वयधिके इति सप्तविंशे । द्वथाधिके उन्न । ५ 1.
तद्द्वयाधिक इत्येकत्निशे । |
१२॥ तदुद्याधिके उनचत्वाश्ि।
१३। एकाधिचत्वारशे इत्येकचत्वारिशे । इयाधिक्ये इति निचत्वारिशे ।
१४॥। पञ्चवेदपदँसषे पञ्चचत्वारिकशांशे । ह | ०
` १५॥ सारांश इति । सारदा दुर्गा रक्चणया ततपीर््यानानि, तन्मिते अं एकपत्वाशांस = 9
इयथः! निपजचाश इति निपन्चाशरो, अयन्वांशोऽ्नासनडरतिद्ोः साधाश्य इति जेयम्; = |
शवधिकेऽज्नासनल्य' इत्यनेन त्रिपञ्चाशांशेऽजासनस्य दटेदक्तत्वात् । 1
ठृतीयोऽभ्यायः +
; ` देवतामूत्तिप्रकरणम् `
दिक्पाला खोकपालाश्च रहा मातृगण(णा)स्तथा ॥२२॥
नान ५०१०५०५५ ०१५०५११. ५ ११५... ०५०५.८१०१५१८०१०
१७। मैरवीति भैरवस्य दषटिः । पदमिति । तदूढ्तः त्रिषव्य शान् परतः दलं पदं इषि-
स्थानं भवति, विषमद्वासंशस्य श्निष्ष्व्य श्र एव निःचेषित्तत्वात् ।
॥ ता ०००५११५५
१८। लिङ्ग्र इति। लिङ्ञमरे दिवलिदङ्घाग्रं अ्चौस्पेन प्रतिमाष्येण दैवता न स्थाप्याः ।
एतच्च, शश्िवस्याप्रे शिवं कुयात् इति वक्ष्यमागविषेसवादकम्, टिपर कशिवप्रतिमप्सपि न
कुर्यादित्यर्थः । एवञ्च शिवल्याभ्रे शितं ऊर्यादित्यत्यायमथः--्िवल्य लिङ्घ्याप्रे शिवं क्िव-
छिङ्गम् , शिवस्य प्रतिमाया अग्रे च शिवप्रतिमां यादिति ॥ि
प्रभान्ति! शिज्घाप्रे सर्बरूपेण देवताः इताश्वेत् प्रभानष्टा नष्टप्रभा भवन्ति । अन्न इष्टान्त-
माह--नभोगेति । यथा दिवाष्टरे उदिते नभोगा नमःस्थास्तारा नषटप्रभा भवन्ति सद्दिप्य्थं
०--२१। पूर्वं व्रह्माणं ब्रह्यणोऽप्रतःः इति °विष्णो विष्णु! जिने जेनम्ः इ्युक्तम्, इदानी
तद्पवादमाह--ये यल्यापीति ब्रह्विष्मोरिति च । यत्य देवस्य ये हितावहम हितकर
` भवन्ति तेऽपि तदग्रतः स्थाप्या इत्यर्थः । श |
बहत्यादि। एकनामिः सनाभिः सपिण्डस्ुल्यो वा, ताच्छे जिने सम्युलवत्तिनीत्यथः,
दोषो न विद्यते, ब्रह्मणो विष्णोश्नागरे स्थापितो जिनो दोषाय न भवतीत्यर्थः एवञ्च जिनस्या- `
प्यगरब्रह्मणि विष्णौ वा स्थापिते दोषो न भवतीति रम्यते न्यायसाम्यात्}
तृतीयोऽध्यायः ५७ `
यच पुंराधं न प्रोहति ॥२३॥
[देवतास्थापने दिङ्निर्णयः । ह
नगराभिमुखाः श्रेष्ठा मध्ये बाह्ये च देवताः
शिवन्रह्मजना विष्णुः सवांशाभिमुखाः शुभाः ॥२५॥
॥ गणेशो भे रवश्चण्डी नकुरीशो ग्रहास्तथ
भूताया धनदाश्वेव दक्लिणास्याः शुभाः स
प्रातणां सदनं कार्य द्लिणोत्तरदिङस
हनमान् वानरशे्टो नेक ठ ६ र ॥२५७॥
क ममत जमाकर
२३। एतं इति । डशटिेधविवनिता इति ब्रह्मविष्णादीनां परल्परह्िधेन हीनाः, क्षिव-
इशििधेन वा । “ष्ियातहितं यच्च" इत्यत्र “हष्टिपातहिता यन्न" इति स्यात् । तथा सतियत्न
देवा दष्टिपातवशाइ दहितास्तन्न स्थाने पुरां नगरस्य पापम् अभङ्रूमित्यथंः, न प्ररोहति
न प्रोद्धवत्तीत्यथः | | |
५॥ देवानां मुखं पूरवापराष्यं पूंदिकस्थं पश्चिमदिकस्थं वा इयदिति शेषः। दष्षिणो-
त्तरं॑दश्षिणोत्तरदि्स्थं न दुर्यात्। अचर पूर्वादिशब्दो दिष्य लाक्षणिकः! ब्रहेति । एतच
विेषाभिधानं मतान्तर इति चेयम् । मतघ्यपुरागे पूर्वात्तरसुखल्वल्योकत्सत्वात् । तथा च-- `
| वाषुेवादिप्रतिमारुक्षण प्रवदामिते। ` धा | 6
प्रा्ादस्योत्तर पू्मुखीं वा चोत्तराननाम्॥ इति (अ० ७४, १ श्लो) |
यथा तथा वा भवतु सर्वधा विस्रोऽयं श्लोकः । अस्य प्रहकृतपारोऽ्नुसन्धेयः। == |
२९॥ नगेति। मध्ये वास्तुमध्ये, बाह्ये वास्तुबहिभागे च प्रतिष्ठाप्या दैवता नगराभि- = `
जुखाः प्रशल्यन्ते । पू्वापरास्यमिति यदुक्तं तत्र मतान्तरं दर्शयति-शिषेत्यादि। सवोशामि- |
` जलः स्ंदिसुलाः। अन्न पूर्वं पू्वपराङ्ुलत्वकथनादु बरहमविष्णुशिवग्रहणं मतान्तर्ोत- = ।
नार्थम्, जिनग्रहन्तु न तथा, पूरव॑मनुदधेखेन कस्मिन्नपि मते तस्य सर्वाश्चाभियुखत्वल्वप्राप्तः ` |
विधित्वाव्याघातात्। 1
२७॥। मातणामिति। पतेन मातरो दक्षिणदिङ्मुखा उनत्तरदिङ्युखा वा कायां इति ` 4
देवता-न =
वृताः ॥२६॥
दैवतामसि्रकरणम्
देवा दैत्या मानुषाद्याश्च सवं ।
ह्रात्मानं व्यापकं खष्िकारं
स्थायी इष्टा विश्वकमींश(मां सोवन्याः(वन्यः१) ॥२८॥
इति श्वीक्तेत्राव्मजलूनश्वन्मण्डनविरचिते बास्तुशाखे देवतामूतिप्रकरणे
प्रतिमापदस्थानद्रशिस्थानाधिकासे नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
दति । न केवरं नेक ताघ्यः स्वन्तरारूदिगास्योऽपीत्यर्थः ।
` दुष्करोऽ्य पाठोद्धारोऽधंग्रहश्च ।
फरितम् । हनुमान् इति । नेऋ^ताघ्य इति सतान्तरेणोक्तम् । स्वमतमाह--विदिङ्घुख
चतुर्थोऽध्यायः
अन्तसूलं पुस्तकथ कमण्डलुवरान्वित
विभ्वक्मां चतुरहस्तखिनेत्रश्वन्दशेखरः ॥ १॥
इति विश्वकर्मां |
ऋग्वेदादिप्रभेदोक्ता( देन ? ) कृतावियुगभेदतः
विप्रादिवणभेदेन चतुवेक्लं चतुभंजप् ॥ २॥ `
अक्ञसूलं करे वक्तं गुचिस्तस्या ( स्थो ? दतः स्थिता। `
स्थाद् वामे पुस्तकं हस्ते तस्या(स्यो द च कमण्डलुः ॥३
कमरासननामानं (माऽयं १ ) सवेवणं हित्षदः। `
कतकारापकेः) साद्धं रोहितः कमरसनः॥४॥
इति कमलासनः!
१। अयमध्यायो ब्रह्मादीनां देवानामावुधवणेवाहनादिनिणेयाथ प्रवृत्त इति ज्ञायते |
एतहुधल्थङ्कत्दरत्यन्तयद् ख्पमण्डनात् । . तथा च~ 0 ¦ क
बरह्मादीनाचच देवानां देवीनाच्च यथाक्रमम्! = | ॥
आयुधानि तथा वर्णं वाहनं कथयाम्यथ ॥ (ति भ०२,९कछो०) |
अस्य गन्थस्य शिर्पशास्रत्वात् ततछनतत्येनाभ्यर्दितल्याऽ्दौ विश्वकमंणो रूपं निदिशति-अक्ष- ` |
` सूत्रमिति । अस्मदुपलन्येषु शिल्पशचेषु ऋते रूपमण्डनण्ते च प्ङृतग्न्थं न विश्वकरम॑णो
रूपयुपनिबद्धयुपलन्धम् । रूपमण्डने एनः किचिद् विरक्षणमेव रक्षणमल्माई ग्रन्थात् । .तथा-व-- |
विश्वकर्मा चतुर्वाहुरक्चषमाराच्च पुष्तकम् । 2
कम्बां (कम्ब १ ) कमण्डलु धत्ते रिनेत्नो हंसवाहनः ॥ इति ।
व | | 1. (० २,.१० शोर.) र|
२-४। एकस्यैव ब्रह्मो नामभेदेन चत्वारि रूपाणि निरूपयिष्यद्ादौ कमदधस्लनं, ॥6 तं ।
ई०.. ` ` दैवतामूर्तिपरकरणमं
तस्य चतु्षहुत्वे चतुमंखत्मे च देतुप्रदर्शनपूवंकं स्वरूपमाह --बरगूषेदादीति । चहगादयश्चत्वारो
वेदाः इतादयश्चत्वारि युगानि ; ब्राह्मणादयश्चल्वारो वणाशरेति यथासम्मवं ततस्तत त्वतत्-
कन्त त्वादिश्पेण ब्रह्मणोऽपि चत्वारि श्ुखानि चत्वारो बाहवश्रेत्यर्थः । तत्न कतं सस्थयुगम् $
करे दक्षे इति दक्षाधःके, ऊद्र'त इति दक्षो तः, एवं वामेऽपि। द्ितीयकमलादनयपदं
धिक्ोषणपरम् ।
द्या कमण्डलुधरः कर्तन्यः स चतुसंखः
हसाखूढः कचित् कायः चिच्च कमलासनः ॥
वर्णतः पद्मगभोभश्रतु्बाुः शयमेक्षणः ।
कमण्डलु" वामकरे सवं इस्ते तु दक्षिणे ।
धामे दण्डधरं तद्त् खवञ्वापि प्रदशयेत् ।
= सुनिमिर्दवगन्धवेः स्तूयमानं समन्ततः ॥
कुर्वाणमिव रोकास्त्रीन् श्यु्धाम्बरधरं विथु ।
शरगचमंधरञ्ापि दिव्ययन्लोपवीतिनम् ॥
आज्यस्थारीं न्यसेत् पाश्वं वर्दाश्च चतुरः पुनः|
वामपाश्वंऽघ्य सावित्रीं दक्षिणे च सरस्वतीम् ॥
शप्र च कषयह्तद्वत् कार्याः पेतामहे पदे ।! इति ।
( अ० २६०, ४०-४९ श्छ )
तमराक्चणसूत्रधार च--
बह्मानलाचि प्रतिमः क्तव्यः उमष्ा्तिः
स्थलाङ्धः श्वेतपुष्पश्च श्वेतवे्टनवेषटितः ।
कष्णाजिनोत्तरीयश्च वेतवासाश्वतुमखः ॥
दण्डः कमण्डलुश्ास्य कन्तन्यो वामहस्तयो |
अक्षसृत्रधरस्त(द्वा ? दह) मौन्ज्या मेखलया ततः ॥ इति ।
| | | (अन ७७, २-एश्छो०)
क्षिल्परत्नीत्तरभागेऽपि ( भ० २५९; १२३-१२७ श्रो ) व ह्मणो ह |
अिखितम् । परं प्रहृतगन्थ इव छत्रापि बरहमणशचतुमेदभिक्त्वं न इश्यते । कमलासनः कस्मिन् `
युगे छलदायक इति नोपरभ्यते । विरिचिब्रह्माणो छते छलदायको, पितामहस्त्रेतायाम् । तत्र `
0) पारितिभ्याहु भवतु कमलासनः कलो वा द्वापरे वा, न तेनैकेन युगदयविनां जनानां छं
श्क्यलम्पादनमिति छधीभिशिन्तनीयम् |
चलुथोऽन्यायः ` ५.६.
* |
कम् लशा शुचिवं पुस्तकं तथा ।
पितामहस्य स्यान्मृत्तिखेतायां सुखदायिनी ॥ ६ ।
पुस्तकं चाक्षसूल् शुचिश्वेव कमण्डलुः,
ब्रह्मणश्च भवन्मृकत्तिः कृते स्यात् सुखदायिनी ॥ ७।
इति ब्रह्मा !
अन्तसूत्र पुस्तकञच धत्तं प्य कमण्डलुम् ।
चतुवक्ता तु साविध्री श्रोविथाणां ग्रहे स्थिता ॥ ८ ॥
इति सावि ।
ऋग्वेदः श्येतंवणेः स्याद् द्विभुजो रासभाननः । ५
अन्तमाखाम्बुपाले च पि (धि ?) तश्चाध्ययने रतः॥६॥
इति ऋगवेद्ः। ` |
अजास्य८ ?) पीतवणः स्याद् यज्वदोऽक्तसूत्रधूक।
वामे चाङ्कशपाणिस्तु भूतिदो मङ्भलपरदः ॥ १० ॥
इति युवद ।
५। विरिञ्िमाह--अक्सूद्रमिति। श्रतिवैदः, इतरत्र र्षणन्रये श्चचि'रिति पाठो |
हश्यते तन्नापि श्युतिरिति भवेन्न वेति विचारणीयम् । चिरिः । कते सत्ययुगे । इहान्यत्न
इति पितामहः! `
च व्ह्मणो क्षणद्भये अक्षसूत्रादिप्रथमान्तपदएनामन्वयो दुरूपपाद् एव । इञखखञ्च--सक्षसूत्रादीना- ` ८ |
सुहिशपरतामघ्नस्वीकारेण तत्तदविशिष्टा मूत्तिरित्यध्याहारजन्यम् ।
9, €| शआरत्रियाणाभिति-- `
व ( ` (जन्मना ब्राह्मणो हथः संस्कारे द्विज उच्यते। | ह
“ ` शिचया याति विप्रत्वं धिभिः ्रोवियञ्च्यते॥# . `
1 ४ _इत्युक्तर्णानां वेदविदाम् ।
९ । अक्षमारेत्यादि । अक्षमालाम् अम्शुपान्नञ्च श्रित इत्यथः ।
पुरषाकारगम्भीराः सकूची ( चां ? ) सुकुरोज्ञ्वलाः॥ १६
५ शास्त्रान्तरे कथितं गणदेवमित्य्थः । भिया देवीत्यभेहे वृतीया श्रीदेवीत्यथः ।
नाह-त्रह्मग इति । तत्राऽऽदौ सव॑साधारणं विरोषणत्रयमाह--पुरषेत्यादि । सद्वा इति । कूर्च
टं | । कवतामरि्रणम्
त्पलदल्ाभासः सामवेदो हयाननः
र अन्तमाखान्वितो दन्ते वामे कम्बुधरः स्श्रतः ॥ ११
इति सामवेदः |
अथवंणाभिधो वेदो धवरो मकंटाननः।
अक्तसूलथ खटाङ्गं विभ्राणो विजयभिये ॥ १२ ।
दटर्यथबणः |
तरलयशा' सितं रम्यं प्रगवक्त' जटाधरम् ।
अक्तसृलं बिशूख्च विश्राणं तं (तत् ?) त्रिलोचनम् ।॥१३
इति न्र्यशास्तम्
| [| अथ ब्रह्मायतनेऽस्यदेवतापदम् ] |
आमन † तु गणं प्रोक्तं मातृस्थानच् दज्िणे |
त्ये तु सहखान्तं वारुण्यां जटशायिनप् ॥ १४
वायव्ये पर्वतीरुदो हा ( ग्रहा १ ) श्वेवोत्तर स्षृताः ।
ईशाने च भ्निया देवी प्ाच्यान्तु धरणीधरः ॥ १५
1 ध [ अथ ब्रह्मणोऽशो प्रतीह्यराः ]
ब्रह्मणे ( णोऽ १ ` प्रतीहाराः कथयिष्याम्यनुक्रमात् ।
1 ०
१४-१९। अत्र द्वितीयान्तानां पदानां कर्पयेदित्यघ्याहतक्निययाऽन्वयः, गणं प्रोक्तमिति
१६। पं ब्रहणश्चतुरो मदान् दलयन्पि साम्प्रतं बरहमत्वेनेक्यं परिकल्पयन् अष्टौ प्रतीहारा- `
1 शब्दो नानाधंः। ततर भ्मशव इत्येकोऽथेः, नासङ्कतानि हि प्रयसः पितामहस्य प्रतीहाराणाम् |
` अतिरम्बीनि भ्मश्रूणि । इशसुष्टिरिति द्वितीयः, ततस्वसूपञ्च-- = ` |
चतुर्थोऽध्यायः ६३
पद्यं सट (खु ?चाऽ्षरं ठंश (दंशं ¢ सप्तनामा तु वामतः
सव्यापसन्ययोगेन कमण्डलुश्च (८ च ! ) धमकः ॥ १७
अक्तपद्मवामदण्डकमलश्च (ख ‰) महतोद्धवः (मतोद्धवः १) ।
दण्डागमचछ्रवाक्कारं (छचा कारं ) जयश्च सर्वकामदः ॥१८॥
भ ११०८०११.
०११९११११ ०१५५५५० ०
इत्युक्तरक्षणम् । नायुक्त्च॒वेदसम्तवे दिकघठुरीणस्य दुदिणस्य प्रतीहाराणामपि वेदोक्तकम- `
निचोहसादायकार्थं इकयुिधारणम् । तूलिकिति वृतीयोऽ्ः। चसा च वुषश्रवणसोमभिर्वा
खरकेदो्वा तन्तुभिवां वषिता उदटुम्बराङ्राकारा वटाङ्राकारा प्ठक्षसूचीनिभा तेति शिल्प |
शाल्त्राद्नगम्यते । तथा च समराङ्गणसत्रपदि--भ० ७३1 १९.१६, १८ १९ श्लो ।
दुवकं धारयेद्धीमान् बुषश्रवणरोममिः ॥
"वर्करा विधातव्यः खरकेरोरथापि वा ॥
तन्तुतः कुचकः श्रेष्ठौ विरेखाकमंणि स्वतः |
"भो वराद्कराकारस्ततोऽश्त्थाद्राङ्कतिः ॥' ( संशोधितः पाठः )
॥ छश्वसूचीनिभध्वान्यः ऋ न ऋ क| `
उडम्बरादराकारः # # ऋ क + 1
इति शुचे विषथं णं नमुपरभ्यते । नानुचितञ्च विरवखजः प्रतीहमयणाम् भडनोपयोभिन्या- `
तुर्क हणम्, प्रभोः परतीहाराच्चुजीविनामपि प्रुतम्मतमशमूषादीनां रोकः साचखतशवाजु-
रीरुयितव्यत्वात्। एतेऽथा दिगदर्शना्थमस्माभिर्पश्चि्ठाः अन्थतराथग्रहणपर्हिरयोस्तु धियः
परसागम् । इदुमन्रावधेयम्--यदि नाम कूं घायंवस्तुविशेषः स्यात्तदा परतः प्रोक्तैः प्रहरणादिभि-
व्याद्रतनाहुभिरेतः क नाम तदु धमेमिति दमच्र्थक एव कुर्वशन्दोऽत्र शिः स्यात् ।
१७। एवं॑तेषां साधारणीमाङृतिमभिधाय इदानीं तेषां प्रातिष्विकं रक्षणमाह-- `
पश्चमित्यादि। त एते सवं एव चतुर्हस्ता सव्थापक्षन्ययोरूदधःकरमेण यथोक्तपहरणादिधारिणो `
ब्रह्मणः सव्येऽपसथ्ये च चलुश्रतुःकरमेणावस्थिताः। तत्र वे प्रथमतः सप्तनामा वामदक्षिगयो- `
हस्तयो पद्मम्, सुचाम्, अक्षरम्, वेदम्, दंशम् दधान इति शेषः । एवं सर्वत्र द्वितीयान्तानां `
दधान इति क्रिययाऽन्वयः । तत्र खचा खक्, दंशोऽच्चविशेषः । 00
इति, कपण्डल््च दधानो धम॑कनामा द्वितीय इत्यथैः । अत्र कमण्डल्रिति पूरवोक्तवतुष्या- `
तिरिकततवेन वा पकडान्यपरकल्पनविधया वा निदिष्टमिति न ज्ञायते ।
१८। अक्पन्नवामद्ण्डकमर्रेत्यस्य प्रहृत पालेऽुसन्धेयः । पम कमलब्रेत्येकल्यैव `
्विवीयमाह--कमण्डल् धमक
ह देवतामतकरण्
वेट दण्डं विजयो भवेत् ( दघत् 0 ) 5:
अधोहस्तापसव्येन खडगयुग् यज्ञभद्रकः ॥ १६
अल्षपाशाङ्श(शान् ?दण्डभयश्च (दण्डं भवश्च ?) सवकामदः ।
दण्डङ्कशपाशरोत्पलनिभवः (वलं षिभवः ?) सवेशान्तिदः ॥२०॥
[ अथ द्वाद सूथमूत्तयः |
श्रृणु वतस्त प्रवत्थामि सूयभेदां् ते जय।
यावत्प्रकाशकः सूयां यावन्मृत्तिभिरीरितः ॥ २१॥
वस्तुनो द्विश्छेखः समुपलभ्यते । "वामः इति पदमप्यनन्वयि । अत्र "प्रियोहुमव' इति पगे
` शपमण्डने ( स्प--अ० २,१९ श्छो० ) । `
ताम ०००५
२० । तदैवं धामतश्रत्वारः सक्त-घमंक-मतोहमव-जयनामानो ब्रह्मणः व्रतीहाराः, दक्षिणत
छत्वारो विजय-यज्ञमद्रक-मव-विभवनामानश्च निर्दिष्टाः ।
२१। द्दानीं हाद सूयमूत्तीराह--श्रण्विति । जय इति वततेत्यनेनो दिष्टस्य सम्बोध्यल्य
नाम । यद्वा जय सरवोतकषेण व्तसपरेत्यर्थ॑ः । ते व्रवक्ष्यामीत्यन्वयः |
यावदिति समस्तवस्तुप्रकाश्क इत्यर्थः| यावन्भूत्तिमिरीरितः कथिवल्तावतीमर्तीश्र
प्रषक््यामीत्य्थः। सर्वां एवेता मूत्तयश्तुर्बादव इषि न्तायते धार्यद्रन्याणामाधिक्यदशंनात् ;
८ तथा ~ ^ त |
| ८ ‡ | इत्यः १ 2 | |
पपद्मद्रयामयवरान् दधतं करान्जेःः इत्यत्यत्र करान्जेरिष्त्यनेन दोष्णां द्वाधिकत्वराभाच्च ।
अन्न पूष्णो मूतिरद्विभुना केवरपद््यरान्छिता च, वेन्णवी मूतिरपि दविकरा, परं तस्या दक्षिणकरे
चक्रमि्रत्र पद्यमिति विशेषः तदितरत्र सर्वासामेव मूर्तीनां करये नीरजङ्वयमन्ययोश्च
` यथोक्तद्रन्याणीति । अ्िषुराणेऽपि-- ।
0 गभ्वरदा ह्वान्जिनः सवं दिक्पाराश्चकर कमात् ।* ( अ० ९१.२३ शो ) इति ।
सतक्ठादवे सेकचक्रे श्ये सुयो हिपशचधक् । |
मसीमाजनटेखन्यो विध्रव् + >* ५॥ (अ०९१,१ को) `
। इयनेन च तन्मूतीना चतुबाडुतवस्य सूचितत्वात् । एतेन काश्यपरिल्पे-- `
द्विभुजा पश्चहस्ताश्च रक्तपद्यासने स्थिताः । ` २
रक्तमण्डरुसयुक्ताः करण्डमुङधटान्विताः ॥ ( अ० ४८,७९-८० शलो )
इति यद् कवं भस्करमीनायुतं तन्मलान्तरपर्वनमिति हृत्वा सोढव्यम् |
चतुर्थोऽध्यायः ` ४
सपदमो पाणिवलमो (पवो १) ॥२९॥ `
सा श रोद्री ज्ञातव्या प्रधाना पञ्चभूषिता
चकर तु द्लिणे यस्था वाः गो
ता वारुणी भवेन्मूत्तिः द्मन्य्मकरदया ॥२६॥
कमण्डलुः द(लुदं (क्िणतोऽतमाल तः।
स्तु दक्षिणे शूरं वामहस्ते सुदशेनम् । र
त. समास्यति पल्नहुस्ता यमय व ॥२८॥ ५
२२। उपरिथचतधिशश्छोके सञुदि्ाना भात्करमू्तीनामयुकतेण रक्षणानि वक्तं प्रथमा- ` । |
माह--दक्षिण इति । यस्या दयध्याहारः । यस्या दक्षिणे केरे पौष्करी कमर्चटिता माला, `
वामे करे कमण्डलुर्वतत इत्यर्थः । इमौ च करावदधीविति चेयम्, उद क्रमेणेव धारणीयद्व्याणां =
` कथनौचित्यात् । पश्ास्वां शोभितकराविति वामदक्षिणयोरधःकरावित्यंः। एवमुत्तरत्रापि
` क्तेयम्। "द्याभ्यां शलोभितकरेत्युवितः पाठः। | ५.4
खधातेति । भच्र ्डधातेश्ति वा श्डधामेःति वा पडो भवतु, उभयथाऽपि दोषानुषङ्गो ` ध: |
` इुष्परिदर एव, उदेश्छोके शवातिःति पाटस्योपट्पेः । अत्र ्रूमः--'धाते'त्येव पाठो ज्यायान्
` परिगणनश्ठोकस्थितधातरब्दसाम्यात् ; छन्दोभङ्गदोषोतसारणाय चीपपदं प्क्िघ्षमिति ; तदेतत् द ५ ( |
उरभमेव प्राचीनग्रन्थकृतां ृतिष्विति। ` ध
२३। दक्षिणे सोम इति, सोमः सोमरसोऽतं वा । |
8 दैबतामून्तपरकरणम्
छ दक्षिणे हस्ते वामे होमज (रीटकम् १ कञ्जः ॥
मूत्तिस्सवा्ी भवेद् वत्स पद्मसद्धकरद्वया ॥ ३२ ।
सुदशैना(न ?) करा सव्ये पद्महस्ता तु वामतः ।
एषा सा द्वादशी मृत्तिविष्णोरमिततेजसः ॥ ३३ ।
धाता मित्रोऽ्येमा रुदो वरुणः सूयं एव च ।
भगो विधस्वान् पूषा च सविता त्वटविष्णुको
इति इादश सूर्यमूत्तेयः ।
1
२९। सा विश्वमूर्तिरिति, बेवस्वती मूतिरित्यथंः ; उदेश्दरोके तथा पाठात् । `
३४ । उक्तक्वणानां द्वादशमृततीनां सं्रहरलोकमाह--घातेति। दूरविभिन्नान्येव सूर-
नामान्युपलस्यन्ते काभ्यपरिल्पे। तथा च--
४ आ्नेयषुराणे पुनः-- |
विकत्त॑नो विवस्वांश्च मात्तण्डो भास्करो रविः ।
रोकपारः प्रकाश्चश्च रोकसाक्षी लिविक्रमः ॥
आदित्यश्च तथा सूयः अंद्ुमाी दिवाकरः ।
एते वे द्वादक्लाऽऽदित्या उत्तरादिक्रमात् स्थिताः ॥ इति ।
| ( अ० ४८,८१-८३ श्छो° )
। वरणः सूयेनामा च सहलरंखस्तथाऽपरः । |
धाता तपनसंश्च सविताऽथ गभष्तिकः ॥ `
रविश्ववाथ पर्जन्यस्त्वष्टा मित्रोऽथ विष्णुकः । `
मेयादिराचिसंस्थाश्र मागोविकरािकान्तकाः ॥ (अ० ५१९६ न्छो०)
चतुर्थोऽध्यायः ् ६७
[अथ सूरयायतनम् ]
मेण पूज्यन्ते (१18२ |
ऋ त्ये गाहु॑स्थानं शुक्रस्थान पश्चिमे ॥ ३६ ॥
२५७ ॥
इति धातृ-सविव्-स्व्-वरण-सूय॑-मित्र-विष्णूलां सप्तानां साम्येन, भग-तपन-गभस्हिक.रवि- =`
पजंन्यानां पञ्चानाञ्च भिन्नतया नामान्युपरम्यन्ते ।
३९॥ सुेस्यायतने वक्तव्ये प्रसङ्गा्तदचंनायाः सवदेवाचनयुलत्वं वु सममिन्याहताना- 1
भन्येषासपि तथात्वभाइ-- सूयं इति । अयुक्रमेण पूज्यन्ते चेद ॒ पते अर्चने सवदेवपूजाविधौ
पारदाः स्युः, सवं देवपूजास्वेवाऽऽदावेते पूजनीया इत्यथः । तथा च सतिः--
| बणेशच्च दिनेशञ्च वहि विष्णुं शिवं शिवाम् । |
| पूजयेहेवषट्कश्च ततः पूजां घमाचरत् ॥ इति ।
भत्र च वहि निहवानेन म्न्थक्ता अपक्रमन् कऋमोऽपि नारक्षीति विभावनीयम् ।
तन्त्रान्तद-- | ध
आदित्यं गणनाथच्च देवीं इदं यथाक्रमम् ।
नारायणं विषयदवाख्यमन्ते च इख्देवताः ॥ `
इति प्रङ्ृतश्छोकवदेव पञ्चदेवाच॑नं विष्ठितम्, तत्राप्यस्ति क्रम विपयेय दति नवीनोऽयं पूजापर्यायः। |
३६-३७। आयतने ग्रहसंस्थानमाह--आघ्नेय इति । न-गुर-राहु-खक-केषु-डध-क्षनि- ०
नदराः कऋपेणाऽऽ्नेयत देष्ट्री यावत् स्थाप्या इत्यथः । तथा च स्पसण्डने-- `
| सूयंस्याऽऽ्यतने स्थाप्या बह्विकोगादितः करत् ।
ष कुजो जीवल्तमः शक्रः केतवो ज्ञः शनिः शी ॥ (अ० २०२५ शछो०) # ॥
~ दति ॥ तमो राहुः, जो बुधः । एवन्न- ईशाने च शनिः स्थाप्यः दयनन्तर स्खखनघ्थाने-- ५ : |
` प्प्राच्यां स्थाप्यः इत्यक्षरवतुषटयं च्रटितं स्यादित्यचुमीयते ।
प
१ हत . ४ दैवतामु्तिप्रकरणप्
1. भवितुं प्रहता कमोत्कपास्थां सवेतरकमेवाथ प्रतिपादयतीति इ्यते । किमन्र तातूपयमिति `
प्रय दे देवयुख्यास्तेषामायतनेषु त एव विभक्तविभागेनावस्थिताः फरदायका ्युःतत्रापि |
। चस्याथतनं तस्य प्राङ्निदशाधेमयसचम इत्येवारमाकं प्रतिवचनविभवः ।
` श्रीकणत्यादिशलोकस्य तु दुष्करः पालोदधारः। प्रथमे पादे एवं दर्थः स्थित स्व
प्रदक्षिणे" इत्यत्र शविशश्व परक्षिणात्' इति पाठः ङ्यः । तथा चेते परदि्ेन दवौ दौ इत्वा == =`
ह | | अथ सूयप्रतीहाराः |
स्ैकदन्ताच्युतशक्तिरुदरा विघ्रेशशक्तीश्वरविष्णुसूर्या
श्रीनाथविघ्ेशभगास्विकेश८ः)) चण्डीशटेरम्बपतङ्गक्ृष्णा(}) ॥३८
श्रीकण्ठसूर्था रुदस्थाम्बिकाज८)) वदज्िणमध्यादिदिन्ञु पूञ्याः।
खस्थानगाः स्वमनोरथांस्ते यान्ति विघ्नातिपरसंस्थाः८) ॥ ३६
दण्डी च पिङ्लश्चेव आनन्दश्वान्तकस्तथा ।
चि्ो विचित्रो ज्ञातव्यः किरणान्ञः सुखोचनः ॥ ४०
सवे च पुरुषाकाराः कत्तैवयाः शान्तिमिच्छता ।
चतुद्र रेषु च स्थाप्या दिशाथेव प्रदल्लिणे ॥ ४१ ॥
ह तमक ००८०७ ५५
भ ~न
ति माज -१ १ प
छन्लानाथमधः सूर्यायतनं चित्रारूढमुपत्थाप्यते-- |
पू चधृर्द्रः |
दण्डी, पिङ्कः
२८-३९॥। प्चपादीयं प्चानां सूर्येकद्न्ताच्युतशक्तिरदाणां करम देकेकप्राथम्येन निर्दैशमनु-
| शरीकण्ठसूयभसुखाम्बिकाजाःः इति । वचलुरथपादन्तु दुरूढमेव । । ॥ १ ॥
४०-४१। दण्ड्यादयोऽोद्वारदेवताः पूादिदवारकमेण द्विशः संल्थाप्याः । एवच्च दिाचरेव `
चतुर्थोऽध्यायः न 0
प्रतजेन्यृध्वेकिरणं ताश्रचूडं वण्डायुषप् ।
दण्डो वामविभागे तु पिङ्गलः स्यादतः श्रणु ॥ ४२ ॥
(किरणस्थाने 0 किरणे तु) यदा शक्तिः किरणं ताभ
तजंनीदण्डपूवेच पिङ्गलः पू्दत्तिणे ॥ ४३॥ `
तजनी द्वो वक्तानां 0) दण्डेनानन्दकः स्मरतः!
तजेनीदण्डापसतव्यं सव्यवेदान्तकाशुभाः ॥ ४४ ॥
तर्जना द्वोपमनी दण्डं द्ण्डन्ते चित्रका भवेत्
तजेनीदण्डापसव्यं स भवेतद्विचित्रकः ॥ ४५ ॥
तजनी दो किरणं (१) दण्डान्तकिरणोदभवे । `
तजेनीदण्डापसव्ये क्तव्यः स सुखोचनः ॥ ४६
| [चन्द्रः |
चन्द्रिले विधातव्यः श्वेतः श्वेताम्बरात्रतः
दशभ्वेताभ्वसंयुक्त आरूढः स्यन्दने शुभः ॥ ४७॥
द्विसुजो दक्तिणे पाणो गदां बिध्रद् यथादरम्। `
वामस्त॒ वरदो हस्त इति चन्द्रो निरूप्यते ॥ ४८ ॥
ध [भौमः]
धरापुच्रस्य वद्यामि छल्लणं चित्रकर्मणि ।
चतुभजो मेषगमश्चाङ्भरसदहशव्यतिः ॥ ४६ ॥
| चतुद्रीरषु संस्थाप्या इत्यथः । 'चतुद्रीरेषु संस्थाप्या विशशरेते प्रदक्षिणम्” इति रूपमण्डने ( भ० ॥ ८
म, द्को० ३० >) पाहः । | |
४२-४६ । पञ्चरछोकष्या तेषां दण्ड्यादीनामायुघानि पूर्वाद््ियाः प्रादक्षिण्येन स्थितेः = |
प्रकारश्चाऽऽह-प्रतजन्युदध करिरणमिति । पाव्वेकल्यादकल्येनाप्यल्य यथाययम्थाविष्कारे नेदं |
सडक!
` दुष्परिष्काय यत् प्रतजेस्यादीनि अवयवसूषरूपेण वा आयुघल्वरूपेण वा दण्ड्यादीन् प्रतीहारान् = |
॥ विरिषन्तीति । तत्र पहरि दण्डिनो दक्षिणे पिङ्गलकः, दक्षिणद्वारे भानन्दस्य दक्षिणे चण्डकः, = |
| पश्चिमद्ररि चित्रघ्य दक्षिणे विचित्रः, उत्तरे किरणाक्षघ्य दक्षिणे खछोचन इति पूोक्तप्रदक्षिण- 0
४९-९० । अद्गारसद्शययुतिरिति जवर्द्गारगोरवपुरित्यथंः, तन्त्ान्तरऽस्य छोहितवणत्व- = |
शौरितिः त
ड `
[ इदस्यति-छक ]
वगुरुलैस्यः शुभ्रश्च भृगुनन्दनः ।
चतुभिर्वाहुमि॑क्तथिलकर्मविशारदैः॥ ५३ ॥
वरदो सान्तसृतो च कमण्डलुधरो तथा
दण्डिनो च तथा बाहू विभ्राणो परिकल्पयेत् ॥ ५४
ललम्यमातं (शोरि तिलसमाभासं ) एारूदं
णसंयुक्तं चापशूलधरं छिखेत् ॥ ५५ ।
५ ह्योक्तत्वात्। द््गमिति, इधो शक्षभूलम् । हस्तमिति अधोषहत्तम् । यद्वा इुल्लपदेनात्र
॥ ध श्ष्ठणयाऽोदेशो ग्राह्यः, दक्षिणाधोहस्तं वरदं परिकल्पयेदित्यथेः । पुरुतकं हस्तम्! इति शिल्परत्ै, `
शुद्र इति तद्धरं" इति ततपादरिप्पण्यां पाठान्तराणि इर्यन्ते । (शिल्प० उ० २९४४ श्ो०)1 = |
अयं शक्तिवराभयगदाधारीति शब्दकस्पद्रुमदतग्रहयागतत्त्व॑रजातकादयंः । 1
९२-९४। तुल्थबाहुत्वातुल्थप्रहरणत्वाच शदस्पतिष्चकरो तन्श्रेणाऽऽ्े-पीतं इत्थादि।
। करदावित्यादि ्िवचनन्तूमयािश्षया, एवं “बा इत्यत्रापि । परमा्॑तस्त्वनयोः प्रत्येकं चत्वारो ५
| बाहेवश्नत्वारि चाऽ्युघानीति ज्ञातन्यम् । एवल्रं बरोऽ्षसूत्र कमण्डलदेण्डशेति बहस्पतेस्तान्येव च॑ 1
चतुर्थोऽध्यायः ` 1. 9 ध
[ राः |
सहसनगत राहु करावदन रिखेत् ।
वरदं खटगसंयुक्तं खेटशूलधरं छिखेत् ॥ ५६
| [ केतवः ]
प्रा दिबाहवः सव वरदाश्च गदाधरः
ग्रपृष्ठसमारूढा लेखनीयास्तु केतवः ॥ ५७॥ `
[ प्रहमूर्तौः साधारणविधिः] ` 1
(य १ मोहाः किरीटिनः कुर्यान् (कार्यां?) नवतारप्रमाणकाः ।
रलकुण्डरकेय॒रहाराभरणभूषिताः॥ ५८ ॥ श
इति नवग्रहाः ।
वरदं वजाङ्कश् कमण्डलुविधुत्करप् ।
| गजारूढं सहखान्तमिन्द्रं पूवदिशि स्थितप् ॥ ५६॥
` - [श्निः].
वरदं शक्तिहस्तख भ्रणालओ कमण्डलुप् ।
प्रकरणाह् रह" इत्येव पाठः समीचीनतयाऽल्मामिर्मिधारितः। किञ्च यत्न “गृधाः इति पाड
इत्यनेन विहङ्धविशेषस्य गृध्रस्य द्वितालकत्वस्येव युक्तत्वात् ।
पतिदर्टन्या । 0
| : वरदः शक्तिहस्तश्च सष्णारुकमण्डटुः ।
ज्वारपुञ्चनिभो देवो मेषारूढो र ढ
_ ज्वालापुञ्जनिभं रूपं ( देवं १) मेषारूढं हुताशनम् ॥६०॥ `
` ५८॥ अच्र श्ृ्राःः इति शिल्परत्ने ( शिल्प उ०२९।१५७ ० » पाठः । बद्य्यन् 4 |
एकाक्षरविपरिणामरम्या पा्डद्धिः शया श्रहाशेत्युमयमेव युगद़बु्ावाविभावयति, तथाऽपि ` |
स्यात्तदा 'नचतारुप्रमाणकाः” इत्यजुपपनञ' भवेत्, दास्यां प्रोक्ता विहङ्गमाः" (रअ० ष्ठो ) = |
९९ वन्ना्कशमित्यर्त्यथःऽत् । एवम्भूतम् इन्द्रं वित्रविशारदाशित्रे इरयुरित्यध्याइरिण ` |
| दवितीयान्तपदानामन्वय । प्रथाथ द्वितीया 1 रेखकप्रमादादु निन्द्रोरकष्त्ररिति वेति सातन्यम् । | ॥ ॑ । । ॥ ध न |
६०। वरदमित्यादि । णाच कमण्डलुमिति दधानमिति बषः, चित्रे यंसित्यिव । ` ५ |
एवमुत्तरत्रापि यथासम्भवं दधानम् , दधानो वा, इर्यः क्रियेत वेत्याचध्याह्मरेण वाक्यानामन्वयोप- 6
इताश्चनः ॥ इति सूपमण्डने (रभ० ३शछो०) 1 ` ५ ॥
1 ७२ देवतामूतिप्रकरणम्
. : [ यमः |
लेखनीं पुस्तकं हस्ते कुट दण्डमेव च ।
महामहिषमारूढः कृष्णाङ्श्च यमो भवेत् ॥ ६१।
| [निक्दतिः]
का(कन्तंका ?)वेरिमस्तकम् ।
वटगखेटकहस्तथ क
` दंशाकराखास्यं कुर्याच् श्रानरूप (श्वानारूढथ!) नेक तम्॥६२॥ `
[वरणः] |
वरदं पाशपद्य् कमण्डलुन्तथा करे ।
मकरा(नक्रा)रूढय कर्तव्यं वरुणं पश्चिमादिशि ॥ ६३
[ बुः] ह
वरं ध्वजपताकथ कमण्डलुन्तथा करे । न
|
गजारूढं कर्तव्यं सोभ्यायां धनदं दिशि ॥ ६५
६२। धारारूढमिति शरारुढमिलं + अमतः श्वानकब्दोऽपि इुराथकः । ` भय खरारूढ
` इति काछिकापुराणम् ( अ० ७९, ६१ छ@ो० ) । वदषट्कराख्वदनः श्वानारूढश्च राक्षसः" ( सूप `
२अ०) इति छपण्डे पाठः। श्रावारूढम्' इति कारयपरिल्ये ( ४८।४७ ) पाठः । एवज ।
1 इ यद्यपि यथाकामं “खराखूढ' श्शवारूढग्योरन्यतमः पाडः श्ुद्त्थेनोपादातं शक्यते तथाऽपि साम्य कि | |
स्याट् रूपमण्डनपाऽसाम्याच बन्धनीमध्यस्थपाॐ एव श्ुदत्वेन निणीतः ।
| | ६३। ननक्रारूढः स कर्तव्यो वरणः पश्चिमाभध्रितःः (रूप० २ अ०) इति रूपमण्डने पाटः । 1
` यपि यादस्त्वाविरेषेण मकरो नक्ररेतयुभाषेव वरणस्य वाहनीभावे स्वरूपयोग्यौ तथाऽपि ` 1
` छन्दोऽलुकुरुत्वेनान्यत्रोपरन्येश्च नक्र इत्येव पाऽः श्युद्रसेन कल्पितः । वरणो हंसारूढ इति `
जलाश्चयतत्त्वएतहयशी॑पञ्चरा्म् । | । ;
६४ । चद्यपि तरोः इत्यत्र भर्टु' इति पाठ्कल्पनम् एकान्ततः कर्थनेव, तथाऽप्यथ- = `
| वैशयौदनन्यगत्या तथा पाऽः कसिपितः । निपुणः शब्द्म्यमुबध्य पागन्तरमयुखन्धातव्यम् ।
इति दश दिक्पालाः। `
यस्माद् बरह्मा वेदविद्याः समस्ता `
आदिदाद्याः खेचरा पिष्ट्यच्रम्। =
दिक्पाखायं व्यक्तरूप जातं =
(बन्धेषन्यो) षिष्णुविश्वश्ठक् पाट(कस्यः१ कोऽसो) ॥६७॥ ` |
इति न्तेत्ा(धवएतम)जसूरथुन्मण्डनविरचिते वस्तुशाख्े देवतामूसिप्रक्षरणे
रूपावतारे ब्रह्म-सूये-नवप्रह-दशदिकपाराधिकार-
श्तुर्थोऽभ्यायः ॥ ७॥ ध
|
६8 । मन्त्रिकोणके इति देवमन्व्रिणो बृहस्पतेः कोणे ईशानदिशीत्यः । 1
६७। यल्मादु व्रक्मादिभ्यक्तरूपान्तं जगन्नातम् असो विधस्क् पारकश्च ` विष्णु्वन् |
इत्यन्वयः । खेचरा ग्रहाः, धिष्व्यचक्रं नक्चत्रमण्डरम् , व्यक्तस्पं भूतलम् ।
चमेकरद्रजकानाथे नटस्य वरटस्य च ॥ ३
` मेदभि्टकिरातानां हृषीकेशः सुखाषहः ¦
` कुम्भकारवणिग्वेभ्यचाकिकाणां ध्वजस्य च ॥ ६ ॥
सर्वासां प्रक्रतीनाच पद्मनाभः सुखप्रदः! `
` दामोदरः सोख्यकरो बरह्मचा्येकदण्डिनोः ॥ ५ ।
हरिं हिरण्यगर्भ नारसिंहमतः परम्।
वामनथ वराह सर्ववर्णेषु सोख्यदप् ॥ ६ ॥
प थातो तोति जन ०००१५
५ २। एतेन मधुसूदनो वचिष्णुश्वाविरैषेण कषत्रियाणां वेर्यानान्न शुभदाषित्यायाति।
। | सूपमरण्डने पुनरन्यथेव ह्यते। तथाच-- `
१ मधुसूदनविष्णू च क्षत्रियाणां करुप्रदो । `
त्रिविक्रमो वामनश्च वेभ्याना(मचयच्छुभा † मच॑ने शमौ) ॥ (अ०३) ध
इति। एष एव च पाटो युक इति प्रतिभाति ।
३। बूदाणाननेति चकारा ब्रह्षत्रविक्ामपि उलप्रेत्यनुमीयते। सूपमण्डने ` पुनः =
श्वा सौल्यदायिनीःति पाठः ।
(८ . | ४। मेदो म्लेच्छनातिविशेषः, ध्वजः शोण्डिकः। अनर द्वितीया छम्भकारवबणिक- ५ #
| वेश्यचाङ्गिकष्वजिनामपिः इति छखबोध्यः पाठो रूपमण्डने । एवशचैतन्मते वैश्यानां मधुसूदन- `
| विष्णुहषीकेशा, सूपमण्डनमत प्निविकरमवामनहपीकेरः इुलावह इति स्थितम् ।
= पञ्चमप््यावः "4
[ अवस्थाभेदेन मूर्तीनां याह्याय्राक्यत्व
इ्भध्रा या मूत्तिः २ |
नखाभरणमालाख्रेभ॑श्रां तां न विसजयेत् ॥ ७ ॥
| [ विष्णोश्चतुविक्षतिमूत्तयः | क
सङ्कषंणो ग-शं-पा-चं ८?) दामोदरः प-्श-ग-च (: ?) ॥ ८
वासुदेवो ग-शं-च पे ८?) प्रद्यम्नश्चक-शं-ग-पः
विष्णुगेदा-प-शं-चकी माधवो ग-च-रह्क-पेः ॥ & ॥
अनुरुद्धश्च-गं-शं-पः पुरुषोत्तमश्च-पा-श-गेः।
अधोक्लजः प-गा-शं-चो जनार्दनः प-चं-श-गः॥१०॥ `
गोविन्दथक्र-गा-पा-(शं १ शः) त्रिविक्रमः प-गं-च-श८ ?) ।
श्रीधरः पद्म-च॑-गा-(शं ? शः) हृषीकेशो ग-चं-प-शोः ॥ ११ ॥
` नृसिंहश्च-प-गं-श(ख १ भ्व) अच्युतो ग-प-चक्र-(शम्!शः)।
वामनः शं-च-ग॑-पद्मर्नारायणः श-प१-ग-(च : ¢) ॥ १२॥
पद्यनाभः श-प-चां-ग उग्रः शं-ग-दा-च-पेः |
| हरि श-च-ग-पः पृञ्यः कृष्णः श-ग-प-चक्रभृत् ॥ १३ ॥
इति चतुविंशतिमूत्तयः।
मनात
त न भः 0 ४५५ 011
७॥। या स्थाप्या मृत्तिरङ्प्रत्यङ्गमन्मा तामिति योजना 1 विदोषः प्रथमे ( प° २२ ) दष््यः ।
८--१२ 1 आत्रयोदश््छोकमनयां षट्श्छोक्या विष्णोश्तुविश्चति मूर्तीः सह नान्ना सह
चाऽ्युयेनामिदधानः सकषषलुद्धधा आयुधानां पूण नामानुपादाय प्रतीकरूपेणाचाक्षरमत्रेण तान्या- ॥
भुतानि प्रतिपादयतीति रहस्यमत्र विभावनीयम् । अन्न छृतडद्धिषु पेषु प्रथमान्तानामायुघ- = `
पदानामादुधिसामानाधिकरण्यम् अस्त्ययैऽतप्स्ययात्। इतेष च विरोषणत्वात्ततीयेति द्रव्यम्| = `
(्ुचूदनः इत्यननातप्रस्ययान्तेन सह कमधारयः । तत्र तत्र बिन्दव आकारार्च छन्दपारन- = `
धतत्रता भपि बहुत्नाकारणङ्ृतप्रमाण इति विषीदामः । तत्र वास्येव प्रन्थकःतुगरन्थान्ते स्पमण्डने =
| आसामेव चठुचिशतिमूरतीनाुेखोऽविकटेनाऽधयुधनाश्चा वत्ते । तदरिनाञ्चेतानि प्धानि
छनोधानि स्युरिति खूपमण्डनीयपद्यान्थत्रोद्वयन्ते । तथा च रूपमण्डने वृतीयाध्याये-~ ` ८. |
केशवः (पदमशङ्कश्च १ प-च-शं -गश्च)मधुसूदन-८च शं -प-(गाः गः)
` कग
बाखदेवो गदारद्भवक्रपश्मधरो मतः । ` |
केदाचः कमर कम्बु धत्ते चक्र( फ)गदामपि ॥७१॥.
नारायणः कम्डुपद्यगदाचक्रधरो भवेत् । |
माधवस्तु गदां चक्र' शङ्क बहति पटलम् ॥ ८ ॥
पुरषोत्तमस्तु चक्र' पद्म ` शद" गदां दधत् ।
मधोक्षजः सरोषं गदां शङ्क छदशंनम् ॥ ९ ॥
सड्षंणो गदा-कम्बु-षर्सीष्ह-चक्रग्यत्
गोविन्दौ धरते चक्र' गदां प्चज्च कम्ञुना ॥ १० ॥
विष्णुः कौमोदकीं पञ्च पाञ्चजन्यं खदम् ।
मधुसूदनस्त् चक्रं शङ्क सरसिज" गदाम् ॥ ११॥ `
भच्युतस्त॒ गदापञ्चयक्रशद्सखेः समन्वितः । |
उपेन्द्रो बहते चहु गदां चक्रं शेशयम् ।॥ १२ ॥
प्रयन्नशच शह्कवक्रदास्मोजल्लानि पाणिभिः!
` च्रिषिक्रमस्न्रु गदाचक्रदाह्ान् बिभति थः ॥ १३ ॥
नरंसिष्स्तु चक्रान्जगदाकम्बुविराजितः। `
जनादेनोऽम्ुजः चक्र कम्ब कौमोदकीं दधो ।॥ १५॥
धामनस्तु श्चक्तगदापद्मरूसवकरः |
श्रीधरो वारिज चक्रं गदाश्च" दधाति च ॥ १५ ॥
अनिश रसचक्रगदाशद्भमरधिन्दवान् ।
हषीकेशो गदां चक्र" पञ्चशहम च धारथन् ॥ १६ ॥
पद्मनाभः पाञ्चजन्यं पद्च' चक्र गंदामपि ।
हामोदरोऽग्बज' शङ्क" गदां धते छदशेनम् ॥ १७ ॥ | |
हरिधारयते कम्बुं चक्र पद्य" तथा गदाम् ।
कृष्णः करेः पाञ्चजन्यं गदां प्म" खदर्ञ॑नम् ॥ १८ ॥
एताः छमूत्तयो जेया दक्षिणाधःकर-कमात् । इति ।
हदमन्रावभेयम्-रूपमण्डने अन्येषामिव केशवमधुसूदनयोरपि चत्वारि चत्वा्थयुघानि `
| निर्दिष्टानि, भत्र तु केशवस्य पद्श्वाविति दे, मधुसुदनस्य पुनः शद्पश्चगदा इति त्रीण्यादुधानि ` |
द्यन्ते! तत्र च सम्भवन्स्यामपि केदावल्य द्रैवाहन्यामाकृतो, मधुसूदनस्य त्रेबाहवं रूपन्त्व-
| नाकणितचरमिति छन्दोदोषभविगणस्येव बन्धन्यन्तश्कारः परकिपतोऽस्माभिरितिकेयम्। = `
| शूषमण्डने त्रैविक्रमं स्पं प्रबाहवं इभ्यतेः इष पुनश्रातबोहवमिति। कतरत् पुनरनयो- = `
धुं्तरमिति नावधारयामः। भ हयस्ति निममो यत् त्रयोऽस्य पादा ईति बाुभिरपिक्निभिरेव ।
॥ ८
॥॥
` पञ्चमोऽध्यायः ` ॐ
| ( प्रीक्तानामायुघानां स्यासक्रमः 1
` अधरं दक्लिणे हस्तमारभ्य खषटि(माग्रतः ? मार्गतः)
चतुविशतिमूर्तीनां स्वै(वेना ? वेवा)युधक्रमः ॥ १४ ।
[ अथ शाख्पामशिखापरीक्चा ]
[ आङृतितो ग्राह्यशिखारश्षणम् ]
नागभोगसमा युक्ता शिखा सूच्मा च या भवेत् ।
पूजनीया प्रयलेन स्थिरा ल्लिग्धा च वत्तेखा ॥ १५ ॥
मान्यमिति, न चापि वचतु्भिस्ताश्शमूत्येन्तरादर्लनात्। भ्यते हि प्रायेणारोकिकमूर्त
प्रतिपादं दवो द्रौ बाहू इति, यथा हिवविष्णुचतुराननादीनाम् । त्रिपादत्वे च--
“उ्वरस्त्रिपादस्तरिक्ियः षड्थुजो नवरोचनः 1?
इत्था दिस्षटतो ज्वरा्रादीनां पट्वरणत्वम् । यद्यपि इुराणादौ श्रयन्ते राणादीनामतिषादा = `
बाहवः परं न श्रयन्तेऽतिबाहवश्ररणाः । समबाह्वं द्विपदादौ इष्टमपि न त्रिपादादौ युक्तमिति `
विभावयामः । भल्तरन्यासक्रमविघायकश्टोकदशंनादपि चतुबाडुत्वमेवेषा प्रतीयते इति दि।
१४! प्रोक्तानामाुधानां विन्यासक्रममाह--अधरमित्यादि । चतुत्राहुमू्तीनां दक्षिणाधो-
` इस्तमारभ्य खष्टिमागंतः स्वभावक्रमेणाऽञ्युधक्ररो जातव्य इत्यथः । स्वमावक्रमश् आदौ ^
दक्षिणाधोहस्तस्ततो दक्षिणोर्वहह्तस्ततो वामाधोहस्तोऽन्तततश्र वामोध्वंहस्त इति । तथा = `
फकरेशवः पचदागश्चेति केशवस्य दक्षिणाधोहस्ते पञ्चम्, दक्षिणोध्वं चक्रम्, बामाधःशङ्कः, . `
वासोध्वें गदेति जेयम् , एवं सव॑न ।
१९॥ आ पञ्चदशश्छोकात् श्रिषष्श्छोकं यावदष्टाचत्वारिशता श्लोकः श्ाखग्रामशिकाया रक्षणं | | 1 |
दोषुणौ ग्ाह्ाग्राद्ते परस्परमेदाश्च निरूपितानि । श्ास्त्रान्तरप्रसिद्धान्यमूनि वस्तूनि कविदवि- `
कलपद्योदधपिण कविदक्चरमान्रपरिवर्तनेन, कचित् पद्परिवक्तनेन, कविहु भाषापरिव्तनतोऽथमात्रा-
दानेन चायं मन्थकारो यथायथमाजहार । एते च विषयाः प्रयोगपारिजातमत्स्यसुक्तादो स्छन्दाध्चि-
बरहम-्हमवेवतत-वाराहादिमहापुराणेषुचोपरभ्यन्त इति वीरमित्रोदयप्राणतोषणीरिलाचक्राथ-
बोधिन्यादिशंग्रन्थादिभ्यो जायते । जिक्ताछमिस्तत्र तत्राऽऽकरे संगरे वा दर्व्यम् । म युक्तं पुनरथं-
शास्त्रं व्याचिख्याछमिधंमंशास्त्रविषयमवलम्न्य विरेषेणाऽऽखोचयितुम् इति ततो विरमामः। `
नागभोगसमेति फणिफणाङृतिविरिष्टा, युक्ता उधरिता । न दुनर्नागमोगसमायुकतत्येक- = |
वचम् । (नागभोगखमाकारेऽति श्पमण्डने, “छत्राकारे'त्यन्यत्र च पाटः । स्थिरेति, भासमे यथा = `
स्थिरतया वत्तत तथाऽधश्चिपिदेत्यथः । तथाऽपि वत्तुला उभ्वंभागे गोरङ्घतिः |
सतय
3 [ प्रमाणतो ग्राह्वशिललक्षणम् |
तस्य मेवं सदा ष्मः धिया सह वस्तस्य] ) १६ ॥
यथा यथा शिला सृच्मा तथा तथा महत् फलम् । `
तस्पात्ता पूजय ध्मकासाथमुक्तये ॥ १७
[ त्याज्यक्षिछारुक्षणम् ]
` कपिला कर्वरा भन्न रुक्त निद्राकुटा च या ।
(रेषाङ्कषा!रेखाकुखा)ऽस्थिय ध्थुखा बहुचक्रकचक्रका ॥ १८॥
ब्रहन्मुती बृषचक्रा बद्धवक्रा च (चायुनः १ या पुनः) ।
बद्धचक्राऽ्थ(नामा? वा या) स्थाद् भिन्नचक्रा त्धोयुखी ॥९६॥
` दग्धा (सुरताघुरक्ता) चापृञ्या निषण्णा (पातिएषंक्ति) चक्रिका।
५ पूजयेद् यः प्रमादेन दःखमेव खभेत् सदा ॥ २० ॥
[ तच्च प्रतिप्रसवः 1
खण्डिता स्फुटिता भिन्ना पाश्वभिन्ना विभेदिक्षा।
शारिख)प्रामसमुदभूता शिखा दोषवा न हि ॥ २९॥
७ 0 +~
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५ १८ । शछोकन्यं प्रागतोषगीतस्कन्दपुराणे किञचिद्विकलमुपरम्थते! तन्न यथा पाठान्तरं `
श तथा श्रोकमध्ये बन्धनोचिह्वान्तयंथासम्भवं सन्निवेशितम् । |
रक्ेति--अविराच्छुष्करतां याति यस्यां खििन्तु चन्दनम् । सा र्केतिः रिष्लाचक्रार्थंबोधिनी
छतप्रयोगपारिजातोक्तरक्षणेत्यथेः ! अस्थिति आने ल्थिरतयाऽवत्तमाना 1 बहवक्रेति `
। प्रमाणाधिकचक्रशाछिनी, यस्याः शिलाया यावन्ति चक्राणि प्रमाणतः प्रकषानि ततोऽधिकचकरेति
1 1 £. यावत् । एकचक्रेति एकं चक्रकं यस्था सा, यस्या एकमपि चक्र क्षं तादश्ीत्यथंः । अन्यथ
। | जकचक्राया गराह्यत्वश्रवगात्। | 4.
चन्ान्तगंतच्क्रा,
१९॥। बद्धचक्ेत्यत्र रप्चक्रेति पाठः पुराणे । तत्रापि नास्यर्थान्तरम् । दृहचक्रेति `
` भ्वक्रेणाऽऽवृतचक्ना च बह्व प्रकीर्तिताः
ध ५ इति श्िङाचेक्राथबोधिनीरतप्रयोगपारिजातस्मरणात् ।
ध र ५ २१.६५ अत्र प्राणतोषण्यां सफुटितादिवजनीयशिरलश्षणमभिधायं-- त | ( ५ ध त 2. क न
[ वर्णभेदात् सरमेदनिरूपणम् ]
करी स्रा ष्णा कं ५ दा रि
[ वणभेदात् संज्ञाभेदः ] |
संहन्तु वामनं (चात ? पीत) सन्निभम्
वासुदेवं सितं जञेयं र्तं सङ्कषेणं स्मृतम् ॥ २३
दामोदर नीलाभमनिरुद्धं तथेव च ।
भ्यामं नारायणं (तैलं ज्ञेयं) वेष्णवं कष्ण (कषे १ वणकः
बहुवणमनन्ताख्यं (श्रीश )धरं पीतमुच्यते ॥ २४ ।
| [ चक्रप्रसाणम् ]
बु्रसूत्रेश्टमो भाग उत्तमं चक्ररन्ञणप्।
मध्यम चतुर्भागः कनीयस्तु लिभागि(कःकप् ) ॥ २५॥
तोतो ५००५० ००५५
[० तातन भ् न
“यत्त बरह्मपुरागे-- खण्डितं स्फुरितं भग्नं पाश्व॑भिन्न' विसेदितम् ।
श्ाठग्रामर्िरभूतं किञ्चिदोषावदहं न हि॥ `
इति वचनं ततस्वीयेष्टवक्रस्पतिपरम् । भत एव स्कन्दपुराणे--
| खण्डितं स्पुटितं भग्नं शाख्पराये न दोषदम् ।
दृ यस्य तु या मूत्तिः स ता यत्नेन पूजयेत् । ८
संपूर्य फरमाप्नोति इड रोके परत्र च ॥ इति हद्रवाक्ष्यम् । =
इत्युक्तम् । ` ध ध
२२। स्वेताश्यामयोविरेषपरमाह शिराचक्राधंबोधिनीतप्रयोगवार्निति-- =
` श्ुशिदधिपरदा यामा श्वेता सारिवकदापिनी ।' इति
२३} इदानीं वणंक्रमेण केषाञ्चन चक्राणां रक्षणानि निर्दिशति-कपिरूमित्यादि ।
लारसिहादिपदे तस्येदमित्यण् । नरसिषठचक्रमित्यथः। एवं वामनादिषु ।
२५॥ इदानीं चक्रप्रमाणमादेकेन-घ्तसूत् इति । चृतसत्रा्टमो मागः इत्यतिरोहिता्थः = `
पाहः] यल्य चक्रप्यं यहु बृत्तमानं तस्या्टमाशमितं चक्रम् उत्तमम्, चतुरंशमितं मध्यमम् ,
ऋ्यंछमितमधममित्यथः। एतेन यथासोस्थमेव चक्राणां शरेष्ठ्यमित्यायातम् । यथोक्तम्-- ` ` ् ५
त्राप्यामलकीम(ना सूष्धमा चातीव या भवेत् ( ९।१६ शको° ) इति ।
ऽध्यायः | ल..." §£
ठा
[त
(1 ० देवतामूततिप्रकरणम् `
अथ चक्र[षिगेष]खक्षणानिं | क
श | [ तत्र वाखदेवः |
द्वारदेशे समे चक्रे दश्यते नान्त (रायिके ! रीयके)
वासुदेवः स विन्ञेयः शुङ्धाभः स्यां(चा?)तितेजसा ॥ २६ ॥
८ | ` {खड्गः | व
` ्लोचक्रावेकलमनो द चके एकलगने) तु पूवेभागवस्तु पुष्क(खुलम्)। `
` सङकर्षणाख्यो विज्ञेयो रक्ता(भि ? भ)श्वातितेजसा ॥ २७ ॥ `
1 [ परय्नः | ध
प्रदयम्नः सृच्मचक्रस्तु पीतदीपिस्तथंव च ।
सुषिरं छिद्रबहुटं दीधांकारन्तु यद् भवेत् ॥ २८ ॥
| [ अनिश्ढः ]
अनिरुदवस्तु नीखाभो वत्तेलश्चातिशोभनः
ष्यायां?रेखाणाँ) लितयं (हार! दार) एष्ठं पद्येन खाग्ितप
1 [ एतेषां पूजाधिकारिः ]
` ब्राह्मणेर्वासुदेवस्तु नृपैः सङ्क्षणस्तथा ।
प्रयुम्नः पूज्यते वेभ्येरनिरुद्स्तु शूद्रकः ॥ ३० ॥
` चारो ब्राह्मणेः पृज्याश्नयो राजन्यजातिभिः
वेश्येदरविव संपूज्यो तथेकः शुद्रजातिभिः ॥ ३१॥
| २६। चक्रमेदान् विवक्ुर्वाखेवमाह--द्वारदेश् इति। नान्तरीयके इति चक्यं परस्पर
. छ्नमियथंः। अतितेजतेति विशेषणे तृतीया, भतितेज उपरूक्चित इत्यर्थः । ,
। . २७। टे चक्रे अग्ररघ्ने तु पूंमागे च पुष्करम् । सट्कषेणाख्यो वितेयो रक्ताभश्रातिश्लोभनः॥ `
इति प्राणतोषणी । पुष्करमिति र-र्योरमेशत् युष्करमिति जेयम्, पुष्करमाकालं च्िमित्येः । = `
२९॥ एता द्विवक्रा इति प्राणतोषणीतो ज्ञायते । 1
३० । एवं चत्वारि चक्राणि निरुप्य प्रसङ्धाततेषां पूजाधिकारिण आह--ब्राह्मणेरिति इभ्याम् ।
३९ । अत्रत्योऽयं शोकः; ॥ 4
" . शाख्प्रामाः समाः पूज्या विषमा न कदाचन । समेषु न दयं पूज्यं विषमेष्वैक एवषहि॥
| इति स्त्यन्तर्टतवचनस्यापवादविधया देमाद्राबुक्त इति वीरमित्रोदयान् ज्ञायते। अत्रचायं
` बा्ेवादिपूजाप्रकारः-- ` | 0
` पृश्चमौऽध्यायः _ ४ =
~ ४ ~
[ ्िवक्रर्ध्मीनाराचणः ] `
सूदन आख्यातः शलहा 1 परिकीसितः॥ 1३३ ॥ ~
[ दामोदरः ] १,
= व
व्ाहमेवौखैवः पूज्यते दस्ययमेषामस्नायारणोऽधिकारः वणं गुसत्वादिततरवरणसाधारण' वकरषरूनन- = ।
मप्यविशम्। एवं च्पैः सदधपंणः पूल्यते दति, भयमेषां कषत्रियाणां ब्राह्मतधारणो |
५ वन्यशूट्यवेश्षयाऽसाधारणोऽचिक्छारः ततश्च तैः सटू्वणप्यम्नाभिसद्ा पूजनीयाः । प्रयस्मः | ॥ ५ ५
पूर्यते वेश्ेरिरयेषां श्माघ्रपिक्षयाऽसाधारणो व्राह्मणकषत्रियसाधारणोऽपिकारः । पवन्न वैश्यैः =
1 प्रयम्नानिशधौ पूजनीयो । भनिददरस्वु श्दकरित्यथमेषां सवंसाघारणेऽधिक्ारः । तथाव--- ५
| = श्ैरेक एवानिरुढः पूजनीय इति परितो (1
| परंन हि चेहीना व्ोततमानां इतिमादृदीरननति न क्रवाछेवः ल्यः, न ठु वेश्येवीखेव- = |
। | सद््णौ, न च शष वाखदेवसङ्गपंणप्रद्म्ना इति । तदैवाहयो्रदलोके--चत्वार इत्यादीति! = |
| ३७-३८। एकवक्रे विशेषमाह-श्ुद्ध इति । एकचक्रस्य -छु्कादयः पञ्च सं्नाः ` |
देव्ता । र ॥ 1 |
४ बन् ५ देवतामुतिपक्षरणम्
क [ बणेक्रमेण तेषां नामानि |
| | [ थथाक्रममेतेवां दरम् |]
मो्तं मृत्य विवादश्च वारिद्रचमटनं तथा ॥ ३८ ॥
१ 0 हिचे चक्निबन्धनो विशेषः |
चक्रे तु मध्यदेशे स्यात्(छखा ! ता)माख्यामि रमे शरण
` परमेष्टचजितक्रोधस्तथा नारायणोऽन्तकः ॥ ३६ ।
अनन्तश्वदिति ? ति वि-)क्ञेयो नानामूर्िस्तु यो भवेत्!
[ यथाक्रममेतेषां फलम् 1
राज्यं सद्युः धनथेव हानिच वाञ्छिताथंकप् ॥ ४० ॥
ता ०५७७०५५
स्युरित्यन्वयः । व्र सहाः स्युधेःति स्यात् । यथाक्रमम् इत्यस्य परतरान्वयः । श्विवणं इति `
वतङिचिहुवणंदयवानित्य्ंः, वहुवणमाग् इत्यत्र च द्वययिक-यत्किन्निदवणंवानिति । यथाकम-
` मिल्यल्वर्थत्तु-श्द्वः पुण्डरीकः, रक्तः प्ररुप्बहः, कृष्णो रामः, द्विव वेङण्डः, बहवणभागे = ।
विष्वरकूसेन इति। एतेषामर्चनाफर्माह--एशर्च्चास्येति । यथाक्रममित्येव । तथाच
| पुण्डरीकाक्षाचने फर मोक्षः। एवं प्रम्बघ्ाय्चने ष्सयादयः । "अटनमि'तयनत्र अजनि
(पुराणे. पाडः । |
३९-४०। द्विवकरे विशेषमाह-चक्रे ल्विति। हिचक्राणां चक्रे यदि मध्यदेशे स्यातं `
तदा तेषां परमेष्यादिसंहा भवतिः करच्च राज्यादिकमिति वर्तंखाधैः ! नानामूिरित्यनन्त |
। इत्यस्य विशेषणम् । राज्यमित्यादिद्टितीयान्तपदानां ददातीत्यध्याहतक्रिययाऽन्वयो द्रष्टव्यः । .(
भ्रेदं विवेक्तः धरम्--प्राणतोषणीश्टतपद्यएुराणे 'वणचक्रादिभेदेन तानि नामानिचे शचणुः इत्युपक्रम्य, ८ 4
॥ छ (1 | | द्धो रक्तस्तथा पीत' इत्यादिसक्षत्िंशररोकादारभ्य राज्यं ए युम् इत्या दिचत्वारिश- ५८ |
५ लोकान्तो भाग कचित् क्षिञ्चिददशल्य योगविप्रयोगास्यामविकलो वत्तते । परं तत्न वण तश्चक्रतश्च ६.
। भिन्नतया द्विविधानामप्यमूषां शार्प्रामशिकानां राज्यं द्यं विवादन्चेशत्यायेकमेव कलं निणीत- `
| वमाह कात्वाऽचग्रनरःः इत्यंमधिकं वतते । तदनयो्णंमिन्नवक्रभिन्नयोः शाख््रामशचिखा- `
(1 व्गयोयुतफरताऽयुतसरूता वेति स्मा्त॑धुरीणा एव समादुधत्वितिं |
` पथमोऽ्यायः न नै
[च्नन्तराणि] 1
तक(पद्यान्तिका ! चक्रान्विता) या तु दक्षिणा १
` ?णावततं ) संस्थिता। `
च भोगमोक्ञप्रवा शुभा ॥ ४१॥
चक्रेण कम्बुना या च (पद्यनादि य शङ्िता? `
पद्येन गदयाऽङ्किता )
तल श्रीः प्यहं तिषठ त् (सत्त १ सर्व)सम्पदमादिरत्
लाज्छनेन विना (यस्य १ या स्यात् ) प्रशस्ता तु न
सा स्छरता ॥ २॥
[ हरिः ] |
चक्रं वा केवलं यल पद्यं वा(व्य्थं यद् १ प्यथवा) गदा।
खाङ्कलं बनमाखा च हरिलच्म्या (स हि ? सह) स्थितः॥४३ `
[ एततपूाफटम् ] 1
तस्मिन् णहे न दारिद्रय न शोको रोग भयपर्। =
न चोराधिभयं तस्य ग्रहे रोगेन बाध्यते।
अन्ते मोतो भवेत्तस्य पूजनादेव नित्यशः ॥ ४४ ॥ `
` विकटस्य तु किक्ता च्रसिंहसुखला्छना । 1
पाशाङ्कशगदाचक्रा्ये ! ण्ये)षामङ् न लाञ्छिता॥ ४५॥ `
नारसिंही भवेन्सुद्रा भोगमोत्तप्रदायिका। ६. क
` दशैनान्नभ्यते पापं ब्रह्महत्यां उ्यपोहति ॥ ४६ ॥ 1
तान
४१-४२। चा शिला एकचक्रान्वित 1, दक्षिणावत्तसंस्थिता चतुखंन्छनसंयु्ता चसा |
। भोगमो्षप्रेसयन्बयः चुरौन्छनेत्यस्य विवरणं कऋरेणेत्यादि । = `
ेवतामत्तिकरणम्
[ कपिलनृसिंहः |
उ्यमुरि सुक्तदो नत्र सशयः ॥५२॥
7 ४७ । अयं कपिलिवणं इति पद्यपुरणम् । तथाब-- `
कपिशो नर्धिहस्तु प्रथचको मह्मघरुखः।
१ ब्रह्मधर्थग पूल्योऽषौ त्रिबिन्दुः पञ्चवरिन्डुकः ॥ दृति
४९-९०॥ अयमङ्ुलाकार दत्यध्चिप्चादिषु ! = जयदुत्वन्चुभाषक्तो ननः? इत्यत्र `
। | श्वक्रभ्वजघमाघुक्तो नरः" इति स्यात्। एवच्च "नः पापात् प्रघुष्पतेः इत्येततद्ूनठो नर इत्यथैः । `
९२ अत्र क्रमभङ्गः सम्मव्यते । इयग्रीवात् परयेवातह्यं स्थानं निदेषटं युज्यते! द्यते ` |
पञ्चमोऽध्यायः ` ० : क
५.५ स्याचक्ं परमशोभनम्
नानाब्द्धिकस्थेतदन्नाथं चा्षयं भवेत् ॥ ५६ ॥
ष [जाम्याः]
चक्रमध्ये तु हभ्येत परशुः रामरूपकम्
। [ कोशल्यानन्दनः ]
` चक्रेण दृश्यते ब्रह्मन् बाणकामेकभृत् प्सुः ।
कोशस्यानन्दनो रामः (सीत
क्तत तोतो ततता णमा र५११११५१५१५१ ० ८ प
[ वामनः 1
१
भञ्येतेव । अभिम॑तश्च ऋमो भ्रन्थकर्तृरिति ष्यते, कथमन्यथा पूरव भृसिषदवयं निरप्यापि ` 0
युनवराहानन्तरं नृसिं निरूपयेत् । (1 श 0
९५ ॥ एकराजकमिति राज्यमित्यस्यं विरोषणम् , पुकच्छतं राज्यं सात्राज्यमिस्ययैः । ==
६९॥ नारिंहद्कितभिति नरसिंहाङृतिचिद्धेन चिहितमिंत्यथः । 0 ४
८.6 ९७॥ न्तल्नामद््यं चक्रं स्याद यजमानोऽपराङूसुखः' इति स्यात् । तावं चक्ररचंयन् = `
| जनः क्वचिदपि विषगरऽ्ृतङ्ृस्यो न भवतीति तदर्थः । 1 1
९८ । कौदालयानन्दनरामरक्षणमाह--कक्रेणेति । एतदश्चण' शिराचक्रबोधिनी- ` ८ (८
"पवार | १ ५८ ^
तायाः तृतीयः) परिकीतितः॥५८ `
4 वैवतमकरणम्
^ [ इडः |
तेन युक्तास्त् दभ्यन्ते पाषाणधृतरूपिणः।
र | [ कल्की |
(खडगा ! खडग्या)सनसमारूढः इगधातृखरूपवान ्
उभौ वक्रौ तु तत्नस्थौ स भवेत् पुरुषोत्तमः ॥ ६०
~ ~= क ~ "न~
ता न 0 म
चक्रोध्वं इश्यते थत्य तूण शाङ्खं धनुः शरः (१) । `
कौश्यल्यानन्दनो रामघ्तृतीयः परिकी त्तिः ॥ इति `
वतीय इति पूं शमो रामश्च रामशरेःल्युपक्रमादयं रक्षणक्रमेण वृतीय इत्यथः । अयं द्विचक
अनेनांगतोऽपीदं रक्षण" न संवदतीति प्रयक्चमेव सवषाम् । यच्च--
ह्ारह्ये चतुश्चको वामपश्रेकचक्रवान् ।
बाणतूणीरचापाद्यः सीतारामः खगन्वित्तः ॥
इति शिलाचक्राथबोधिनीषतव्रहमाण्डपुराणे पञ्चचक्रवम सीतारामण्श्चणः ततोऽपीदं दूरवत्तीस्य- = `
(य प्यतिरोषहितम् । यच्चापि तन्न तत्र षुराणे राम रामचन्द्रादिरक्षणघुपर्भ्यते तस्मादपीदं भिवत `
इति नवीनमिदं क्षणं कस्यापि । चयन्तु कोशल्यानन्दनपदमुपजीन्य सीतायाः इत्यत्र धृतीयः =
| | 0 इति विपरिवस्यं नामकल्पनं कतम् । इदमन्न ातव्यम्-रिकाचक्राथबोधिन्थाम्--
प्पीतः परञ्चुकोदण्डलाङ्खेन उरुक्षितः ।
रामो रामश्च रामश्च स्यो एरत्युहरः कमाद् ॥*
1 ध | 4 इत्यभिधाय थेवं रक्षणानि निरूपितानि । अत एवं कोशल्यानन्दनरामरक्षण निरपणप्रस्ताये
तृतीयः इत्युक्तम् । अत्र तु बरूरामलक्षणं नेव रुशष्यते ; तदयं मुदाकरप्रमादो वा स्याह
्रत्थकारप्रमादो वेति उधीभिनिणयम् । `
५९। इद्धरक्षणमाह -तेनेति । शिलाचक्रार्थनोधिनीषते वाराहे-- `
५ ` इयरन्प्रद्मयोपेतामन्तश्चक्रद्यान्विताभ् । = |
शिरःपुच्छोध्वंचच्च पाहवंयो्वाऽपि इश्यते ।
नानावणमयीञ्चापि इद्धमूतति प्रचश्चते ॥ ध
ध ८ 1 4 इतिं हविवक्रहुदरक्षणम्, पदमपुराणे च~; `
अनुगह्रलंयुक्तं चक्रही नं यथा भवेत् ।
निवीतबुद्रसंहः स्याहदाति परमं पदम् ॥
| ५ प ध ` इत्यचक्रञुदधरक्षणञ्च नतस्य तुल्ये इति द्व्य् । "पाषाणधतरूपिणः' इत्यल्यार्थं प्रकृतपा्ं वा व क
ध १ न विद्यः । | |
९०। अत्र स मवेत् बुर्भोत्तमः' इति स तेऽपि, पूर्वं इरषोचमस्य लक्षणं छिखितमिति ` । ष
पञ्चमोऽध्यायः =$.
[ चकव्रतिशनिषेधः ]
ध थ, ) ब्रह्मादयो देवाः स्वेभूतानि के
१ कम नास्त्यतः) ॥ ६१।
[ श्िटाचक्रविंक्रयादिनिषेधः ]
शालि १ ट)्रामशिलाया यश्चकसुदधाटयेन्नर
विक्रेता चानुमन्ता च यः परी्यानुमोदयेत् ।
सवं ते नरकं यान्ति यावदामूतसंछवम् ॥ ६२ ॥
[िखप्रकषंसा ] |
शा८लि! र)ग्रामशिलामे तु यो (जहति! जहोति) हताशनप्। `
एकाहतिहेता सम्यक् कल्पकोरिगुणोत्तया ।
एतस्मिन् पूजिते देवे व्रोखोकयं पूजितं भवेत् ॥ ६३ ॥
इति शालग्रामरिरपसैत्ता^ `
| [ मृत्तिविशेषाः ] |
तादयो मरकतप्रख्यः कोशिकाकारनासिकः।
चतुभजस्तु कत्तव्यो धृत्तनेवसुखस्तथा ॥ ६४ ॥
7 1 ० ~ 0 १.१.१५१
रक्षित इहापि द्विचक्र एव रुध्यते इति नंकस्येदं रक्षणं भवितुमहंतीति ।
खड्गी इति खड्गाकारर्लावानित्यथंः । शिखाच्राथंबोधिन्याम्--
अतिरक्त सृकष्मविषं स्पष्टचक्रं स्थिरासनम् ।
( कपाला १ पाणा ) कृतिर्चे ढै इरस्योपरि प्ष्ठकै । `
| म्ङेच्छनाश्ची भवेत् कल्की कलिकल्मषनारनः ॥ इति द्विवक्रकस्किरक्षणम् । , ` .
। प्रकृतग्रस्थे आक्षनघमारूड इति स्थिरासन इत्यस्प्रानुवादः । 'खड्गधघातृस्वरूपवान्" इतिं (६ [|
ठ मू्य॑मिप्रपरेणेति विभावयामः, कल्फिनः खडगधघारित्वस्य पुराणादौ प्रसिदत्वात्। =
६२ । चक््दधाटथेदिति संवतचक्रं प्रकाशीङ्यौदित्यथः । पुराणे तु भूल्यञुदावयेदिन्ति पटः । =
* इयं शलगामशिलापरौचा अप्रासङ्गिकीष प्रतिभाति। दपमण्डनेऽपीयमशतो वर्तते । शिष्परत्रः
काश्यपशिल्य-समगाङ्गणसूवधारादौ तु नामतोऽपि नौप्रलभ्यते। न युक्तं भिदिनासुपकाराथ ग्रयनिमौषु" |
्रहत्तसाऽऽजानिकं चक्र विशेषण लचयितुमिति ।
०५१०१. १५
अयं दशावतारोपक्रम इति च कल्किरश्षगेतरेदमिति निश्रीयते। न च सत्यपि पृहषो्तम-
रक्षणे चक्रमेदेनायमन्योऽपि पुरूषोत्तमो रश्यत इति वाच्यम्, पू्त्रापि ह्विवक्रपुषोत्तम एव॒
म = दैवतामूरिप्रकर्णम्
नवतालः भ्र क्तञ्या गरुड
पाद्( न करटि८?) य॑
किथि्टम्बोदरः कार्यः
मू ॥ ६८ ॥
4 इति पन्नगाशनः ।
उष्टवाहो्रेमतेरायुधानि वदाम्यहम् ।
नन्दकश्च गदा बाणः पद्यं दक्तिणवाहूषु ।
` शङ्खो धुस्तथा चक्रं खेटकं वामवाहुषु ॥ ६६ ॥
लिविक्रमो विहश्च दशतारो प्रकीर्तितो ।
वामनः सपततालस्तु विप्रमूत्तिः कचिद् भवेत् ॥ ७०
१ १११००५०५ म ५१०९१५७०. ५११११०५,
। | ६९॥ प्रभासंस्यानसौवगं इति प्रमासंस्थानाम्यां कान्तिदारीराम्यां सौवणेः छवणंमय
इव प्रतिभासलमानः। "करूपिन विवजितः इत्यत्र कटपेनं विभूषितः इति रूपमण्डने
(४७) पः । यद्यपि कपो मूषे वर्हः इति कोषान्मयूरपिच्छ एव कलापदह्दौ वतते.
` तथाऽपि पक्षमात्रार्थं एवात्र प्रयुक्तः । मूषणार्थस्तु न प्रसज्वते। मविवनितःः ग्विभूवितःः
इत्यनयोः कतरच्छष्यते दति नावधारयामः।
६६॥ द्विघेह वाहनानि विविच्यन्ते, एकं स्थितयोः प्रविमायाः, अपरसुपविश्षवाः । द्वितीय
मविपुनद्ट्धा भिचते, एकमेकष्मिन्नेव पादवं छम्विततचरणाथाः, द्वितीयन्चोभयोरेव पादर्वयो म्बित-
, चरणायाः । सङ्रने् पुनश्मीण्येव वाहनानीति । तत्र स्थिताया अर्वाया वाहनस्य दृष्टिः पादं यावत्,
शएुकपार्वंलम्नित्तचर्णाया जानु यावत्, उभयत्तौ छस्वितवेरणायाः कटिं यावदिति विपरिकः
तदेतदाह ग्रन्थकारः पादमिति। अचर पादपेन गुम्फपर्थन्तो मागो र्यते विभागसामथ्यात्
६७। कुभमपूणचेषयत्र 'पूणंङ्कप्मचचे त्युचितः पाशे सयसण्डने ।
| ६८॥ बहुश्च मगवान् दति यदुवंकीयो मगवाद् श्रीङ्कष्ण द्यः ।
` भ्यादवो भगवान् पृष्ठे छत्रकुम्मधरो हरिः, इति शूपमण्डने विस्रः पाडः । =
। ~ ५०॥ अन्न मर्स्ययुरणम्-- , `
दकता सभरतो रामो अदिवरोचनिस्तथा
वाराहो नरसिंहश्च सक्ततारुस्तु वामनः ॥ इति (२९९ अ० १२ श्रो) `
पश्चमौऽध्यायः क =
कृष्णाजिनोपवीतः स्याच्छली (कृत ! धृतोकमण्डलुः।
कुण्डली शिखया युक्तः कुञ्जाकारो मनोहरः ॥ ५१।
इति वामनः ।
समस्तु हिज रम्यः शरवापधरः प्रभः ।
इति रमः।,
(महा ? नूवराहं प्रवत्यामि शुकरस्येन शोभनप्। `
गदापद्यधरं धात्रीं दंाग्रेण ससुद्धुताम् ॥ ७२ ॥
विन्रा(णा ? ण) कृषं रे वामे विस्मयोत्फुष्लोचनः
नीरोत्षलधरां देवीसुपरिषटात् प्रक्पयेत् ॥ ७३
4. : दल्िणं कटिरसंस्थथ बाहू तस्य प्रकर्पयेत् !
७९। शेष इति । शविताञ्चछिरिल्यनेन नेदं स्वतन्त्रस्य होषल्य शक्षणमपि तु नृवराहङ्ग- = `
तया तद्र कतंव्यस्येस्यायाति । अन्यथा वृवराहरक्षणमभिधायान्तरा शेषः रुक्षयत
पुनन् वराष्टग्रकारान्तरकथनमनुपपन्नं स्यात् । शिल्परल्ने क्ोषलक्षणमपहायेव दृवराहस्य रश्षणद्ितयं
छिखितं इश्यते ( श्षिल्प० ० २५ अ० ११२-११६ शछो० ) ।
मतल्यपुराणे पुनः किञ्चिद् विलश्चणमेव रृवराहरश्चषणमिति तदत्र प्रदश्य॑ते--
महावराहं वक्ष्यामि पद्महस्तं गदाधरम् ॥
तीर्णदंषप्रघोणाल्वं मेदिनीवामद्धपरम् ।
दषटाप्रंगोद्धतां दान्तं घरणीयुतपलान्विताम् ४
विस्रयोतूपफुष्छनयनासुपरिव् प्रकल्पयेत् । |
` इष्षिणं कटि(इस्त १ संस्थ)च्च करं तस्याः प्रकल्पयेत् ॥
` क्मोपरि तथा पादमेकं नणेन्द्रमू्धनि। |
संस्तूयमानं रोकेशेः समन्तात् परिकल्पयेत् ॥ इति । 1
५, ( मतस्य० २६० अ० २८-३१ रछो* )।
^ क | देवतामरि्रकरणम्
[ प्रकारान्तरम् 1
` अथवा शूकराकारं महाकायं कविष्टिखेत्
तीच््णद्ोग्रधोणास्यं स्तव्धकणाध्वयोमकप् ॥ ७६ ॥
। इति नरवराहः । व
नरसिंहाङृतिं व्ये रोदसिंहसुखेक्लणाप् । त
भ्रुजा्टकतमायुक्तां ध्वजपीनसटाधिताप् ॥७७॥
हिरण्यकशिपु देत्यं दारयन्ती नखाङ्करेः
उरोरुपरि विन्य(स्त {स्य)खडगखेटकधा(रणा ! रिणेम्
| (तथा. 0 तस्य (न्त्रमाडख निष्छरष्यं बाहूयुग्मेन पिश्र र य|
आकारं पुरु(षाकस्ये ! षस्येव)धारयन्तीं मनोहरम ॥
मध्यस्थिताभ्यां बाह्यां दक्िणे चक्रपङ्कजे
कौमोदकीं तथा शङ्खं बाहुभ्यामिति(नामतः वामः
अधःस्थिताभ्यां बाहुभ्यां दारयन्तीं श्रकल्पं
येत् ।
उध्वंस्थिताभ्यां बाहुभ्यामन्तमालां तु विश्रतीम् ॥ ८१
नीरोत॒पलदलच्छायां चचम्पकसप्रभाम्
त्तकाजनसङ्काशां बालाकंसह(शां शी) लिखेत् ।
नण तामा माजन
५६। शस्कन्यकणो््वरोमकम्, त्यत कन्धकरणोधवरोमकम्, इति शिलपरते (रद अम
११६ छो° ) पाडः । 0
५७। रोद्सिहयुतेक्षणामिति मीषणसिंहयुखनेतरतुसययुलनेव्ाम् । भौद्रपिङ्गयुचे्षणाम् इति =`
| शिस्परत्नपाद्रीकाषतं पाञन्तरम् । ध्वजपीनसटाभ्रिताम् इति ध्वजल्थरकेररधारिणीमू । = `
श्तम्मपीनः इति शि्परत्ने, ^स्तन्धपीन' इति ततपादटीका्ां पाडः ।
७९। आकारमिति, खुखदेधस्तात् पुटषाङ्तिवदाृतिमिस्यथः। रिल्यरत्ने इदमर्थ
॥ | | ८ नास्ति । ( शिष्प० ॐ० २५ अ० ११७-१२० शछो° 0
` ८१।. भत्र दरणान्त्रमाराधारणयोरयुवादो बाहुविरेषनियमार्थः । शिल्परत्ने अयमपि
९२। अन्न वीरो गोल परेतयादिविशेषणत्रयं पक्षान्तरथोतकम् । “अथवा चस्पकप्रमामू = `
,
कमेष्यायः = 1
[ प्रकारान्तरम् 1
आसीनं द्िभुजं देवं प्रसन्नवदनेक्षण ।
स्फटिकसङ्काशं चतुर्बाहुमथापि वा ॥८३।
द्ाजानुरम्वित बाहू कन्तंउयो तत्र दक्लिणे
समीपे कल्पयेखकरं वामे शेषं समीपतः ॥ ८४ ॥
ऊध्वेस्थिताभ्यां बाहुभ्यां दक्षिणे पङ्कजं न्यसेत् ।
वामे बाहो गदा रम्या(लिनात् भ ? छिखेचिल)
विशार८दः ? दः) ॥ ८५
` इति नरसिंहः ।
जटखमध्यगतः कायः शेषः पन्नगदशेनः
फ़णाम्बुजमहारल `` शिरो(धतः ? धरः) ॥ ८६
इति लिह्परत्ने ( उत्त₹० २९ अ० १२० शो० ) पाष्ठः । पुराणे तु वणंकान्त्यादिविषये किमपि
नोक्तम् । विशेषतस्तु तत्राऽऽ्नुषङ्धिकं मूच्येन्तरमपि कल्पितं इयते । तथा च मावक्स्ये--
नारसिहन्तु कतंन्यं भुजाष्टकसमन्वितम् ॥ ` |
रोद सिहा(खनं १ ननं ) तहवदिदासियुखेक्षणम् ।
ल्पन्यपीनसशाकणं दारथन्तं दितेः छतस् ॥
विनि्गतान्त्रनाल्च्च दानवं परिकल्पयेत् ।
( मसन्तं १ मषन्तं ) रुधिरं घोरं ध्रङ्टीवदनेश्षणम् ॥
युध्यमानश्च कतेभ्यः कचित् करणबन्धनेः ।
परिधान्तेन दैत्येन तज्यंमानो सहसः ॥
दैत्यं प्रदेशंयेत्तत्न खडगखेटकधारिणम् । ५
स्तूयमानं तथा विष्णु ' दक्षयेदमशधिपेः ॥ इति `
, (स्ष्मन्दह्-रष्ो)। =
८३-८९। विशेष्यानुद्ध लात् कल्य लक्षिकेयं शोकत्रयीति म प्रतिपथामषे । नेयं नरसिं्ट- |
छश्णत्येनोपलभ्यते शिल्परत्ने । खिवेचिन्रविक्षारद् इत्यत्र वाक्याथंः कम ।
` ८६। भवं पूवं( ७९ शो० )खक्षिताच्छेवाद्विक्िष्यते । अत पुव पन्नगद्श्चन इत्युक्मर् । ` | | | | |
॥ (णास्बजमहारत्ने- = `
गतत्वेनाच्ययं ` धिश्षिष्यते शिष्यते
( ३य^खभ्ड० ) तथा वा |` , ध
पन्नगदशेन इति सपांृतिरिस्य्ैः । जलमध्यगततव
त्यनन्तः शुनिरीकष*ति पतितं स्यात् › विष्णुधमोत्तर
न
1 यकम
` सन्तानमः तथा चेवापरो भवेत् ॥ ८९
` नाभीसर(सःसि)सम्भूते कमले तस्य याद(वः १ व)
(नीर? नाल )रस्नो च कत्तव्य पद्मस्य युक भ। ॥६०॥
वे कुण्ट् प्रवच्यामि (धृष्!साष्टोबाहु म
` ताच्यीसनथतुवक्त् कर्तव्यं शान्तिमिच्छता ॥ ६१॥
गदाखडगो बाणच(को ? के) दक्िणाञ्जचतुषटयम् । $
शह्खलेटधनुःपदयं (वामदं्ाएवामे दधथाच्)चतुष्टयम् ॥ ६२
अग्रतः पुरुषाकारं नार
1 पितोता ७
4 ९० । विंष्णधमोत्तरे ( खे० ३, अ० ८१ ) पद्मनाभीयत्वेनेदं रुक्चणञ्ुपरम्यते, च्यादवः
श्रपरं ख्रीमुखाकारं बाराहास्यं तथोत्तरप् ॥ ६३ ।
४ इति वैकुण्डः।
ति ता ००११००५,
1 इति सत्र बोद्धन्यल्य भगवतः सम्ब्रोधनमिहाविकशशुद्धितमिति कान्यम् ।
९१। शान्तिमिच्छता कर्तन्यमश्टबाहु' वेङण्टं प्रवकष्यामीत्यन्वयो व्याहूरणसंस्कारायातः ।
गवङुण्ठच्च प्रव्यामि सोऽ्टबाहुमंहाबर ध
५ ॥ सा्यासनश्चतर्व्ूः कतन्यः श्रान्तिमिच्छता ॥* =
| ५ इति शूपमण्डने ( ३ अ० ९२ कको० ) ।
९३। अग्रत इति । पतच वेकुण्ठल्यं चलुणामाननानां विवरणम् । तत्र अग्रत इति `
अग्रव सुखं परषाकारं परषसुलतुरयम्, दकिणं युख' नारिं नरसिंहयुखतुल्यं सिंशस्यवदिति
भावत्. नरलिंहल्क्षणे 'रोद्रसिंदसुसेक्षणाम्? ( ७७ श्छो० ) इत्युक्तेः । अपरमिति पश्चान्युल- ` ५
। भित्रथः। वाराहास्यमिति ऋकू राननम् ।
य
पञ्चमोऽध्यायः ६ ३&- `
तस्य चानुकरमं वये (विश्व ! जल (क
यु ? कयु )तपु
पताक ?)शङ्खो च हलं वजमङ्कशसायको ।
चक्रं तुङ्गश्च षरदो दक्लिणेषु करेषु च ॥ ६५॥
पताकं ? का) दण्डपा(शच ? शो च) गदाशाङ्गविधरतकरम् । | | | |
पद्म( {शू खो १ जी) च कुसुदमन्तमाला तयेव च ॥ ६६॥ `
योगसुद्रा करयं ? इन्दे) वेनतेयोपरि स्थितप्र्।
नर्च नारसिहञ्च (ततीय!खीसुखं) शूकराननम् ॥ ६७ ॥
| व इति विश्वरूपः । _
प्ननन्तानन्तरूपथ यस्माद विभ्वं 7 श्व)समुद्ध(वम् ? वः) ।
अनन्तशक्ति(मा ! सै)की्णमनन्तं ? न्त)) रूपसंयुतप् ॥६८ `
संयुतं ढादशयुजेश्चतुवक्तमहोतसवम् ।
सुपर्णकैतोतराखं!स्कन्धमारूद) कर्तव्यं सर्वकामदम् ॥६६॥ `
लाता मा ५५
९४ । यदपि श्वि्षत्था हस्तकेयुतम्ः इत्येव समीचीनः पाठः, तथाऽ्ष्यक्षरसाम्यमयुकद्य = `
“विशद्धिरिति कृतम् । भूरिप्रयोगश्रायं विंशष्च्छब्दसित्रशदादिक्षन्देवत् पुराणादिषु, वंचनविपयंयोऽपि
नगण्य एवेवंविधनिबन्धेष् । 'विं्चत्या हस्तकयु क्तो विर्वरूपश्चतुसु खः” इति रूपमण्डने पाटः । |
| ९७॥ नरञ्नेति। यथाश्रतपि तु विश्वरूपस््िविध इत्यायाति । अत्न च विश्वल्पल्य = `
भ्ुखसङल्यादसंनात् सम्मवदपि तत्य त्रैरूप्यं तन्त्रान्तरविरोधीति कृत्वा परिहितम् , पाठान्तरञ्व क |
कल्पितम् । भत एव सूपमण्डने-- . `
विंशत्या हस्तकयुं्तो विश्वरूपश्तुसंखः।
पताका हरशद्कौ च वन्नाङ्ङुशन्तरास्तथा ॥
चक्रञ्च बीजपूरञ्च वरो दक्षिणबाटुषु
पताका दण्डपादो च गदाज्ञाज्लंतपलानि च ॥
` श्ङ्धी मषलमक्ष्न क्रमात् स्थुबामबाहूषु ।
= ल
गव!
गदाखड(गं ! गो) तथा चक्र कं वजार (क ॥ शौ
शङ्कखेटौ धनुः पदां दण्डपाशावनन्तकः ॥ १००
नरं तथा नारसिंहं (ततीयचीमुखं) शूकराननप् ।
तेजःपुज्जोदभवं कायमनन्तं नाम नामतः ॥ १०१
इत्यनन्तः |
लैलोक्यमोहनं वच््ये संसारमोहकारकम् ।
` षोडशे युजास्तस्य ताक््यारूढं महावटम् ॥ १०२ ॥
गदाचकराङ्कशान्येव बाणशक्तिसदर्शनम्। `
वरदं करसुद्धृत्य शचा वे दच्ति(णस्त!णे त)था ॥ १०३ ।
मुद्गरः पाशशाङ्ख तु शङ्क८) पद्मकमण्ड(लु ? लू) ।
श्वी च वामहस्ते स्याद् योगमुद्रा करद(यप् ? ये) ॥१०४॥
नरथ नारसिंहाख्यं शूकरं कपिङाननप् ।
हिशक्तयषटशक्तियुतं कुर्यात बररोक्यमोहनम् ॥ १०५॥
इति भैलोक्यमौहनः ।
नि पि 101
हृत्तद्ये योगमुद्रा बेनतेयोपरि स्थित |
क्रमान्नरमृखिंहखरीवराहमुषखवन्पुखः ॥ ( ३ अ० ९५-९८ शको० )
| | 1 ५ इत्यस्य विश्वरूपस्य चतुमखत्वं वदुण्टवत् प्रकारमेदभ्च प्रतिपादयति । भूरे तुङ्गरित्यन्न
छङ्कमिति स्यात्, नामेकदेशे नाम इति मातुद्गमित्यर्थः । `
१०१॥ अत्रापि विभ्वसूपवदु व्यवस्था । यद्वा उभयत्रापि वृतीयमिन्ति शख्ीयुखमित्त्य-
| | स्यादुकषणाथम् , एवज्न शीलम्, इति बन्धनीमध्ये पाशन्तरकल्यनं लाभम् । रूपमण्डने `
खस्य विवरणं नास्ति । शूपमण्डनेऽनन्तरक्षणम्-( ३ अ० ५८.९९ को० ) = ` |
अनन्तोऽनन्तरूपल्तु इस्तेदौदक्चभियुतः । |
अनन्तशक्तिसंबीतो गश्डल्थश्चतुमखः ॥ == `
दक्षिणे तु गदाखड्गो चक्र' वलाङ्धशे श्वरः ।
| श्भुः खेट धनुः पद्म दण्डपाद्लौ च वामतः ॥ इति
१०२-१०९ । अन्न ्रेरोक्यमोहन्य षोडशाः
~ योगमुद्ेति वनराः । शरद्धी योगेन.पवंतसभिधन्त ५ वते ।
डानां थुंजानां चतुश्च यथोक्तास्यस्त्राणि कषये (1 |
पञ्चमोऽध्यायः ५ ९४:
ई ने स्थापयेद् विष्ण॒माग्नेय्या्च जनार्दनम्
छ स्ये पद्मनाभ वायव्यां माधवं तथा ॥ १०७
केशवं मध्यतः स्थाप्यमथवा वासुदे( वं करम् ! वकम |
सङ्क्षणप्रथम्नो चानिरुद्धथ यथाक्रमम् ॥ १०८ ॥ `
जलशायी तथा षोक्तो दशाषतारसयुतः
शूकरश्चा्रतः स्थाप्यः सवेदेवमयः शुभः ॥ १०६ ।
इति विष्णायतनम् ।
प्रतीहारांस्ततो वच्ये श्रो चतुषं दिज्ञु च ।
तस्यानुकमरूपश्च छन्तयेद् यस्य याटशप्र् ॥ ११० ॥
` बाभनाकाररू(प ? पा)श्च कत्तेव्याः सर्वतः शुभाः
तज॑नीशङ्कवकरं चेदं प्राग् दक्षिणक्रमात् ॥ १११ ॥
(द ? चोण्डाभिधानकः प्रो(्ता शल्ला ? क्तोऽस्या)पसव्ये
४ प्रचण्डकः। `
वामे चण्डः प्रकर्तव्यः प्रचण्डो दक्षिणे तथा ॥ १९१२ ॥
मा था ताजा ००५८०.
१०६। गोविन्दः पश्चिमे स्थाप्यः इति रूपमण्डने ( ३ अ० ६३ शो ) पाटः ।
१०८ । केशवो मध्यतः स्थाप्यो वाखेवोऽथवा बुधैः । ` 8
` संड्षंणो वा प्रचुशोऽनिरुढो वा यथाविधि ॥* इति रूपमण्डने पाठः ।
११९०। यत्य प्रतीहारस्य यादशमनुक्रमरूपं भवेत् , तस्य॒ तादरामनुकरमसूपं रक्षयेत्, 1
व्यमाणरक्षणत इत्यथः । अनुक्रमः हस्तेषु वामदृक्षिणादिक्रिमेण उदधौचःकमेण बाज्ञाणां ४ ४ १
स्निवेशपरिपाटी । रूपम् आहृतिः । | | +
(५ १११। (तजनी शङ्खचक्र च दण्डं प्राग् दक्षिणक्रमात्' इति स्थात् । एवमेव रूपमण्डने ` न
“रदः (३ अ० ६८ शो० >) । ५ | 1
| | ११२॥ 'भषस्ये प्रनण्डक इतयुकयैव सन्ये चण्डक दति भ्यते ; एवच्च वामे चण्ड =
1 ` इत्याचुवाद्कमद् इखाथम् । बद्वा, सन्यशन्दस्य वामदक्षिणोभयवाचित्वेन अपसन्यज्ब्दूस्यापि = ` |
य न त = स न --- स ल ~
1 | 0 4. देवतामूत्तिष्रकरणम्
य 0 णा)
११९
[|
सत्तः प्रमाणगणनां गरुडध्वजस्य `
ब्रह्मादयोऽमरगणा न हि ते समथां
विश्वस्य पारनविधो बहुधाप्रकारं
स्पाणि यस्य विचरन्ति स पात विष्णुः ॥ ११६ ॥
इति विष्णप्रतीह्याराः।
इति ्तेवारमजघू्भृन्मण्डनविरचिते वास्तुशास्त्रे देवतामृ्तिप्रकरणे
विष्णशाल्ग्रामशिलपरीन्नादिभेद्ाधिक्षासे नाम
पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥ `
मममत नतानि जा ००५५००८००५
` तथात्वाचण्डो वा दक्षिणे प्रचण्डो वेति भ्रमः शिष्याणां मा भूदित्यसन्दिग्धार्थमुत्तराडमिति
क्ञादव्यम् ।
१९३। विछोमेः पश्चगदथयोरिति ; जयत्य वामोध्वरादिहस्तेष् कमात् पञ्च खड्गः सेरकं
1 गदा चेत्यादुधानीपति पूरवाधस्याथंः । ततश्चषामायुधानां पञ्चगदयोवरोम्येन विजयत्याऽऽ्युधं भवेत् `
| इत्युत्तराधस्याथः वेलोम्यज्च पूरं गदायाः पश्चाच पञ्चस्य सन्निरशादिति ज्ञेयम् । एवच्च “विरोमे
` पञ्चगद्योविजयो जयदक्षिणेः इत्येषो चितः पाठः । |
९४-१९५॥ अनयोरपि गदाया एव सन्यापसव्ययोगेन उपवस्थेति द्षवयम् । `
षष्ठोऽध्यायः
शुद्धाम्बरधरं देवं शुङ्कमात्यायुलेषनम्। `
जटाभारसमायुक्त' बालेन्दुङ्कतशेखरम् ॥ १।
विलोचनं सोम्यमुखं कुण्डलास्यमलङ्कतम् ।
दिव्यदेहं महाकायं नवयोवनमण्डितप् ।
महाज महोत्साहं वरदाभयपाणिनप्॥ २॥
इति सयीज्ञातः |
तास जोरि ११५१८१११ ००००५८५.०५.-०
१-२। पञ्चमाध्याये वेष्णवे अरोषविरेषा विष्णुसूतीरभिधाय श्िलिपक्रियाऽविषयमपि
शिलाचक्रं प्रसङ्गतो लक्षयित्वा षषटेऽध्यायेऽबक्षरप्रापं शेवं रक्षयन् भाद सथ्योजातमाह-- ८
छक्वाम्बरधरमिति । इतः प्रति ्ितीयान्तानां पदानां 'यौदि'ति वा "कारयेदिति वाश्या- =` |
इतक्षिययाऽन्वयः काथः । सबागरेता मूर्तयः शिल्परले ध्येयत्थेन निरूपिताः । तन्मतमनु्द्भस्त॒ = ध
श्यापेदि'त्यध्याहतन्निययाऽस्वयः समाधेयः । प्रथमाघोरव्यतिरिक्ताड सदारिवान्तास्वाइ मूर्सिषु ध ध | |
अघ्या इदं रक्षमभित्यत्र पुष्पिकेव केवष्ट प्रमाणम् । ४
धिल्परकले-खधोजातवामदेवाघोरततपुद्बाणां समाक्षतः श्रोकद्रयेन वणनसुपरभ्यते । तथाव
तन्न अथ सद्योजातादिमूर्तयः' इत्युपक्रम्य--
सयो वेदाक्षमाराभयवरदकरः इन्दमन्दारगोरो
वामः काश्मीरवर्णाऽभयवरद्परश्वक्षमारो विखासी ।
` अक्षलग्वेद्पालाङ्शडमस्कलयाङ्गदरूान् कपालं
शिश्राणो मीमर्द्रोऽञ्जनरविरतनुरभीतिदश्राप्यघोरः ॥
` विदयदुवर्णोऽथ वेदामयवरवङकुधरान् दधत् पूरषाल्यः `
प्रोक्ताः सव त्रिनेत्रा वि्टतमुखवतष्काश्चतुबीहवश्च।
सुक्तागोरोऽमयेशथिककरकमलोऽधोरतः पञ्चवक्त्- `
स्स्वीशो ध्येयोऽग्बुजन्मोद्धवमुररिषुर्दरेश्वराः स्युः शिषान्ाः ॥
। स । 1 ( क्षि° उ० २३ अ० २०२-२०६३ छो° |
इत्युपनिवद्म् । पएतेनेतन्मते भधोरोऽटयुनः रिष्टाश्चुबाहव इत्यायाति । प्रकृते विप्रचद- = `
आयुधानुमितमितरेषां द्विकरत्वन्तु ` ८
मनेष्वप्यायुधनामष्ठ संवंदत्येवाघोरस्याष्टयुजत्वम् षः ¦ | ।
स्ाकरमवकरो वेति विद्रइभिविभावनीयम् ।
देवता--१२३
॥
योनिशं ¢) कटिसूत्र इथिकामालिका गले
` नीरोतपलदलम्याममतसीपुष्यसन्चिमम्
पिङ्गर पिङ्घनरिलं शशाङ्ककृतरोखरम्॥ ८
तक्तकं पुटिकथेवं पादौ च नूपुर कृतो)
अधरस्य स्वरूपषन्तु कालरूपमिवापरम् ॥ & ।
महावीयं महोत्साहम छवाहु महाबलम्
वासयन्त रिपुबलं निवेशो यत्र भूतले १० ॥
ताता
६॥. 'दष्टकरादटबदनम् इत्येवं छते छन्दोह्ानि युनहक्तिश्च परिहृते भवतः । र्डमारैति, १
7 र रुण्डं कबन्धः, 'कषत्धो रुण्डमुच्यतेः दति हारावरी ।
७। योनिश्चमिति इरहा्थस्यास्य पदस्य पायान्तरमनुलन्पेयम् । वृश्चिकेति दीर्घत्वं 0 ५
| छन्दःसौन्दयाथम्। `
८ । अतस्ीति घुमापुष्पं नीलवणम् । ध ८ | 1
९ । तक्षकमिति । अन्न "तक्षकः पुष्िकश्चैव पादयोर्न पुरौ ङतो" इति इश्िष्ार्थकः सम्माव्य- `
मानः पाटः। पुटक इति सपविरोषल्य नाम, तक्षकः प्रसिद्धः ।
| जयन्तम! `
१०। निवेशो यत्र भूतले इति । यत भूमागे देवस्य निवेशः स्थितिल्तत्र रिषं `
अहदभाखकपाटं च कण्टभ्रीवासुशोभित
। चतुभज महाबाहु शूलपङ्कजधरतकरम् ।
| दिव्यरूपधरं देवं वरदाभयपाणिकः
। पस्तकाभयहस्तश्च वरदाक्तं दिलोचः
पीताम्बरधरं देवं पीतयज्ञोपवीतिनप् । ¢ ।
६ करे वामे अत्ञसूलच वा कि ॥१३॥ `
मातुल ((२॥) खः
_ इति तत्पुरः ।
शद्धस्फटि कसङ्गार जटाचन्द्रवि भू। षितप्र्।
श्यत दन्ते लिशूकश्च वामहस्ते कपालिनप् ॥ १९
इतीशः।
कंपालमायिनं श्वेतं शशाङ्ककृतरोखरम्
उयाघचमेधरं भद्रं नागेन्द्रास्तनभूषितप् ॥ १५ ॥
त्रिशूलं चान्ञसूलश् कारयेदक्निणे करे! `
कपालं कुण्डिका पाश योगमुद्रा करये ॥ १६
र्कवक्त विने च शशाङ्कृतशेखरम्
॥ १७
कृप् ॥ १८ ॥
लेपाणिपादक् ।
मर् ॥ १६ ॥
` इति किरणान्ञः।
तुभेजं महाबाहू
१६। कण्डिका कमण्डलुः। योगसुदा सुद्राविशेषः। तत्स्वरूपं श्रीतत्वचिन्तामणो =
गोडराग्रारे द्टन्यम् । (८
१९। वरदाक्षमिति वराक्षसूत्नकरमित्यथः।
इति शत्युभ्जयः। `
इति वव
सा
खड्गचापशिरःखेटं शशाङ्ककृतशेखर ॥ २२
~ अन्तत तथा वामे महादेवसुमाचितम् ।
सदढमेकादशं प्रोक्तं महदेभ्वयेकारकम् ॥ २४ ॥
पद्मासनशिवच्छायां योगाक्तनकरद्यप
` प्वक्तू(भ? मवं शक्तिशूरुखटूाङ्गधृत्करम्
सजङ्गमन्तसूलं च उमर मतु ! लु)गकम्। ` क
ईइष्छाज्ञानं(कलाविलय ! क्रिया चेति) विनत ज्ञानतार्णवप्॥२६॥ `
८ ध । | अद्धंनारीभ्वर व उमादेहाधधारिणप् ~
व्यालका वामकणं तु द्लिणे कुण्डलं स्थितम् |
इति श्रीकण्डमूतति
णो च संपृणं चामृतं च रसं पिवत् ॥ २३ ।
इति महादेवः ।
॥२५॥
इति सदाशिव
` . सङटाम्रे च माणिक्यं जटाभारं स्वदक्षिणे ॥ २८ ॥
त
णि ~ धि
५ ५ मा १५१
२८। व्यालकेति यथा्रतपषठे शाब्दक्मादार्थक्रमस्य बरवत्वादु दक्षिणे कणं व्यर्का = `
। वैणोयः वि > ५ १०६
धे तस्य(्रयो श) (0) किया रूप) सव रण पित्र । `
रुषं दल्निणे भागे कपारकटिमेखला ॥ २९६ ॥
इत्यदनायेष्व(रोश्ः) | `
उमामहेश्वरं व्य उमया सह शङ्करम्। = `
मातुल!) विशूटश्च विभ्र(ते?तं) द्तिणे करे ॥ २१।
अध(स्तब्दषमं ! स्ताहषभ) कुर्यात् कुमार गणेभ्वरम् ।
भृङ्किरीटं तथा कुर्याननियमान्नत्यसं(स्थिता!स्थितप् ) ॥३२॥
। इत्युमामहेभ्वो।
छकष्णशङ्कर(ततोएमतो) वक्त्ये कृष्णा(थनस्तु? द्वन तु) संयुतम्। =
। ष्णां मुकुटं कु्याज्जटाभार्च दक्षिणे ॥ ३३ ॥ १
कुण्डलं द्लिणे भागे वामे मकरकुण्डठम् ।
अच्षमाला त्रिशूल चक्रं वं शह्मेव च ॥ ३४ ॥
^ ४. (इत्य!इति) इष्णशङ्करः । १
पद्मशक्तिखेटशष्कं मृतति८)) स्यात् कष्ण(तात्तिकःकात्तिकी)।
| (इत्यए्ति) छृष्णकातिक्ेयः। ` |
= पद्मशहुध्वजाचिह' ताच्यर्ू (ढो?) गरुध्व(जः7जप्)॥३५॥ = |
णामा सिनतोिणणायानभााज्िाााणाााामि्माि
क क क म
क द -
ष्वा्किं दक्षिणे कणं वामे ण्डरमादिशेत्ः ध ्
४ (सतस्य र६०अन्दष्ो०)
` ईति मतस्यषुराणीयपदयादधंमपि अलुपराहकयक्े पदं निदधाति । एतेन- कणं व तालपत्रकमिन्ति == ।
पू््॑छोकीयपादं सम्पातायातमिति सम्भाव्यते । श्यारकाः इत्यत्र “बारिकि'ति कल््यमान- = |
ष पाठे बालिका कणंभूषणम् , ततश्च वामके ताख्पत्र बारिक्रा चेति कणंभूषणद्यम् । णव = `
शब्दक्रमेणेवा्थां भवति । क 0 . 1 १
३२ । शद्धिरीट इति शिवानुच॑रल्य नाम । <
| ७ दैवताूकपणम
५ शिवना रायणं वच्य अपनो १ ह
बाहूदय् ृष्ण(चस्य) माणकेयूरभूषितम्
चक्रस्थाने गदतवाऽ पिपा गणो व दद्यादधस्तने
` शेषं वा दद्तिणे दात् कव्य्धं भूषणोऽवलम्
{ठ् ध = < भिार(मध दु्क्रुत् तह \- च्तृण < ॥ ९
भुजङ्कहाखलयं वरदं दक्तिणं करम्
द्वितीयं चापि कुर्वीत त्रिशूवस्थारिणप् ॥ ४० ॥
व्यालोषवीतसंयुक्तं कलय शृतां कृत्तिवाससम् ।
मणिरलेश्च संयुक्त पादं नागविभूषतम् ॥ ४१
` इति शिवनारायणः।
(1 समारूढं तनु(त्येक सिनम् ध,
1 षट्(वक्तख !? भुज) चतुव॑क्त् सवेरल्षणसयतप् ॥४२॥
3 अन्तसूत्रं विशूख् गदाश्ैव तु दक्तिणे ¦
+ 1
कमण्डलु खटा चकर वामभुजे तथा ॥ ४३ । 1
इति ह(रष्रिष्टस(पीश्पिःतामहः।
माण
०५७११५११
३८। शेषं घा दक्षिणे द्यादिश्त्यत्र श्राह चैवोत्तरे दयादिति मवस्यषुराणे
| ` (२६० अ०, २४ श्लो) पाटः। 1
1. । ४२1 द्वाचत्वारिशि्ोकारिचत्वारिश्टोकं यावदेकं हरिहरपितामहर््षणम्, पुनश्वतु- ` |
| श्रत्वारिचटोकात् षट्चत्वारिद्टोकं यावदन्थह इरि्टरपितामहरक्षणमिति ; किमभिखन्धान- 4
` भूयं दक्षणद्ववीति नावधारथामः। न चेका पुष्पिकेव खदुष्पायतामिति वाच्य् ; उभयो- `
` षष्ठोऽभ्यायः १०
शङ्खचक्रधरो हरिम चेव तु संस्थितः
एव त विधेय धं सवेकामपरपदप्र् ॥ ४६
इति (सृयशेहरिहरपितायह
सर्वामि मरणसु सवेकामफटप्र्दप् ॥ ४८ ॥ ५
इति चन्ाङ्पितामहः।
लेखिहन्तं द॑ं्ाकरालं चण्डभेरवसुत्तमप्। =
एकवक्त्' शूलहस्तं खडगशक्तिशराङ्कशम् ॥ ४६ ॥ `
वरदं दक्तिणेज्ञेयं खटाह्गंखेटकं तथा।
चां तथाऽभयं चेव कपाटं बामहस्तके ॥ ५० ॥
कमनतम ताता निति तत तेम
जिमि पातिता तोति ततिति ज तान १
कुक्षणयोर्भिन्नतयेकस्य वस्तुनः प्रतिपादकत्वालुपयत्तेः। तस्माद दवितीयहरिहरपितामहरश्चणे
गदिवाकरपददश्चनात् सुथंहरिदरपितामहस्येदं लक्षणमिति निश्चिनुमः । (तयुत्रयनिवासिनमि'^ति
सम्भाव्यमाने पे एतेषां एयङ्मूततंयः कर्तव्या इत्यथः। =` |
. । ४४ । वचतुवक्तमिति दवितीयान्तपदानामन्वयी हुघटः । चतुष्केकनिवासिनशधिति एकल्मिन् | : ति |
` चलुष्कोणे स्थाने चतुष्कोणवत्यासने वा समासीनम् । ऋदाुलगत इति, द्रस्य दक्षिणे, ` |
हेरेवामे, पितामहस्य पश्चिमे सन्चिवेशद््रौनादयं पूदिकस्थ ईइत्यायाति, कवित्तद्योतकमिदं ^
पदं स्यादनर्थक्ं वेति छखधीभि्भान्यम् । | 1
४६। द्वितीयाद् "दवंविधोऽयं कत्यः सर्वकासफर्प्रदः” इति स्यात् ।
४७-४८ । चन्द्राहपितामशोऽ्नुघन्धेयस्वर्पः । ` |
या
~ नर
| रे प्रा्ञश्चग्डम ्॥ ५९१
त | ` इति चण्डमखः।
र विस्पाकतसत ; खड्गं शूलं उमर्मङ्कश्म्।
= सर्षं चक्रं गदामन्तसूत्रं विभ्रत् कराष्टके ॥ ५२ ।
खेटं खटाद्कशक्ति(श्ष!ख) परशुतजेनीषटम्
घण्टाकपाल(क्तो१को) चेति (वामार्पावामोरध्वा)दिकरा्टके ॥५३
इति विरूपान्ञः ।
स्यम्बकोऽपि दधचक्रं डमरं (सदर १ मुद्गरं) शरम्!
शूखाङ्कशाहिजाप्यथ दन्तोध्वादिकरा्टके ॥ ५९ ॥
दादरा तमनो १ नी) च्
` परशुं पटं चेव वामोद्धादिक्रमेण वे ॥ ५५॥
इति अधम्बकः ।
कायो हरिहर(स्याश्वा)पि द्तिणाद्धं सदाशिवः
वामाद्धं च हृषीकेशः भ्वेतनीखाक्(तिःती) कमात् ॥ ५६ ॥
वरे त्रिशू(लल) चक्राव्जधारिणो बाहवः कमात् ।
दक्षिणे बृष(भेभः) पाश्वे वामे विहगराडिति ॥ ५७॥ `
` इति हरि-हरमूत्तिः।
| छ(्णाष्णोशङ्करसयोगाद् दवालिंशदमेद-(मर्जयः ! मूर्तयः)
(1 नोदिता मन्थवाहस्यान् ज्ञेयादियाणेवा)) बुधः ॥ ५८ ॥
नि
९४-९९ । अहिजाप्यमिति अहिः सपः जाप्यं जपलाधनमक्षसूत्रमिति यावत् । गदा- `
खदाङतिं । पानं दृक्पालम् । एतेनायं षोडरभुन इति सिद्धम् । पूर्खोक्तो. विष्पक्षोऽपि = `
¢. | ॥ त \ तत॑ः पुनः ६०
सत
९९ । भथ टलिद्खान्याह--अष्टरोद्ानीति । पएतेऽ्टौ धातव एवाष्टरोहनान्नाऽभिधीयन्ते `
छोहशब्दस्य धातुप्यायेऽन्तःपातात् । तन्न॒ वद्धं रङ्गापरनामा धाठुविशेषः, नागं सीसकम्। = `
रिङ्घफखान्युक्तानि रूपमण्डने ( अ० ४, श्लो० ३७-४१ )।
ल्थिररक्ष्मीप्रदं हेमं राजतश्चेव राज्यदम् ।
प्रजावदधिकरं तान्न" बाङ्मायुविवधंनम् ॥
॥ वि्षकारकःं कल्यं पित्तलं सुक्तिसुक्तिदम् । `
| सीसकच्च शङृषिङकम् आयसं रिपुनादानम् ॥ =
अष्टरोष्टमयं छि ऊु्टसेगक्षयापहम् ।
भ्रिखोहसम्भवं लिङ्मन्त्थानप्रविदधिदम्॥
आयुष्यं हीरकं रद्धं भोगदं मोक्तिकोटुभवम् ।
छखह्त् पुष्यरागो वेदूयं श्रमदंनम् ॥
श्रीप्रदं पद्यरागज्च इन्द्रनीरं यद्षःप्रदम् ।
रिङ्खं मणिमयं वुष्ट्ये स्फाटिकं सवंकागदम् ॥ इति ।
` मेदस्थाऽऽवक्यकत्वेनास्योपरश्चणपरत्वं व्याल्येयम् ।
८ शिल्पे भङ्टीनां इृधेस्तारतम्यतो ोहटिङ्गस्य द्रेविध्यञुक्तम्। तथाच-
देवता-१४
षष्ठोऽध्यायः | १०४
शिल्परत्नेऽपि प्रायेणेवमेव फलानि । ( शिल्प उत्तरभाग० अ० १, इर ३८४१ )। =
६०। एकाङ्लादिति। धापुमयारि लिङ्गानि एकाङ्खादारम्य यावदषटङ्खख्युन्नतानि `
ल्युः 1 एवज्चा्टौ शिङ्गानि भवेयुः, ततः पुनरदेकस्याङुरल्या्टौ शिङ्गानि' भवेदुः, स्वणं- = `
रौप्यादिगदेनेत्यर्थः, इति व्युतक्रमेग व्याख्येयम् । तथा च एकाङ्गखादष्टाङ्गखान्तानि स्वणं- ` 7
शिङ्गान्यष्टौ, एवं राजतानि एवं तान्नाणीत्यादि। यद्वा एकैकस्य अङ्गुस्या्ौ लिङ्गानीति `
` वक््यमाणमनोहरादिसंामेदैनेत्यधेः, तथाच एकाङ्खादषटङ्खान्तानि मनोहरलिङ्गान्यौ एवं
| श्रीमुखलिद्ानीत्यादि । भत्र च पक्षे अविरोषादु वश्यमागेषु ोरुदारवादिषिद्धेष्वप्येवं ५
यहा, तृतीयपादे एकेकल्याङल्यस्यद्धर्याः इति ङत्छद्धिः पाडः । ऋद्धिरिति 0
` नार्थान्तरम् ¦ -तथाच. ` एकाड्खादारभ्य एककल्यादख्स्य बद्धा रिान्यषटो भवन्ति । । | व
~ दः देवतामूसिप्करणम्
५५८ [ धातुरिङ्धनामानि ]
- (४ ब ( ६सुवख्राख्य (अश्रीपु ज न न्दतः
[ धावुिङ्ं विकेषः !
छ [ रललिद्गम्।
` कर्तव्यं धातुखिङ्गस्य भ्रमाणेन हि रलजप् ॥६२
: इति धातुरल्ललिङ्घानि ।
^ काभ ००८५
अष्टाङ्ुरं समारभ्य ( हिद १ चाद्य )ङुविवधेनात् ।
लोष्टानि नव लिङ्लानि शिहस्तान्तानि कारयेत् ॥
तथास्शाङ्ल्मारभ्य दवद्ङरविवधनात् । {
त्िहस्ताम्तानि शिङ्गानि प्रयसा भवन्ति हि ॥
( उत्तसमाग० २ अ० ९४-९९ शै )
५ ध रिङ्गानीत्युक्तम् | मानन्तूुभयन्रवाशङ्खत आरन्धम् । रूपमण्डनेऽपिं अषशङ्गखरन्धमानकानि ४ |
४ अष्टाङ्रशृदधिमन्ति नेव रोहरिङ्गानि । तथाच-- `
धाहोरष्टाङ््ं पूवंमष्टष्टा्रवधेनात् ।
तरिहस्तान्तं नवेव स्युङिङ्धनि च यथाक्रमम् ॥ इति।
(अ० ४, श्छ ९१) ।
` एवत्र स्वह्ृतादु रूपमण्डनात परछृताच्छिल्परत्नाचान्यादशत्यास्य धातवरिङ्धानां रक्षत्य
| मूलमन्यत्र श्लान्नारण्येऽनु्न्धेयम् । `
६१॥ अष्टानां घातवलिङ्गानां नसान्याह-पनोहरमिति । एतानि नामानि नान्यत्नोप-
ओ लभ्यन्ते! एवसुत्तत्रापि दादनादिलिङ्गानाम् । सिल्परत्ने अ दशलिङ्गनामान्बुकतानि
` कथा्यदरतनमिश्नणवयादृ््थमेतदित्युसन्धेयम 1. यद्धो्तरपादे पीक्किरक्षणवदकषीमूतपत्वमात्र+ = `
( क्षिल्प० ० अ० २, श्छो० १-९ ) ।
६२। सोहमिति । लोहं चातवं शिङ्गं मिश्रं धाल्वन्तरसंयुतं न कर्तव्यम् । यद्यपि ६
भातुष्वपि केषनान्योन्यसंकरजन्मानो वन्त, अत एव तालुदिय निन्दाऽपि श्रयते-- `
सुख्यलोष्टानि चत्वारि हेमादीनि श्ुमानिष्ि। _
पिक्ाचरोहान्यन्यानिं कस्यादीनीति केचन ॥ इति ।
1 ( शिल्प०.उ० अ० ९ ४१-४२ श्टो० )
` षठौऽ्ष्यायः १०७ `
[ कारषरिङगमानस् ] ध
॥ 7न्या)रसह(खा एस्ताोन्तमष्टाविं शोच |
पदव्यावत्तनीयसनेनाऽऽ्यपादेन दर्शितम् , तथाच पीषिकिाः रोहमिश्ा न कर्तव्येति वर्तरोऽथैः
यद्रा रोहमिश्रं लोहान्तरमिश्रं लिङ्गमिति शेषः, न कर्ज्यम् । वञ्च वथाश्रत एव पारः `
प्रथमपादे ।
स्वमप्रेति। शङ्खं स्वमात्रयोनिसंयुतं कर्॑न्यम् इत्यन्वयः । स्वमान येन धातुना इतं `
लिङ्खं तन्मात्रं तेन छता योनिः पीठिका तया संयुतं शिद्धं यादित्यर्थः, न त्वेकेन धातुना घटिते `
खिद्धं धात्वन्तरेण पीषिका कर्तव्येति भावः । तदेतत् सर्वं विकिष्याऽऽह किल्परते-
स्वथोनिः पीठिकेव स्थाच्छेलादीनामदुषणा ।
अभावै त्वे्टकी चेरे रलजानां हिरण्मयी ॥
राजती ताश्नरजा घा स्याच् श्रष्ठमध्याधमक्रमात् । `
| न्यनेवा पररोहानामिष्टकाभिश्च दारवे ॥ इति । -
५ | ( उ० अ० १, ९७-९८ श्छयो° ) `
` हपसण्डनेऽपि- 9
रत्ङिङ्क द्विधा ख्यातं स्वपदं धातुपीडकम् ।
धातुजन्ठु स्वयोनिल्यं सिद्धिभक्तिप्रदायकम् ॥
तान्रजं पुष्परागत्य स्फाटिकस्य तु राजतम् ।
तान्रजं मोक्तिकल्यापिं शेषाणां हेमजं मतम् ॥ इहि
( ख्प० अ० ४, ४२-४३ शछो० ) _
एषमुत्तरपादे सम्मविनमथं प्रडवानोऽपि यथाश्रतः पाटः प्रमाणान्तराचुप्रहाभावादुपेक्षितः
अतिरोहितार्थश् यथाश्रतः पाटः ! उक्तमर्थ रललिङ्धेऽप्यतिदिशति-क्न्यमिति । सत्प्यन्यत्र
रतररिङ्विषये विगेषो नेह प्रपलित इति दरषव्यम् ।
६३। षोडशेति । एवमेव रिल्परलञ( उ० भ० २, श्लो ९६ )स्पमण्डनयोः (भ० ४, `
श्ो० १२ )। व्रयधंस्यास्य प्यस्य प्रथमाय यथोक्तशोधनं विना मध्यमां शिङ्गसंल्या
इवपादा । तथादि येव्म्ाविशोत्तरं शतम् इति संख्या श्रयते सा किं लिङ्गानासुवाङ्गरी- `
नामिति विचाय॑मागे न रिङ्गानाभित्यापातत आयाति । कथमिति चेह रसहत्तमवधीङत्य ` ध
षोडला्गरादारम्य षोडश-पोढशवधनेन नवेव लिङ्गानि भवेन यथोक्तानि । नाप्यङ्लीनाम्, = `,
चथोक्तसंल्याकाभिरङकीभी रसहस्तानिष्यत्ेः । तस्मादत्र कवित् कथि श्रमः क्टपनीय `
१. | 0... व, देवतामुत्तिषरङ्रणम्
(भकण्डास्यं (्रोरवं (*काम्यं (रपुष्पकच (फलोद्धवम्॥
| [ दार्वलिद्धनामानि-]
(शोमकरेन्दु च (रमालक्यं (पुष्यं सिद्धायै
तत. ।
५ [ लिष्गोचितवृक्षः ]
भीपणीं शिशुकाशोकः शिरी(घ ? षः) खदिरोऽजेन
` चन्दन नः) श्रीफल निम्बो रक्तचन्दनधीर्यकौ ॥६५
कयरो देवदारश्च स्यन्वनः पारिजातकः
` म्रन्थिकोटरसंयु(्ता एताञ्) शाखोदभू(ता एतान् ) र"
त परित्यजेत् ॥ ६७ ॥
` चम्पको मधुद्तश्च (हिताश्चागरुडःहिन्तालश्चागुरुः) शुभः॥६६॥
[ ब्ष्ाणां रक्षणोद्धारः ]
नित्र(णा ¢: सु ) हटा षृ्ञा लिङ्काथं सोख्यदाय(कः १ काः) ।
| लिद्धोवितानि गृहाणि ]
शेखजं धातुलिद्गानां स्वरूपं वाऽधिकं शुभम् ॥६८॥ `
| इति दारज्ा(ती ? नि) ।
[ शेङलिद्नमानम् |]
षकस्तादिमं रिङ्ं हस्तददधया नवान्तिकम्
शंखणिङ्गस्य मानन्तु हस्त(हितं दीनं) न कारयेत् ॥६६
~+
यावलिङ्गानि यथोक्तसंस्याकान्ेव स्युरिति सर्वमनवधम् 1 (भरसेत्यादावाङ् मयादायाम् =
^ पएकाङ्रोनरसदस्तान्तमित्य्थः, एवमेवा्टार्विश्ोत्तरशतसंल्या स्यात् । मध्य दस्त
| प्राल्ताकक्यिव!
६४ । नवानां लिङ्गानां नामास्याह-मकरेन्दु
९९। खिद्ानाह--श्रीपणीत्यादि "हिन्तालश्राणुरः शभः” (६६) इत्यन्तेन । स्यन्दन === `
इत्यत्र चन्दनः इति प्रामादिकः पाठो रूपमण्डने ( अ० ४, छो० ९६ 9 ।
| | | ६९॥। शेकरिङ्गमानमाह--एेति । पकस्ततो नवहस्तान्तं देरचिष् इषत्! = `
त | | वठौऽध्यायंः 1 १०६:
हस्तादिपादव्रद्धया च (भयलिं १ अयच्ि)शत् कमेण वें ।
रिङ्गानि (न च १ नक) हस्तान्तं-- `
७0५०य०५००८५१००११ १०५०-५
त् म ५४७५ तो ता न
नाता तमत ४८०
७० । पूर्वोक्तानां नवानां रिङ्कानां नि्माणक्रपेम त्रयक्चि्त्वमाह--हस्तादीति ।
'इत्तहीनं न कारयेदिश्युक्तत्वदिकडरतमारम्य एकहल्तं स्पादहत्तं खाद्धहल्तं पादोनद्विहस्त- =
मित्यादिक्रमेण पादशो बद्धितानि लिङ्गानि नवहरतं यावत् त्रयक्धिंशतसंख्यकानि भवन्तीत्यथः। =
खपमण्डने-
हस्तादि नबहृस्तान्तं शं शिद्धं विधीयते ।
हस्त्या नवेव स्युमधये ब्दधियंडच्छ्या ॥ ( अ= 9, श्छो० ५३)
इति हत्तादिनवहस्तान्तं लिङ्गमानं नियम्य या चेह पाद्दधिस्क्ता तन्नोदासीन्येन याषच्छिकडद्धि
स्तन्न प्रतिपादितेति तेयम् । श्िटपरले पुनः--
(सक्च † एक)हस्तोचमारम्य पाद्रुदधगण तु पूववत् । 1
` श्रेष्ठानि नवलिङ्गानां त्रयस्त्रिरदुदाहतम्॥ ५
1.2 (उ० अ०र+ शछो०२४-२९) ।
इत्येन प्रहता पाद्ृद्धिः समर्थिता इश्यते । न
रिङ्गमानं तावत् नवधा भतेत् ! तथाच-~ | 9 ५
लिङ्गं गभ॑गृह(१)्ा२(२) स्तम्भा(रे)धिष्ठान(४)किष्टछुमिः (६) ।
ताक(६)मानाङ्छे(७)श्वापि तथा माज्रङ्र (८ )रपि ५ ष
यजमानोच्मानेन (९) षेवं नवदविधं स्श्रतम् ॥ इति । ए
क (शिर्ष ० भर र छो० १३)1 = |
वित् सप्तधेत्यपि । तथाच-- ` ^ 1
गभगेहप्रमाण्च द्वारमानं तथेव च । स्तमभन्न कारुमानच्च हस्तताखङ्कुरं तथा ॥ | ॥
छिङ्मानं धवं सप्त" ^.“.* । ( काभ्यप० अ० ४९) छो० ६९-७०) |
इति । ईह तु त्रिधा लिद्गमानयुक्तम् । तत्र मानाङ्टेन पूवसुक्तं प्रास्ादगभमानाभ्यामिदानी- = |
मुच्यते । प्रालादमानेन लिङ्मानक्धनस्यायमभिप्रायः--एवं हि सन्तरयुक्त्या शङ्िमानं |
छिद्धोचितप्रासादमानजोक्तं भवतीति । प्तं मत्ये-- = ` | |
` प्रासादस्य प्रमाणेन लिङ्गमानं विधीयते । 3 |
छिङ्गमानेन वा विधात् प्रासादं श्भक्चणम् ॥ इति । 1
( मतुस्य० अ० २६३, छो २)।
सप्करणम् `
[ शेरलिङ्गनासानि] |
(शश्रीभवं (नु १त्)द्धवं द) भवप्
(भभयहत् (“पाशहरणं ($पापहस्तेज उच्यते
ततः परं (महातेजा (परापरऽम(खे ? १॥७१॥
° शेखर (१४शिवं (प्रशान्तं (रोमनोहादकरं ततः ।
५ (१ स्द्रतेज (१५सद्त्मिज्ञं (१६)वांमदेव (भमघोर(श्भ्वरम् ५७२
(वततपुरुषं (णतयेशानं (रशमूतयुञ्जय^र्यविजयक्रमात् । `
` (र्श्किरणान्त(्ण्महोयस्ं (र“श्रीकण्टं (रध) मुनिवधेनप् ॥७३॥
(रभपुणडरीकं (रसुवक्ताख्यप्् ९९उमातेजं (२गविश्वेश्वरम् ।
षत्रिनेवं श्प्यम्बकं चैव (प्थमहाकार नामतः ॥७॥ `
[ प्राादमानेन छिड्मानम् 1
इस्तमानं भवेग ेदहसत सुरारये। 0
` ©व!ज्येलिङ्गन्तु वदेशं ? वेदांशे) षट्रिरो नवहस्तकम् ॥७५॥
७६। प्राष्ाद्मानल्यावधिमाह--पञ्चादीति। पञ्चसंख्याया आदिः पृञ्ञादि |
संख्येत्यथेः। तथा च चतुहह्ततो भूतव्ेदान्ते प्चचत्वारिशद्धस्तमिते प्रादे इस्तसंख्यया `
पथादिभूतवेदा(न्तं १ न्ते) प्रासादे हस्तसंख्यया ¦
मध्यमं पथमांशेन हस्तादिनवहस्तकम् ॥७६॥ `
रित्यादि८)युगलं चान्ते हस्तसंस्था रिवाख्ये !
षडंशेन प्रकततव्यं हस्तादि (भव एनव)हस्तकम् ॥७७॥
६५ प 1 = 9
11 त भाता म
लिङं स्थाप्यमित्यथंः। शहस्तमानं भेलिङ्गमः इव्युक्तत्वादेवमनाजंवेन व्याख्यातम् ।
७७। 'रित्यादियुगरमित्ययं दुहः पाठ य॒च्च समानतन्त्रे सरूपमण्डने शृत्वा `
| कदुगलम्ः ( भ ४, छो० ६२ ) इति पाठः सोऽपि देय्रतोपयोग इतयुमषितः।
| अतिकोमरूमेकतोऽन्यतः सरसाम्मोकह
स 1 द
७९। इदानीं ग्भगेहमानेन सिङ्मानमाह- गभं इति । पञ्चभागीङतल्य ग्भगेहस्य श्येन
` परिमितं टिङ्क जयेष्ठं मवेत्, एधं नघधा तस्य तस्य पञ्चांशेन मध्यमम् , द्विधा कतस्य च॒ |
` तल्याद्धन कनिष्टमित्यर्थः । मात्स्ये- ध ध ^ |
गाधन तु यिङ्खं कायं तदिह शस्यते । `
पञ्चभागविभक्तेष तिभागो ज्येष्ठ उच्यते ।
भाजिते नवधा गँ मध्यमं पाञ्चमागिकम् !
8 इति ( अ० २६३; श्छो° ७-८ )
गरभ॑गृहत्वरूपमाह समराङ्धणसुत्रघरि--
शारा यत् पुनमंध्यं वापी पुष्करिणी च सा।
संछन्ना ८ चा १ सा )पि य्य त्यात् तहु गर्भ॑गृहसुच्यते ॥ इति ।
` (अ० १८, श्योर २० ५।
तन्मानन्तु- `
| प्रासादस्य तरिभागकं सक्तभागानरराकम् ।
विषाद गभंगेहस्य विस्तारं प्राह कादयपः ॥ इति! = `
(शिप पूर्व॑, अ० २९०९) |
यथोक्तमानल्य क्चिह विपर्ययोऽपि भवतीयाह--वक्तरिङ्ख षेति। पाथिवे
| ` बक्तूलिद्धे इति सम्बन्धः । वतर लिङ्कविश्चेषः, मुखलिद्धभित्यस्य नामान्तरम् । . ततह्वूपं
शिल्परत्रे उत्तरभागे तृतीयाध्याये द्रष्टव्यम् 1 श्म्भुबाणे इति दम्भो बाणे चेत्यर्थः 91
२. ~: देवतामूतपरकरणम्
1 [ रिङ्खविस्तारः |
तृदाररोहश (लं बालाना) द॑ध्यं (=
` भक्ते (दिनांशके{जिनांशकेः)
१ र्यात् षटसार्धसतांशनवांशे विस्त(ररं) क्रमात्
` (विषकीविष्कम्भं) नव(नागं}भार्ग) तु साद्धंमष्ट पितामहं
नारायणोऽभिज्ञ(योयः ) स्तसार्धं महेभ्वरः ॥८२॥
सा
1
८१-८२ 1 इदानीं द्धस्य वित्तारं ब्रह्मादिभागविभागच्च युरमकेनाऽऽह--शदाविति ।
दादिशिङ्ानां देष्यं जिनशकश्वतुविंशत्येत्यथेः, भक्ते षट्साधौदिना विह्तरं कुर्यादित्यथैः । यद्रा
विष्कस्भनवभागं गभंगेहविष्कस्भस्य नवमांरामितं विस्तरं इयौदित्यथंः । अत्नोदिषटिनां
शरृदादीनां चतुर्णा षटसार्घ॑त्यादिभिश्रतुभिरनुदेशाह यथासंख्येनान्वयो बोध्यः । विषमफरमपि `
त॒ल्यप्रकारं विभागवचनं शिल्परते-
आथामे दरिते दिवाकययुजाऽभीशेऽ्टमिरविस्तृतिः
४ ` न ५. 2 नः नै
| न र, नरै. न भ म
पञाशेरपि गभंगेहनवमिनापि सा स्सय॑ते ॥
| | | ( ० अ० २, श्षो- &७ ) ।
बरह्मादिमागमाह--साद्मष्टेति । अत्रापि जिरनादकभक्ते इत्येव । सप्तसाङमिति शाद्ध-
` सपषेत्यथेः। अत्रापि करविसंवाद्यपि संवादि प्रमाणं तन्नव-
लिङ्क सवसं समोन्मितिविभ्छाश्त्रयं तत् पुन
प्वायत्या सम-नाहकं यदि सरमां चाथ वृद्धयत्तरम् ।
भक्ते भानुयुजोच्छरयेऽद्वि(७)चड (८)नन्दा(९)शेस्तु मूरादिष-
पेतं दिगृदहिते त्रिरोकयुगख्यातेस्तथेशाधिक्म् ॥ =
ष | ( शिल्प० उ० अ० २ शछो० ६६ )
अल्यायमथेः--रिङ्गस्य उच्छ्राये भावुयुजा रविद्रमेन चतुर्विश्षतयत्य्थः, भक्ते क्रमेण अद्िव्ठ- `
नन्दो सप्ता्टनवभिरंशेम् खादिषु मृलमध्योध्वंभागेष उपेतं पू्वाधविशेषणविशिष्टं लिङ्गम् ५
शाधिकं शिवभाणाधिकं भव्रेदित्यथंः। पक्षान्तरमाह--दिगृदर्ति इति । दिशा दक्षभिर्दस्ति `
1 विभान्ति उच्य इत्येव, निरोकयुगसंल्यातेः यथाक्रम तरिमिच्धिभिश्ति् मृ मदिषु उपेतम् ५ 4
8
4
व [ सिद्धस्य अ्ह्मादिभागाः ]
तुरो (वोऽधो) मध्येऽशखस्तु वर्य
गः सुदत्त स्यात् षीटोध्व शङ्करस्य च
[{ नागरलिङ्गानि |
क | गभा(धध) कृन्थस श्र पथलिष्यै)शं {र धरः
४. भवन्ति नव गरि
निष्ानि व्िविभेदानि तानि हि। ` `
नागरे नागरस्यो मन्दिरे ॥८५॥
म्न तालान ततो काणि िकमि
अत्रेशभागोऽधिक इति दश्यते प्रहृते तु ब्रह्मभागः, तस्य॒ सार्घा्टमागभाजित्वात् ।
तदतरेशपदं बह्यपरं वा स्यात् मूलपदम् उदर् परं वेति तत्रभवन्तो निर्माणर्निषुमा जातिक्षिस्पिनो
नि्िकञन्त्विति । परमीश्चपदस्य बरह्मपरस्वेऽपि तथ्य मूरमाक्त्वादाधिक्यभसमभ्भवमेव ।
८३ । ब्रह्मादिभागत्य देशं प्रकाराऽऽह--ब्रह्मंल इति । ब्रह्मारश्तुरखः समवतुष्कोणः, ` (
सच अधो विधेयः, वैष्णवः अष्टाक्लः, स तु मध्ये कतन्यः, शङ्करस्य पूजाभागः इद्त; पीठो ड `
स्यादिति योजना । पदेतदाह शिल्परते--
यथोचितातानवितानयुक्तां शिखां यथोक्तकमतोऽभिमन्य ।
मूं युगाश्रं विदधीत मध्यमष्टश्चकं प्रुत्तमयं परञ्च ॥
॥।
#7
॥
(७ 9 | दति ( ॐ० अभ० २, श्चो० ७७) ।
८४.८९॥ सम्प्रति रिङ्धल्य पू्ोत्तं श्रष्ठमध्यकनिष्टत्वादिमेदत्रयमनूचय नागरादिप्रासादमेदेन
` शिद्धमानमाह--गभाधंमिति । गर्मार्धं शिवाख्यं शिवलिङ्गं कन्यसं कनिष्ठम् › पञ्चन्यंशं गपन्लारस्य == `
यरं शिवसि ष्टम् इति पूौक्ताद्ववादः । प्रस्तुतमाह--भवन्तीपि । तयोमध्ये ज्येष्ठ = |
कमनिष्मोम॑ध्ये नवांशीङृतस्य ग्म॑ल्थ पञ्चाश इयर्थः, पूर्व तस्येव मध्यमत्वाभिधानात् ; = `
अष्टभाजिते अषटभिर्विभक्ते नव लिङ्खानि भवन्ति ; तानि च ्रेष्ठमध्यकनिषटानीति चित्िमिदानि
भवन्तीत्यरथः। निगमयति--नागर दृति । नागरे मन्द्र नागरस्य शिङ्ल्य मानम् इत्युक्छम् ! `
क्षिल्परते "नागरः इत्यत्र शरैश इति टिखितं विरक्षणेश्वंशादिभिरयमेव प्रफारोऽभिहितः। ` `
तथाच-- `
अभिह्ृत्यंशके (२६) गभ॑ षोडशा तदुत्तमम् ।
त्रयोदर्शाशसधमं तयोमध्येऽटमाजिते ॥
देवता--१५
शद
तयोम॑ध्येऽश्(भागिके?भाजिते) | ८४।
नव छिङ्कानि सिध्यन्ति वेसर तानि कल्पयेत् । ( उ० अ० २; श्छ ° ६४-६५ ) |
। जयद् यदि) विशालं तु पूवर्वद् व्राविर मतय
[व
इति । काश्यपर्चिल्पे पुनद्ररमानेनेयं कल्पना, परं तत्न नागरादिंज्ञा नास्ति! तथाच
कत्र हइारमानमभिधाय-
| अधमोत्तमयोमेध्ये वछभागविभाजिते ।
५ ^ नवधा सकरोत्तङ्ं द्वार ( मानं १ मानाह् >) विधीयते ॥ |
इत्युक्तम्। एतत्तु चित्रम्, सर्वत्रेव मध्यमषटिर्विभज्य नव लिङ्गानि विहितानि, परंकथं `
` तथाविधे भागे शिङ्गनवकोदपत्तिभंवेदिति कषिल्पिन एव कल्पयितु प्रभवः । भ
८६1 नागरलिङ्स्य विस्तारक्रमेण नामान्याह--विकारशा इति। तदायासे छिङ्ायामे
विकारे जयदं पौष्टिकं साधंकामक्च रिङ्कं यथाक्रमं भूततरेदाभ्चिविस्तरं पञ्चचतुस्त्यंशविशालं
विुः। पर्चाशविस्तृतं जयद् , चतुरंखविस्वृतं पोषटिकम् , व्यंशविस्वृतं साद्ंकामकम् इति `
निष्कषेः। शिल्परते (ड० भा० अ० २, छो० ६३ >) पुनः (सावंकामिकमि"ति तृतीयं नाम
दाविडे प्रासादे एषां स्थान्योक्तम् । `
भत्र विकारपदेन षोडश परहृतिविकारा उच्यन्ते, काभ्यपरिल्पे--
भथोदये करे तु पर्चा स्वस्तिकं भवेत् । ॥
4 वेदाश पोशिकं ख्यातं गुणां जयदं भवेत् ॥ (अ० ४९, श्छो° ९१ )
इति यथोकछंशस्य कलाराब्देनोदेखात् । अत्रापि नान्नं मेदः पौवापयेविपयंयश्र दरश्न्यौ । `
. ८७। दवाविइप्रासादे लिङ्गायामविस्तारो वक्तमशविभागमाह-गभं इति! द्वाविडे `
प्रादि त्रिःसक्षमागे एकविंशतिभागे छते कशांशोऽथमः त्रयोदराकं श्रेष्ठं मवति । मध्येऽ्टशे-
नेति पूषवत् नागरे इव तयोम॑ष्ये अष्टीशेन विभक्ते नवरिङ्गानि भवन्तीत्य्थः। =
(1 सम्प्रति विस्तारमाह--त्रिःसक्ताय इति । निजायाम इति रिङ्दध्ये । षटपञ्च- व
चतुरक चिश्चा विस्तारं कादिति शेषः। जयदादीति कमेण तेषामंशानां पूर्ववत् जयदादि- `
~ ` कलाल्यादित्यथः। ` = ५.
व्ठोऽध्याथः | ८ ११४ `
[ े्रङ्ानि ]
॥ ग गभाकारे विमानके
| लिक्गासादोवितनत्रानयनम् ]
उतसेधाष्टगुणे सतविंशभिहैरणे ततः,
शेषमनश्चयुजारध्य्य) तु
पिता ति नायमा त य ७५८८१५८ ०, कणम्
काश््यपवे--
रिङ्गोचे द्विनवांशे 8 रसभूतयुर्गाक्षके । `
गु्णांशे शान्तिकादिः स्याह द्राविडे च चतुविधम् ॥ (अ० ४९, शछरो० ९३).
हति द्विवेवाश् इति चतुविधमिति च प्रङताह् भिधेते । | |
८९। वेहारलिङ्खमाह--वेश्चर इति । प्रमादबहुरोऽयं पाडः । `
शिल्परले-
पञ्चपर्वाके देयं वखसक्ठषडंशकं: ।
कादयपरिषस्पे-
वेरः लिङ्तुडे तु विदहात्यंश्षविभाजिते ।
अष्ट वा संषटूपच्चभागेन्यौसं प्रकल्पितम् ॥ ( अ= ४९; श्छो० ९४ )
इति चेकाथबोधकं पद्यम् ।
९० । प्रसङ्घात् प्रालादल्य लिद्धघ्य च नक्षत्रादीनि वक्तमादो नक्षत्रमाह--उत्तेषाशटयुणे
इति। रुतानि च शिल्परलादौ आयादिरिति नान्ना व्यपद्ियन्ते। छभानाम् एतेषामति- `
प्राश्स्त्यमाष् समराङ्गणसून्नधार- |
| आयो व्ययश्च योनि( त्वं १ श्र) ताराश्च भवनांशक्छम् ।
गृहनामेति चिन्त्यानि करणानि यहल्यषट्।
तरिभिः छभेः श्चुमं वेदम द्वाम्यामेकेन चाञ्ुमम् ॥
| करणेश्रतुरायेस्त श्मेरतिष्चमं मवेत् ॥ (अ० २६, शो० ४९--९१ )
इति । इह गृहनाम वज॑पित्वाऽन्येषां पञ्चानां खश्चणानिं रिखितानि । =
सम्प्रति व्याख्यायते । कतंग्यस्य प्रासादस्य
विल्तारं वेशे विचत् पूंबज्जयदादिकम् ॥ इति (० भ० २, छो० ६९) `
५ दस्य लिङ्गस्य वा भाविते उत्सेधे उश्नतिमाने |
अशसितुंणिते सपररस्या हते च अवशिष्ठसंल्यया नक्षत्रं जानीयादिति निकषः । अदवयुजाच- = `
^ ५ [ तस्करा्ंशानयनम् ]
न्तत च) चतुगं
नवभिहं वभिहरणे (ष्मश्यकं {रोषमंशकं) तस्करं ति {रादि 0
्तधनं (राज्ञा षडं का १ राजा षण्डाभयकं) वियत्
तस्करं (विषखण्डन्तु !वियत् षण्डन्तु)
निन्दित सुपार(के0केः) ॥६१
नात भ म४८७००१७५५१०१५४५१
समा जि जि ना णन ०० ०७9 ० - “~+
पिति अश्िवन्यादिनक्षत्रम्। शेषसंख्यया नक्षत्र्ानञ्च-यथोक्तयुणहरणास्यामेकल्मिन्नवरिष्टे
अश्विनी, द्योमरणी तरिषु छत्तिकेति कमेण । इयमेव रीतिः काश्यपे । तथाच-
| # # # अशसष्टगुणीकते ।
सप्तविश्चतिहच्छेषमदिवन्यादिक(कं }) सम्भवेत् ॥ ( अ० ९०, शो ९१ )
ईति। समराङ्णसूत्रधारे तु प्रकारान्तरेण नक्षत्रानयनमुपदिशटम् । तत्र हि सप्तविश्चतिनश्चत्राणि १
मस्षम्पदादिसंक्तया नवधा विभक्तानि ; अत एव तत्र हरणमपि नवभिः कृतम् । तथाच-- क
गणयेत् स्वामिनक्षन्नाह यावत् स्याद् भवनस्य भम् ।
नवभिभाजिते तस्मिन् शेषं तारा प्ररीत्तिता ॥
4... ( समराङ्ण० अ० २६, छो० ४०-४१), = `
। एवमेव शिल्परलेऽपि ( पूं अ० १९, शछो° १३-१४ ) । अयमेव हि प्रकारः साधीयान्, एक
प्रयासेनेव नक्षत्राणां तच्छमाशुभानाञ्वाधिगमकत्वात् ।
९१} अश्ञानयनप्रकारमाह--नक्षत्रे चेति। नक्षत्रे नक्षत्रमाने चलु॑णे चतुभिरंणिते
४ | नवभिह ते विभाजिते च गषमंशकं भवेत् । तेषां संज्ामाह--तल्करमिति । `
युगधा नवे हासे त्वंशकं तरकरादयः' ( अ० ४९; छो १०३) इति काश्यपे यथोक्तावेव
1 ` गुणहारो । परमस्ति नाश्नि विप्रतिपत्तिः । तथाच--
तस्करं भक्तिशक्तिश्च वनं राजच्च षण्डकम् । |
अभयं धन्रणज्चेव न्वांशकमुदाहतम् ॥ (अ० ५०, शछो> ६१ )
4... ` इति । एवं शिल्परलेऽपि (पूं अ० १५, छो २७-२८ ) नाममेदो षिदयते। नवतातु 2
प्राचीनेव । समराङ्गणसूत्रधाि पुनरुंणहारयोनाम्नि संख्यायां च तिप्रतिपत्तिः। तथाच-- ५
व्ययं कषत्रफरे क्षिप्टवा गृहनामाह्वराणि च ।
भागं ननिभिरे्त्र यच्छेषं सोऽश्राको भवेत् ।
इन्द्रो यमश्न राजा च त्रयो नामभिरंशकाः। त.
तल्यफरुदा विक्ातम्यादयोऽपि च ॥ (अ० २६, छो० ३७.४०) ` `
=: "` -वनामे
षष्ठौ ऽच्यायः ५ ११७
[ घनणयोन्यानयनम् |
मता तमात् त ताता सिति सि्
असिति चेषामं॑श्ा्ना करणषटृकर प्राधान्ययोतको हृदयः प्रशंसावादोऽपि तत्रव--
चतुर (ञो ? ङे) यथा (मन्त्रो ? मन्त्री) सुख्यो खगे नवांशकः ।
तथा गृहाष्षु प्रोक्तं युख्यस्वेनांशकन्रयम् ॥ इति । ५1
(अ० २६, इलो० ३८.३९)
अशेष निन्दितानंशानाह--तस्करमिति। "निन्दितं वास्तुपाय इति शिल्पे |
` (पूष अ० १५, श्छो० २८ ) पाठरलम् । | १
९२ । सम्प्रत्येकोपक्रमेणम धनणंयोनीनामानयनप्रकारमाह तिभिः पादंः--उत्तङ्क इति ।
प्रासादस्य लिद्धस्य बा उत्तङ ओन्नत्ये ओन्नयपरिमापके हस्तादावित्य्थंः, वना अष्टभिः नन्देन =
नवभिः अभिना त्रिभिश्च गुणे गुणिते, भष्टकाषटमिरिति-अष्ट च कः सूर्योऽथाद हदश्च च अष्टचेति
अष्टका तेः अकामः अष्टभिह्मौदलभिरषटमिश्च हते विभाजिते यथाक्रमं धनम् कणं योनित्वज्च = =`
स्यात्, तथाच--अष्टमिगंणिते अष्टमिहैतेऽवशिषटं धनम्, नवभिगुःणिते दादशभिहंतेऽवशिष्टे
ऋणम् , त्रिभिगं गितेऽ्टमिहंतेऽवरिष्टं यो नित्वमिति निष्कः | ^
अत्र॒ शोके गुणनसंख्यास्तिखः सूपष्टत उपरम्यन्ते "वछनन्दाम्नीशत्यनेन $ हरणसंखल्या = = |
त्वहपटेति गुणनसंल्यालसाम्यपर्यारोचनया “अ्काष्टमिःरिति पाठं परिकरय भष्टमिहमदलभिरट- = ।
भिरिति कष्टेन कलिपितोऽथः, ततश्रेतहभायफलानां त्रित्वात् संख्येयानामपि च्रित्वमावक््यकमिति ` ५
दधया; ्यथाक्रमश्पदोपात्तकरमान्यथाचुपपत्या श्योजित"पदस्यानथंस्याजसन्धानेन च शयोनित्व- = ` „|
मिति पाठः श्चुत्वेन कल्पितः ! यथपि भ्योनिशवशतमेव पाठः साधीयान् तथाऽपि यथाद्चोधित- =
मेषान्यत्रोपरुष्ध्या अक्षरसाम्यभूस्ना च तथा कष्पितम् । ==
| इदमत्र दष्यम्--योनिः यथोक्तगुणहाराभ्यायेव स्व॑त्राऽऽनीता । आभिः संख्याभि-
धन्णयोरानयनन्त्वन्धत्र नोपलभ्यते । तथाच शिल्परत्ने-- $ 4
| अष्टाहते रन्थ्रहतेऽथ शेषह्त्वायोऽथवाऽत्रापि तिथिस्तु तिथ्या ।
नागे नवध्ने उपय एव दिगभिभंवेदिदं देवात् प्रवश्यः ॥ 1
(7. | (प्षंन्मान्भन शषच्लो० ३१)
दति। ` एवमत्र अष्टाभिगुणिते नवभिहंते आयः, नवभिगुणिते दशमिहते व्यये इति |
< करसिपतम्+ ` |
# # # तङ्क इस्ताश्छदधिदम् ।
नाभिष्तु निविशेषमाथामिन्युच्यते बुधः । इत्येकन्न ।
| | 6 8" ( अ० २५, श्छो० ४-९ )
अन्न द्वितीयाध--"नाडिभि्त्निते रेषमायमित्युच्यते बधरिति स्यात् । अन्यन्न च-- |
अनरे गुणिते चाष्टहूते योनिर्दाह्ता ।
अष्टमि्ंधिते भानुहते त्वायसुदाहतम् ।
नवभिगुगिते नाडीहते शेष्टणं भवेत् ।
| (क्ाद्यप० अ० ४९, शौ १०२-१०३)
इति यथोक्तसंख्यया युणमभिधाय भानुहते अयमा, यत्र प्रहृते अष्टरणयुक्तं यत्न च
प्रते मानुष्रणमुच्यते, तत्र ऋणे स्वयं नवभिषट्रणमाह, गुणनन्तु परङृतवदेव । तदन्यत्र च
पूषोदाहतवदेव अ्ययोन्यादिकमभिधाय--
| नवभिगु णिते त्वं (श्च १ शे) राशिमिहहाखयेचतः ।
रोषं व्ययमिति ख्यातम् * >*#* | |
( काक्यप० अ० ९०; शछो० ९०-५१ )
| ` इति प्रङृतवदेव दवादशमिहरणेन ष्ययानयनं इयते । तदत्र व्ययो घनं वा ऋणं तैति शिल्पिभि- `
स्नुखन्येयम् । मात्येऽपि अष्टाभिभाजिते आयन्ययाबाह । तथाच-
यासेन गुणिते देये अष्टाभिवें हते तथा । यच्छेषसा८ यतं १ यं तं >विन्धात् इत्यायम-
` । भिधाय--“अ्टामिभाजिते बरे यः रेषः स व्ययो मलः” र व
14... ( अ० २५७; डो १५.१६, २१ ) इति न्ययमह । न
धनणयोहयोपदियत्वमाह--धनाधिकमिति। धनमधिकं यत्रेति, ऋणं क्षीणं य्त्रेतिच
। विग्रहद्यम्, शेषं छगमम्। (आायाधिक्यं व्ययं क्षीणं सम्पदामास्पदं सदेति कारये ` ५ | | |
८. ( अर ४९, श्छो० १०४ ) । इदसत्र दश्न्यमू-- विग गिता रैरेव च भाजिता संख्या विकार- `
` मननुभवन्त्येव स्वस्वंरूपेणावतिष्ठते इत्यकलाऽन्ष्टफला वा प्रन्धङ्कतश्चरेत्यवगच्छामः । `
९३ । वारानयनमाह--तुङ्गमिति । स्पष्टम् । एवमेव शिल्परत्न(पवं भा० अ० १९, दोऽ |
३३) का््यपरिल्पयोः ( अ० २९, शलो० ३॥। अ० ४९, | गे १०१ अ० ५०, | ५
। ०),
वज्र (दगेध्वंएदण्डाधचन्द्रौ च(
चक्रमतस्यो घटः) शुभाः॥ ६५ ॥
सोख्यदं चिह्वमित्या(च्य)माव्तो द्िणे हि य
(8 रक्तभ्वेतपीतङकष्णरे(षो+खा) वर्णसुसोर
| [ छि रखारूरणम् ] |
पूजायामे कांश तु खिद चिह्नं दशांशकेः।
पीटस्योद्ध हिभागेन रे(षाखा) कार्या प्रदक्षिणे ॥ ६७ ।
| [ छिङ्शिरोवत्तनम् 1 |
लभागे शिङ्गविस्तारे चेकांशेनाधचन्द्रकम्।
सा्धत्रयशेन तुल्यं स्यादष्टांरो बदब्दाङ्(तिःति) ॥ ६६ ॥
९९ | लिङ प्रशस्तानि चिहान्याह--पद्ममिति । स्पष्टम् ।
स्मैवालुबाद् इति मन्याम ।
क्म्पयते।
[ प्रशषस्तचिह्वम् |
(सत्राचत्रा)ममषटमांसे तु सार््यंशंदंवरो)(षडङ्गकोएषंशके)। =`
तरपुषाभं विस्तरा कुकुरा कुक्कुटाण्डं) शिरो मतम् ॥६८॥
ना ताता ना कः
८ ९६ । रेखामाह--पूजायाम इति । पूजायामे शिवां षोदशमिर्विभक्ते दशमिग््ेख्डि ध ।
विहनितव्यम्। पीर्ल्य उबुद्विभागेन प्रदक्षिणे रेखा कायत्यन्वयः । द्वितीयार्धं प्रथमाधे- =
| ९८ । सम्प्रति रिष्खस्य शिरोवतंनम् भंशवभेन तस्य संत्ाश्चाऽऽह हाम्याम्--उत्राममिति। = |
जिभानीडृतल्य लिङ्गस्य उदु मागः शिर्वारा इत्युक्तम् , शिर्वारं षुनच्िधा विभज्य रन्ध उष्वंभागो = |
` उखम्, तत्र वनं भवेदिति वस्तुस्थितिः । वत्तेनमिति इृत्तक्रियामाह, यथा अर्धचन्द्राच्याकारः = |
शिरोमागे अष्टमा अष्टो अष्टमिरंशीकृते इत्यथः, साधे छत्राभं षडे ्रदुषामं वतन |
भवेत्) त्रपुषाभमिति चपुषाप्रलहशमित्यथः, ्रएुषं फरविशेषः यत्य शशका इति ल्यातिष्ञषु ; ` |
१९०. + ५ देवतामूर्सिपरकरणम्
| । [ इश्िद्गरक्षणम् |
उ द्धो ध्यहीनं यद्धिङ्खं गारर्कर भवेत् |
दीर्घवा सन्धिरे(वाखा)भियक्तं काकपदा८ि
, [ स्फाटिकलिङ्गमानम् |
एकद्विव्यङ्कला बद्धिहौनिरायादिशुद्धय ।
भात्रादि स्फाटिकं लिद्ध यावदेकादशाङ्खलप् ॥१०१
। इति दार्जानि स्फारिकानि च) ]
[ अथ बाणलिङ्ानि |
1 [ तत्न िङ्गोत्पत्तिस्थानानि ]
कुरुतेवे च खिङ्भानि सरस्वत्यां तथा पनः
वाराणध्यां प्रयागे तु गङ्घयाः सङ्गमेषु च ॥ १०२ ॥
यानि बे नर्मदाया अन्तववेदे च सङ्गमे ।
केदारे च प्रभासे च बाणरि्धं सुखावहम् ॥ १०३ ॥
(दिकेः)॥१००॥
[1 ०५०५०१५
~~~
4 विल्तराद्ध कक्कुटाण्डं त्रिभागेकभागे जडचन्द्रकम् अर्टाशीकतस्य साद्श्यंेन तुल्यं उुद्वदाङृति शिरः [व
स्यादित्यर्थः एवं पञ्चधा वर्तनं भवेत् । तथाच शिल्परत्ने-- `
छत्राभं त्रपुषाकारं कक्वयाण्डनिमं तथा ।
अद्धन्दुसषशं चाथ बुददाभन्तु पञ्चमम् ॥
सद॑षामपि छि्ञनां शिरसो वत्तनक्रमम् । इति । |
(उ० अ० र, इछलो° ११६-१९७)।
१०० । सम्प्रति दुष्टलिङ्ञन्याह--उद्धधोमध्यहीनमिति । म्रत्थान्तरेऽल्य श्ल्षणोद्धारः
| इति क्षिरोनाम इदयते। तस्य च वर्जनीयत्वमाह--
शिरसो वत्तनोपेतं रक्षणोद्धारवर्जितम्? इति
(कादयप० अ० ४९, इ्छो० ४)।
४. ध एतच स्फाटिकादिरिङ्गविषयमिति सम्भाव्यते, तत्ेवेतेषां दोषाणां इष्टत्वात् । तथाच शलिल्परत्े `
, ` रत्नवोषमधिक्ृत्य--
रेखा बिन्दुः करश्च काकाङ्श्रि्षतधृख्यः। = `
4 ( तुषारत्रासरन्घाणि यत्नाद् रलष्षु वजयेत् । इति ।
¦ ( उ० भा० अ० १, शछो० ३९-३६ )। | । |
` षष्ठोऽध्यायः १२१
[ बाणरिङ्गपरीक्षा |
(नारएवार) यस्येव तुखसाम्यं (जनायते
णं समाख्यातं रोषं पाषाणसम
[ बल्य॑नाणषिङ्गानि ]
स्थूलं वर्च दीं (स्फटिकं ! स्फुटितं) (चिन्न!
वन्द
युक्तश शृलग्रं कृष्णञ्च (विषवि)पिटं तथा ॥ १०५
(वक्त्ए्वक्र)च मध्यहीन् बहुवणेञ्च थद् भवेत् ।
वजयेन्मतिमषटिङ्खं सवैदोषकरं यतः ॥ १०६
[ कचित् पाषाणस्यावि पूज्यत्वम् |
महानदीससुद भूतं सिद्धन्तेलादिसम्भवम् ,
पाषाणं परया भक्त्या रिङ्गवत् पूजयेत् सद! ॥ १०७॥
[ यथातथावस्थितस्यापि बाणस्य प्राशस्त्यम् |
पुष्पषीटमषीरं वा मन्त्रसंस्कारवजितप् ।
। भुक्तिमुक्तिकरं बाण सवेप्रासादपीटकमप् ॥ १०्द्॥ ` | । | । ५
| | [ भोगद्बाणश्षणम् ]
उद्स्थलं कृशं चाधो यवा लिङ्गं निवेशयेत्
तदा भोगं विजानीयात् पुलपो(त्रा्र)श्च वधते ॥ १०६॥
| 0 11
१०४1 बाणलिङ्गपरीक्षामाह--जिपञ्चवारमिति ! यत्येवेत्येवकारो भिन्नक्रमे !
निपञ्चवारं पद्चद््ावारम् एव दुराखाम्यं न जायते प्रतिवारमेव मानं मिदते इत्यथः, तदा बाणं `
बाणरिङ्गं समाख्यातं कथितं सुनिभिरिति शेषः ; “अमेयः खलु भगवानि'ति भावः । ८ ।
१०७। महानदीति । रूपमण्डने (८ अ० ४, श्छो° ७८ ) प्परन्थान्त हत्युपकरम्यायं `
शोः पठितः । रिङ्खवदिति बागवदित्यधैः, तस्येव प्रल्तावात् ।
| १०८॥ दुष्पपीडमिति। प्राणतोषणीतवीरमिन्रोदयेऽयं श्लोकः ुष्पपीठमित्यन्न |
श्तत् सपीठःमिति, युक्तिख॒क्तिकरमित्यत्र “सिद्धिसुक्तिपरदःमिति 'पीर्कमित्यत्र वीकयामिति च॒
` षिपरिवत्तनेनोपरभ्यते। एवमन्यान्यपि रक्षणानि पोराणिकान्येवेति द्यम् । ॥
| र ठ नन र ५
। 6 >
` रे(षाखा)कीरकसंयुक्तं सुवर्णं च निवर्णैकम् ।
` रक्तं कृष्णं तथा श्यामं पीतं शुङ्कं च पाण्डुरम्
सदोषगुणसंयुक्तं बाणं पूर्य निलशः। `
बराछृक्मीं समाक्रष्य भुज्यते बाणलिङ्गतः ॥ ११३
तस्माच्छतगुण (पुष्य पुण्य) ततसस्थापनपूजनात्
बाणलिङ्गं तथा पूज्यं ततसंस्थापनसुत्तमप् ॥ १९९ ॥
[ बाणल्यापनप्रहञंसा |
सर्वयज्ञतपोदानतीरथवेदेषु यत् पलम् ।
॥
यो विद्धं स्थापयेदेकं विपिपूर्वं सदक्षिणम् । ` श
1 ॥ सर्वागमोदितं पुष्प! प्यं) कोटिकोटिगुणं भवेत् ॥ ११६
। दादामि नोता ततान 0
शंतवारं कुरुचेत्रे सहस्र जाहवीषु च ।
नमेदाया लन्लेण कोरि च कुरुजाङ्गले ॥ १९.७
कृता स्नान (पी! पि)ण्डच हृतं वान भोजनप्।
गुणितं कोटिवारओ सवपुण्यं लभेन्नरः ॥ १८ ॥ `
1 ध १८०५ उभ्वङृशमिति । पूव भुक्तिमुक्तिकरं बाणम्" इत्युक्तम् , तत्र कीरं युक्तिं 1
कीदशं वा सुक्तिकरमित्येतदाह श्ोकदयेन, तत्रापि पूकरलोके जुक्तिदशिद्धरक्षणमुक्तमितीदानीं
५ ` अुकिदरिङरक्षणमादेत्यवधायं अर्थवानपि यथाश्नतः पाठो विपरिव्तित इति हेयम् ` ४ ५
(बाणलिङ्गा तु लिङ्घनामाकर्बाणां ?) स्वयम्भुवा ।
पीट पर! प्रासादस्य यथेष्ठं कारयेत्
[ एकाखादिबाणमाष्ात्म्यम् 1
एका(ख) स्रोबाणमारभ्य यावच्चतुदंशा(श्रयम्? खक
पूजया परया भक्तया सवंसोख्यप्रदं चणा ॥ १२९२९ ॥
शनुधाः ॥ १२९१
धातवे शतहस्तेषु बाणे प्शतेषु च।
खयम्भूसहसखहस्ते शिवती्थोदकं स्पृतम् ॥ १२३ ॥ `
[ किवतीर्थोदकल्य पुण्यजनकत्वम् 1 क
ल्लाने ते महत् पुण्यं लिङादिषु दिशं प्रति
| [ शिवतीर्थादकलहुने प्रत्यवायः ] ४
लद्धिते च महत् पापं शिवल्नानोदके नृणाम् ॥ १२४
[ प्रदक्षिणनियमः ]
४५१
[: एकां चण्ड्यां (वरे ! रथो) स(पत् ? प) तिसो दाद् विनायके ।
॥ [ जेनदेषार्ये विरेषः ]
जेनदेवाग्रसंस्थाने स्तोवमन्त्राचेनादिकम्।
(पृष्िःदष्टिः) प्रदातव्या (सन्मुखं?) हास्लक्ननम्
~~ वि -.--
५८. श ` । | 1 देवतापूत्तिश्रकरणम् |
स ॥ | [ प्रणारदिङ्नियमः } `
10: @; हर भरणाल चोत्तरे शुभ 8
स्तं स्वदेवानामिति शाल्लाथेनिश्चयः ॥ १२७ ॥
[ पिण्डिकाया रक्षणम् |
| (आतत)दो ब्रह्मविष्णोश्च पिण्डिकाना(सुपध्य)षिदुः।
| [ तस्याः स्वजातिकन्तेव्यत्वम् |
` जात्येकया विधातव्यं नेष्ठमन्योन्यसंकरम् ॥ १२८
[ तत्र मतान्तरम् ]
आहुः शंलेष्टमेकेचित् पीठं पकेटकाम(दम् एयम् ) ।
[{ पीठानां सन्धिष्थानम् ]
उषयपरि पीठानां सन्धिरङ्गवसानके ॥ १२६ ॥
[ नारूमध्ये कणसन्धेनिषेधः |
मारस्य मध्यमध्ये च क्णैसन्धि न सन्धयेत् ।
[ प्रणारङभागकथनस् ]
प्रणालन्तु त्रिभागेण तततव्यं चा(्मा्मार्धकप्॥ ९३०॥ `
त्रिधा विभक्तमग्रे तु मध्ये सजलमा(ग ? मतः
| कन्देतु पादमेकेकं मध्यवंशोद्धवाकृ(ती ? ति) ॥ १३१॥
~ ४ 1 [ मेखछा | `
` प्रथुपीट{स्तुनां!गुणाँ)रेन मे(षःख)खा श्रवणाकुतिः
4 [ खातविघानम् 1 |
^ मेखला (च!) त्रिभागेण खातं र्यत्तिथा परम् ॥ १३२
नामा षि [र
७७७
> . कर्तन्यः। प्रणाको जकनिःसरणमागंः ।
६ 8 व वि ॥ / ति व्याख्यानायोग्या । (1
१२७ । यत्य देवाखयल्य पूवस्यामपरस्यां वा दिशि द्वारं वत्तते तत्र उत्तरस्यां दिलि प्रण।छ 1
१३२ । इदानीं पीष्कामाह--मेखलेति। पचचश्छोकीयं क्विद् विक्रतपाटा कविदन्- | 1 |
वष्ौस्ध्यायः ` [क १२४
(याम्ोदस्तत् ¢) संपादमगरे स्यात सार्घभा
| | [ पी ] |
मेखलामध्यकन्तैव्या नवषीटन्तु कामदम्
भागेकं भूगतं कार्य त्रिभागं (कत्ते)कण्ट)पदिका ॥९३४
भागोगाधं मुखप (स्कन्धता्धंत्रिभागोन्नतप्
१स्कन्धं साधंत्रिभागतः) ।
स्कन्ध पटिकाद्(चं न्दर) भागाधं चान्तरपतिका ॥१३५।
कणकं सर्धं भागे >‹ > >‹ कथिन्निका भता ।
` द्विभागं चान्तरपटं (कच) (धोताविद्वितार्धकाः!) ॥१३६॥ क
(अधं च मघ्रासपद्टि)कतेव्यं षिधिपृवेकम् ।
अघं स्कन्धपटिकाख्या त्रिभागं स्कन्धशोभनप् ॥१३७॥
(अर्धमुखपहिका कार्या कर्णके तु भाग॑कम् १) ।
शोभनमश्टभागेकं कतैव्यं तमशङ्खिते ॥१६८॥
। [षिष्ीवयोन्युनाधिस्न्विषः] =
यावदीघं भवेिद्धं ताषत् स्यात् पीठविस्तरम्।
उमा तु पीठिका ज्ञेया लिङ्क शङ्कर(सुठच्यते ॥१३६॥
| | [ तथोन्यूनाधिक्ये दोषः ] (
न्यूनाधिका न कर्तव्या उमा च शङ्करस्तथा ।
५ न्यूनाधि(क)के) कृते दोषा (्षरते रा्विश्रमम् १) ॥१४०॥
[ पीठिकामेदास्तन्नामानि च| -
(रस्थण्डिला चेव (वापी च यक्षी शवेरी तथेव च ।
` (मण्डला पूर्णचन्द्रा च गवज(7पद्यङ्घ(तीएति)स्तथा॥१९१॥ = `
. प कृत्या मत्टलगकारय मेखलाभिरलङ्कता ।
वतां
मधेचन्द्रा (णत्रिकोणा च विज्ञेया दश पीटिक
9 [ पीतिकिरक्षणम् |
चतुरा स्थण्डिखा स्यात् संयुता मेख(खाले)कया ॥१४२॥
चतुरा यदा वेदी स्वेकामफलप्रदा ।
[ इति स्थण्डिला(१) 1
4. जवस तंत विया गान सिदित ।4 २२६
। [ इति मण्डरा(५) |
पूर्णचन्द्र (विनि)भाकारा मध्यन्स्तद्विमेखला । `
विज्ञेया पृणचन्द्रा सा रुद्राणीशतसंप्रिया ॥१४९॥ `
४ हि [ इति पूणंचन्द्रा(६) |
षडसरा च भवद्रज्रा मेखटात्रयभूषिता ५
[इति बज्ञा(७) ]
षोडशाखा भवेत् पद्या किथिच्च(स्यास्यान
मरणाखवत् ॥१४५।
4. ति पा
ठभ्रज्यधनु(षाएरा)काराऽधेचन्द्रा चेव सा भवेत् । `
` [ इत्यधंचन्द्रा(&) |
अल्ला लिकोणा विज्ञेया सा शक्त्या सहशा भवेत् ॥१४६
[ इति लिकोणा(१०) |
[ आसा फम् |
स्थण्डिल पीठिका यत्र धनधान्यार्थदायिनी ।
` मदिषीगोप्रवा वापी यक्ती सर्वार्थवायिनी ॥१४५७॥
[1 माता 9१०८०५५
१४६॥ रकषज्येति ज्याुक्तधनुराकृतिरित्य्ैः ; एवं शाट चनदाङतिेत् ।
१९७॥। ददान पौिकानां नामभेदेन फलान्याह --स्थण्डिकेति । अत्राऽऽयायाः स्थण्डिलायाः . `
परं वापीयक्षीवेरीणां तिसणां पीठकानां रक्षणं नोपल
ह्येते, वेरी तु वेरायमाणेध दश्िथं परिहतव रे तवती ।
रुध्यते । फलकथनप्रस्तावि युनर्वापीयक्ष्योनामनी = `
(वि षष्ठोऽध्याय तः ~. ५
मण्डला की पूण॑चन्द्रा तु शान्तिदा ।
वा शलुविनाशाय पद्मा सोभाग्यदायिनी ।
अधचन्दरा सुखाय स्यात्तिकोणा शल्ञनाशिनी ॥१४८॥
| [ पीषठिकानां स्जातिकर्तन्यता ] |
शेखजे शेलजा योज्या दारुजे दारुजा शुभा ।
पार्थिवे पाथि(वाण्वी) कार्यां लोहजे रोहजोत्तमा ।
रलजे धातुजा शस्ता रतजाता विशेषतः ॥१४६॥
[ प्रणार्न्यवल्था ] |
मूखाद्र प्रणाख(स्या!स्य) परमाणारपधिकं शुभम् ।
जलख(मग्राविभाषेण एमाेस््रिभागेण) |
चाग्रतस्त॒ सुशोभनम् ॥१५०॥
४ [ उुखलिङ्म् ]
सम्भुं (चेव?चेकोवक्त्' स्यात् लिव(क्तकले) प्रष्टतो नहि ।
पश्चिमस्यं स्थितं शुरं कुङ्माभं तथोत्तरम्
याभ्य करष्णकराखच प्राच्यं दी्ाधिसनल्लिभप् ॥१५१॥ `
| [ ञुखनामानि |] |
सश्यो वामं तथाऽघोरं पुरुष चतुथकम् ।
पचम तथेशानं योगिनामप्यगोचरम् ॥१५२॥
. वामे गणाधिपत्य् द्लिणे पार्वती स्पृता । ५
ने स्ये भास्करं विथाद् वायव्ये च जनादेनम् ॥ १५३ ॥
त्ता नण न्न ०५५०७५५१०५०१५५
५ काण
१९१। मुखरिङ्गमाह--सम्सुलमिति । पततपूरवाद्धत्वेन सूपमण्डने-- `
| सुखरि्खं त्रिवक्त्' वा एकवन्तूः चतु खम्,
(नभव्ेभ) |
इति पीठिकामखट्ङ्िधिक्रारः। |
| | त | । त
दैवतामूत्तिप्रकरणम्
मात् भर्मातरस्थानं कारयेदक्तिणां दिशम् ।
म्ये शान्तिरहं कुरया(वदय)क्ाधीशख पश्चिमे ॥ १५४।
इत्येकद्वारशिवायतनम् |
वामे लानं कुर्याद (यशो?) ह्वार दक्षिणे ।
1 मध्ये सद्र प्रकत्ते(द्यं0३यो) पातस्थान् दल्लिणे ॥१५५॥
(वामवामे) देवी महालच्मीरुमा वे भेरवस्तथा ।
ब्रह्मा विष्णस्तथा संद्र प्रष्टेशे तु कारयेत् ॥ १५६ ॥
चन्द्रादित्यो स्थितो कर्णे आग्नेय्यां स्कन्दमेव च,
` नन्दी सुकुटशोभाल्यः सर्वाभरणभूषितः ॥ १५८
खटूाङ्गव कथा उमरू बीजपूरकम् ।
` दं्कराखवदनं महाकालन्तु दक्तिणे ॥१५६
तजनी च विशूल डमरं गजमेव च । ०
(हरे्षहर्म्बो) वामभागे स्यद् भङ्गी दक्तिणतः श्णु ॥१६०॥ `
ईशाने विघ्नराजं तु धश्चमीशानगोचरे ॥ १५७ ॥
इति चतुज्रखशिवायतनप् |
द नगेन्द्र )) उमर चात्तसृत्रकप्
इति पूर्वप्रतीहारौ। `
गजं उभरखटाङई तजनीवामहस्तकः ।
उभौ च दक्षिणे द्वरे गृङ्गी दक्षिणतः शुभः ॥१६१॥
` धिशूलं उमरुथेव खट्ग कपालकम्। `
डमर तधा दण्डं बीजपूरं तथव हि ॥१६२॥
क व ------
इति द्निणप्रतीह्यसे ।
०9
न
7 ॥ १६३॥
श्चिमप्रतीहारो । र
| [ बाहनविधानम् 1
१ यस्य देवस्य तत्तस्यामे कलप
एक-द्ि-त्रि-च (तत् एतुःपञ् वा
वाहनं मृत्तिलिङ्ग् मूलघासादमानतः
वृषभस्य (विभावन्ते))खिङ् दशं नियोजयेत्।
सूर्यस्याग्रे भवेत् सोमस्तनसूत्रसमोद(धं१यः) ॥१६७॥
१६२ । अनेन वक्ष्यमाणयोः पश्चिमप्रतीहारयोरायुधानि प्रतिषादितानीति तत्वम्! `
सवषामेव प्रतीहाराणां चतुभंजल्वमनुमीयते प्रहरणचातुर्विध्यात्, इह तु द्वितीयार्धे श्रीण्येव `
प्रहरणानि प्राप्यन्ते । शूपमण्डने तु--"कपारं डमरु" दण्डं बीजपूरं तथा दधत्, ( अ० ४, श्लो
१०४) इति यथापएूषं चत्वायवाऽऽ्युधानि छभ्यन्ते ।
१६३। प्रतिद्वारं दौ ष्ठी प्रतीहाराविति प्रृतम्, दह सेक एव रम्यते व्पाण्डुरः
इति । सूपमण्डने--दुसुंखः पश्चिमे वामे पाण्डो दक्षिण तथाः (अ० ४, शको १०६)
इति द्भावे प्रतीहारौ निर्वो) अत्र भ्न्थछ्तुप्माददिकः प्रतीहारो स्तः किंवा पाण्डरनामानौ
| डेव प्रतीहाराविति चिन्तनीयम् । एवच्च शवाण्डुरा"विति द्विवचनमेव न्याय्युद्पम्यामः 4 अत्र॒ `
॑ ` श्वामदक्षिणः इति युगपदुभयपादवेयोस्लेलात् पाण्डर इत्येकमेव नाल्ना निवि दव प्रतीहाराविति `
` च नायोक्तिकं वक्ुमर्हामः। अपि च पूर्॑श्ठोकेः द्विधेवाऽध्युधानि प्रतिपादितानीत्यपि प्रतीहार- =
दघं निबौघमुपन्यस्यति ।
. १६४-१६९। उत्तरद्वारप्रतीक्रावाह--सितक्रेति। उत्तरे द्वारे वामे सितः दक्षिणे मित ५ | ४
इति वतुरोऽथेः। तदयं संकषपः--पूषंहारोभयपादवंयोनेन्दिमह्ाकारो, दक्षिणद्ारपारर्वयो्रम्ब- = `
गङ्धिणो, पश्िमद्वारपावंयोः पाण्डरो, उत्तरद्वारपापलयोश्च सितास्िताविवि ।
देवता--१७
० | [ बाहनहष्िकथनम् |
पादं नानु करि' थावन् (मज)मृत्ते)वाहनहक् शुभा ।
स्था(न(न) नाशं करोत्युध्वाऽधोटष्टिश्च ्रजाच्तयम् ॥१६८
(धातधाता) दिवं प्रति(हातगृगतः) कलनेऽस्य रूप॑
(तत्यादयुग्ममगमदहाशो हरिहय्थ) ।
शतो न पारमम(्वपीष्वपि) नवनी(माएय.)
क यदुपरि विरि्रिच ५ चं यातो" इत्यादि स््तिरत्रमूलमदुलन्धेथम्
मव्य(ताक्तोरूपममरापिपतेश्च पातु ॥ १६६ ॥
इति श्रीत्ते्रा > > > > विरचिते बास्तुशाख्े रूपावतार
शद्रसूत्तिलिङ्खाधिकारो नाम ष्ष्ठमो(ट)ऽध्यायः।
१६८ । व्याख्यातमिदं प्राक ( पु५ ८८ श्छो° ६8६ ) |
१६९ । अन्ते अध्यायान्तसुंख्यतः प्रतिपाचमाचं महादेवं ह्तौति--धातेति । द्वितीवपदे | `
४ 1 तस्मादुयुग्ममगमदं बहुशो हरिश्चेति कथञ्धित् स्यात् । तथाचायमर्थः--अल्य रूपं करने क्प | |
` करूयितुमित्यथेः, घाता दिं प्रतिगतः, र्थि तघ्माह् धातुर्युग्मं पृथगित्यथं बहून् | ध 1 1 ५
कोकानगमत्, उभावपि यस्य पारमन्तं न यातौ तल्याव्यक्तं रूपं पातु । (्तवेश्वर्थ यन्नाह `
। 1.41 भ ५ शि
[ भथ चतुविंशतिस्तीथंडयः
4 [त <+ (>| (३) ८ ¢ (2.1) | ॥/ (2 ८“ नत १ ) ( च ९ नु <] १. र
(सुमतिः (पद्मनाभश्च (अमूर्याधेुपा््व) स्तमानतः॥९॥ `
॥२९॥ ।
१६)शान्तिश्च ९७१८ पुथार १ कन्थनाथार ) (ऽमह्ययो
-पा(यो्वनाथो(र्वर्षमान- `
(नाभि या? (श्नमि (स्रनेरि
ते मतास्तीर्थङ्करा बुधः ॥ ३
। चतुतिं शतिरिः
१--३ । यावद् देवतमूत्तिं कन्तंकामः सम्प्रदायविशेषाणामेव ताममिधाय यन्तः
त्तदाऽवशिष्टाऽपि जैनदेवतानां सूक्तिः किमनेना्तानादवन्तानाद्ठोपेशषितेति शिष्याणां भ्रमो मा
भूदिति जिनानां मूर्विमाह--चषम इति । जिनाश्च सवं एव समानाकृतयश् इति तेषा मृत्तौ =`
विकेषमनमिधाय विरोषवतीस्तच्छासनदेवतानां मूतीरेवारे रक्चपिष्यतीति सेयम् । ध ध |
| जैनानां समये उतसर्पिण्यवसर्िणीति द्विषा युगानि भिन्ते । तत्रावसर्पिण्यां जना उत्ताः |
ऋमेणावनति प्रपचन्ते, उतसर्पिण्याञ्ावनता जनाः ऋरमेणोन्नतिं रभन्ते । अवसर्पिणी अतीत ।
युगस्य उतूसर्पिणी वत्त॑मानयुगल्य संहा । अवसर्पिण्याल्ये व्यतीतदुगे चतुविशतिस्तीर्थं #
` विलीनाः, वत्तमाने उवसर्पिण्यारूये युगे पुनश्रतर्विश्शतिक्षबभृदचः । तेषामेवायमधिकारः कारः, =
| सएव च जेनेदंवाधिकत्वेन पू्न्ते मन्यते च देवा अप्येतानच॑यन्तीति । अत्र च वमान = `
धुगीयलीधं्कराणामेच मूकतिः ऋमेणोष्िखितेति केयम् । रूपमण्डने पुनः--“एतल्या(मिष१ मव ) = `
५ ` सर्पिण्या (ऋ १ ष्ट) षभो ( जिन? ऽजित ) सम्भवः" (अ० ६; श्टै+) १ कमी इष्यते; `
श्पुष्पद(न्त १ न्तः) (शीत(खा १ छो) `
स्तः परम्|
व दिषः
र्वङ्करा
श दैवतात्तिरकरंणम्
नि ५ [ निनानां वणः 1
रक्तो च पद्मप्रभवासपूर्यो
शुक्छो च चन्दरप्रभपुष्पदन्तो
वर्षभ इति अस्थाऽऽदिनाथ इति नामान्तरम् । (६)पद्मनाभस्यापि पश्मप्रभ इति नामान्तरं
एपमण्डने ( अ० ६, श्रो १), शीरलसूरिछृते चतुरविंशतिनिनल्तुतिंग्रहाल्ये भ्रन्े चोपरुभ्यते ।
अन्धङ्ताऽषयुचतरतर वणेनिणंयावसरे पदप्रभ' इत्येव नाम तमिति द्वयमपि साधु । सतमानत
इति छपाश्वः स्तम इत्यथः । (८)चन्दरप्रम इति, चन्दरपथुरिति जिनस्तुतौ सूवनायासुपरभ्यते ।
मूरुयन्थे पुनः--
| = च्वन्द्रुप्रभ च्रिभुवनाधिपते प्रघीद सोभाग्यद्ठन्दरविभो इरराबरीद
इति यथोक्तमेव नाम इश्यते! यच्च जेनपद्मषुराणे श्ञशिष्रतपर्ुः" ( पर्वं २० शछो० ८ )
इत्युपलभ्यते, तत्र 'दशद्तप्मः' (्लशचतप्श्ु्वौ भविष्यतीति सम्भावयामः। (९) पुष्पदन्त
^ इत्यल्य रूपमण्डने (अ० &, श्छो० २ ), जिनस्तुतो, पद्मपुराणे च 'डविधिःरिति माम । यद्यपि
(तक्षकः इत्यत्र हिपिह्ृतप्रमाद्दधा (धमकः इति कल्यनमतिसाहसं तथाऽपि यथा्थपाणेद्धि |
। ब्धपरिक्राणामलमाकठं न केवलं रिगह्तधमादोच्छेदे तात्पर्यं सङ्खोचनीयम् , दर्शितमेतदर्वाग् `
| द्विष्यते चेत उद्ुभपि। उपरुम्थते च “धर्मकः इति नाम जेनपदयघुराणादौ स्पमण्डने च
| (ज० &, शलो० ३१ )। एवच्च पुष्पदन्तः दृतयननाप्यपेक्िता शद्िनं कृतेति न्यनतां छन्दस्या-
सञ्चयता कथद्ित् छलमनुभूषते । यद्वा उभयत्राप्यनपेक्षिता श्ुद्धिल्तन्त्ान्तरे तथाविधाभिधानस्थ
` पम्भवादितिदिक्। `
नमीति । नाथपदल्य सवन्नवान्वयः, नमिनाथो नेमिनाथः पार्वनाथक्चेति । किच्च शसम `
0 ॥ इत्यादीनि सर्वाण्येव नामानि नाथान्तानीति जेयम् 1 वर्धमान इत्यल्य महावीर इति नामान्तरम् `
| भल्येवायं ज्ञास्नकालः। तथाच--श्चिमो वीरो श्चासनं यस्थ वर्तते" इति ( जे प० २०।१०)
४। जिनानां वणानाह-रक्तौ चेति। जेनपद्मषुराणे एनरन्यथेव वणनिर्दैशः। `
बन्द्राभश्न््रसंकाशः ुष्यदन्तश्च कीरसितः। परियड्गुमञ्चरीवणेः उपाद्व जिनसत्तमः ॥ ५0
। . भपक्दारिद्काशः पाश्वौ नागाधिपर्तुतः । पञ्मगमंसमच्छायः पदचप्रभजिनोत्तमः ॥
किञचकोतकरसंकाशो वाडपूल्यः प्रकीर्तितः । नीराञ्नगिरिच्छायो निखबततीर्थद्त् ॥ ४ | | <
| : मयूरकण्डसंकाशो निनो याद्वपुद्गवः। छतपकाञ्चनच्छायाः शेषा जिनवराः स्ताः ॥ ` 1
इति (पवर २० षो" ६३--६६) ,
[ि
(उत्तरा फल्गुनी चेति जिनानां जन्म
(२०६०) पा जैनपदमषुराणे । रूपमण्डने ^ ठ |
८ ` (भर श्छो० ८ ) इत्यपपाहः । ^ ४ ५ 1. ` |
सतभौऽध्यायः 3१३ |
[ जिनानां ध्वजाः ]
`गजोऽरश्वः “'घुवगः (“क्रोओो (5
भ्रीवत्स(षट्भि ? !९खड्गी) (येम महिष > 0
(रशक्रस्तथा॥५॥ `
(१०श्येनो (९८ ज९६)सरग(श७च्छागा (नद्या ! (शतनन्या) |
नि वत्ता (१<घटोऽपि च ।
कूर्मो (शनीरोतपरं (र्रशंखः (रशेफणी (षहो १ (रणसिंहो) = ¦
ऽहेतां ध्वजाः॥ ६॥
[ जिनानां जस्मभानि |
(१उत्तराषाढ(ररोहिण्यो श्रगशीरष (*पुनवेसुः ।
| (भा (चित्रा भविशाखा(नश्वाऽतुराधा (मूलमेव च ॥७॥ = |
| (पूर्वाषाढा (४ुतिश्चैव (रयशताभो(््तर (भव्रपं?मादरपत् ) । |
| ` पणखाती च (५पुष्य($भरणी(७छ्त्तिका ("रवती कमात्॥९॥
(्अश्चिनी (रणेश्रवणा(रश्िन्यो तथा (द्वित्रा ^
सधविशाखिका । =
( नानि ? भानि) वे॥&
1
नम १४०
९-६ । जिनानां ध्वजाय यथाक्ममाह--इृष इति । `
५-९। यथाक्रमं जन्मनकषत्राण्याह--उत्तरति । श्छगशीषमित्यत्र पिन्यस्" इति = |
` जैनपदषुरणे पाठः। विाखेति तदधः । तत्र पवान्द्कष् इति वा, व्याकरगसंसकारः =
पुराणेऽनावश्यक ईति 'देन्दणक्चम्ः इति वा पाठो भवेन्न वेति चिन्तनीयम् । स्वातीत्यन्न |
` भवतीति (२०।९० ! ) रेवतीतयत्र रोदिणीति (२०।५४ ) उत्ता ल्युनीत्यन स्तेति = |
शवती पुष्यमरणी छत्तिछठा रती क्रमात्" = |
। [ निनोपासकयक्षनामानि]
स्य (ख्ये १ खो) (रमहायन्ञ(रलिसुखो (
तुम्बरः &कुसुमश्चापि (मातङ्को "विजयो
1 ( (जयः ? ऽजितः ) ॥ १२
(चरा (११ य्लेट(^२कुमारः १३.बृ८सुखः ८ १०पाताख५५किन्नरः।
(गरुडो (१०गन्ध्वो ("यतर् (१९ुबे
(रेअङुटि< गमिघ(यार््वो (रणमातङ्गोऽहै(ड् ! दु )
1 + पासकाः ॥ १३ ।
1 [ जिनानां श्ावनदेवताः]
` (शोचक्र(रोश्वर्यनितबला (दुरिता रि ]श्च ® कालिका ।
। (महाकाली (श्याम(ेशान्ता(रध्नकुल्य ( स्प १ श्च )
॥ (शपुतारका ॥ १४
(अशोका (र्मानवी (ररचण्डा (शषिदिता (र्ण्वाङ्कशी तथा। `
५1. (“कन्दर्प (६! निर्वाणी (ग्बलछा (रूधरणी(दधरणप्रिया ॥१५।
1 ५०१
+५८११५८४५.१५ 1
जय इत्यत्राजित इति नाम सथुपरम्यते ; परं तत्न च्छन्दोभङ्घािकोष
१२ । शुम्बः इत्यत्र पुस्बरःरिति रूपसण्डने (अ० ६, श्छो० १२) । प्रातित्विकरक्षणनिणंय- = `
गदिदेष आप्रतेदिति जय एव ५
918. स सुखो यत्तो हेमवर्णा गजासनः॥ १७।
त्सूलं पाश बोजपू(रं) करेषु
[ इति गोभुखः १ |
चक्रेश्चरी हेमवर्णां ता्यारूढाऽध्बाहका । `
¦ बाणं चक्र शांङुश वक्ता १ शक्त्य)श निधेनुः ।॥१९
4 [इति चकरेश्वरी १]
` अ(ति!?जि)तस्य महायत्तो (हरा ! हेसा)रूढश्वतुमेखः।
` वरसुद्वरा( शा ? शनि )पाशाङ्कृशशक्स्यभयानि 1
बीजपरंच॥ २०
(क ` [इति महावक्षः] .
चतुभैजा गोरवर्णां गोधारूढाऽपराजिता। = ।
` वरं चेव तथा पाशमङ्कशं बीजपूरकप् ॥ २१
० [ इत्यपराजिता ? अनितबखा २]
सम्भवे तरिसुखो यत्तः श्यामो मयरवाहनः। - ८ ८.
नकुख्गदाभयान्लं नाग बीजपूरकम् ॥ २२ ॥
| ` [दति निमुखः३]
१७॥ इदानीं यस्यः तीर्थङ्करस्य यो यक्ष उपासकः, या च शासनदेवता तानू क्रमेण |
वक्तमाह--अथात इति । तन्न एकेन शोकेन यक्षमूतीरन्येन शासनदेवतामृर्तीव॑क्ति । एवमेव = |
चतुर्विंशतितीथ॑ङ्रणाम् उपसकान् शासनदेवताश्व प्रतिपादयतीति दरष्टञ्यम्। 3 ¢ |
२३
न [इति दुरितारिः ३]
श्यामवर्णां १ णा) गजारू(ढा ? ठ ) ईभ्वर-
५ (भ्वा १ शा)भिनन्वने
मातुलिङ्गाक्तसूत्रथ शङ्कशं नकुलं तथा ॥ २४ ॥
{इति यक्ञनायकः ७ ]
कालिका भ्यामवणां स्या(त्) पद्मारूढा चतु जा ।
वरं पाशाङ्कशं नागं वक्निणा( खश्र ? धश्च ) खष्टितः ॥२५।
। [ इति कालिका ७ ]
(115 तार्त॑यस्थं (वरदं १ तुम्बर) भ्वेतं सुमतो तु चतुभेजम् ।
वरदं च तथा शक्तिनागपाशं गदा(धरे १ करे) ॥ २६॥ `
~ | [ इति तुस्बरः ५ |
महाकाली ( महे ? हेम )रणा पद्मारूढा चतुसुजा ।
` वरदं नागपाशं चाङ्कुशं स्याद् बीजपूरकम् ॥ २७ ॥ `
1 ` [इति महाकाली ५]
(षमपन्नख १ पद्मनाभस्य ) कुसु (मे? मो)
५ नीलो हरिणवाहनः
ब्रीजपूराभयं चेवात्तसत्रं नकुलं तथा ॥ २८॥
ध [इति कुषठुमः £ |
निन ५
` २४। वर इति क्षनायक इत्यर्थः ।
२९। दक्षिणाधर्च खष्टित इति खुकिमेण अनुरोमेनेत्यथैः ! - दक्षिणाधक्व इति । ५
५ दक्षिणयोहस्तयोरधःक्रमेण ।
२८। यद्यपि '्दमपन्नख' इत्यत्र श्द्प्रमस्यः इत्येव शुद्धिः स्वाभाविकी पदरभरभ
(5 तथाऽपि मूले तथाव्रिधपारानुपकम्भादियं शदधिरस्माभिं भारिं
सप्तमोऽध्यायः | १३७
णैः स्यान्मा ( तङ्क १ तङ्ञो ) गजवाहन
) शरलीपाशं चाङ्कशं च नकुटं तथा ॥ ३
[ इसि मातङ्गः ७ |
शान्ता [ भवेत् ] सुवर्णास्या गजारूढा चतु जा
वरदं चाक्षसूतं चाभयं तस्मात्तिशूलकप् ॥ ३१
[ इति क्लान्ता ७ ]
चन्द्रपरभस्य विजयो विनेवो हंसवाहनः
द्विभुजो नीख्वणेः स्याच्क्रं च मुद्ररं कमात् ॥ ३२ ॥
[ इति विजयः ८ ]
` भ्रुकुटिः पीतवर्णां स्यात् सिंहारूढा चतु जा । `
खड्गं तथा सुद्ररस्च परशु खेटकं कमात् ॥ ३३ ॥
[ इति शङ्करः ८ ]
अजितः पुष्पदन्तस्य कृमारूढ ८) सितो भवेत् । `
बीजपूरात्सूत्रच कुन्त नकुलं कमात् ॥ ३४ ॥ `
[ इत्यजितः, जयः ९ ]
सतारका श्वेतवरणां ब्रषारूढा चतुभुजा। `
वरदं चाक्लसूलं चाङ्कशं च कशं भवेत् ॥ ३५ ॥
[ इति खतारका ९ ]
णोमा
म ~ -~- ॥ ॥ -
३०। नकं वा्ययन्त्रविशेषः ।
¦
1)
पूर्वपदे सन्धिला विकृतिरप्येतदेव मतमनुद्ुरयति ।
३३। श्रङुिसित्युदेश्ोके (५७१४ ) ।
३२ । त्रिनेत्रः इत्यन्न 'द्विने्रः इति पाठः श्रेयान्, द्वि्ुजमूर्तौ ने्रत्रयस्थ विरख्दक्णेनत्वात् । | ६ |
शदेन
३६ ।
[ इति ब्रहम १०1
[ इति यक्षद् ११ |
| चतुरसंजा गोरवणां मानी सिंहवाहना
शङ्कं वरदं हस्तं नकुं सुद्र(लं ? र) तथा ॥ ३६ ॥
(२ | | [इति मानवी १९)
वासपूज्ये कुमारः स्याच् श्वेतो वें हंसवाहनः
मातुलिङ्कश्च बाण धनुनकुमेव च ॥ ४० ।
४ [ इति इमारः १२ |
पसुखः श्वेतः (शिषी ! शिखि) स
बाणं खडगञख पशात्तमभयाङ्गशखेटकम् । `
॥ ~~~ ~. १ क
थः फृलचक्रत् ।॥ 1
३६1 श्लेतञ्ुखोजश्वरः इति वा, भ्नेतमुलोऽक्वगः' इति वा शतमुखाम्बुजः इति
1 ह चा ल्यात्) अतिसाहसं पुन यक्चशरा्टभुजोऽक्जगः* इति कल्पनम् । लङ्मिति
मातुज्गः, अशुर फरुविरशेषोऽयम् ।
४० । बासपूज्यस्य यक्षः कमासेऽनेन रक्चितः, क्रमप्राप्ता क्षासनदेवता चण्डा
घनन रक्षिता, तदयं छिपिक्तप्रमादो वा ग्रन्थतः स्लरनं वेति खधीभिश्रिन्तनीयय् । ==
५. इति ह्पावतरे । =
प्रचण्डा यामव स्याद् अद्वाख्डा चतुभजा ।
वरदं च तथा राक्तिगदाम्बुजमनुक्मात् ॥
कुरप्र् ॥ ४२ ॥
[ इकति पातालः १४1
[ इत्यद्कुशौ १४]
किन्नरच्िसुखो धमं लोहि(ते १ तः ) कूमेवाहनः। `
बीजपूर गदां चाभयाक्तषमा [ ला | ज्जनाङुलप् ॥ ४४ ॥ |
| [इति क््नरः १९] |
| उत्प । चाङ्गर हस्तेऽभयं पद्यं कर
[ इति कन्दर्प १९ ]
गरुडः शान्तिनाथस्य श्यामः शूकरवाहनः
वाराहवदनो बीजपूरपद्माल्लनाकुलेः ॥ ४६ ॥
| [ इति गडः १६]
निर्वाणो गोरर्णा स्यात् पदमारूढा चतुयुजा। `
पुस्तकं चोत्पटं पद्यं कमण्डलुः कमाद् भवेत् ॥ ९७ ॥ ` 1
| [इति निवांणी १६] == `
त ^ ०.५
तिमिना तेतेन क नण न - ।
४१। बहुवारं षण्युख इति सम्भाव्यते भयुघबाह्ल्यद्शनात् ॥ = `
४२। त्रिञुखत्वात्. पातारः षडूभुन इति षदेवाऽध्युधानि ।
४४। किनयेऽपि ज्िष्ुल त्वात् षड्जः ।
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दैवतामूलतिप्रकरणम् ति
[ इति गन्धर्वं: १७ 1
[ इति बला १७ ]
अस्नाथस्य यन्ेन्दरखिनेवः शोषवाहन
षण्सुखः श्यामवर्णा(स्या ? स्यो) मातुलिङ्ं शिरस्तथा ॥५०॥
खड्गं मुद्ररपाशो चाभयाक्लाङ्कशशरकप
. खेटं धनुश्च नकुलं सुजा द्वादश कीततिताः ॥ ५९॥
नोपल माके १।॥ ५२॥
[ इषि यक्षे १८] _
धारिणी यल्िणी नीखपद्यव्णासनस्थिता ।
[ इति धारिणी १८ ]
‡ मष्ट (सुतःलितः) (कुषोरोहकुबेरोऽथ) रथारूढश्चतुमेखः।
छष्णवणां चतुहस्ता पद्यस्था धरणप्रिया।
वरदं चान्सूत्रच शक्तिवें मातुलिङ्गकम् ॥ ५९ ।
0 नलो वरुणो यन्तो धवछो सुनिसुत्रते ।
इषवाहश्चतुकक्तो जटामुकुटमण्डितः ॥ ५५ ॥
वरपशुटमभया सुद्र शक्तिलङ्कम् ॥ ५२ ॥
[ इति ङबेरः १९}
[ इति धरणप्रिया १९]
तान
॥ ९९। पञ्च कभिति षरवमित्यादिवह् बाडुविरोषणम् ; पष; पर्पयायः! == `
सत्तमोऽध्यायः | १४
त् ॥ ५६॥
[ इति वरुणः २० ]
र्कप्् ॥ ५.७॥
[ इति वरद्न्ता २०
८ प्रोक्तकायो १ ) ॥ ५६ ॥
ष कः [ इति गान्धारी २१]
> मिनायसय गोमेधो नर(स्थाछ्िमृषर ! स्थश्िमुखः) सितः
[ इति गोमेधः २२]
अङ्कशं च तथा (पुषपलै) त(थास्या) हस्तेषु कारयेत् ॥६१
| [ इति अम्बिका २२ |
९९ । अक्षमिति ! अधंमिदं # श्द्टेरायुधप्रतिपादनपरमाहो गान्धायां इति न
निश्रिनुमः। दास्यां द्वास्यामधौभ्यामेकेकल्य रुक्षणसमाश्षिरित्यत्मिन् प्रकरणे हश्यते,
ततक्तमादेरे तु गान्धार्या आयुधप्रतिपादनपरमिदम्धमिति भवति ।
भक्षवव्रपरन्चुनङ्कलं(मथावुस्तु ¶गान्धारी यक्षिणी ।
घरखड्गसेरल्ग हंलार्ढा(च्तिता कायो) ॥ = `
` इति रूपावतार एतन्मतप्रतिपादकम् भपरित्यत्तमूखवोषविषमं पथम् । |
६१। 'सिहारूढाम्वि(कका)का(वीया) उमनागपाशकम्ः इति श्पावतासपाध्प्या- = = `
` छोचनया "वि्टाङडास्विका मातुखिङ्खज्च नागपाश्चकम्? इति पूर्वाधं पाठः सम्मन्यते । | |
^
6
६ ॥
| | [ इति सिद्धायका २४ ]
# | | [ इति जिनानां यक्षयक्षिणीमूक्तयः | 1 |
अथ द्ितीयभेदेन चक्रे (भ्वरी ) 4
दादशमुजाष्टचकरे वजयोद्रेयमेव च! ` .
मातलिङ्ाभयं चेव पद्यस्था ग(रखो ? स्डो)परि ॥ ६६ ।
केरासमोशरणाब्जसिद्धावत्तिसदाशिवम् ।
सिंहासनं धमचकरसुपरीह चललयप् ॥ ६७
६९॥। एतेषां जिनानां श्ाखनदैवतानाञ्च मध्ये चत्वारो सख्या इति रूपमण्डनपर्या-
छोचनया प्राप्यते| तथा च शपमण्डने--
जिनस्य मू्तंयोऽनन्ताः पूनिताः ८ सौल्यसवं १ सवंसौख्य )दा । ५ ५
चतल्लोऽतिशयेयक्तस्तासां एूल्या विशेषतः ॥ । 1 1
श्रीजदिनाथो नेमिश्च ( पवं ¢ पाष्वा ) घीर (चतु १ चतुर्थकः ।
` चक्रे ( चर्या! श्वय )म्विका पञ्चावती सिद्धायकेति च॥ ०
1 ॥ इति (अ० ६, श्छो० २५२६)! `
५. ६७! . करसं सोमश्चरणं ( सिधि ! घिद्धि ) वतिक्षदाक्षिवम् । ५
४ सिष्टासनं घरचह्ुपरोन्द्र तपत् ॥ इति इयप्ण्डते (अ= ६, श्छो० २७) ।
सप्तमोऽध्यायः । व १७३
॥। प्रतीहाराः ] | ॥
धुर द्रो पद्य कश्च सुनाभः सुश्दन्दभिः
इत्यष्टो च प्रतीहारा (वि ? बी) तरागे तु शान्तिदाः ॥६९
| [ प्रतीहाराणां स्वश्पम् ]
फलवजाङ्कशं दण्डमिन््रसव्ये (ध्जजय)स्तथा। `
द्रो वजो फरदण्डन्तु महेन्द्रस्य विजयस्तथा ॥ ७० ॥
( यवायुथयोगोद्धवा लिपथचफणतोऽद्भ गाः १) ।
धरणेन्द्र८) पद्मकश्च सर्व॑शान्तिकरो स्मरतो ॥ ७९ ॥
यन्तरूपाधिका(रं च) राश्च) निधिहस्ताः शुभो(दरा दयाः)। `
सुना८भं ? भो) इन्दुभिश्चेव स्वे शान्तिप्रदायकाः ॥७२॥
इत्यष्टो च प्रतीहारा जिनेन्द्रस्य च शान्ति(दः १ दाः ) ।
नगरादिपुरगामे सवविघ्रप्रणाशनाः ॥ ७३ ॥
मुत्तयथं विश्वमेतद् भ्रमति च बहुधा देवदेत्याः पिशाचा
रक्तो गन्धवयन्ञो नरमगपशवो नेव मुक्तिं विजग्म॒ः ।
एकः श्रीवीतरागः परमपदसुखे सक्ति(ना(मागे)विरीनो
* वन्यस्तना(ग्य)जेनः सुरगण(म)चुजैः स्व॑सोख्यस्य ` |
हेतुः ॥ ७९ ॥
इति शीन्तेनात्मज ( सूत्र )भ्न्मण्डनविरचिते वास्तुशास्त्रे रूपावतार
जिनमूत्तिचतुविंशतियक्तयक्तिण्यधिकासो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ ५ |
१५५ भो के पमो के ९ ॥
गोधासननोपरिस्था च क्
८ ` षष्टे शवे शिवमूत्तिः शिवरिद्धानि प्रसङ्गतो मण्डपतिषये विशेषाश्न प्रतिपादिताः । अन्तरा
व्या सवेकामद्ा ॥ १॥ 1
व [ इति गौरीमूर्तीनां सामान्यलक्षणम् | ४ | |
खण्डा तोतला वेव त्रिपुरा द्वादशोदिताः ॥ २ ॥ ५2
[ इति गौय | |
[ इत्युमा ]
अभ्रिककुण्डोभये पन्ते पार्वती प्वतोद्धवा ॥ ९ ॥
| | [ इति पावती ]
१। पञ्चमाध्याये वेष्णवप्रकरमे श्िराशक्ररक्चमं विष्णोम् स्यंन्तराणि च प्रतिपादितानि ।
नु क
सक्षमे जेनाधिक्ठरि जिनतहुषासकतच्छासनेवताः सरक्षणाः साभिधानाः प्रतिपाचा्मे १
` क्ञाक्ताधिकरे शक्तीनां शूतीवक्तमासां गोर्वशतथा मूरीभूरता गौरी लक्षयति--अथेति। श्वतु- `
जा त्रिनेत्रा च सवौभरणमूषिते*ति भविशेषेण सवासामेव गोरीमूत्तीनां लक्षणम् ; अत एव प्रत्येक- `
( 0 रिखितानि । ८ |
` रक्षणे भुजनेन्नादीनामुद्येलो न कतः । शगोयौः प्रवक्ष्यामीति रूपमण्डने पाठः । (६।१ ) । ध ५ 4
` २। कास्तावहु गोयं मूत्त॑य इयपेक्चायासाह--उमा चेति । अयमासाम् उश्चः। हष |
४। “अभिङ्कण्डोभये पक्षे इत्यन्न षपश्षद्रयेऽभिङ्कण्डञ्चः इति शूपमण्डने ( ९।२ ) कहज्वरथं
[ इति श्रिया ]
डषु कृष्णा नाम सुशोभना ॥ ८॥
| [ इति इष्मा ]
हिमवन्ती शेटराजी ( शब्दवस्यात् परीसुता ? )
(पद्मदप्णोभवा १) तु वीवाहे तु माहेश्वरी ॥ & ॥
[ इति हिमधन्ती ]
छ ॐ
कमण्डल्वन्तवजाङ्कशं गजास-
[ इति रम्भा ]
1
६। छखिता रूपमण्डने नास्ति । 'सिद्धवामरसेविते'त्यल्य "विद्धामरनिपेधिते'त्यथं तात्प (
चा छतश्डौ प्रे तातपर्य घेति चिन्तनीयम् ।
८। पञ्चाश्नयश्च ङण्डेष्विति उभयतः पाशर्वयोरधिङ्ण्डपञ्चकान्वितेत्यथंः । अन्न व्पक्च-
` इयेऽश्िुण्डञेःति पाव॑तीवदेव पाठो भवेन्न वेति चिन्तनीयम् । इयमपि रपमण्डने नाति ।
हिमवन्त्या रक्षणं पाठविकाराद् दुश्तेयम् । इयमपि रूपमण्डने नास्ति!
१०॥ ला रम्भा प्रतीतोदभवदुरूपा प्रतीतं ल्यातम् उडभवह् रूपं यस्याः तादी, यस्या `
श्प प्रतिक्षणमेव नवनवीभूतं सत् प्रख्यायते हत्यर्थः । सोपसगंण भवतिना चत्तमानकाङ- = `
भाविना करन्ना च रूपस्य प्रतिक्चणोत्पच्मानत्वं म्यते । सपमण्डने- ` | ध.
देषता--१९
(असा) प्रतीतोद्ध८वा ? वद्)रूपा रम्भा च सवेकामदा ॥१०॥
8. 1 देवताभूत्तिप्रकस्णम्
)
।कायप्रटः प्रदादापर् )॥१२॥ `
[ इति न्िखण्डा |
५
शत दण्ड (श्वेतचामकरेण्वेतचामरकं ) तथा । `
भ्वेतदेहा भवे दहीिवी › तोतला पापनाशिनी ॥ १३ ॥
[ इति तोत ]
पाशाङ्शाभयवरं चतुर्हस्तेष्वनुकमात् ।
त्रिपुरा नाम संपञ्या वन्दिता विदशरपि॥ १४।
[ इति ज्रिषुरा 1
इति द्वादश गों
वच्यामि गोर्यायत (नं ! न) मप्
वाने (स्याद्ि!लिद्धः) धिया सोम्ये सावित्री चेव पश्चिमे ॥
` (पृष्टिशृषष्ठं ) कणं तथा इाभ्यां भगवती सरस्वती
ईशाने च गणेशः स्यात् कुमारम श्ाभिकोणके ॥ १६ ।
2 | | इति रम्भालक्षणमुपलस्यसे ।
कमण्डलवक्षसूत्रचच विञ्नाणा बजमङ्शम् । ` ऋ
गजासनस्थिता रम्भा कततंन्या सर्वकामदा ॥ (अ० ९, इछो० ९)
१२ चनिखण्डा रूपमण्डनं न मण्डयति ।
१३1 शूाक्षसूत्रं दण्ड विभ्राणा चैव चामरम्)
तोता कथिता चेयं सवं( कोप ? पाप )प्रणाशिनी ॥
(५ ` इति निःसन्दिग्धाथः पाठो रूपमण्डने (अ० ५, श्छो० ६) | |
१-१७। गो्यायतनं कक्षयति-तरद्यामीत्यादिना। वमे इति दषिगस्यां दहि, `
अष्टमोऽध्यायः १४७
सदा प्रिया ॥ १७ ॥
[ इति गौर्यायतनम् ]
यापक म सा भवेत् ॥ १८ ।
अभयाङ्कशपाशदण्डम् अजितासव्येऽपराजिता ।
अभयवजङ्कशदण्डं विभक्ताङ्कशापसव्ये मङ्गला । ^
अभ( यायं ) शहूपद्मदण्डं मोहिन्य( पि सव्ये सभिनीएपसव्ये `
स्तम्भिनी ) ॥ १६ ॥
ज्ञया च विजया चेव थजिता चापराज्ञिता।
विभक्ता मङ्गला चेव मोहिनी स्तम्भिनी तथा ।
न -- ~
गोर्यायतने शस्ता (चश्च) अष्ट (स्याद्!स्युःदारालिकाः॥२० `
^ - | [ इति गोर्याः प्रतीहाराः ]
॥ ण ४ ~. ध
` इाभ्यामिति-
ृटकर्णद्ये काया भगवती सरस्वतीः ५
इति खुपमण्डने (अ० ९, श्छो० ९ ] संस्कारछ्ुद्ः पाठः । अत्र. रेक्ञानान्नेययोवक्यमाणत्वात् =
सोभ्य इत्युत्तरस्याम्, एतेन पश्चिम्या प्रतिमेति अन्थकर्तरभिप्रायः प्रतिभाति । पृष्ठे कणं तथा + |
श्वृ्ठक्णह्वय्फेन वायुनेकरंतकोगद्वयं बोध्यम् । एवञ्च -प्ध्यवत्तिन्यां प्रतिमायां पू्वास्यायां =
सत्यामेव वायुनेवर॑तकोगद्वयं पृष्ठतः स्यादिति पूवं पक्चिमास्यपरतामवरूम्ब्य यहु व्याख्यातं
ध तदु व्याहतमित्यन्यथा व्याख्यायते--वामे वामभागे पूर्वास्यत्वादुतरस्यां दिकशीत्यथं सोम्ये
दक्षिणे भगे दक्षिण्यां दिक्रीत्यथः । |
अन्न गौ्यीयततने पूर्वस्या दिशि मूरिविशेषाश्रवणात् 'लिङ्खलस्यम्रे न कत्तव्य ह्यर्ाक्पेण = |
परत्वव्याख्यानाह्क
देवताः (अ० ३, इछो०-) इतिवदत्रापि गोयं मूतिनं विधेयेत्यायाति, तत्र लिङ्गपदस्योपरुकषण- ` १ (1 |
१८.१९॥। इदानी गौयाशरतखु दाष चतो द्वाराल्किा भाह--अभयेति। पूोदितः = |
प्राद्षिभ्रेन ( पूर॑-दक्षिग-पशिमोत्तरक्रमेण) प्रतिहवरं दं द द्वारपालके वामदक्षिणोदुम्बरयोः
[ इति गणेशः
तत्व
कमेण काय इति वर्तुराथेः । तत्र एवं द्वरे वामौदुम्बरे जया दक्षिणोदुम्बरे विजया, एवं दक्षिणे
अजितापराजिते, पश्चिमे विभक्ता-मङ्गले, उत्तर मोहिनी-स्तम्मिन्यो इति ज्ञेयम्
अन्न मविजया नाम खा भवेत्ः (१८) इत्यत्र "विजया तामसा भवेत्? इति रूपमण्डने
(अ० ९, शलो ११) प्रामादिकः पाडः, प्रतिद्वारं इारषारिकानां यथाश्चुतद्वित्वभङ्गपसङ्गात्,
अनूकश्छोके तामसाया अपाटाचच । उखबोधा्थं चित्रे गौर्या भायतनदेवताः प्रतीहारश्च
भिवेभ्यन्ते-- ` |
[ गौर्थायतनम् |
मोहिनी स्तम्भिनी
श्वा ठ
॥
सिद्धिः ` च
सावित्री | ।
1
€&
ं ॑ अपराजिता अजिता | ॥
71 [ को्ठमध्ये यथोक्ता भयतनदेवताः । कोषठाद बद्धद्ंोदवयोक्ीरोदुम्बरथोः पूवक्करिमिग |
1 ध यथोक्ता जयाविजयादद्वारदेवताश्च ] (१ | ^
२१। अथ गणेशमूतीराह--दण्डच्चेति । अत्राऽऽद्ञं श्रोकत्रयानन्तरम् “इति देर
अष्टमोऽध्यायः १७६.
वत्त त्रिनेत्र हेरम्ब गणेश्वरम्
बक च समारूढ सवकामाथतस्ताधकप्र् ॥ २३॥
। ॥ि इति हेरम्बः
रक्ताङ्गो गजवक्तः स्थाद् रलकुम्भं तथाऽङ्शम् ।
परशु तथा द्(न्तोन्तं ) दक्तिणाधःकरक्रमात् ॥ २४ ॥
इति गजानन
इत्येवं पुष्पिका हश्यते । परं प्रथमश्छोके चतुर्णाम्, द्वितीये च दशानामायुधानां दशेनादिषट | ॥ |
गणेशस्य पृथक् रक्चुणाददंनात्, रूपमण्डने ( अ० ९, शछो० १६-१७ ) उभयोरेव प्रथक् रक्षण-
दुशषेनाच्च एतचृश्छोकानन्तरम् [ इति गणश्च: ] इत्येघं बन्धन्यन्तः युष्पिकंका निवेशिता । क्षिल्प-
रत्ने आयुधानां मेदो इष्यते यथा- `
विध्नेशं सपरद्वधाश्चवटिकादण्डोलसलण्डक-
, दौभिः पाक्षदणीस्वदन्तवरदाव्येवा चतुभियंतम् ।
छुण्डाप्रा हितबीजपूरमुस्छुश्चि चीक्षणं संहरेत्
सिन्द्राभमिभास्यमिन्डुशकराधयाकल्पमन्जसनम् ॥
( क्ि० उ० अ० २५ इछो० ९७ )
इति । परमिदं गणेक्चस्य वा वध्यमाणवक्रतुण्डल्य वा रक्षणं नोभयोशपि वेति उधीभि-
मान्यम् । तत्र तु भथ बीजगणपतिःरित्युपक्रम्य रक्षणान्येतानि र्लितानि इश्यन्ते ।
२२। इदानी देरम्बं निर्दिशति- वरमिति । अत्र कण्ठतोऽनुक्तत्वेऽपि एतन्मते भयं दशयुज ` |
इत्यायाति, आयुधानां तावतसंख्याकत्वदशंनाद् । स्षिल्परत्नेऽपि अथ देरम्बः" इत्युपक्रम्य = |
सा्धश्छोकत्रयेण तदक्षणयुक्तम्, तत्रापि दशसुजत्वमेव हर्यते ( उ० अ० २९१ श्छो० ५८-६१)। |
ख्पमण्डने तु--
घरं तथाऽड्क्षं दण्डं दक्षिणे पादवंभागयथोः |
वामे कपालं बाणाक्चं पाश्चं कौमोदकी तथा ॥
( भ० ९, शछो० १६ ) इति विषमः पाटो विषमा चोभयतः पारश्वंयोरायुधस्वना दृयते । '
२३। पञ्चवक्त' त्रिनेत्रमिति गणेकेरम्बयोः साधारणं रक्षणम्, गणेशरक्षणे वक्तूनत्रयो- `
रलुदैखात्, अत एव श्देरम्बन्च गणेदवरःमित्यन्नोमोरेव विशेष्यपरताऽभ्युपेया न त्वैकेल्य = |
:- निचेकनपरवा ऽपि ।
इति वक्रतुण्डः
[ इति क्षिप्रमणपतिः 1
| मा
। गणपततिप्रस्तवे--
२९ । वक्रतुण्डं रुक्षयति--रुम्बोदरमिति । वप्रमाणान्तसनुपलम्येऽपि भ्रन्थद्ता इषया
पुष्पिकथा वक्रतुण्ड एवायं न छम्भोद्र इति जानीमः
२६ 1 उच्छिष्गणपतिमाह--उच्छिष्टमिति । अयं रूपमण्डने नाष्ति । शिल्परत्ने तु बीज-
रक्ताश्वमारां परञ्च दण्डं भध्यज्च दोभिः परितो दधानम् ।
हेमावदातं त्रिरं गजास्यं रम्बोदरं तं शिरसा नमामि ॥
( उ० अ० २९; इरो० ९९ )
इति प्रकृतोच्छिष्टगगपतिरक्षणान्वितः कश्चिहु गणपतिरुक्षितो इयते । “मदय” मोदकम् ।
9 ५ २७ शखिन्दुसभमिति । नायं खूपमण्डने न वा शिल्परत्ते उपलभ्यते । पूष द्वार्विक्ञ-
१ श्रयोषिशरोकाभ्यामेको हेरम्बो रश्चितः पुनरपरोऽपि र्यत इत्यहो हेरम्बप्रहिरुता अन्थकतत : ।
२८ । पाशाद्कश्चषाधिति । अयमपि शपमण्डने नाह्ति, अस्ति च शिल्परत्ने ; परं तत्र
(0 ` अङगस्थाने शस्वरदः' पदं करोति। तथाच-
शतपा्ञाङ्कशकस्प (क) रुतिकास्वरद्श्च बीजपूरयुतः
शशिदाकरुकलितमोङिक्िरोचनोऽखणतनुश्च गजाननः ॥
इति। एवन्रात्र शशङ्गमिःत्यत्र द्दण्डमि!ति पाठः कल्पनीयो न वेति सुधीभििन्तनीयम् ।
अष्टमोऽध्यायः | | १४१
इति गणे शायतनम्
तजनी परशु दण्डमविन्नो दण्डहस्तकः ॥ ३० ॥
नीदण्डापस्ये स भवेद् विघ्नराजकः!
तजेनीखडगवरदं दण्डहस्तः सुवक्त्कः ॥ ३१
00०0०
२९} इदानीं गणेक्षाथतनदेवानाक--उनत्तर इति ! रेखक्प्रमादादत्र कोणदेवताप्रतिपादकमेक्ं
पं श्टितमिति सम्भाव्यते । तचच-
वामा गजकणन्तु सिद्धिं दध्याचं दक्षिणे ।
पृष्ठकणं तथा द्धौ च धमको बारुचन्द्रमाः ॥
( रूप० अ० ९, श्छो० १९)
इति रूपमण्डनो वदेव भवेद् इति सखस्मावयामः ।
३० । गणेशप्रतीहारानाह--सवं इति । रूपमण्डने (सौम्याश्च पुरषाननाः' इति द्ितीय-
दे छलसेव्यः पाठः ।! अष्टौ गणेशप्रतीहारा दक्षादिद्ारतो युग्मशः स्थापनीया इति बह्त॑दा्थः। =
क्रमस्तु गोर्यायतनदष्व्या ससुननेधः । शिर्परत्ने एकेकं ृक्षमाश्चिताभ्यामग्रादिदिशषसरङ्वतीस्या
द्वाभ्यां दास्या दारेवताभ्यां गणेश्ायतनमद्ुतमिति हश्यते । तथाच--
अग्रेऽथ विल्वमभितश्च रमारमेशौ तदक्षिणे वरजुषौ गिरिजादषाञ्ञो ।
पृष्ट ऽथ पिष्परुजुषो रतिपुष्पबाणौ सव्ये प्रियङ्मभितश्च महीवराहौ ॥
| ि | ( उ० अ= २९, श्छो० ४६ )
इति । एवद्धेषां यथाक्रममायुधानि च तत्रैवोक्तानि-- |
ध्येयो च पश्चयुगवक्रदरेः पुरोक्तो पाशाङ्ङकलाल्यपरनुत्रिशिखेरथान्थो ।
युग्मोतपरेश्चुमयवापशरेस्तृतीयावन्त्यो शुकाहकरमाप्रगदारथाद्धैः ॥ `
्् ॥ ( उ० अ० २५; शछो० ४७)
इति । परमिदं प्रतीहाराणामायतनदेवतानां वा रक्षणमिति यद्यपि दुस्तरेयम्, तथाऽ्प्यादुधः =
` दर्शनात् प्रतीहारा एवैते इति निधिनुमः नाऽऽयतनदेवताः, आयतनदेवतानां कापि प्रहरणा. `
बुषरभ्धेः। ` 0 व | 1
३१। अघर चतु॑वरणे दण्डहस्तः छुवस्कः' इति रपमण्डने (अ० ५, इछो० २२) पाडः । `
गण्डकंश्चि(रक कुरे यः म हन्
स्थानीयं ये) खेटनगरे भुजा दादश कस्पयेत्
न ~~ "न
३०५ 1 द्वा्रिंशष्लोकतुल्यमिष्टं पं सम्पातायातमिति सम्भाव्यते ।
३६ । कात्तिकेयमाह--कात्तिक्रेयमिति । स्थानभेदेन स्थाप्यमानोऽयं श्वि-चतु-हादश-
शुजल्येन त्रिधा मवति। त्त्र स्थानीय खेदनगरे वा द्वादशजुजः, खर्वटे चतुर्भंलः, प्रामेवनेवा
1 द्विभुज इति शिल्परतवस्मतं तत्वम् । तथाच--
| ह्थानीये खेखकै वाऽपि कमारो रिष्यते यदा
सुजा द्वादक्च ऊर्वी खवटे चतुरो युजाम् ।
ग्रामे वने द्विबाहुः स्यात्.“ "इति । = |
५ ५ ( शिल्प० उ० अ० ३५ शछो० १२९-१३० )
("कमण्डलोद्वणीभ्ः इत्यत्र ककरलोद्रव्णाभम्" इति सरूपमण्डने पाठः ( अ० ९, शलो
२६)1 एवन्च (तदणादित्यसप्रभमिश्त्यनेनोज्स्वल्यम्, "कमललोदरव्गाममिश्त्यनेन च वर्म.
पर्वः प्राष्य | | |
| ३७। श्यानीयं खेनगेे' इत्यत्र स्थानीय खेटके वाऽपिः इति. किस्परत्ने श्थापनीया- =
| (: ६ ( खेटनगरे() इति सूपमण्डने पाठः । गण्डकश्चिङ्करेयं क्तमिति गण्डेश्विरुम्बिभिः केशैः ` 6 1
शाहपाक्चः इति प्रविद्धैः शिखण्डकविरेते्यक्तमित्यर्थः। ` ४
धनु ( : ) पताका सुश्च तजनी तु प्रसारि(काता)
खेटकं ताञ्चचूडश्च वामहस्तेषु शस्यते ॥४०॥
[ इति द्रद्शभुजः ]
| द्विजस्य करे शक्तिवामे ( स्याऽन्यः ) कृशुटोपरि ।
५. [इति हिनः]
चतुभूजे शक्तिपा( शो! शो ) वामतो दक्षिणे ( च 1
[म 7 सः १ तसिः )॥४१॥ `
वस्दोऽभयदो वा(पीएपि) दल्ति(णे स्या!णः स्यात् ) तुरीयकः।
| १.४ [ इति घतभंजः ] |
य( मयंमिमं ) शुरं कत्तेव्यं सवेकामदम् ॥ ४२॥
| दति कालिकेयः।
१
ति ममका
ति
` स्थानीये इति स्थितियोग्ये खेटनगरे कषकग्रामे इत्यथः । ` |
१. भ ३८। ख्बटे क्षद्रनगरे । रूपमण्डने-- ५
चतुर्भुजः कपटे स्याद वने ग्रमे बाहुकः । `
दक्षिणे शाक्तिपाशश्च खड्गं पादं त्रिशयूलुकस् ॥ इति ५
( अ० ९, भ्छो० २८ ) ।
५ ४९१॥। वामे करे शक्तिरन्यः करः ककुटोपरीत्यन्वथः । ।
` ४२। तुरीयकं इत्यत्र तुरीयकमिति रूपमण्डने प्रामादिकः पाठः ।
देषत्ा--२० 9 |
अस्यानन्तर(त १ तो ) (से १ चय) नव दर्ग
१४४ देवतासूत्तिप्रकरणम्
पथरीखया वक्लयाम शाख्मेदेस्तु भेदिताः।
(शलीखया ( (रलीदलीला )शरीखाङ्गी “भराता च
(ली }खावती ॥
त कानवा वारसूयेसमप्रभा
वक्ता च सनेला च ( स्यस्व )रूपारूपदायिन
अक्तमाखा तथा कुण्डी अधोहस्तेषु कारयेत्
न हस्ता( वि? वी ) दशो सर्वा(ह्¶वृ)दहस्तो निगवयते ॥४५
मृणालयु(मे (मेः) रीलया चे रीखा स्यात् पद्यपुस्तकेः ।
लीला म्री ? जगी ) पाशपद्याभ्यां टछिता च ( ब्जा १ वजा- ,
॥ ९॥
4 करोः ॥४६॥ `
पाशाङ्क(श ? शेः ) रीखावती लोलया) पच कीसिताः
इति पञ्चलीखयाः ।
शुभावहा) ॥ ४७।
~न
। ४२ । इदान पञ्रीरुया कषयति । पञ्रीरूया इति नवदुगादिवत् छीरुयादिपञ्चकमित्यथेः।
| हपमण्डने लंदास्वल्पनिदेदिा आच्या पथी नादिति । विचिन्धन्तोऽपि वथं पत्नरीरया-
शक्षणं ` समराङ्णसून्नवर का्यपक्षिल्प्िल्परतयादिषु नोपर्न्यवन्तः ।
५९ स्बौसामेवाधोदस्तेषु भक्षमारा ङण्डी चेति प्रहरणम् ; उदु इल्तानः विषो `
वदयत इत्यरथः! 'छुण्डीत्यत्न 'अम्डुपात्रम् इति खूपमण्डने पाठः । सवौवृद्ध हल्ताविति राश्य- ध |
पेक्षया द्विवचनम् । निगद्यत इति शरं परम् ।
६। गणाख्युग्मेरिति हेष्तयोयग्मं युग्मं श्रणारूमित्यथंः, शद युग्मेः इति रूपमण्डने |
0 । | | \. | 0 । | | | | ( पाह |. 'पद्यपुर्तकेरिःति बहवचनमधिवक्षितम् 9 एवयुत्तरत्र । सवन्न विशेषणे तृतीय ।
४७ । नवदुगा भाह--अस्येति । सपमण्डने हारथगीक्षमहरी-हरसविदधयस्तिच ` एव ` 01
॥ . ° दक्षिताः । पताः स्श्रतुबहवः 1! किमिति वाव एव केवरं ठक्षिता इति न कश्मामःः। = ` ४
भष्मोप्ण्यायः
वरदं त्रिशूरं खेटं पानपात्रच विभ्रती । ४५
ली ता ॥ ५० ॥
मध्ये महाखदमी८) प्रकीरि
[ इति सहारुष्मीः ]
नन्दा नाम (संख्य! १ समास्या)ता पूज्यते नन्दहेतवे ॥५१॥
, वर(दं ‰) लि पद्मं च पानपालं विधृत् कर ।
क्तेमङ्करी तथा नाम क्तेमारोम्यप्रवायि
॥ स्वती च तदा नाम ( सवेकृष्ट ? ) प्रदायिनी ॥ ५३॥
व [कि सवी]
| खड्गं तथा व्रिशूलं च घण्टापात्रं तथोन्नतम्।
` महरण्डा (तथोन्ञाम ? तथा नाम) वन्दिता लिदशेरपि ॥५४॥
[ इति सषहरण्डा ]
| ४८। श्ेसकरीत्यत्र क्षेमद्करीःति लक्षणनिरूपण्वेरायाम् | =
| ४९। अनुक्रम करमेण एकेकल्याः कथयिष्यामि लक्षणमितिरेषः। = `
९० 1: नागनीखकण्ठयोषपद्म नप्रयोजनमयुसन्धेयम् । | ध
[ इति नन्दा | $ |
1 १५६ दैवतामूर्तिपरकरणम्
|
वु | [ इति रमणी |
अन्षसूलं तथा वज्र घण्टापालं तथोत्तमम् । |
सर्वमङ्ग(र ! ला) मङ्गल्या सवेविन्नविनाशिनी ॥ ५६
ध [ इति सवंमङ्ल ]
दण्डलिशूरं खटाङ्गं पानपालं च विभ्रती ।
रेवती च तदा नाभ सर्वशान्तिपरदायिनी ॥ ५७ ॥ 1
। [ इति रेवती |
कमण्डलु खडगडमर पानपालं तथा शुभम् ।
` हंरसिद्धिस्तदा नाम सर्वस्य सिद्धिहेतवे ॥ ५८
६. ~ ~ [ इति हरषिद्धिः ]
इति नवदुर्गाः ।
| | कत्तिकां मरुं विघ्रदक्षिणे तु करये ॥ ५६ ॥
८ वामे शूल कपाट च सुण्डमालोपवीतक
` करोटि(नी १ नि)करोदारमाखाग्रन्थितरोखरः ॥ ६० ॥
इति स्े्रपालः ।
(मामन
त १५८११०१५
५९ । उदेशश्छोके श्रमणी"ति चत्तते अन्र च श्रामगीति इयते, कतरदेतयोः परिवित्तंन
महंतीत्यनिश्िन्वनिररूपाभिः कापि न व्यापारितो हस्तः, परं प्रथमपरित्यागे सानामावं
मन्यमानेः पुष्पिकाां "श्रमणीति विहितम् । |
५९-६० । क्षेत्रपालं रक्षयति--क्षेत्रपारु इति । शिस्यरसेऽथमादौ स्ास्विकादिभेदेन
( । चरिषा भिंयते सात्तिकथ्च द्विुजचतुरमुंजत्येन पुनद्वियेति साकल्येन चहर्विधः । रूपमण्डने 4
नरक एव चतुसूनः। तथाच-- .
| कोति(किलोदा्समन्थितयोका
क्षत्रपारो विधातन्धो दिग्वासा धवण्टभूषितः ॥ =
` (कात्तिक १ कत्तिका ) उमर बिश्रहक्षिणे तुक््धये। `
वामे श्रं कपाल युण्डमारोपवीतकम् ।
तशर र ॥., इति.(म० ९, छोर ७४७९) |
|
अमोऽध्यायः १ १५७ `
ग, बिश्र(त्तीं १ ती) चाभयप्रदा ।
[ इति बाह्मी ] `
| [ इति महेश्वरी ]
कोमारी रक्तवर्णा स्थात् षडवक्ता साकंलोचना ॥ ६५ ॥
रविबाहुमंयूरस्था वरदा शक्तिधारिणी ।
पताका बिध्रती दण्डं (पाः
प्रसिद्धिरिति युज्यत एव ततसस्बोधनम् ।
६२। यिङ्गली छव्ण॑म्। कज" पद्मम् । दृरभिन्नमेवास्य रक्षणं रिल्परल- (ड० : `
` भ० २९; शछो० ७६ ) शूपसण्डनयोः ( अ० ९, शखो० ६ १-६३ ) । तयोरियं चतु्भंजा ।
६३। इयमपि चतुभंजा श्षिह्परलशूपमण्डनयौ
। ६९॥ साकंरोचनेति। घा अकंरोचनेति च्छेदः, अकंरोचना द्वादशनेत्रा। बद्वा, `
भकंरोचनेः सह वर्तमानेति विग्रहः । रविबाडद्दशुजा । इयमपि शिल्परल-रूपमण्डनयो- = `
` श्रतुभजा। 1 ~ |
† १ पाशं) बाणज्च दक्तिणे ॥.६६।
करोटीति । करोटिनिकरेण ररारास्थिसमूष्ेन प्रथिता या उदारा महती माला तया `
ग्रन्थितः शेखरः श्िरल्यकेश्जयो यत्य सः । अयमेव पाडः साधीयानिति प्रतिभाति, चलिल्परले `
(० ० २९; छो १०८) नानानागविभूवितत्वस्योक्तत्वेऽपि रूपमण्डनीयपाडश्निन्त्य एवं । == `
६१ । इदान सक्च मातुर्चयत्ति--अथात इति । जयः इति विवकमणोऽन्यतममानख- = `
ुत्रह्थ नाम ! शिल्पशा्खल्य प्रवक्ता विरवकमा बोदधव्यश्च ततुतरेष्वन्यतमो जयो नामेति
दनी सहलटक् सोम्या हेमाभा गजसंस्थिता ।
वरदा सूत्रिणी वज्ज विघ्रतयृद्धं तु दक्िणे
वामे तु कटं पात्रमभयं तदधःकरे ॥ ५१
चामुण्डा प्रेतगा रक्ता विकृतास्याऽदिभूषणा
| दं्ू(दा! टा) न्ञीणदेहा च गर्ता
` विगाहः क्षामकु्तिश्च सुसर ( चक्रं १ चरकं ) शरः।
` अङ्कु(क् १ शं) विभ्रती खड्गं. `“ चाप्यथ वामतः ॥७३।
खेटं पाशधनुरदण्डकुठारं वे! चे)ति विश्रती |
दैवतासूरत्रकरणम्
र
खंटपाशाभनया ! य् बाते नव चापि लसईभजा ॥७०।
[ इति षाराद्दी ]
[ इति रेन्त्री ]
[ इति चाञ्खण्डा ]
नशः ममा ०००,७८०५८
~ " ५.
। | ४ | ५ ६९ । शहुःचक्राभयंरिति । वामभागे शहुचवक्रादिभिविरुषहञुजेत्यन्वय 1
ज 9९1 ज्व इतवदुकरोण । 2
| ` ७३१ द्धश बिश्ती खड्गं" इत्यनन्तरं बरुटितस्थाने सन्ये" इति स्थात् ।
वीरिश्वरस्य रूपं तु मातणामग्रतो भवेत् ॥ ७८ ॥
पएक्वक्ता८) चतुसु जा सुकटेन विराजिता८)। `
अक्तपद्यं वीणापुस्तकं महाविद्या प्रकीर्तिता ।
[1 ५ ~न
विति। अचर आध्न्तादिपदानि किसम्बन्थीनीतिन चिद्चः। म्मध्ये च मातृकाः कार्याअन्ते ।
तेषां विनायकः (अ० ९; श्छो० ७४) इति रूपमण्डने सनिवेशस्य पेपरीत्यं इश्यते! =
` कतरदेतयोर॑क्ततरमिति क्िल्पिन एव निधारयन्तु । | |
ओ इति। एताः सरस्वत्यो नेतरत्र छभ्यन्ते । यत्र यत्र पुस्तक्रमिति च्यकषरेण नाम्ना छन्दसो
अषङृतम्, तत्र तन्न युल्तमिति पटेऽपि न क्षतिः । &
॥ि अ्टमोऽभ्यायः भ १५९ १
र णिका भ्वेतवेणां स्या(जावा ? च्छवा)रूढा च षडभ॒जा
रखा च छसल्यन्ता वरदा शूटधारि णी ॥ ७६ ॥
कृत्तिकां बिध्रती दन्ते पाशपात्राभयान्यतः |
| [इति चण्डिका |
इत्यह ? ता ) मातरः पोक्ता रूपभेदव्य वृस्थथा॥ ७५ ।
भेरवं कारयेत्तल नृत्यमानं विकारणप् ।
णेशमादो करतव्यमन्ते कुर्याच मेरम् ॥ ७६ ॥
मातृणां मध्यतः कार्याः प॑क्तिशो १ शः ) चण्डिकादथः।
रवरिश्यर्(स्य १ श्च ) भगवान् वृषारूढो धनुरषैरः ॥ ७७ ॥
( वीणाहस्त ¢ वीणां हस्ते ) त्रिश बाणं चेव प्रकारयेत् ।
इति मातरः। 1
[ अथ द्ादक्ष सरस्वत्यः | 0
प्रभामण्डलरसंयुक्ता८) $ुण्डलान्वितरोखश८:) ॥ ७६ ॥
[ इति सरल्वतीनां साधारणरक्षणम् ]
| इति महाविया-! ]
अन्तं पुस्तकं वीणा पञ्च महावाणी च नामतः ॥ ८० ॥
| [ इति महावाणी-र 1 0
७६ । प्रसद्माल्मात्रायतने कततच्यानामन्येवां नामान्याह --भेरवमिति । गणेलमादा
७९-८० । इदानीं हाद सरत्वतीरुक्षयन् प्रथममास साधारणं रश्षणमाह-एकवक्ता = ` |
0 11
अष्टादश(जया !
॥ि १६० ॥ देवताभूसिप्रकस्णम्
` { इति भारती--३ |
[ इति सरस्वती-४ | _
[ इत्यार्था--९ |
८२ | |
[ इति ब्राद्यी-६ |
[इति महाधेलुः-५]
(म्बुजम् ॥ = ॥ |
[ इति वेदगम्म--८ ]
[ इतीश्वरी-९ ] |
। अल्पं १ अन्तं प्म) पुस्तकथ महाकरमीस्तथोतृपलम् ॥८९॥ `
[ इति महारष्ष्मीः-९० ]
अक्तं पद्य पुस्तकं च महाकाल्यभ धृ तथा
(7 ॥ [ इति महाकारी- ११ ]
ती ॥ ८५॥ `
[ इति महासरस्वती-१२ ]
| इति द्वादश सरस्वत्यः ।
धुजा) कायां भद्रकाटी मनोहरा
0 आरीदस्थानस्था तु कर्तव्या सोर्यदायका ॥ ८६
अक्तपुस्तकमभयं पं महासरस
भ्र्तमाः त्रिशूलञ्च खड्गशचकं करेषु च
| बमेतु चाप कृत्तैऽयं शङ्कपद्
तथेव च ॥८७॥ `
५ ता
न ५०००-७
1 ८६ । आकीढेति। दक्षिणं पादुमग्रतः कृत्वा वामपादाङब्रनमालीदल्थानम्, तेन॒. = `
। ` सन्तिष्ठत इति भारीदल्यानसंल्या। = `` -. | ५ =
` अष्टमोऽध्यायः । १६१
इशाक्तश्च कत्तव्य ! व्या) कष्णाजिनहूता९ 8
स्ताना भटदकाल्यास्तु भवत् तु 0) शोभन
इति भद्रकाली
निगव्यते द्यथो चण्डी हेमभासा सुरूपिणी ।
त्रिनेत्रा योवनस्था च पीतपीनपयोधया ॥ ६० ॥
एकवक्ता तु सुग्रीवा वाहू १ विं)शतिसंयुता ।
शूखासिशक्तिचक्राणि गदाशड्खपवीन(पी ? पि) ॥ ६१॥
ऊद्वादिक्रमथोगेण विष्रती सासवा श॒भा। `
श्स्नोयतकरः कद्धस्तदम्रीवासम्भवः पुमान् ॥ ६२॥
शूलभिन्नो वमद्रक्तो रक्त(मू१शर्)मृद्धजच्तणः ।
सिंहेन खायमानश्च पाशाषद्धो गले भृशम् ॥ ६३ ॥
यास्यहो कान्तसिंहा च सव्यं योखीढगासुराः ¢) । `
चण्डी चोयतशस्ला च महिषासुरघातिनी ॥ ६४ ॥
इति चण्डी।
1)
न साकल्यतो विदातिभवन्त्यायुधानि, मूले अष्टानामेवाऽऽ्युधानां निदेशात् । आश्रये तु-- = ।
| दूखासिक्क्तिषक्राणि पां खेटायुधाभयस् । |
डमर श्चक्तिकां वामंरनीगपाश्ञ्च सेटकस् ॥
कुधराङ्श्ाचार्पाश्च वण्टाध्वजगदास्तथा।
क? | आदर्ुदगरान् हस्तः!“ '““ ॥ ( अ० ९०, शो १-३ )
इति विशतिरेवाऽऽ्युधानि प्रतिपादितानि । |
देवता--२१
९१॥ इह बाहुर्विदातिपयावानामायुधानाघ्ेखो नास्ति । यथपि द विक्रमयोगेणः | ८ |
इति परत उक्तया निर्दि्ान्येवाऽध्युधानि वामे दक्षिणे चेत्यायाति मादिपदसामर््यात्, तथाऽपि |
९४ । "याम्याङ्ज्क्रान्तसिहा च सव्यादत्निनीचगाद्दे दयाप्नेये (अ० ९०, पलो ९)। = ॥
नी खद "सा (स्याद्) उमरदण्डको । == `
वेतारस्तु समाख्यातः सव्यापसव्ये करटकः ॥ ६७॥
अभयं खडगखेटथ दण्डं पिद्कललोचनः
अभयापसन्ययोगेन भवेद् भृकुटिनामतः ॥ &८ ॥
५ तः नेनोवजाङ्शादण्डं धूम्रको नि कीत्तित
पसव्ययोगे च भवेत् (कक ? ककु)दनामकः॥ ६६॥ `
जेनीविशूलहस्तं खटाङ्गं दण्डमेव च ^
श््तात्ञो नाम तस्येव सव्यापसव्य सुलोचनः ॥ १००
0 इति चण्डिकप्रतीहारा
` दिव्याम्बुजकरा ( कुयां {कायां ) सवाभरणभूषिता
गोरी शुङ्काम्बरा देवी रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ १०१।
प्रथमा चतुसुंजा कार्या देवी सिंहासने शुभा ।
` सिंहासनं प्रकर्तव्यं कमरं चार( ! केणिकम्॥ १०२ ॥
धम ५१०-७०५०५८०१.००५
0 ९६। आनुधग्रतिपादनावसरे शततमद्ोके “ककुदः इति नामदर्शनाद्ापि तदेव `
1 र ` नाम युक्तमिति धन्नकः छकुदश्षवः इति षाठः स्यात् । व
५ वेता (छ † छः) कटश्व पिङ्गाक्षो शङ्करस्तथा । 2
1 सूत्रकः कड्द्चेव रक्ताक्ष्च छरोचनः ॥ ८ भ० १, इछो० ९१-९२) |
| प इति रूपमण्डने नाम्नो वेरक्षण्यमुषरभ्यते। = |
1 ९७॥ करटक इति पूर्वं शवेतारो वरटश्रेव' इति घोषवदुवर्णनिमित्तक-विसर्गसन्धिद- = `
1 . नात् सन्नपि रूपमण्डने “करटः इति पाठो नोपात्तः, अत्र पुनः "करटः इति दश्यते । परमत्र
। साधकबाधकप्रमाणाभावादेकाक्रमन्छृता "रेति छदिः शक्यशम्पादनेति मन्यामहे । = `
१०२-३। सिहानमिति। चारकणिकम् शष्पं कमलं सिंहासनं प्रकतन्थं |
सिहासनत्येन कल्पनीयम् । तस्य कर्णिकायां महाभागा देवी संस्थिता इत्यन्वयः । "अष्ट- ` |
पत्राम्बुजल्योद्ध रष्मीः सिंहासने शुभे । विनायकवदासीना सवीभरणभूषिता ॥ इति रूपमण्डनीयं-
( अ० ५, श्छो० ९७ ) पाढदर्ंनादम्बुनोपरि सिंहालनं कत्र रुदमीविनायकवरदासीना इत्यथः
सम्पद्यते । अयमेव यदि प्रमाणं तदा “सिंहासनं प्रकरत॑भ्यं कमरे चास्कणिके । अद्रे इति =
पाटठपरिवत्तनेनात्रत्यं पादत्रयं क्ोधनीयम् । विनायकवदाकषीनेत्यनेन किं रुषेयत इति न विद्यः
१०६ । आवंजितघटमिति--
‹आवमितधरं काय ततष्ठे च करशिद्रथम्'
ईति स्यात् । अस्याथंः--तस्या देव्याः पृष्टे पृष्टपाश्वयोरित्यथैः, आव जितवटम् अवनमितं- `
करद्वयं करद्वयं इत्तिनौ कार्यम् इति ! ददं मतान्तरम् “उत्त्हाटकनिभा करिभिश्वतुभिराव-
निताण्तवटेरभिषिच्यमानां' इत्यन्यन्रोक्तेः, | ४
| मुक्तागोरेश्रतुर्भिद्विपपतिभिरथौ दृष्करोचहवशस्या-
नियद्रत्ाभिषिक्ता करकमरुरुघतपश्युग्माभयेश ।
नानाकल्पामिरमा दतकनकनिभा रक्तपङ्करहस्था
रम्याङ्की खप्र्रन्ना वितरतु विपु सन्ततं श्रीः भियं वः ॥
॥ (1 इति रिल्परंतंववंनाच्चं ( उ० भा० अ० २४ शरो० ९) । करिदयपन्षमय्यबुगरहणाति-~ - 1 ¦
नवयोवनसंयुक्तां सर्वाभरणभूषिताम् ॥ ९११ ॥
सुचारवदनां तद्वत् षीनाोन्नतपयोधयाप्
भङ्कस्थानसंस्थानां महिषापुरसू
` छभरभद्वयपुष्करेरितथटश्च्योतह विशुदधोदके
श्ायन्तीमतिह्रूपविभवां नीरोष्टसतङ्कन्तखाम् । `
शश्राकल्पविक्ेवविश्रमरसासत्तदेमप्रमां
छ वन्दे बाहुयुगप्रसक्तकमलं देवीं सरोजासनाम् ।
ईति लिर्परतनीयमेष पधान्तरम् ( उ० भा० अ० २४, इको० १० १ ।
१०७ ॥ को्ठापुशदन्ये अन्यस्मिन् कषेत्रे इत्यन्वयः । `
१०९॥। कात्यायनीमूत्तिमाह--कात्यायन्या इतिं । प्रायेणाविकठं तूस्यषुराणीयं दशयुजा
| ध्यानमिद्म् | (अर २६०) इरो० ९९-६९ ) विकलानि स्थानानि यथावसरं प्रदंविप्यन्ते ।
` ज्रयाणामपीति, ब्रहमविष्णुमहेश्वराणां प्रतीकसर्पामित्यथः । 'अनुकारानुकारिमीम् इति मास्ये
११०॥ अचेन्ुहृतशेखरामि'ति द्वितीयचरणे, ून्ुलद्ाननामिन्ति चदुधचरणे `
मात््यानुमतःपाठः। `
१११। (नवयोवनसम्पन्नामि"ति वृतीयचरणगतो मात्स्ये पाडः ।
११२। छचाख्वशनामि^ति प्रथमपादे महिषारमर्दिनीमिःति चतुर्थपादे मात्याभुगत
५ प 2 ~ 1
[ शस्ये संस्थानवेंकिष्व्यम् |] ० 1
| कर्याद्ध(स्ते ! स्तो ) दष्टं च ध 8.
9.
११३ । शज्िश्ूरं दक्षिणे दयात् खड्गं चक्रं क्रमादधः ।
तीश्णबाणं तथा श्चक्तिं वामतोऽपि निबोधत ।
खेटकं पूण चापञ्च पादामङ्रमेद च ।' इति मात्स्ये ।
११४ । श्वामतः सन्निवेशयेदिति मोत्षल्ये पाठेः । श्रकर्पयेदिष्त्यत्र प्परदशवेदिषति |
मात्स्ये पाठो ध्येयपरत्वेन निद्॑ाइ यथा उरिलछ एवमिहापि निमयत्वेनोपपादनात् प्रकल्पये . |
दिष्येव पाठः प्रकृतोपयोगी । ११
११६। दतल्माच्छरोकात् परं “सपाशवामहस्तेन शतकेरज हुगया । वमदरधिरवक््देव्याः =
सिं प्रदर्शयेत् ध ईत्ययं शछोकोऽधिको मात्स्ये ! 1
| ११८ । भरव कारयेत्तन्न नृत्यमानं धिकारणम्? ( ८।७७ ) इतस्यादिपये वत्यन्मूत्ति- ५ |
दक्तनात्तदुपयोगितयाऽस्थान एव नत्यसंस्थानं द्ंविुमाह-भद्वे भङ्गे इति। न्तन भद्ध ` । । |
द्धे नततनल्य प्रतिचिच्छेद प्रतिपाद्ेपमिति यावत्, सुखं हस्तो दृष डवाड विदध्यात्,
नत्तनविषयोपयोगितया सुखादीनि विन्यस्येदित्यथंः । अथवा तृतीयदोके आल्येनाऽऽलम्बयेह॒ = `
` गीतम्" इति द्चनाहु गीतघ्य भद्गे भङके मुखं कुयात्; मृतये हस्तो दिन कयादित्यधैः क्च. =` |
इति कात्यायनीमूत्तिः।
५ [ इह्तादीनां रसाभिन्यञ्चकता ] |
थतो दः भावो थतो भावस्ततो रसः ॥ १९६ ॥
सुखादीनां प्रातिस्विकं विषयम् “भस्येनाऽऽरम्बयेह गीतसर इत्यादौ दशं विष्यति । कथमेवं इयौ -
दित्यपेक्षायामाह--इष्तकाच्यमिति । यतः दल्तकाचं सुखहल्तदश्यः रोके कमंणश्ररन-
कक
भोजनादिरभिनये भवघ्यानुकारे अखिरं सप्रयोजनं भवेत् । यथाहि लोके वाचा ष्व स्वं मनोगतं
` ग्रकाश्यते एवमेव इस्तादेरिद्धितेनापि तत् प्रकायितुमहदित्यथेः । अत्र पूर्वाधं मुखस्य व्राङ्-
नि्दश्षादिह 'सष्तका्यम्ः इस्येव पाठः साधीयानिति प्रतिभाति । यथाश्चुतपे हस्तकाचसरः
दद्यत्राऽऽदिपदम् आचन्तयोम् खदष्व्यो््राहकम् ।
११९1 सम्प्रति इस्तादीनां रसाभिव्यक्तौ कारणतामाइ--थत इति । अन्न वत्य
५ प्रसङ्ञत्तदुपयोगितथा रशसस्येव चरमभावषिफरुत्वसुक्तम् समराङ्णसूत्रधारे ऋ
रसानामथ वध्यामो दृष्टीनां चेह रक्षणम् 1
तदायत्ता थतधिप्रे भाषव्यक्तिः प्रजायते ॥ (अ० ८२, श्छो० १)
ईति चित्रविषयत्वेन भाषाभिव्यकतेरेव चरमप्रुत्वमुक्तम् । तन्न भावाभिन्यक्तेहष्यायत्तवं
इष्िथङ्यत्वम् , रसायत्तत्वं रतानुक्षारित्वमिति विवेकः । |
सम्प्रति व्याख्यायते-यतो यष्मिनरू विषये हतः प्रवत्तते, हहतो यं विषयं प्रतिपाद्यतीत्यथंः,
` इष्िरपि ततस्तत्रैव भवेत्, हस्तानुुणविषये एव हसं प्रवतंमेदित्यरथः ! यत्र इषिल्तत्र मनः,
मनोऽपि दष्व्यनुकूरषिषये निवेशयेदित्यथैः । यत्र मनत्तत्न भावः तह्य मनो धिकारशरूपत्वात्
यथोक्तं "निर्विकारात्मके चित्ते भावः प्रथमविक्रियेःति । यत्न भावश्चित्तविक्रिया तत्रैव रसो मचेत् ,
रसस्य विभावायुभावन्यभिचारिभावव्यङ्गस्थायिभावरूपत्वेन तत्य भावस्य चाविनाभावत्वेन
` प्रतीतेः। अत्र हर्तदृष्टिमिनतां व्यापारः कतत साध्यः, इतरयोस्तु व्यापारः प्रतिवन्धापगममात्रेण
यदच्छयोत्प्यत इति मेदः, रसस्तु फरीभूत इति न तस्थ व्यापारचिन्ता । अत्र भावपरेन
स्थायी भाव उच्यते। जत्र च चित्रे रलाभिव्यञ्चनाथुपक्षिसमिदं पमिति प्रत्यक्षयोैस्तटष्व्यो-
। वात्रोपयोगो न त्वप्रतयकषस्य मनसः, तथाऽग्यल्य इष््ररकत्मेन भावकारणत्वेन चोपन्यासो `
नानुपयोगमति। एवं यद्यपि चित्रे भावरसयोविविकोऽप्यनतिप्रयोजनीयल्तथाऽपि रसल्य
सुल्थफरुत्वेऽविसंवादात्तदुपस्थापनञ्चोपयुज्यत इति ज्ञेयम् । ५: ~
| ` बल्य खलु चित्रल्य हस्तो युद्धायोदुयुक्तो तल्य कथं भावः स्यात् कथं बा डषटिरित्थादि ५ ५
` शशयापलुत्यथंमयमारम्भः। तथा च यत्य इल्तौ युदधव्यापृतो तस्य प्रायेणोचाहो मावोष््े- =
` कन्ग्वरत्वादिना रिषिषना प्रतिपाचेतेयथः । उकज्न समराङ्गणे- | |
जनिभ == १५
च अ्मोऽव्याथः १ (य १६५७ `
[ कृत्ये आघ्यादीनां परातिल्विकविषयनिरूपणम् ] = ` |
अद्गे!आस्ये)नाऽऽलम्बयेद् गीतं हस्तेनाथ प्रकल्पयेत्
चत्त॒भ्यां चं भवेद् भावः पादाभ्यां तालनिणैयः ॥ १२ क
[ ््धहतः स्वाहङ्कारपरिहारः ]
ध्ीविभ्वकमणः शाले पुराणभरतागमे ३
रूपसंस्याऽप्यनेकाऽस्ति लेशोऽयं छिखितस्ततः ॥ १२१॥
[ म्रन्थसमा्िः ]
यस्या नो कलयन्ति रूपमखिलं ब्रह्मादयो देवता
गोर्या विभ्वमिदं विचिलरचनाश्च्यं समुतपद्यते
[र
क्त स्वानामिदमन्न ख्व दश्च संक्िषठतया तदेतत्
विज्ञाय चित्रं छिखतां नसणां न संशयं याति मनः कदावित् ॥
| ( अ० ८२, छो० ३५ >) इति।
१२०। पुनरपि नृस्यादो विशेरमाह--आस्येनेति । अर यथाश्चुतपाठे सामान्यवाचिनः
भङ्गरब्देन अङ्धविशपो सुखं र्यते, यथा नदीवियोषजोऽपि गाङ्गेयः शान्तनवो नदीज इति। |
शोकः स्पष्टाथंः । कमराङ्णसूत्रवरि--
| हस्तेन सुचयत्नथं हष्व्या च प्रतिपादयन् ।
सजीव इति इश्येत सर्वाभिनयदशंनात् ॥
इति ( अ० ८२१ शदो ३३-३४ ),
आाङ्धिके चैव वित्रे * * * साधनयुच्यते ।
( भवेदत्रादत १) ल्तल्मादनयोशिन्नमाश्चितस् ॥
इति यथोक्तमथंमनुवदन्निव तस्य विन्नोपकारकत्वमपि व्यादिदेश । नन्दकेक्वरविरचिते अभिनय `
द्पणे ( (९1५ ८॥४४ 98081} 861९8, ०, ४, )-- | ५
चक्चुभ्या दशशयेहु भावं पादाभ्यां तालमादिशेत्ः
इति द्वितीयवरणपख््त्याऽयं श्छोक्ः, अविषः पूवेशटोक्श्च वत्तते ।
१२२ । सम्प्रति अ्न्थकरत्तौ स्वङ्ृतेरषमग्रस्वमन्यच्छायायोनित्वच्च प्रत्याययति--श्रीविशवकमग = `
इति। घुराम मावूस्याञनेयविष्णुधर्मोत्तरदौ भरतागमे मरतङ्गतनाव्यसूत्रादौ च ख्पवंल्याऽपि, ` ८ |
न कैवं तृत्यगीतादिगतविरेष इत्यपेरथंः, अनेका अस्ति, मया तु ततो ठेशोऽल्यमाघ्नं । |
हिखितः। भला नाम चृत्यगीतादिविषयके विरते न्यूनता तत्रास्माकमनयिकारात्, यततवस्म-
दधिङ्कतायां रूपलंख्यायामप्यसामग्रयं तदेव मां दुःखाकरोतीति भावः । 1
१६१ देवतामूतिप्रकरणम्
इति ध्रीत्तेतवात्मजं [ सुतरं ? |-भृन्बण्डनविरचिते वास्तुशाच्े रूपावतार
देवीभूत्तिखक्षणाधिकासे नाय अष्रमोऽध्यायः ॥ = ॥
समाप्तोऽयं ग्रन्थः । |
जितत तिन ्म ाना५११.०५ + ५.
[ श्रीडमामदेष्वरपंणवस्तु । शके १७५६ जयनामसंबत्सेरे ( ज्ये १ यै ) हे मसे
षृष्णयक्ते अयोदभ्यां भरगुवासरे समापितम्! सखोपन्तदादाटिभये अषकर्यां चा
वुस्तकावरूस नकर तयार केखी भासं ॥ शके ॥ १७६२ ॥ क्ञयनामसंवत्सेरे माघङ्कप्ण
११ पकाक्भ्यां मन्दवारे तारो २ मादे माच सन्न १८६७ इसवी सेजी नारायणकल
छिहिणार व्यंकाजी नारायण भरसा शीयहणार धीकनृहारकन्तेबस्थेन छिखि(त)प् ॥
स्वार्थ परोपकारर्थम्। शरीङृष्णापंणमस्तु ॥ श्री शमं मवतु ॥
धीमही प्रसम् व्रम्थसं० |! ६०० ॥ ]*
जभ १००० ~^
0 प
१२२॥। अस्याघ्यायल्य देवीमूरिलक्षणायिकारत्वेन, देवीनाञ्च गौरीप्रङतिकल्मेन भरन्थ
समाप्तो गोर स्तो्ति- यस्या नो इति! सा "यस्मात् न कल्यन्ती'त्यादि श्तल्माद'सिक-
जगदुवन्येति देतुदेतुमदभावः । |
` वेषम्याहु विषयल्य वा विरसणात्ततूखम्प्रदायत्य वा
मो्ठ्यादाक्षरिकिस्य घा स्ललनतस्ततल्यावधानल्य वा ।
छस्प्राप्ठा य इ प्रमादनिचया याथाथ्यंबोधद्िक-
स्ताल्तान् शोधयितु' यथामति समारम्बि प्रयासो मया ॥
ओदृस्यतोञत्र विदुषां न दशं निपात
सञ्चात इत्यनपनीतदुरूहभावे ।
शास्त्रे न हिल्पविषये विद्तिः खकल्पा `
| ज्ञात्वाऽपि दिड्नियमने सम कल्प एषः ॥
, उमेन्दमोहनाल्येन कोटालीपाडजन्मना ।
काह्कमतीर्थैन विप्रेण कालीक्ेनप्रवासिना॥ `
र ` कान्यप्रकाशं संस्कततुऽ्टमतो दशमावधि! `
‡ ` दीकेयं देवताभृत्तिगोचरा विहिता मया ॥
# जदङ्गे लिपिः खकीयोऽं देख उपलभ्यते, = `
देवतामूर्सिप्रकरणस्थ-पाटेषु
रूपावतारे भेदाः
देवतामूत्ति्रकरणस्थ-पटेषु
शषूपावतारे भेदाः
प्रथमाध्याये
† १३। (१) स्तादेवेद्-' इत्यन्न श्स्तादिवेद्-' ।
१५। ४) द्हविभागाः इत्यत्र षद्विमागे' |
१६। छ) द्धिभागेः इत्यत्र द्विभागाः।
षोडखश्टोकाष् परम्--
भागमेकं मवेत् पीतं (?) कनिष्ठा मध्यमो(न्त १ त्त )मा।
या प्रोक्ता द्वारमानेन सावा श्रेष्ठा प्रकीर्तिता ।। इत्यथिकम् ।
१८ । (३) (्दशहस्तादितोः इत्यत्र द्राहस्तादिनाः
२०। (१) श्वतुरस्रीकरतेः इत्यन्न (चतुरस कृतेः
२१। (३) 'दशंशेनः इत्यत्र दशांशोनाः । (४) "पच्वाशेनः इत्यत्र “पच्वांशोनाः
२३। (२) शचेरल-' इत्यत्र 'स्वणरल्न-; । ४) श्रुभाः इत्यत्र तथाः |
२४ । (३) स्पुरिताऽप्यर्च्याः इत्यत्र ^स्पुटिता पूज्याः । |
(४) 'दुःखदायिकाः इत्यत्र (दोषदायकाः |
२५। (३) "काष्ठपाषाणजा भग्नाः” इत्यत्र (काष्ठपाषाणनिष्पन्नाः । `
। ‡८५) वराही वाः इत्यत्र 'वराहोऽथः
३६। पटतंशः छोकः सपतत्िंश्छोकस्य प्रथमपाद्श्च न स्तः ।
४०। (४) श्मीतः इत्यत्र (शामतिः।
४१। (३) भूमेगोदानात्? इत्यत्र ^भूमो गोदानात्? ।
धर | (२) इत्यत्र ध्चेव जनमरकम्ः ।
= पुतदुमन्थविवरणं भूमिकायां दव्यम् । १
† सवंसन्या अङ्काः शोका नास्, बन्धनीस्थाश्च श्छोकपादानामित्यजुसन्धेयम् ।
{ (९)-(&) इत्यहद्वथं षट्पादश्छोकविषयम् । ११
४५ । | (१ ) "नत्तनं ह्यन्न नदन (४) “महद् भयमुः इत्यत्र (अयं महत् म ५
४८। (४)
„28. (१)
५०1...
९५२-५३ ।
( ९५२ )
“स्तथा इयन्न ^-स्तदाः ।
दैवतायात्रा-” इत्यत्र 'देवतयात्र-' ।
श्रोद्भूतवे्तं' इत्यत्र ध्रोद्भूतं वेछतम्ः ।
` बेदव्यासे' इत्यादर्थात् परमरधत्रितयं नास्ति ।
अध्यायान्ते देवतामूत्तिप्रकरणे? इत्यत्र “रूपावतार
` 1..@
@)
। (१)
५। (२)
६ । (१)
६। (२)
८15.
ताष्टः
२८। (१)
1
१६1; @
दितीयाध्याये
(क्रमाहदागणंः इत्यन्न क्रमादष्टगु्णंः
'जनसंख्येः कराङ्कखेः' इत्यत्र जेनसंख्येः करोऽ
'तटरुखंः इत्यत्र (तालमान ।
(जनस्तथा इत्यत्र जिनस्तथाः ।
'पथ्चताटेश्चः इत्यत्र "पच्चतारच्चः
ब्रह्मात्मा" इत्यत्र श्रह्माया' । (५) जितेन्द्रा्चः इत्यत्र जिनेन्दराश्चः ।
` १२। दादश्श्छोकात् परम्-
पोडराभिः क्रर(दे १ दे ) वीरूपाणि कारयेत! । इत्यधिकम् ।
(विस्तर इत्र "विस्तरे" |
दीधे" इत्यत्र दर्ये, ।
'जरायुजाव्यंः इत्यत्र “जरायुजाद । (४) “विदवरूपं इयत्र
प्विरवरूपी' ।
अध्यायान्ते “रूपावतार देवतामूर्िप्रकरणेः इत्यत्र केवलं “रूपावतार |
५८९.
तृतीयाध्याये
श्रह्माशिः इत्यत्र (नारो
४-५1 चतु्-पञ्चमन्छोकौ न स्तः ।
(९,
< ®
(५ । | ध १६। षोडकश्षोको नास्ति ।
“मातुष इत्यत्र “मानुष्यः । (३) ब्रह्मविष्ण्वंशाः' इत्यत्र श्रह्य-
किष्ण्वी(शं १ शाः) । `
शाके इत्यत्र '्वेशाचिके' । (४) श्रमि चिजगमैरवरम् इतयल॒
` ब्रह्मारां छिङ्मीदवरम्ः | ध ध
द्वारादयोऽष्टाः इत्यत्र (ारोदयोऽष्टधाः
र यसव ~ ~ ह 1
२३। (२) “सोम एव चः इत्यत्र सौभं एव चः |
२४ (४) 'पाणिवहमोः इत्यत्र "पाणिपहछवोः ।
२५ ४) प्रधाना पद्य इत्यत्र श्रधानपद्य-' | _
२८। (३) भभर्गमू्तिः' इत्यत्र भोगमूर्तिः? । `
३२। (२) द्टोमजटीटकम्' इत्यत्र 'होमजकीखकम्? ।
३६। (१) आननेय तुः इत्यत्र मप्नेवयां तु ।
३७। (४) ५८ > खः इत्यत श्राच्यां स्थाप्य! ।
( १ )
२१। (१-२) “-रेकनामिर्जिनेः इत्यत्र “रेकनाभिल्िनेः |
२२। (४) ग्रहा मात्रगणा-' इत्यत्र 'महामतरगणा- । |
२३। (३) शष्टियातदहितंः इत्यत्र शष्टिघातहरतः । (४) ध्पुराघं' इत्यत्र पुरा- `
(चवं) । |
२७! (१) “सदनं इत्यत्र वदनः ।
२८ | अस्य शोकस्य स्थाने ज्ञात्वा स विरवकर्मा सर्वद्यःः इति पाः ।
अध्यायान्ते 'देवतामूत्तिप्रकरणेः इत्यत्र “रूपावतार
| चतुर्थाध्याये
१।. (२) ("कमण्डलुवरान्वितः' इत्यत्र "कमण्डलुकरान्वितः' |
% | (१) “नामानं इत्यत्र “-नामाऽ्यं' ।
५। सपुष्पिक-पञ्चमश्ोकल्थाने अक्षसूत्रं पुस्तः इति पाटः ।
६। ४) 'पित्श्चाध्ययने रतः इत्यत्र (तपश्चाध्ययनोद्यतः' |
१३। (४) ततं त्रिखोचनम्! इत्यत्र (तत्तिलिचनम्? ।
१५। (२) गृहाश्चेवोत्तरेः इत्यत्र श्रहाश्चेवोत्तरे' ।
१७! अस्य शोकस्य पूर्वाधंस्थाने-
“पदं शुचाऽश्षदण्डच्च सत्यभामा तु वामतः" इति पाठः 1
(४) (कमण्डलुः इत्यत्र कमण्डलु स । ४
१८ । (२-४) (्ण्डागमस्त्रवाकूकाटं जयश्च इत्यत्र 'दण्डागममस्त्रवाकूफलनयस्य' । `
१६। (४) 'खड्गयुग्? इत्यत्र “खेटको' । ५
२० | (४) “~-निभवः? इत्यत्र -विभवः' |
२१। (२) नते जय" इत्यत्र तेजसः ।
३३1 (१) शसदशना कराः इत्यत्र शुदशनकराः ।
८.९ )
ध ३८। (2) ` -भगाम्निकेशः' इत्यन्न “भगोऽस्बिकेदाः' ।
1 ३६। अस्य शोकस्य पू्ाधे-- ` |
` श््रीकण्ठसूर्या()स्युरथोऽभ्बिकाजा (:)
परदक्षिणं मध्यविदिष्च पूज्याः । इति पाठः ।
9 (४). “विघ्रातिपरसंस्थाः” इत्यत्र “विघ्रानि परत्र सं वा ¢?
| क) चत्वारिशश्छोकस्य पराधम् उत्तरपद्यच्च न स्तः ।
छर-४६ । द्वाचत्वारिरण्छोकात् षटचत्वारिशश्छोकान्तायां पच्चश्होक्यां पाठो
| विसंष्टुखः।
‰८ । अवत्वाररिश्छोकस्य परा्ध--
त (वामश्रुचवरे दोस्यः शशाङ्कस्य निरूप्यतेः इति पारः ।
५५। (१) श्ोरितिकसम्यमासं" इत्यत्र शरि नीरसमाभासघंः ।
५८ । (१) गृहाः किरीटिनः छर्यान् इत्यत्र शृहाः किरीटिनः कार्याः ।
५६ । (१) (वरदं वश्राुरा्च' इत्यत्र वद (१) वजार ।
` ६०। @) मेषारूढं हुताद्यनम्? इत्यत्र भेषारूढो हुतारान
६२। (२) (कतिकाः इत्यत्र कत्तिकाः ।
@) श्वानरूपन्चः इत्यत्र ( स्वा ? श्चा )नारूढन्चः
६४ । (®) तलो दिरिए इत्यन्न (ततो दिरिः ।
। &५। (4) (िषिवीजपू न ^निधिकरशवे व ।
(३) भ्मृगारूढ इत्यत्र 'गदारूढ” ।
६६ । (४) 'मित्रफोणके इत्यत्र ईशकोणके
& | (२) 'आदियाद्याःः इत्यत्र 'आदिलयामीः (१ ।
` पालकस्य" इत्यत्र “पाठकः सःः ।
अध्यायान्ते द्देवतामूत्तिप्रकरणे रूपावतारिः इत्यत्र केवरं “रूपावतार
। पञ्चमाध्याये
। २। (२) लाडशूख्रं छिवेतः इत्यत क्षत्रियाणां फलपरदौ ।
@ श््रियाणां ल्द इत्य त्रिविक्रमो वामनन्धः
४। @&) चाक्रिकाणां इत्यत्र चक्रिकाणां ।
२१
२९४ ।
२६ `
२६ ।
३७।.
। (३).
(५)
“रावः पद्मं -चं-गो मधुसूदनख्च शं-प-गः इति पाऽः ।
°प-र-ग-चः इत्यत्र “पशं -ग-चैः ) |
श्वसिंह्य-प-ग-शश्ः इत्यत्र प्ठसिंदधक्-पं-गं -शष |
क-प-चां-गः' इत्यत्र “ङा-पं-चागः' । (३) शसं-च-ग-पः' इत्यत्र
“शं-व-प-गःः । | कि वा) त
माग्रतः इत्यत्र शतृष्टिमर्गतः? । (र) 'सरवतरेणायुध-? इत्यन्न = `
भसवत्रेवाऽभ्युध- ।
व
“च वत्तुखाः इत्यत्र सुवतु । ` | |
“निद्राङ्खखः इत्यत्र “चछिद्राद्घखाः । (३) रेषाकरुषाः इत्यन रेखाद्ुलाः |
धपायुनः' इत्यन्न ध्या पुनः. ।
श्वक्राऽथनामाः इत्यत्र “चक्राऽथवा साः ।
(सुरतः इत्यत्र शुर्ताः ।
(निषण्णा पाति इत्यत्र “छक्षणा पांक्ति-' ।
“पूजयेद् यः” इत्यत्र “पूजयेच ।
ध्पाद्वभिन्ना विमेदिका' इत्यत्र 'पारर्वभिन्नविभेदिता' ।
ुष्णकर्षकम् इत्यत्र ्ष्णवणेकम्ः । |
“समे चक्रेः इत्यन्न “दयामचक्रेः ।
८नान्तरायिके" इत्यत्र “नान्तरायकेः ।
रेप्याया इत्यत्र ^ेखाणा' । `
८एकवसेकः इत्यत्र “एकचक्रस्य ।
“संज्ञाः स्युः पच्च इत्यत्र (संज्ञाः पच्च'।
दारिद्रियमटनंः इत्यत्र दारिद्रय मदनः
३६ । अस्य पूर्वाध--
+ 2.1
. ४१).
(३)
1.
1
श्चक्रे तु मध्यदेशस्थे तेषामाख्यानकं श्णु" इति पाठः ।
(अनन्त्येदिति ज्ञेयः? इत्यत्र अनन्तश्चेति विज्ञेयः" । क
'एकपद्यान्तिका' इत्यत्र “एक्र( पद्यकिता ? पद्माङ्किता )'। `
दक्षिणार्तसंस्थिताः इत्यत्र दक्षिणावत्तसंस्थिता' । =
४२। (@
(४)
(५-६)
0.
1 । ४४। (२)
9)
४५। (१)
^^.
‰७ । (१-२)
४८। (९)
५०। (१)
५१ । (१)
५२ । (१)
५३ । (१)
त (र)
१७६ )
'पडयनादि य अङ्किताः इत्यत्र “पद्य न गदयाऽङ्किताः
“सप्रसम्पद-' इत्यत्र सदा सम्पद~ |
पञ्चम-ष्ट-पादयोः-- ` | | |
-शसखन्छनेन विना माया सा प्रस्ता तु सा स्सता (?)" इति ।
'वाप्यथं यद् गदाः इत्यत्र षवाप्यथ वा गदाः |
“रोगज्ञः 'रोगतोः | (३) (तस्यः इत्यत्र (तच्च ।
रहे रोगे- इत्यत्र श्रेदु ४ ।
धविकटास्या' इत्यत्र कोटरास्या, ।
(-प्येषामद्क नः इत्यत्र ^-ण्येवमङ्केनः ।
“पीतवर्णाममहावत्त) ° इत्यत्र "पीतवणमिं ( सह १ महा ) चक्र ।
धरषठदिगृभागेः इत्यत्र 'मध्यदिगभागेः
(जयदुखवश्ुभासक्तो ननः? इत्यत्र 'जपद्ःखं सुभासक्तो मानः(?); ।
(सुभः इत्यत्र सेः | ि
(चतु्चक्रं' इत्यत्र '्वतुर्वकत्रः ।
रर्माङ्धितास्तु येः इत्यत्र शरूमाङ्किता(-)ध्ियेः ।
-दायकाःः इत्यन्न कारका) ।
अस्माच् छोकात् परम् उनचत्वारिश्छोकतल्यम्--
५५। (द)
५६-५७।
। ©
५1.
(४)
(परमेष्ठयमितक्रोधस्तथा नारायणोऽन्तकः ।
अनन्तश्चेति विज्ञेयो नानामूर्िस्तु ये तः(१)" |}! इति पयम्
'तरसेन्यस्यः इत्यन्न "परसेन्यस्यः ।
षटपञ्ान्ल-सप्तप्ाशरशछोकयोः स्थाने-
अङ्कितं" `“ ग्रं चक्रं स्यात् यजतादिवतादविः इति पाठः ।
अतः परम्-
हला( कुष ९ इदा )धरं चैव चक्रमध्ये व्यवस्थितम् |
( बरं भद्रकितं ? बलमद्राङ्धितं ) चक्रं वाच्छिताथफल्प्रदमः ||
इति पमधिकम् ।
धसीतायाःः इत्यत्र प्तृतीय
धृतरूपिणः' इत्यत्र श्वृतिरूपिणः ।
(प्रदृच्व यतः इयत्र “-प्रदं हि तत्! ।
व ५.११५.
६२ (२) 'यश्चक्रमुदघाटयेन्नरः' इत्यत्र श्यो मूल्यमुदूचाटयेन्नरः'
८ | अतः परं पुष्पिकायाम् (इति पन्नगाशनः" इत्यत्र (ति ग्ड
६६ । (&) 'वामवबाहषुः इत्यत्र (सवबाहष्? | ` ध
, ४२ (१) महावराह" इत्यत्र भ्नृवराह । =
७५ | (३) शशिल्युषलोः इत्यत्र शीरसुषलोः ।
७७। ४) श्वजपीनसटािताम्' इत्यत्र ्वजपीतसमाथितम (१)
७६। (१) पुरषाकस्यैः इत्यत्र धुरुषस्येव!। `
८०-८१। अदसीतितमेकाशीतितमश्रोकयोः पौर्वापर्यविपर्यय
८३। (३) श्वेतं स्फटिक-' इत्यत्र “दवेतस्फरिक-
८५ । (४) छिनात् प्रविद्यारदः' इत्यत्र “खिखिचित्रविरार (देः? दः ):
८६ । शिरोधृतः" इत्यत्र दुनि रीक्षशिरोधर
८८ । (१-२) (कतन्यमतिजानु-" इत्यत्र कृतंव्यः प्रतिजान्ः |
६०। (४) ग्राच् कार्यस्तु" इत्यत्र श्रागवन् कार्यः ।
६१। (२) ध्यृष्टवाहु › इत्यत्र ्यष्टवाहु " ।
६२। (२) दक्चिणाखचवुष्टयम्? इत्यत्र दक्षिणासे चतुष्टये
६८। (२) गिदव समुद्भवः" इत्यन्न “विरवसमुद्भवः
१०८ । (२) वासुदेवं करम्! इत्यत्र वासुदेवकम्! । `
१११। (३) “चक्रं चेदं इत्यत्र “चक्रं च दण्डः ।
११३। (३) 'पद्यागमोक्ताः इत्यत्र "पश्चगं चोक्ता); |
११४ (१) तर्जनीवाणचापच्च' इत्यत्र “पद्चिनीचापबाणच्चः।
अध्यायान्ते ष्देवतामूर्तिप्रकरणे" इत्यत्र "रूपावतार" । = `
3 पष्ठाध्याये-- | ५
२। (र) शक्रण्डखस्यमलडकृतम्? इत्यत्र शुण्डलाभ्यामलच्छृतम्!। `
| (१) (जटाकृतचन्द्रदेवं' इत्यत्र 'जटाचन्द्राकतिः। ` |
६। (£ ्दष्राकराट्विकटास्यं' इत्यत्र दृश्राकराख्वदनम्? ।
८। @) श्लकशाङककतशेखरम्ः इत्यत्र शाङ्करं कुतशेखरम् ।
८-६ । अष्टम-नवमश्ोकयोः पूरवापरीमावपरित्तिः। ==
११। (१) “खदुज्गं चक्रपालच्च" इत्यत्र खदुाङ्गच्च कपाख्च्च'। = 1 1
द... 1 ५ |
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_ ५ स ली न ध,
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{ १८ )
‰ १३। (३-४) (वामे अक्षसूत्रभ्व' इत्यत्र 'वामेऽ्षसूत्रच्चेवः
१४। (२) “विभूषितम् इत्यत्र “विभूषणम्, । |
१५। ४) नागेन्द्रासनभूुषितम्? इत्यत्र 'नागेन्द्रोरविभुषितमः
१८। (४) श्वरदामयपाणिकम्ः इत्यत्र वरदाभयपाणिनम् ।
१६। एकोनर्विशः शोको नास्ति ।
| २८। (र) (स्तं रि्ूलिनम् इत्र “दस्त निधिन्
` २१। (४) शचित्रदवर्यसमन्वितम्' इत्यत्र “चित्रेदवर्यपलपरदम्'
` २२। इ) खड्गचापरिरः- इत्यत्र खड्गचापशर” ।
२५} (३) '"पच्ववक्तूमयं' इत्यत्र “पथ्वास्यमभयंः |
२६ भस्य पराध--
श्च्छाज्ञा(नं ? न )कलायुक्तननिनेतरं ( व ? वि )ज्ञानार्णवम् इति पाठः ।
२७। (४) “कणे बे तालपत्रकम्! इत्यत्र कणयोस्ताडपत्रकम्ः ।
२८। (४) ^स्वदष्षिणे' इत्यत्र च दक्षिणे ।
२६1 (१) अर्थे तस्य तरयो रूपः" इत्यत्र अर्धस्तस्य सियो शूपंः
३०। ) गणेशं व्याप्यः इत्यत्र “(मणेदा चाथ ९ गणेशश्चाथ)ः
३१। णकर्रिशशटोकात् परम्- ` ५,
4 # अंलिङ्गितवामहस्तं नागेह द्वितीये कर । `
| इरस्कत्यलुमाहस्ं वर्णां द्वितये कर | इत्यधिकम्।
३३। (२) शछरषणार्थेनस्तुः इत्यत्र श्ृष्णार्धेन तुः! `
` ३५॥। अस्मात् छोकात् प्रम् इति गरुडध्वजः इत्यधिकम् ।
४४1 (३) ऋद्धासुखगतः' इयत्र “रज्यागतमुखः' ।
1 ४६ । पुष्यका्ां ह्रिहरपितामहः' इत्यत्र हरांहीरराय-पीतामहः' इति विरोषः।
४७४८ चन्द्ा्पितामहरश्षणात्मकं शोकद्यंनास्ति ।
४६} अस्य शोकस्य परार्थं परस्य च पूर्वार्धं नास्ति ।
1 ५३। र) 'वामार्धादि इत्यन्नं 'वामोरध्वादि- ।
साना ण नोन
भतभकरम भ७०१११८.५ ८ ०
| | गत्या सन्निवे्ित आसीत्, पाठान्तरं तु छन्दः पाख्यदेवाऽऽत्मानं खसंहितमकरोत्। ` स
य
५५ |
५६ ।
५८ ।
६ © |
६२।
(१)
(१)
व
(४)
( ` १७६ ` | ) `
-खटाङ्कपात्राणिः इत्यत्र “-खटाङ्गपाशानिः
इरिहरस्यापिः इत्यत्र 'हरिहरश्चापिः
न्ततः पुनः इत्यत्र प्पुनः स्मृतः |
यथोक्तपू्वाधौस् परम्--
(२)
(४)
(र)
(१)
(१)
)
क्रमेण नव छिङ्ानि षटकरान्तानि संख्यया ॥
` पोडशाङ्गरूमारभ्य एकेकाङ्खवरधनात् । क
लिद्धानि रसदस्ता(तत्! न्तम्) अष्टाविंशोत्तरं शातम्! । इति पाठः ।
"हिन्ताश्चागरूडः शुभः" इत्यत्र "हिन्ताखश्चागरः शुभम् ? :)
पुष्पिकायां 'दारुजातीः इत्यन्न 'दारुजानिः
भयित इत्यत्र त्रयखिंडात्ः । (३) न चः इत्यत्र नव~ ।
(-मघोरेश्वरम् इत्यन्न ~मघोरकम्' । |
“-महोरा्ं' इत्यत्र “-मघोराख्' । `
“-भूतवेदान्तं" इत्यत्र “भूतवेदान्त-' ! `
“रित्यादियुगटं चान्ते इत्यत्र “ह्तादियुगर्त्वान्तेः
“भव-' इत्यन्न नव~ ।
अत्य शोकस्य पराध--
(२)
1
(२)
` श्रासादा कन्यासे ज्याठा सिमामानमिदं स्परतम्? इति पाठः । #
छ,
"गभे पच्वांशाकेः पाभपन्चांराकेः
दार्णेः इत्यत्र ्दारजेः
अस्य शोकस्य पूर्वधि-- ` व
मृहारुरोहशेखाश्च देध्यंमकंलिनांराके(:)' इति पाठः ।
(नवनाग तुः इत्यत्र नवभागं तुः |
` 'शिवाख्यमः इत्यत्र 'शिवायतम् ।
न्नागरेः (नरः
(यदः इत्यत्र “जयदं ।
` शमे चिसुप्रभार? इत्यत्र (मगा ? गम)त्रिसप्तमागेः
८८ । (२) चतुरं शतम् इत्यत्र प्वतुरंशकम्! ।
,.: श;
¢ ८ ९२।
६५ ।
(३-४)
(६)
(५)
..()..
४)
(; १६०.) ४
(६) जयदाथि' शत्य
'जयदादि
अस्य शछोकष्य प्रथमाध-- `
मशकं तस्करादिकम्? इति पाठः!
“राज्ञा षण्डं काभयकंः इत्यत्र "राजा षण्डं चाभयकं |
सुपाठकेः इत्यत्र 'सुपाठकेः ।
'घनादिक-' इत्यत्र ध्वनाधि(प-१ क~) |
“विजिताः ईत्यत्र विवजिताः' ।
(नवमिहरणे रिष्टं
` क्रमस्त्याप्यटकः' इत्यत्र व्वक्रमतस्यौ घट
८ ६६। (३-४) -दुष्णरेषो वणटुसौख्यदाः इत्यत्र कृष्णा रखा वणु सौख्यदा ।
अस्य शोकस्य पूवोधं-- `
त ५,
६६।
१०० |
। १० वि ।
८.१६
1 १०६।
18 1
८ ९
४)
(६)
र
(व
@
७.
श्टुत्राभमष्रमांशेन साध्य शषडंडकेः इति पाठः । `
ुद्रवुदाकृतिः" इत्यत्र चुद् ुदाकरति
'काकपदादिवेः इत्यत्र 'काकपदादि
= पुष्पिकरायां दारुजानि स्फाटिकानिः इत्यत्र ^स्फरिकानिः
(१)
भस्य
'वरच्चः इत्यन्न 'खण्डञ्चः | = `
चतुर्थपादीय-दोषकरं यतः इत्यारभ्य भ्मन्त्रः ( १०८ श्लो २ पा०)
इत्यन्तोऽ शते नास्ति । ५
` एततपूर्वार्थात् परं १०७-१०८-तम-श्छोकद्वयी तत्तः पुनरयं पूर्णः शोक इति
विस्ठख दिपिपद्धतिः। |
पुत्रपोत्राश्च' इत्यत्र धुत्रपौत्राणिः
श्रयस्तं पीट" इत्यत्र ¢यखं विपीठम् ।
भुज्यते इत्यत्र ूज्यतेः
तथाः इत्यत्र ततः: ।
"पीण्डञ्चः इत्यन्न “पिण्डच्वः
स्थापितं इत्यत्र “स्थापितेः ५
(३) “करं इत्यत्र “करे ।
९४२1 (१) अर्धचन्द्रा
१४८ । (३-४) शुखाय स्याचिकोणा' इत्यत्र शुखावाप्रय त्रिकोणा
६ १८१ )
१२३ । (१) वातवे" इत्यत्र रे वे" ।. (३) 'सहखहुस्ते' इत्यत्र 'हस्तसा्हर. ।
१२४ । अस्मात् शोकात् परम्-
घाटे जगति मध्ये तु वाणे गमगृहुं भवेत् |
स्वयम्भूपीठिकास्थाने चटे चण्डो न वियते ॥* इत्यधिकम् `
१२५ । (१). एकं चण्ड्यां वरे सपत्? इत्यत्र "एकां चण्ड्या रवेः सप्त! । =
(४) भङ्चिबस्याध प्रदक्षिणाः इत्यत्र रिवस्यार्धप्रदक्षिणम्ः
१२८ } अस्य शोकस्य स्थाने-
ष्छिङ्गानामष्वा कृत्वा पीरिकाणान्तु र्षणम् ।
आदौ बरह्मा च विष्णोश्च पीरिका( सु १८ )च्छ्रयं विदुः" ॥ इति पाटः ।
१२६ । (२) “कामदम् इत्यत्र ~कामय(म).
१३०। (#) . न्तत्तुल्यं चाप्राधकम्? इत्यत्र तुल्यं चाप्राधकरं त्रिधा ।
१३१। (१) वत्रिधा विभक्तमप्रे तुः इत्यत्र "विभागाकृतिम्त्रे तु' । `
| (४) भ्मध्यवंदोदूभवाः इत्यत्र मध्यवङ्क्षोद्मवा' |
१३२। (२) रवणाकृतिः इत्यत्र 'वापराजितेः |
(क) अस्योत्तरं परश्छोकपूवर्धच्च १२४द-ष्टोकपूरवार्थात् परं वतेते ।
१३३ । (१-२) शयाम्योत्तरततसंपादमप्रेः इत्यन्न 'याम्योत्तरततसपादमप्रः
(क) अस्मात्. शोकात्. परस्.
“उष्टपेये चुपीस्याशचा(प्रतिमाजिताम्ः इत्यधिकम् । =
१३५ । (२) “साधत्निमागोन्नतम् इत्यन्न साधत्रिभागिकम्ः
१३६ । (१-२) (्सार्धद्वयं भागे > >< > कच्चिन्निका मता" इत्यत्र ¦
'साध(दाय ? भागं) तु भागेकं चिपिका मताः। इति।
अस्य श्छोकस्योत्तराध-- ` | |
'द्विभाने चान्तरा पटरी कपोताटि(-)द्विसाधंकाः इति पाटः ।
१३७। (१) अर्धयं च मघ्नासपटरीः इत्यत्र 'सार्धपच्च प्रासपटरी' ।
१३८ । अस्य शोकस्य पूवाध--
भअर्धुलं ९ अर्धं सुल-)पद्ठिका च कर्णे ु्यभागिकम्? इति पाठः ।
त्रिकोणा च इत्यत्र अरधकोणा चः
स
प
0 | 4. |
कर)
^ |
२
१५४
५६।
१६०।
५
१६६
१६६ ।
( ९८२ )
प्रणारस्या' इत्यत्र श्रणारस्यः । (३) (जलमम्राविभषेणः इत्यत्र (ज~
मार्गो विधानेनः
अस्मास श्टोकाच् परम्- | |
(ुखलिद्धं त्रिवक्त्रं स्यादेकवक्तरं चतुम॒खम्? इत्यधिकम् ।
द) श्रिक््तः इत्यत्र श्निवचतर' । (२) '“पश्चिमास्यं स्थितं" इत्यत्र
पपश्चिमास्यासिर्तंः
@) स्मरताः इत्यत्र (तथाः । |
(१) “-मातरस्थानंः इत्यत्र मातरं स्थाप्यः । (४) ्यद्कषाधीराच्ः
इत्यत्र छरयाद् यक्चाधीराच्चः }
(१) “वामः इत्यत्र धवामेः |
(३) श्रेः इत्यन रम्ब" । (४) शुणु इत्यत्र स्थित
(३) (असिनोः इत्यत्र असितो! `
(३) (-द्वितचरिचतत्-' इत्यत्र ^-द्वित्निचतुः- ।
अस्य द्वितीयपादे-
"तस्मादयुग्ममगमद् बहशो हरिः इति पाठः ।
(३) ननन्दनीमाः इत्यत्र "वन्दनीयाः । |
(क) पुष्पिकरायाम्--श्रीक्षेत्रा > > विरचिते इत्यत्र श्री्षेत्रात्मजसूत्रभरन्मण्डन-
. --विरशितै
1 सप्रमाध्याये
(३) पद्मनाभश्च इत्यत्र दप्रभश्वः । `
५ (४) सर्याभ्र सुप्रमान्तः- इत्यन्न सुपां सप्रमो मतः. |
द
(्) “~-नन्ततक्षकः" इत्यत्र “नन्दमन्दकः' |
अस्य पूवंपादत्रये-- `
श्वरः शान्तिश्च (क)्न्थेरमद्धियो युनिराप्रतः ।
(ख) 'तेमिर्ननिपादवे नाथोः इति पाटः।
(४). “मदिपाश्वैः इत्यत्र “-मदधिपारर्वौः
(२) श्यः" इत्यत्र श्रीः
(क) न्थाकहमहयो सुनिखरतः' इत्येवं स्याप्। (ल) नेमिनः पाश्वनाथोः इषि ध
१ 1 1 ॥
&। (२) नन्यावत्ताः इत्यत्र ^नन्दावत्तं
म न 9 (0 क्र
( १८ )
चग
त्ता" । (४) 'षिहोः इत्यन्न “सिंहः
अतः परं “इति जंनटच्छनानिः इति पुष्पिकाऽधिकरा ।
७। (३) वविराखाश्चा-' इत्यत्र "विशाखा चा- ।
८। (३) स्वाती चः इत्यत्र रेवती?! = `
६। (१) श्वणादिवन्यो" इत्यत्र “श्रवणादित्यौः
भतः परं-इति (क) जनानक्चत्राः इति पुष्पिकाऽधिका ।
१०। (३) कुखब्रधिक- इत्यत्र कुम्भवृधिक-" । |
११। (१) (कर्ममेषोः इत्यत्र (ककमेष- ।
१२। (३) तुम्बरः' इत्यत्र तुवराः । (४) "विजयो जयः” इत्यत्र 'विजयो- `
ऽजि(म ? तः)
१३। (३) 'अकुटि-' इत्यन्न भक्कुटि-' । |
१४ । (१) -“-र्यमितबला' इत्यत्र ^-्यनिनवलाः । (२) "काटिकाः इत्यत्र 'पाख्काः |
(2) शश्याम्ान्ता' इत्यत्र श्यामा घ्राता |
२०। (३) शवरमुदरर्ा-' इत्यत्र 'वरयुद्रराक्ष-' । ।
` २४। (-४) “सूप्रच्च (ख)भङ्छ्रं इत्यत्र “सूत्तच्चाङ्छुराश्'
२६। (४) "गदाधर" इत्यत्र 'गदाक्रे'
२८। (१) पद्मपन्नख' इत्यत्र पद्प्रभस्य' । `
३०। (३) भनिल्पारं इत्यत्र 'विरवपारो' ।
३१। (१) शान्ता सुवर्णास्याः इत्यत्र शान्ता (ग) सुवर्णा स्यातः |
(३-४) न्चाभयं' इत्यत्र च भवेत्? ।
(२) छवेतमुखाव्जञरथः' इत्यत्र खेतश्चतुम॒ खः ।
अस्य द्वितीयादं-- ` ५
-उजस्याक्गमुदगरपारावभवयाक्षक्ुरगदानक्घट्मः इति पाठः ।
३७। (९) शयुद्रव्णा' इत्यत्र सुद्गवर्णाः । (२) श्रमारूढा' इत्यत्र पद्मार्ढा'। = |
३८ । (£) "कमलः इत्यत्र "करः ।
३६ । (४) शद्ग" इत्यत्र चुद्गरमः
(क) 'जिननक्षत्राणिः जन्मनक््ाणि" वा स्यात्। (ख) अत्रापि पूलवव् छन्दो ` ८ ।
मेदभीतिरेव मू सम्धिविच्छेदेतुर््यः । (ग) “खवणेव्ण स्यात. इति स्यात् ।
( १८४ )
# ४०। चत्वारि श्छोकात् पर्म--- ` १
चण्डा इयामवर्णा स्यादश्वाूढा चतुभ्जा
1 रदं च तथा राक्तिगदम्बुजमनुक्रमात् || इत्यधिकम् ।
† ४१। (२) शईिषीस्थः इयत्र 'हिखिस्थाः । |
४४। अस्य श्लोकस्योत्तरा्धे-- ` |
. बीजपूरगदा चाभयाऽक्षमालाऽन्ननाद्ुटाः इति पाटः ।
` ४६। (३) 'वाराहवदनोः इत्यत्र ्वराहवदनोः
४६। (द) ्रिमूलने" इत्यत्र ५त्रिनूलके() ।
.. (द) भ्सुषांधिकाः इत्यत्र “पद्य सुषण्डिका !
५०। (२) शेषवाहनः' इत्यत्र 'ाद्वाहनः"। =
` ५२। (२) (पद्यवर्णासनस्थिता' इत्यत्र “वर्णा पद्यासनस्थिताः
` - ५३। (१) शतः फषोरोदः इत्यत्र “सितङेरो(व १ ऽथ )"
१४ अस्य श्लोकस्य परार्ध-- `
दावादक्तिपाराधनुस्तथा पद्य च नछुखम् । चेति दक्षिणाधकरक्मात = `
वरदं चादसू्रच्च च शक्तिना मातुलिङ्घकम् ।' इति क्रमहीनः पाठः ।
1 ५७॥। (१) (क) "रदन्ता इत्यत्र नरदनत्ताः ।
(१) श्चकुटिनेमिनाथस्यः इत्यत्र श्ृक्ुरिनमनाथस्यः । =
: ५९॥ अस्यशछोकल्य स्थाने--
'अ्षुवजञपरलुनङुरं मथानस्तु गान्धारी यक्षिणी
वरखडगखेट्लुङ्ध' हंसारूढास्तिता कायो ।| इति पाठ
६१॥ अस्यश्ोकस्य पू्वाधै--
सिंहारूढाऽम्बि(ककायं ? का कार्या) डम(र) नागपारक्रप् इति पाडः | |
(४) (तथा हस्तेषुः इत्यत्र तस्य हस्तेषु । `
‰ एतदंशसुद्रभावखर एवास्माभिरिदं “स्पावतारुस्तकमुपरुन्धम् । परं तदानीमपि `
र ५ ¦ स् ॑ त्ञातं यदिदं पुस्तकं नासमाव्रभिन्न द्ेवतामूतिप्रकरणमेषेति अधिकोऽयं रोक इति
ध ( ख्पावतार इत्युरेखेन अ्रत्यपादटीकायां सन्निवेधितो न मूले । |
† मूणे १३८ तम-यृषटत्यस्यास्य खोकस्य संख्याट्को भ्रमान्न सुद्धित इति द्यम् ।
ध (क) मूष्रन्थे उदेशल्टोके (१६ @ो०) “नरदन्तेत्येव नामोषलम्यत इत्यतो रश्चणनि्णय- = `
मूले “नरदतते"ति नान्ना भाव्यम्. प्रमादादस्माभिरनुतेक्चितपाढान्तरं यथाप्राक्षमेवं ५
( ' १५. )
६७ । अचय इटोकस्य पूर्वाध-
'कंलाक्षसमोशरणं सिकालिसदाहिवम्ः इति पाठ
६६ । () 'वित्तरागे तुः इत्यत्र 'वीतरगेषुः। |
७०। (४) माहेन्द्रस्य" इदयत्र “महेन्द्रोऽपसब्ये' ।
७२। (२) शुभोदराःः इत्यत्र 'महोहरा' । (३) श्ुनाभंः इत्यत्र युनाभोः |
प्रजग्मुः" |
| | मष्टमाध्याये--
, ..& 1 (४) भसिद्धचामर-) इत्यत्र सिद्धचारण । |
७। (१-२) “-सनाक्षसूत्रा च मभयं? इत्यत्र “-सनाध्वसूत्राव्जमभयंः ।
८ । (२) षहृदये चः इत्यत्र (हृदयापरेः । (३) "च्चाप्रवधः इत्यत्र 'पच्चाम्रयश्चः |
६। (ष) ्वीवाहे तु माहेश्वरी? इत्यत्र “विवादेरवरीः ।
१०। (२) गजासनसंस्थित्ताः द्यत्र 'गजासनसुसंस्थिताः ।
१३। (२) वेतचामकरेः इययत्र दवेतन्वामण्डक' । | ५
१६। @) भोदहिल्यपि सव्ये सभिनी 'मोहिन्ययसव्ये स्तम्भिन्यपि! ।
२९) पएकर्विश्चः शोको नसि।
२४-२६ । चतुर्विंशतः षड्विहषान्तानां त्रयाणां शछछोकानां स्थाने- `
"रक्ताङ्गो गजवक्त्र (:) स्याद् रत्नकुम्भं तथा(ङक्)शम् ।
> ॐ > > < > >‹ ॐ परञ्ुमोदकाक्रमात् ।
इत्युच्छ्ठगणेशः इति पाटः । `
9 2७ | अस्य शोकस्य स्थाने-- `
{. (सिन्दूराभ(त्रिण एत्रिनेत्रश्च प्रोक्तबीजगणाधिप() ।
दण्डपाशाङरो बीजपूरं बिभ्रत् करेषु च ॥
इति बीजगणपतिः ।
अक्प्रसारिधरं वा सिहवाहनत्रिनेत्रप्।
. दानमये मोदका दण्डमेव च ॥
ट्ख रिरेक्षमाखा च मुद्गरं चाङ्कशं तथा | 11
` त्रिशूलं चेति हस्तेषु दधानं छुन्दवत् सितम् ॥' एतावानूपाढः । ‰ = |
"विन्ुराभस्तिनेतरश्च प्रोक्तो बीजगणाधिषपः' इति स्योत् । 1 |
ए.
७४ । (र) शरष्नो गन्धवंयक्षोः इत्यत्र ररक्षोगन्धवंयक्षा । विज्य" ` इत्यत्र `
१८६ )
(२) श्ङ्धविन्रत इयत्र "गूं विधतः ।
भल्मात शोकात् परम्--
२६1.
:*2३२।
ए
र प
४० ।
४१।
4... ४६1
र्
1
9 ५६।
६९1
&।
` ६८।
क
७२ । ५
(५
५ | ध ४ ६४ ।
४ ¦ ७६ |.
1 91
वामागे जक णाहथाद्धे दक्षिणे
प्र कर्णे तु द्वा पातु धष्रको बारुचन्द्रमा(:)' इत्यधिकम् ।
८३) “राज्यं इत्यत्र “राजाः । (४) (्यवस्थितः' इत्यत्र (च संस्थिताः ।
(र) वल्वान्तक-' इत्यत्र बल प्रातक- । `
अयं शोको नास्ति ।
(३) "कमण्डलोद्वरणाभं' इत्यत्र "कमलोदरवर्णाभिः |
(१) (-श्विरक- त्यत्र ८-श्चि | प (२) (स्थानीयं सैट इत्यत्र
(स्थानीयखेट-' |
(२) श्रसारिकाः इत्यत्र श्रसारिताः ।
(४) "च स' इत्यत्र ल्वसिः' 1
(३) ्लीलाभ्रीः इत्यन्न (नीखाङ्गी' ।
(१) "वरदः इत्यत्र वरं" ।
(४) 'सर्वङ्रष्ट- इत्यत्र 'सव॑क्रह्ल-' ।
(र) (तथोत्तमम् इत्यत्र 'तथोन्नतम्' ।
(४) श्ह॑सर्संस्थिताः इत्यत्र हंसवाहिनी ।
(२) निधत्त" इत्यत्र चिभ्रतिः । `
(३) दरदाः इत्यत्र "वरदा ।
(२) 'दादिनीः इत्यत्र (दनी? । | ।
(र) (स्ेर्य" इत्यत्र 'स चैवः |
(२) द्रवा" इत्यत द॑ष्राखाः
(२) चक्रये" इत्यत्र (चक्रकं! | (४) ५....चाप्यथ' इत्यत्र दक्षिणे त्वथः
अस्य छोकस्य पू्वाध--
'खेटपादाधनुदण्डं कुठारं चेति बिभ्रतीः इति पाठः ।
(३) (इत्ये इत्यत्र त्येवं । (४) “व्यवस्थया, इत्यत्र व्यवस्थिता() । ` |
(२) शत्यमानं विकारणम् इत्यत्र (ृत्यमानपीणाकरम्?
(३) ववीरेरवरस्यः इत्यत्र षवीरेरवरधः । `
| \ ५८। (र) नोगासवतनिधूख्ः इत्य धवीणाहस्वदिराख्च्चः । == `
---- --------------------------------~------ ~ न ----------- -----=---
( ७ )
८२॥। (३) वर्च पुस्तकं वीणा इत्यत्र वरं पुस्तकं वीणा चः ।
८४ । (३) "असपप्न' इत्यन्न 'अक्षाभयंः ।
८६ । ४) “दायकाः इत्यत्र “-दायिनीः ।
८८ | (९) श्युकछुचौः इत्यत्र श्युवश्चचौः |
६१। (३) “बूलखासिशक्तिचक्राणिः इत्यत्र 'गूलासिराक्तिचक्रासि- ।
६२। (२) “सासवाः इत्यत्र 'समुवाः |
६३। (9) “पाशबद्धो गले भृशम्" इत्यत्र पाराब(द्धं १ द्ध) गलेक्षणःः ।
६५ । (३) "वरटश्चंवः इत्यत्र 'करटश्चंवः ।
६६। (१) "कण्ठहवे, चेव इत्यत्र कन्दकश्चैवः ।
६८ ! ॐ) भृकुटिनामतः' इत्यत्र भूक्रुटिनामकः ।
१०१। (१) र्या इत्यत्र कार्या" ।
१०६। (२) ्ततुपूषठच्च करद्वयम्? इत्यत्र (तत्पृष्ठे च छुरहयम्ः ।
१०८ | (४) (तदधःकरेः इत्यत्र दधतः करे ।
१०६। (३) त्रयाणामपि! इत्यत्र श्रयाणामनु- ।
११३! (२) (वामे खेटकचाप” इत्यत्र "वामे खेटकचापं चः ।
१९१४ (१) ्वण्टं वा परशु वापि' इत्यत्र “वण्टाश्च परश चापि
२) वामहस्तेः इत्यत्र "वामे हस्तः । (४) श्रकल्पयेत्' इयत्र श्रदरीयेत्' ।
१९१५ । (४) (नियहन्त- इत्यत्र (तियगदन्त-' ।
११६। (१) “र्तरक्तिकताङ्च्च' इत्यत्र “रक्तरक्तीकृताङ्ख च्च । (२) “-विस्फारिते-
| इत्यत्र “-विस्म् रिते- ।
पाठान्तरं समाप्रम् ।
` पुकत्रदेवपूजानिषेधः - क र 1
विषयाः पन्नाः
१। प्रतिमद्रव्यगुणदोषतालधि-
काराख्ये प्रथस्राव्याये [ १--७ |
विषयाः | व॒घ्राङ्काः
तुर्या पूज्ञानिषेधः 1 ८
कमखाद्नः ४३
यन्थारम्भः ह | साविघ्री ६ (0
मूर्तीनां करतेन्यतोपदेश्चः =, १ | चर्षयः ४ ९
प्रल्णष्तरशिखालक्षणम् 9 ५) | विशधक्मी ० 9
हुष्टशिरारक्षणम् ४ »» | ब्रह्मायतनम् 1 "
पुनः श्चुभरिखालक्षणम् =... ,› | ब्रह्ममुिः आयतनं प्रतीहाराः ॥
शिलाहरणदिनादिनिदंशषः ^ „ | स्यादिनव्रहसूर्यायतनप्रतीहाराः--
` गृहपूल्यप्रतिमामानम् =“ ४ | सूर्यः क
देवाख्यपूज्यप्रतिमामानम् 182. | । । | 89 श्रहूमणां वृणाः + क | |
अनावृतदेकषूल्यप्रतिमामानम् + | । | | १ ग्रहार्णां वाहनानि #@ ४ | 99
प्रतिमाघरनद्रम्याणि ह »» | ग्रहाणां भूषणानि ण
जीणोद्धारविधिः क न सूर्थाथतनम् ७७४ ` " च
मीषणदेवतास्थानम् ८ व प्रदीहाराः ,„ ९१
इ ५ ४ । | (7 7। १५ दिक्पाटमूत्तिष्यानम्- । |
अ्चावेकतकथनम् ५ ९ विक्पारेु शनः ॥ ४ +
प्रतिमािरोक्ञानम् क न
¢ घ + ४ 99 ५१
तारसानेन मूततयः ५ 9, द 0.
@ ¢ ४ 9१४ ,
रेणाङ्वधानम्-- ५
तालाज्ुसिणाद्कषिधानम् तेग: क
तन्न बटूताख्स्य १०० ६ छ 7 र
सषतारस्य 11, + 8 पदनः रि ५ । ५ ५ + |
अष्टतार्स्य ८" 8 इ
नवतारस्य ^“ . ६ | शान 4
कपार्मूर्यधि- ५
| तव ¢ ४ 6 ३। विष्णुमूरयंधिकाराख्ये तृतीये ॥
जीर्णोद्धार विशेषः ४ 11, १ |
| युगमेदरेन वर्णभेदेन च विष्णमूत्यः १३
(9
(१९)
विषयाः
दिरोविधानम्
घर्णमेदेन विष्णुसूतीन्धं शुमदत्वम्
ध्रीहरश्यतु [द शातधुत्तयः-
(९)
(१२)
(१३)
(१४)
(१९)
` (१8)
(१७)
(१८)
(१९)
(२०)
(श)
५)
(र्द)
क 1),
दशावतासः--
4. मत्स्यः = |
नारायणः
माधवः
पु्षोत्तमः
अधोक्षजः
सडषणः
गोदिन्दः
विष्छुः
मधुसूदनः
भच्धुत् ४
उपेन्द्रः
प्रु
चचिविक्रसः
नर सिः
जनादंन्ः
वामनः
| शरी दः
अनिष्टः
ह्षीकेशः
पद्मनाभः
दामोदरः .
हरिः
कष्णः
9 € &.
[ २]
पश्राङ्ाः विषयाः
१३ | वराहः.
५ वृधिष्टः
| बामनः
४ | परयुरामः
। साभ
99 ।
बरराभः
18.
उः
9५ ,
क्क
द,
जछ्दाथनः
गर्डः
क
दु०८*
विश्वसुखः
अनन्तः
ध ( | ्ररोक्यमोहनः
| षिष्णुप्रतीहाराः |
१६ | ४). शिवमूत्तिशिवलिङ्गल्तणाधि- |
» | काराख्ये चतुथं [ २९३२] `
शाटश्रायवर्ा--
पूञयश्िषाहष्धणन्
त्थाञ्यक्षिहछारक्षणम्
तत्र मतान्तरम्
वणसेदात् दखूवि्रेरकथनम्
चक्रधिशेषे वणमेदः
उत्तमा दिचक्रप्रमाणस्
त्रिचक्ररुकष्मीनारायणः
दारग्रामस्थ प्रतिष्ठानिषेधः
दाटग्रामप्रशसा
मूसिविशेषाः--
1.2.8
पत्राः
विषयाः | पत्राः | विषयोः ` पत्राः
ददश शिवघुचतेयः-- | | छिद्नान् [ ४ २७
(१) सयोजातः ` ४ २१ | छिद्धवृक्चाः ५ ॥ त
(२) वामदेवः ` ५ | * | चुक्ष्षणम्ू ०५५ ८
(३) अघोरः ` ० 9 | दावादिरिल्लोविताः प्राक्ाहाः ... र
(४) ततपुरषः ५" प्रासादमनेन शिष्मानम् ... | त
(५) ईशः ` 3५ % रिध छभव्ह्वानि ` ^ २८.
(६) शल्युज्ञयः ,, | लि ्रह्मादिभामाः न 1
(७) किरणक्षः ,, । दिङ्गस्योद्धौदिभागाः ४
(६) भ्रीकण्डस्वश्पम् १. २३ | घटितरट छिङ्श्वणम् 4 | २९
(९) भिश्च ८ ,, | बाणोुपत्तिस्थानम् ध
(१०) वचिषूपाष्टः 6 ,, | वाणपरोक्षा ता न
(११) बहुरूपी सदाक्षिवः ... ~ चज्यंरिङ्धानि ००५ न
(१२) च्रयम्बकः त ,, | बाणद्द्प्रशंला ` 1
उमा महेश्वरः ^ 8. वाहनविधिः क
हरिहरमूसिः 4 ,, | पीष्कि क
हृरपितासहः 4 $ युखलिद्धभ् 4 + 28 91
युग्रम् व | एकट्वारशिवायतनम् ४
ठिङ्गनि-- | चतुमखश्िवायतनम् 1
ष्टरोहरिद्धषलस् २५ | दप्रातद्ध्यः | |
अग्टरललिङ्धफर्म् 6 व॑परति्ारो [र ए
पीडविधिः ५ दक्षिणपरतिारौ ध 9१
टिदोचिता मणयः वन २६ पश्चिसप्रतीहारो 1
चङाचरुटिद्घम् | | त | उत्तरप्रतीहासे [ । ^ | |
चललिद्म ` ६ . ५। गोर्याः प्रमाणमूरिखक्षणाधि- |
स्थिररि्गम् ह | काराख्ये पञ्चमे [३३-७१] = |
रक्णादिदवीनस्थापि पूज्यत्वम् ‰ „+ | गौर्या मुहेयः-- (द |
रलणिद्धिमानम् = ^ वि 2 गौरीमूतैः सामान्यरक्षणम् ,., 4६.
धातुकिङमानम् = = >» [उमा क. 1 ५
दारवरिङ्गमानम् = ~ . क ५
(6 गरङिद्धमासम्, ५3. २७ | श्रिया | ५: क
विषयाः
रम्भा
क्षता
` च्िपुरा
गोर्यायतनम्
| गोयं अष्टौ हारपाखिक
वक्रतुण्डः
गणेश्षायतनम्
गणेशप्रतिहाराः
कातिकेयः
पञ्चलीलाः
¢
दुगा-मूतयः--
बरहार्दमीः
= किमड्री
` हरसिद्िः
गोर्यादीनां वाहनानि
चाययुण्डा |
ध र्तवायुण्डा
काल्यायनीमूर्तिः
चण्डिकाश्प्रतिहासः
। रुकम्या मूति
महारक््मीः
` महाविया
सरस्वती
` सप मातरः
ब्राह्मी
(1 (1 | मादेश्वरी
ेष्णवी
| ४
पत्राः
३
„ |
|
|
|
|
५४
३८ |
[ विषयाः
वारा
इन्द्राणी
चाययुण्डा
्षे्रपालः
वट्कभेरवः
+ (1114
६। जेन-ृतति-खत्तणाधिकाराख्ये
वषठे--¡ ४२--७६ |
चतु विश्ातिरहन्दः
जिनानां वर्णा ५
यथाक्रमं जिनानां ध्वजाः ...
नक्षत्राणि |
राक्ञयः त
जिनोपासक्यक्षनामानि ,,,
जिनानां शाक्नदेवताः +
जिनानां यक्ष्यक्षिणीनामानि ,.
पतेषां उत्तणम्--
तत्र गोमुखः क
चक्रेर्वरी ध
अम्बिका र
पावः ४
पश्चावती
मातङ्खः र
| सिद्धायका त
द्वितीयभेदेन चकरेदवरी
| जिनेषु चतुणा प्राधान्थकथनम्
३९ | एषां नामानि ` ध
+» | जिनप्रती्ठारनामानि
४० प्रतीहाराणामायुधानि ..
४२.
श्रीगणेशाय नम॑ः
({ अन्थारम्मः ]
विश्वं नमस्कृत्य पूवैतन्त्रानुसारतः ।
पण्डनस्तनुते वास्तुशास्त्र श्रीरूपमण्डनम् ॥ १ ॥
[ मुत्तीनां क््तन्यतोपदशः ]
प्रासादे चिङ्खमूर्तीनां प्रमाण शाख्ररक्चतः ।
मनुष्यपशुपष्यादिरूपं कुर्या्तदजृतेः ॥ २ ॥
[ प्रशरूतक्षिररुष्षणम् |
निविडा नि्रणाऽमृद्री सुगन्धा मधुरा लिख ।
स्वाचोटिङ्गपीरेषु श्रष्ठा कान्तियुत च या॥३॥
[ इष्टक्तिलार्क्षणम् ]
विमरु हेमकांस्यादि चिदं रोहमयश्च यत् १
| तथाऽन्यद्विविध चिं प्रतिमायां मयावहम् ॥४॥
[ पुनः श्चुमक्षिखारुक्षणम् |
कपोतभृङ्खकुयुदमाषमुद्गासितोपमा ।
पाण्डरा प्रतपद्मामा सवीचौयु श्भा शिख ॥ ५ ।
[ शिखहर्णदिनादिनिदश्नः ]
(1 ५ सुदिने सुमहते च शकुने रान्तंचेष्टिते । 1.
प्रतिमाग्रृहकाष्ठादिकमं कुर्याच्च चन्यथा ॥ &॥
नि. = ् 4 ~
७ स्वमण्डै
[ गयप्रतिमामानम् ]
आरभ्यैकाङ्खलादृङ्ध पर्यन्तं द्वादशाङ्कुख ।
गेषु प्रतिम। पूज्या नाधिका शस्यते ततः ॥ ७ ॥
[ देवारुवपूल्वप्रतिमामानम् ]
तद्ध नवहस्तान्तं पूजनीया छराल्ये |
[ अनादृत्तदेशपूल्यप्रतिमासानम्
दशदस्तादितो याऽचौ प्रासादेन विनाऽ्चयेत् ॥ ८॥
दसादि(१)करषष्ठया तु षयुत्रित् प्रतिमा() एथक् |
वाणवेदकरान् यावत् (र)चतुष्कां पूजयेत् सुधीः ॥ ९ ॥
[ प्रतिमाघटनद्रन्याणि ]
अष्टरोहमयी मूषिः शेररलमयी शुभा ।
्ष्ठवृक्षमयी वाऽपि प्रवाखदिमयी शुभा ॥ १० ॥
[ जीर्णोद्धारविधिः ]
(३)अतीतब्दः चता (9)मूरतिः पज्या स्यान्महत्तमेः ।
खण्डिता स्फुटिताऽप्यच्यौ अन्यथा दुःखदायका ॥ ११
धातुरलविलेपोस्था व्यङ्गा() संस्कारयोभयका() ।
कष्टपापाणजा मगना() संस्कारा न देवताः ॥ १२ ॥
[ भीषणदेवतास्थानम् ]
भैरवः शस्यते कोके भरस्यायतनसंखितः ।
न मूरायतने कार्यों भेरवस्तु भयङ्करः ॥ १३ ॥
नरसिंहो वराहो वा तथाऽन्येऽपि भयङ्कराः ।
८ [ इष्टः प्रतिमाः ]
नाधिकाङ्ञा न हीनाङ्गः कत्तेव्या देवताः कचित् ॥ १४ ॥
(१) “करद्वया इति स्यात् । (२) च्चुष्क्याम्ः इति स्यात् । (३) (अतीताम्द- ।
प्रथमोऽध्यायः ८१
प्रतिमाकाष्ट(१)लेपानुमदन्तचित्रायसां गहे ।
मानाधिका परीवाररहिता नेव पूज्यते ॥ १५।
[ अर्वावतकथनस् |
नने रोदनं हास्युन्मीरननिमीठने ।
देवा यत्र प्रकुवैन्ति तत्र विदान्महामयम् ॥ १६ ॥
तूसेनाभिमुखे क्याद् यात्रां द्वारञ्च गस्तुनः
= प्रवेश() प्रतिमादीनां गुविंणीनां विरोषतः ॥ १७ ॥
[ प्रतिमाश्चिरोक्ानम् 1
प्राक् प्श्ादृक्षिणे सौम्ये सितता भूमौ तु या शिखा ।
प्रतिमायाः हिरस्तस्याः कुयात् पञ्चिमदक्षिणे ॥ १८ ॥
[ तामनेन मूततयः ] `
गरासवक्तूमेकभागे द्वौ पक्षी कुञ्जराख्चयः ।
किनराधाश्चतु्तासः (र)पञ्चारितयुरा वृषः ॥ १९ ॥
शुकरो वामनश्चापि षट्ताखो गणनायकः ।
सक्तमागाः प्रकतेव्या वृषद्रूकरमानकाः ॥ २० ॥
अष्टा पार्षती देवी सर्वे देवा नवांराकाः ।
दरशताखे मवेद्रामो बलिषूष्वां जिनस्तथा ॥ २१॥
ता एकादश स्कन्दो हनुमान् भूतचण्डिका।
ताल द्वादश वेताला राक्षसाश्च त्रयोदश्च ॥ २२॥
देत्याश्चतुदशांशाः स्युभगु(र)खूपा ततोऽधिका व
(४)कारंशाः बरूरदेवाः स्युरत उद्र न कारयेत् ॥२३॥
(१) “-लेपारमदण्डचित्रायसां ग्रहेः इति स्यात् । (२) पञ्चासितञ्वरा' इति स्यात् |
(३) “रूपं ततोऽधिकम् इति स्यात् | “) "कल्मंशाः इति स्यात् | |
` स
[ ाजुारणङ्कवषानम् ]
[ तन्न षट्ताङल्य |
मुखं ताख्द्रयं तस्य जठरं तत्समं भवेत् ।
गुह्यं वेदाङ्कलम् ऊ सप्त जङ्घा च ततसमा ॥ २४ ॥
गुणाङ्करं भवेउजानु पादः कार्या गुणाङ्खकः ।
रसतार्मिति पोक्तं सप्ततारमथोच्यते | २५ |}
[ सष्ठतारुल्य |
वक्त्रं ताङ्परमाण स्यात् कन्धरावगुखुततयम् ।
साद्धेस्ाङ्रं वक्षो मध्यं नवभिरङ्ुलेः ॥ २६ ॥
साधेसप्त नाभि()मष्ये (र)ऊरूरषटदशाङ्करे ।
पादोतूसेध त्रिमालश्च मनुजाः सप्ततारके ॥ २७ ॥
[ अशवारस्य }
अष्टतठे मुख कुयात् तारं द्वादश्चमात्रकम् ।
ओवास्य त्रयङ्ुखा कायां हृदयं तु नवाह्कुलम् । २८ ॥
मध्यं द्वादशशमालं च नाभिमेट् नवाङ्खुले ।
(३) उ स्यदेकर्विंशस्या जानु चैव गुणह्ुलम् ॥ २९ ॥
जङ्क। तथेक्विंशस्या पादमूरं गुणाङ्करम् ।
[ नवतारल्य 1
प्रतिमाश्लमानेन नव भागान् प्रकर्पयेत् ॥ ३० |
वेदाङ्ु। भवेद् वां भागेन हृद्यं धः ।
नाभिभागेन मेदे च भागमेकं प्रकस्पयेत् ॥ ३१ ॥
चलुर्विशतिमात्रोरुजनु प्रोक्तं युगाङ्खरम् ।
` द्विभागेन समा जह्खा पादस्तु चतुरद्कुरुः ॥ ३२ ॥
1 (१) “मेद् इति स्यात् । (२) 'अरू अशदशाङ्कलो' इति स्यात्
मि साद् ४
मुखस्यापि त्रिभागेण र्खरं नाधिका हनुः ।
विस्तरे सनगं तु द्वादशाङ्कुमीरितम् ॥ ३३ ॥
तदवाञच वेदवेदांरो कक्षे एकान्तरे ततः। `
सपसपाङ्गुलो बाह दैरष्ये च पोडशाङ्करः (१) ॥ ३४
रोऽष्टादशामात्रः स्याद्(र)वि्तारो रेणुनाङ्ुलः ।
द्ये सूयाङ्लः पाणिविस्तारे पञ्चमातकः ॥ ३५ ॥
मध्यं मन्वङ्खुरं व्यासे कदी रोक्ता जिनाङ्कुख ।
मूढ एकादशोर स्याजङ्खा प्रान्ते युगाङ्ख ॥ ३६ ॥
चतुर्दशाङ्कलः पाद (३)स्ततोद्धं च युगाङ्कखः । `
कक्षस्कन्धस्तदृद्धः तु कर्तव्य्चाष्ट(४)मातृकाः ॥ ३७ ॥
ओवा त्व्टङ्घुखा व्यासे पादः प्रोक्तः षडङ्गुरः ।
षटुपप्ताष्ट(“+नवांशान्तासहैशाश्च प्रदशिताः ॥ ३८ ॥
केयो मानविभा(६)गश्च विस्तरः पूरवशा्लतः ॥ ३९ ॥
इति श्रीसूरधारमण्डनविरचिते रूपमण्डने वास्तुशास्ते प्रतिमाद्रव्यगुणदोष-
| ताखधिकारः प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
(३) ^-स्तदू््वे च युगाङ्गलः इति स्यात् । (४) ^मात्कः' इति स्यात् । (५) ^नवाशाना- ` ॥ |
इति स्यात्। (६) (गस्य इति स्यात् | | |
(५). गलो इति स्यात् । (२) वविस्तारोऽगरे गुणाङ्खलः इति स्यात् । १ |
1 चतुर्वक्त्रा तु साविती श्रोवियाणां गृहे हिता |
अङ्गपरत्यङ्गमयां तु सूति धीमान् बिसजयेत् ।
नखाभरणमारखरमयां तां न विवजयेत् ॥ १ ॥
[ एकत देषपूजानिषेधः 1
गृहे सिङ्द्रयं नाच्यं गणेशत्यमेव च ।
दाक्तितयं तथा राद्धं (१)मच्छादिदशकाङ्कितम् ॥ २ ॥
द्रे चकर द्वारकायस्तु शालग्रामं तथा ।
रौ शङ्खो नार्चयेत् तद्त् सूथयुग्मं तथेव च ॥ ६ ॥
तेषां ठ पूजनान्नूनस॒द्षेगं प्राप्नुयाद् गृही
४ [ तुर्या पृजञानिषेधः ]
तुरुप्या नाचैयेचचण्डी (र२)दीपं सूयं गणेश्वरम्
ब्रह्मादीनाच्च देवानां देवीनाञ्च यथाक्रमम्
आयुधानि तथा वणं वाहनं कथयाम्यथ ॥ ५ ॥
ऋ्वेदादिप्मेदेन कतादियुगभेदतः ।
विप्रादिवणभेदेन चतुपेक्तं चतुभूजम् ॥ &
दक्षिणाधःकरात् ख्या जयमाखं तथा (इ)श्ुतम्
` पुस्तं कमण्डटुं धत्ते सकूषैः कमखसनः ॥ ७ ॥
इति कमलासनः
अक्षू पुस्तकञ्च धत्ते चेव कमण्डुम्
[ इति साचित्री ]
(१) (मतृस्यादीति स्यात् । (२) नवः इति स्यात् ! (३) श्रुचम्ः इति स्यात् । | 1
जटिल८) इमश्चखाः शन्ता आसीना ध्यानततूषराः ।
कमण्डस्वक्षसूवाभ्यां संयुता ऋषयः स्मृताः ॥ ९ ॥
विश्वकमां चतुबोहरक्षमालाच्च पुस्तकम् ।
(१)कम्बां कमण्डलुं धत्ते तिनेतो हंसवाहनः ॥ १० ॥
| [ इति विश्वकर्मा ]
आग्नेय्यां तु गणेशः स्यान्मावृ्थानं च दक्षिणे ।
न्त्ये तु सहसाक्ष वारुण्यां जर्शायिनम् ॥ ११ ॥
वायव्ये पर्वतीर््रौ ग्रदांशचेवोत्तरे न्यसेत् ।
दाने कमला देवी प्राच्यां तु धरणीधरः ॥ १२॥
| इति ब्रह्मायतनम् |
` अह्मणोऽष्टो परतीहारान् कथयिप्याम्यनुक्रमात् ।
पुरुषाकारगम्भीराः सक्च सुकुरोज्ज्लः ॥ १३॥ `
पद (२)सक् पुस्तकं (३)दण्डः सत्यो वामेऽथ दक्षिणे ।
सन्यापसम्य(४)करके (५)पद्मदण्डश्च धर्मकः | १४ ॥
(६)अक्षपदमाज्गकोदण्डः करे धतत प्रियोद्भवः ।
दण्डागम(अ)खक्फर्कैर्यक्ञः स्यात् सर्वकामदः ॥ १५ ॥
अक्षसूत्रदाखेरदण्डेर्विजयनामकः । |
अधोहस्तापसव्येन (<)युवेटब्द य॒ज्ञमद्रकः ॥ १६ ॥ |
| , (ड)अक्षो पाशाङ्कलो (१०)दण्डो (११मब्य) स्यात् सार्वकामिकः ।
दण्डाक्षाकुक्चपदयेश्च विभवः सर्वशान्तिदः ॥ १७ ॥
(१२)इति ब्रह्ममूर्ति; आयतनं प्रतीहाराः । `
ण तमित नातण-जणभहनत
1
(९) "कम्बुः इति स्यात् । (२) शखुक्-' इति स्यात्। (३) "दण्डम्" इति स्यात् ।
(«) “करयोः इति स्यात् । (९) "द्मदण्डञच इति स्यात् । (६) अ्षपद्ा्कयार् `
दण्डम् इति स्यात् । (७) “सुक् इति स्यात् | (८) शखय्धृग्. इति स्यात् |
(९) "अक्षः इति स्यात्| (१०) "दण्डः इति स्यात् । (११) “भवः इति स्यात् ।
(४२) श्रहमूतैसयतनप्रतीहाराः इति स्यात् ।
॥ इपर
१०
स्यात्
[ सुः]
सर्वरक्षणसंयुक्तं सवोभरणभूषितम्
ैकवक्तश्च रवेतपङ्कजधृत्करम् ॥ १८ ॥
वतर तेजसो बिम्बं (मध्यस्थं रक्तवाससम् ¦
(
आदित्यस्य विदं रूपं कुर्यात् पापभणादनम् ॥ १९. ॥
ह्वेतः सोमः कुजो रक्तो बुधः पीतो गुरुस्तथा ।
शुक्रः इवेतः शनी राहुः (२)कृष्णो धत्रा्तु केतवः ॥ २० ॥
पद्महस्तो भवेत् सोमः कुजो दण्डकमण्डटुः
अधकायः स्थितो राहुः केतुः करपुरज्ृतिः ॥ २१ ॥
[ ग्रहाणां वाहनानि]
साश्चरथ आदिव्यश्वन्द्रो दशषहयः स्मृतः ।
मङ्गरो मेषमारूढे बुधः सपासनस्थितः ॥ २२ ॥ `
हंसाखढं गुरं विबयाद् भेकारूढं च भागेवम् ।
शनिं महिषमाखूढं राहुं कुण्डस्य मध्यगम् ॥ २२॥
` पपुच्छाृतिं केतु शनिं ()द्टा कराकिनम् ॥
[ अह्यणां भूषणानि ]
` (भोृहाः किरीटिनः कायौ (५)रल्कुण्डल्दोभिता
[ सूर्यायतनम् ]
| ॥ सूयस्याऽऽयतने स्थाप्या वहिकोणादितः कमात्
कुजो जीवस्तमः शुक्रः केतवो (६)यन्ञः शनिः शशी
'द्यस्थः इति स्यात् | (२) ष्णोः इति स्थात् (३) षदा इति ध ५. | |
(४) शहा इति स्यात्} (५) शल इति स्यात् | (&) अत्रधः
इत्यक्चरमधिकं न्नः" इत्येव स्यात् | = 4 ।
तजेन्यशुता्रचूड(१)दण्डे तु वामतः ।
तजनीराक्ति(२)किरणं दण्डे स्यात् पिङ्गर; परः ॥ २६ ॥
द्रे तजन्यो वजदण्डावानन्दो वामगो (३)दधात् ।
तजनीदण्डापस्ये हन्तकः स तु दक्षिणे ॥ २७ ॥
द्वे तजन्यौ पद्मदण्डे चितो धत्ते स वामतः ।
तजनीदण्डापसव्ये विचित्रो दक्षिणे सितः ॥ २८॥
(४)तजनीदण्डापसव्ये ह्न्तकः स तु दक्षिणे ।
दे तर्जन्यौ प्मदण्डे चित्रो धत्ते स वामतः ॥ २९॥
तञजन्यो किरणं दण्डं किरणाक्षः स धारयन् |
तजनी दण्डापस््ये प्रतिहारः सुखोचनः । `
चतुद्रीरेषु संस्थाप्या दिश्चश्चेते प्रदक्षिणम् ॥ -३० ॥
इति सूर्यादिनवग्रहसूर्यायतनप्रतीहाराः।
[ दिद््पारेषु इन्दः ]
वरं वजाङ्कशौ चेव कुण्डं धत्ते करेस्तु यः । `
गजारूढः सहखाक्ष इन्द्रः पू्ेदिशाधिपः ॥ ३१ ॥
| [ बहिः ]
वरदः शक्तिहस्तश्च समरणारकमण्डटुः ।
स्वाखापुञ्चनिमो देवो मेषारूढो इताशनः ॥ ३२ ॥
[ यमः]
केखिनीपुस्तकं धत्ते (५) कुकुटं दण्डमेव च ।
महाभहिषमाङूढो यमः कृष्णाज्ञ ईरितः ॥ ३३ ॥
[ नेन्ध^तः }
खड्गश्च खेटकं हस्तः (६) कार्तिकां वेरिमस्तकः । `
दंष्ठाकरार्वदनः श्वानारूढश्च राक्षसः ॥ ३४ ॥
"म णा १८००८५५१ १८०५
(१) (-दण्डेदण्डीः इति स्यात्। (२) “किरणदण्डेः' इति स्यात् । (३) (दधत् ॥ त
इतिः स्वात्। (४) पद्यमिदं सम्पातायातं स्यात्। (५). ङुङ्कटः इति स्यात्| = |
(६) (कतिकां वेरिमस्तकम् इति स्यात् ।
ह हरिदूवणः पवनो बायुदिकूपतिः ॥ ३६ ॥ `
| ऊबेरः }
गदानिधिवीजपूरकमण्डटधरः करैः ।
गजाखढः प्रकर्तव्यः (२) सोम्यो यो नरवाहनः ॥ ३७॥
[ कानः 1
प्रं तथा विदल नागेन्द्रं बीजपूरकम् ।
बिभ्राणो (३)वृषमाख्डो ईशानो धवख्दयुतिः ॥ ३८ ॥
इति दिकपारमूतिध्यानम् |
शुभा दः
इति श्रीपूलधारमण्डनविरचिते रूपमण्डने बस्वुशाखर ब्रह्मसूधादिग्रहदिक्पाल-
मूत्यधिकारो नाम दितीयोऽध्यायः ॥ २॥
न ४
(१) "वरपाश्ोतपरुः इति स्यात् । (२) सौम्यायां इति स्यात् । ( ३) ्षमा-
1 वति खाद्)
ततीयोऽध्यायः
ध. दे
यव © ह द) भव्यम
[ युगमेदेन वर्णभेदेन च विष्णुमूंयः ]
वासुदेवः सङ्कर्षणः प्रयञ्चश्चानिरुद्धकः
श्वतरक्तपीतकृष्णा८) क्रमात् (१)कख्युगादिषु ॥ १ ॥
` पू्या द्विजादिभिश्च
{क्षिसोविधानम् ]
-------एषां छत्राभं कुक्कुराण्डवत् ।
तपुषामच्च बलिन्दुरूपं कुयोच्छिरः क्रमात् ॥ २ ॥
[0
व
4. [ वणभेदेन विष्णुमूरतीनां श्चभदत्वम् ]
| न नारायणः केशवश्च माधवो मधुसूदनः ।
| पूजिता मूर्तयो लेता विप्राणां सौरूयदायकाः ॥ ३ ॥
१ | मधुसूदनविष्ण् च क्षत्रियाणां फरदं ।
५ त्रिविक्रमो वामनश्च वैदयानाम् (र)अचैयेच्छुमा ॥ ४ ॥ `
| +: पूजिता (र)श्रीधरी मूर्तः शुद्राणां सोख्यदायिनी । `
चर्मह्ृदजकानाञ्च नटस्य वररस्य च ॥ ५ ॥
मेदभिष्ठकिरातानां हृषीकेशः सुखप्रदः । `
दुम्मकारवणिगूवेदया(४)चक्रिकाध्वजिनामपि ॥ ६ ॥
सर्वेषां प्रृतीनाच्च पद्यनामः सुखावहः । क
दामोदरः सौख्यदः स्याद् (५) ब्र्चर्यैकदण्डिनोः । ७ ॥
(कफहरिहरो हिरण्यगर्भो नारर्धिहोऽथ वामनः । `
वराहः सर्ववर्णेषु सोख्यदो हितकारकः ॥ ८ ॥ `
(१) ककि इति स्यात् । ८२) “अचैने छमौः इति स्यात् । (३) श्रेधरी इति `
स्यात् । (४) ^चक्रिक-” इति स्यात् । (५) श्र्चायेक- इति स्यत् । (ई) हरिः
हिरण्यगमश्चः इति स्यात् । | | 1
5 कम्बुं" इति स्यात् ।
न । हय्णते" :
॥ [ वादेः ]
वाघुदेवो (१)गदां शङ्क चक्रपद्मधरो मतः ।
[ कैश्षवः |
केशवः कमर कम्बु धत्ते चक्रं गदामपि ॥ ९ ।
नारयणः |
नारायणः केम्बु(२ )पल्लगदाचक्रधरो भवेत् |
[ साधवः | |
माधवस्तु गदां चक्र राङ्क वहति पङ्कजम् ॥ १० ॥
[ इ्गेत्तसः }
पुरुषोत्तमस्तु चक्र पद्मं शङ्कं गदां दधत् ।
| | [ अधोक्षजः }
अधोक्षजः सरधिजं गदां शङ्क युदरीनम् ॥ ११ ॥
[ सङ्ककंणः |
सङ्कर्षणो (३) गदां कम्बुसरसीरुहचकमृत् !
[ गोषिन्दः ]
गोविन्दो धरते चक्रं गदां पद्मं च कम्बुना ॥ १२ ॥
# [विष्णः]
विष्णुः कौमोदकीं दरं पाञ्चजन्यं सुदर्शनम् ।
| [ मधुसूदनः 1
मधु्रदनस्तु चक्र शङ्खं सरसिजं गदाम् ॥ १३ ॥
५ { अच्युतः |
अच्युतस्तु.गदपिद्चचक्ररङ्कैः समन्वितः ।
(१) गदा-शङ्खं ५.
प्वक्रयद्म" इति स्यात् | (२) “पश्च इति स्यात्| (३) गदः
पद्युन्नश्च (१)चक्रशङ्कं गदाम्भोजानि पाणिभिः ।
तरिविक्रमख्िषु गदाचक्रशङ्कान् बिभर्ति यः ॥ १५ ॥
[ नरकिहः 1]
नरतिंहस्तु चक्रान्जगदाकम्बुविराजितः ।
| जनादनः |
जनाईनोऽम्बजं चक्रं कम्ब कौमोदकीं दधो ॥ १
[ वासनः |
वामनस्तु शङ्कचक्रगदापञ्र्सत्करः ।
[ श्रीधरः {
श्रीधरो वारिजं चक्रं गदारङ्खं दधाति च ॥ १७ ॥
अनिरुद्धो रसच्क्रगदासङ्कखारविन्दवान् ।
[ हषीकेकः ]
हृषीकेशो गदां चक्रं पश्चशङ्क च धारयन् ॥ १८ ॥
[ पद्मनाभः |
पडनाभः पाञ्चजन्यं पदं च्रं गदामपि ।
[ दामोदरः]
दामोदरोऽम्बुज शङ्कं गदां धत्ते युदशनम् ॥ १९ ॥
[ इरिः |
हरिधारयते कम्बं चक्रं पदं तथा गदार् ।
[ इष्णः |
कृष्णः करैः पाश्चन्यं गदां पदन सुदशनम् ॥ २० ॥ `
(4 एताः घुमूततेयो ज्ञेया दरक्षिणाधःकरक्रमात् । |
(वाघ्वदेवादिव्णाः स्युः षडेते तददादयः १) ॥ २१ ॥
तानति तिमता ममि थत
न्वक्रशङ्खगदाम्भोजानिः इति स्यात् । `
१६ 1 | ह शूपमण्डने
सङ्कष्णः कार्विकेयोऽब्जरक्तिखेरककम्बुमिः ।
-गरुडध्वजस्तक््यस्थोऽउजशङ्खष्वजविहवान् ॥ २२ ॥
जयन्तोऽक्षचक्रदण्डपंदेवीदित्रसंबृतः ।
गोवर्धनो कसच्क्रशङ्खपदोर्गदां (१)टहि तत् ॥ २२ ॥
इति श्रीदरेर्थिश तिमूत्तेयः |
मत्सयद्र्म स्वस्व्पो नृवराहयो गदाम्बुजम् |
(२) बिमूत्स्यामो वराहास्यो द॑ष्टामरे तु धृता धरा ॥ २४॥
[ इति सत्त्यकुसमंवराहाः ]
नृसिंहः सिंहवक्त्ोऽतिदष्टारः कुरिरेशकः ।
हिरण्योरखरसक्तविदारणकरट्रयः ॥ २५ ॥
[ इति दृसिहः ]
वामनः सशिखः इयामो दण्डी (२)पीताम्बुपत्रिवान् ।
(४) जटिठीनधरो रामो मागेवः परह दधत् ॥ २६॥
[ इति वामनपरक्चुरामौ ] `
रामः शरेषुधुक् इयामः सदीरमुशख वरः ।
| [इति रामबल्रामौ |
(५) बद्धपद्मासनो रक्तस्स्यक्ताभरणमूधजः ॥ २७ ॥
` कषायवसलो ध्यानस्थो द्विुजोऽङ्ोद्धपाणिकः ।
थ [ इति इद्धः]
कल्की सखड्गोऽश्वारूढो हरेरवतरा इमे ॥.२८
[ इति करकी |]
इति ददावताराः+
(दपं शेषतस्पे (७)दो दण्डमुजोऽस्य तु ।
शिरोधरो वा वामस्तु सपृष्पोऽये जलेशयः ॥ २९ ॥
४ ह क न ~
क त ा
(१) (दधत् इति स्यात् । (२) व्विभ्रच् श्यामो इति स्यात् |` (३) चठतराश्बु
पाचरवाच् इति स्यात् | (४) जरी वाणधसोः इति स्यात् | (५) बुद्धः पद्मासनोः इति
स्यात् । (६) 'सुत्तरूपः" इति स्यात् । (७) दक्षे दण्डो युजञ्स्यं ठः इति स्यात्। `
| तृतीयोऽध्यायः ` व; व ९७ | ।
तन्नाभिपङ्कजे धाता ( श्रीमूमिवदिरोन्थिगे १ ) ।
निष्यसादिस्वखूपाणि पाश्वयोभधुकेरमो ॥ ३० ॥
इ {त जलखदयम्ः
६ ) अथ शाचिम्रामपरीक्षा
| [रि [ पूल्यशिललक्षणम् ]
वण ॥ि नागभोगसमाकारा शिख सुक्ष्म च या भवेत् |
4 पूजनीया प्रयलेन सिरा क्लिगध। सुवसख ॥ ३१ ॥
| तत्राप्यामश्कीमानात् सृक्ष्मा चातीव या भेत् ।
तघ्यामेव सदा छृष्णः भिया सह वसत्यसौ ॥ ३२ ॥
यथा यथा शिख सुक्ष्मा तथा तथा महत् फरस् ।
तस्मात्तां पूजयेित्यं धर्मकामाथेसुक्तये ॥ ३२ ॥
[ व्याज्यरिरारक्षणस् |
कृपिखा कवुरा भया सुक्ष्मा(र)किनाकुख च या ।
रेखाकुरऽयिरा स्थृख बहुचक्रेकचक्रिका ॥ ३४ ॥
बृहन्मुखी बहच्यक्रा बद्धचक्रा च या पुन
(२)बद्धचक्राऽथ वा स्याद् मिन्नचक्रा त्वधोमुखी
दग्धा सुर्क्ता चापूज्या मीपणा पड्किचक्रिका ।
पूजयेद् यः प्रमादेन दुःखमेव रमेत् सदा ॥ ३६ ॥
॥ तत्र मतान्तरम् |
खण्डिता स्फुरिता मन्ना पदवैभिन्ना प्रमेदिता |
शासिरामसमुद्भूता शिखा दोषावहा नहि ॥ २७ ॥
[ वणमेदात् फरविश्ेषकथनम् |
सिग्धा सिद्धिकरी मुद्रा कृष्णा कीतिप्रदायका ।
ण्डुरा पापदहना (३)पिता पुत्रपरदायका ॥ ३८ ॥
नी दिश्चति (४)रुक्ष्मी च रक्तमोगप्रदायिनी ।
| [ चक्रविशेषे वणभेदः | ॑
कपिर् नारसिंहञ्च वामनं (“)चातसलिभम् ॥ ३९ ॥
ना
नन
(१) चदव" इति स्यात् । ^सिनाङ्खा' इति वा कथञ्चित् सङ्गच्छत एव । `
(४) लक्ष्मी च रक्ताः इति स्यात् । (५) "पीतसन्निमम्' इति स्यात् ।
(२) ध्ट्य्मचक्रास्थ वा या स्याद् इति स्यात्। (३) पपीता इति स्यात्। |
वि छ
वादुदेवं सितं जञेयं रक्तं सङ्क मतम् ।
दामोदरं तु नीटभमनिरुदधं तथेव च ॥ ४० ॥
इयां नारायणं ज्ञेयं वेष्णवं कृष्णव्णैकम्
बहूुव्णैभनन्ताख्यं श्रीधरं पीतमुच्यते
वृत्त(१)सूत्रेऽष्टमो माग उत्तम (र)वक्तरक्षणम् ।
मध्यमच्च चतुमौगं कनीयस्तु त्रिभागकम् ॥ ४२ ॥
[ त्रिचक्रर््मीनारायणः }
रक्षमीनारायणो देवस्तिमिशचकैव्येवखितः ।
पूजनीयः प्रयलञेन भुक्तिमुक्तिफस्प्रदः ॥ ४३॥
[ श्षार्प्रासस्य प्रतिष्ठानिषेधः ]
अहं ब्रह्मादयो देवाः सर्वभूतानि केश्वः ।
सदा सच्निहितस्त पतिष्ठाकमे नास्त्यतः ॥ ४४ ॥
[ ्ालग्रामप्रक्षंसा ]
क्चास्मामद्चिकम्रे तु यो जुहोति हुताशनम् ।
एकाहुतिहुता सम्यक् कट्पकोरिगुणोत्तरा । \ ॥
इति सायिग्रामपरीक्षा |
[ अथ मूत्तिविकेषाः ]
तायो (र)मकङ्कतः प्रक्षः कोरिकाकारनापिकः ।
चतुभुजस्तु कतेव्यो वृत्नेलमुखस्तथ। ॥ ४६ ॥
गृध्ोरुजानुचरणः पक्षद्रयविमूषितः ।
प्रमासस्थानसोव्णः करपेन विभूषितः । ॥
छतञ्च पूणकुम्भञ्च करयोस्तस्य कारयेत्
कद्वयश्च कव्यं तथा विरचिताञ्छि ॥
नवतारः प्रकत्तव्यो गरुडो मानसूत्रतः । `
(भोपादजानुकटियावदचोयां वाहनस्य इक् ॥ ४९ ॥
यदुश्च भगवान् एषे छलकुम्भधरौ करौ ।
(९)
किश्िमबोदरः कायैः सवीमरणभूषितः ॥ ५०॥ `
सूत्राष्टमोः इति स्यात् (२) भ्वक्र- इति स्यात् | (३)
प्रख्यः इतिस्यात् (४) ्ादं जानु कटि यावदर्वायांः इति स्यात्। `
वतीयोऽध्यायः १६
(वामम कुञ्चितः पश्वादन्यपादस्त॒ जानुना ।
प्रथिवीं सथितो यत्र गारुडं स्यात्तदासनम् ॥ ५१
| इति (रोगारुडः |
वेकुण्ठच्च प्रवक्ष्यामि सोऽ्टबाहूर्महावलः । `
तक्ष्यासनश्वतुर्वक्त्रः करेव्यः शान्तिमिच्छता ॥ ५२ ॥
गदां खड्गं चक्रशरं दक्षिणे च चतुष्टयम् ।
दाङ खेरं धनुः पञ्ं वामे दचाच्चतुष्टयम् ॥ ५३ ॥
अग्रतः पुरुषाकारं नारसिंहं च दक्षिणे |
अपरं खछीयुखाकारं वाराहास्यं तथोत्तरम् ॥ ५४ ॥
दति वैकुण्ठः]
विंशत्या हस्तकैयुक्तो विश्वदूपश्चतुरमैखः ।
पताका हर्राङ्खं च वजङ्कुश(३)शरास्तथा ॥ ५५ ॥
चक्रञ्च (४)बीजपूरश्च वरो दक्षिणबाहुषु ।
पताका दण्डपाशौ च गदासार्खोत्पलानि च
शृज्धी सुशक्मक्ष्च क्रमात् स्युर्वामबाहुषु ॥ ५५६ ॥
हस्तद्वये योगमुद्रा वैनतेयोपरि स्थितः ।
क्मानर-नृिंह-खी-वराह-सुखवन्युखः ॥ ५७ ॥
इति (५)विश्वमुखः |
जनन्तोऽनन्तरूपस्तु हतेद्रदशभियूतः ।
अनन्तशक्तेसंबीतो गरुडस्थश्चतुमुखः ॥ ५८ ॥
दक्षिणे तु गदाखड्गो चक्रं वज्ाङ्करो ररः ।
शङ्खः खेटं धनुः पश्च दण्डपारो च वामतः | ५९ ॥
| हत्यनन्तः |
सुखानि पूर्ववत्तस्याप्यत त्रैरोक्यमोहनः। `
स षोडशमुजस्ता्ष्याखटः प्रागवचतुरमुखेः ॥ ६० ॥
गदाचक्राङ्कशो (धबाण राक्तिशचक्र वरः क्रमात् ।
______ व्षषु द्रः पाशः श्गगङ्खाग्नङुण्डिका()॥६१॥ `
(९ शवामो्तेः इति स्यात्। (२) गरुडः इति स्यात् । (३) ~शरास्तथा
इतिस्यात् | (४) बबीजपूरशः इति स्यात्| (५) गविश्वरूपः इति स्यात्।
(& बाणः इतिस्यात् र
स्वमण्डने `
शुडधी वमेष हस्तेषु योगसुद्रा (१)करद्रयम्
नरश्च नारर्सिहञ्च श्ुकरं कपिरननम् ॥ ६२
| इति तेरोक्यमोहनः |
दक्षिणे पुण्डरीकाक्षः पूर्वे नारायणः स्मृतः ।
गोचिन्दः पश्चिमे स्थाप्य उत्तरे मधुसूदनः ॥ ६३ ॥
ईशाने स्थापयेद् विष्णुमामेय्यां तु जनार्दनम् ।
नेसे पञ्चनाभच्च वायत्ये माधवं तथा | ६४ ॥
केशवो मध्यतः खाप्यो वायुदेबोऽथवा बुधैः ।
सङ्कर्षणो वा प्रचुम्नोऽनिरुद्धो वा यथाविधि ॥ ६५ ॥
दशावतारसंयुक्तः प्रोक्तो जलशयोऽथवा
अमतः शूकरः ख्यः सर्वदेवमयः युमः ॥
| इति विष्ण्वायत्तनम्
परतिहारांस्ततो वक्ष्ये चतसणां दिरां कमात्
वामनाकारखूपस्ति कतेव्याः सर्वतः शुभाः ॥ ६७ ॥
(र)तजनी शङ्खचक्रे च चण्डो दण्डं दधत् क्रमात्
वामे खाने प्रचण्डोऽस्यापस्व्ये दक्षिणे शुभः ॥ ६८ ॥
= पृद्च खड्गं खेटकञ्च क्रमाद् बिभ्रद् गदां (३)च यः ।
(४)विकोमे पञ्मगदयोर्बिजयस्तो (*)क्रमाद्धिखेनयसेत् ॥ ६९ ॥
(६)तभनी बाणचापौ च गदां धाता च सृषटितः ।
(ॐेसदापसव्ये तेरसतर्विधाता वाम-दक्षयोः ॥ ७० ॥
तजेनीकमङं शाङ्खं गदां भद्रः क्रमाद् दधत् ।
(८)शखापसव्ययोगेन सुमद्रस्तौ करमान्यसेत् ॥ ७१ ॥
| इति विष्णुप्रतीदारा
इति भश्रीसूत्रधारमण्डनविरचिते वास्वुशास्रे रूपमण्डने
विष्णुमू(स्याश्च्ये)धिकारस्तृतीयोऽष्यायः ॥ ३ |
त ७७००१००१ ०५०६५०११६
(२) करयेः इति स्यात् । (र) सनी इति स्यात् । (३) शनयश्इति =
स्यात् । (४) विलोमे इति स्यात् | (५) क्रमाद्िचित्' इति क्रमान्न्यसेत्
इति वा स्यात् । (६) (तजनी इति स्यात् | (७) सव्येऽपसन्ये' इति स्यात् । .
(८) शसबव्यापसव्य- इति स्यात् ¦
[ रिवमूरत्तिरिवलिङ्लक्षणाधिकासख्यः |
चतुर्थोऽध्यायः `
अथ रिवमूर्तयः
[ हाद क्िवमू्तयः ]
शाङ्काम्बरधरं देवं शुद्धमाल्यानुकेपनम् ।
नटमारयुतं कुयाद् बालेन्दुञ्ृतरोखरम् ॥ १ ॥
त्रिरोचनं सोम्यसुखं कुण्डलाभ्यामख्ङ्कृतम् ।
सच्ोजातं महोत्साहं बरदाभयपाणिनम् ॥ २ ॥
इति सदोजातः [२]
रक्ताम्बरधरं देवं रक्तयज्ञोपवीतिनम् । `
रक्तोष्णीषं रक्तनेत्र रक्तमास्यानुरेपनम् ॥ २ ॥
जटाचन्द्रधरं कुर्याततिनेतरं तुज्गनासिकम् ।
वामदेवं महाबाहुं खड्गखेरकधारिणम् ॥ ५ ॥
इति वामदेवः [२] |
द्ाकरार्वदनं स्शीषं त्रिरोचनम् ।
रुण्डमाखधरं देवं सपेकुण्डर्मण्डितम् ॥ ५ ॥
` सजङ्गकेयूरधरं सर्पहारोपवीतिनम् ।
| योनसं() करिसूत्रेण | गले दृशचिकमाकिकिम् ॑ ॥ ६1 `
नीरोत्पल्दल्दयाममतसीपुष्पसनिभम् ।
1
(१)
िङ्गभ्रपिङ्गजटिरं सशाङ्ककृतरोखरम् ॥ ७ ॥
(तक्षकं सुष्टिकश्चैव पादयोस्तस्य नूपुरौ ।
अधोररूपकं कुर्यात् काररूपमिवापरम् ॥ ८ ॥
` ्तक्चको युष्टिकश्चैवः इति स्यात् ।
दपा मिणानणममप्ननयन
महावीर्यं महोत्साहमष्टाहुं महाबलम् ।
कमयन्तं रिपोः (१)सद निवेशो यत्त भूतले ॥ ९ ॥
खगरङ्गश्च कपारुश्च खेटकं पात्रमेव च
वामहस्तेषु करैन्यमेतच्छस्रचतुष्टयम् ॥ १० ॥
त्रदं परशुः ८२)खड्गं दण्डश्ेवारिमर्दनः ।
शखाण्येतानि चत्वारि दक्षिणेषु करेषु च ॥ ११ ॥
इत्यघोरः [३] ।
पीताम्बरस्ततपुरूषः पीतयन्ञोपवी तवान् ।
मातुलिङ्गं करे वमेऽक्षमाख दक्षिणे तथा ॥ १२॥
इति तत्पुरुषः [४] | |
(२)शुद्धः स्फटिकसंकाशो जटाचन्द्र विभूषितः ।
(४)अक्लिदूरुहस्तौ च कपारं वामतः शुभम् ॥ १२ ॥%
[ इतीक्ञः ९] `
कपारमालि-पुश्वेतं शशाङ्कृतरोखरम् ।
व्या्रचर्मधरं मृलयुज्ञयं नगेन्द्रमूषितम् ॥ १४ ॥
रिदं चाक्षमारा च दक्षयोः करयोः स्मृतौ !
कपालं कुण्डिका वामे योगमुद्रा (५)करदरयम् ॥ १५ ॥
5 इति मत्युज्ञयः [६]।
चतुभुजो महाबाहुः शुङ्कपादाक्षिपाणिकः |
पस्तकामयहस्तोऽसो(६)सच काक्षिरोचनः ॥ १६ ॥
ईति फिरणाक्षः [७] |
० 11 या भा कातता न
(९) त्व इति स्यात् । (२) (लङ्गो' इति स्यात् । (३) श्द्धस्फरिक
इति स्यात्| (४) च्यक्षलिद्यूखहस्तश्चः इति, “दश्च तिदय हस्ते चः इति वा स्यात् |
(4 (५) (करद्वये' इति स्यात् । (६) (स-चक्राक्ष इति [किरणाक्ष- इति वा १ स्याद् ।
-------------------~- ~~~ ~ ------ ~~~ --------------------------------- ८
1
# पद्यमिदं मृत्यन्तरस्य लक्षकं न त॒ मूयुज्ञयमृततैः, द्विरायुधनिरदेशात् । मवति `
५ च मृयुञ्ञयलक्षकत्वेन भ्रान्तिरन्ता पुष्पिकान्तरविरहात् । देवतामूत्तौ ैसलक्षणत्वेनेदं
निरदिम् ( देष० ६।१४ ) ; तद नुगत्याऽस्माभिरपि पुष्पिकैका कसित ; एवञ्चभर १ ४
(1 दति द्वादश रुद्रा इति पुष्पिकाऽपि नादतमाषिणी स्यात् । |
२३ ति
वित्लवखधरं कुयांचितयज्ञोपवीतिनम् | `
चितख्यं महेशानं चित्रे्र्थसमन्वितम् ॥ १७ ॥ `
चतुर्बाहुं चेक (१)वघं सर्वालङ्कारमूषितम् ।
खड्गं धनुः शरं खेटं श्रीकण्ठं बिभ्रतं युजः ॥ १८ ॥
इति श्रीकण्ठखसूपम् [८] । ।
अहिर्वघ्रो गदासपं चक्रं उमर्-मुद्गरी
शूलङ्काक्ष(र)माखा च दक्षोध्वाधःक्रमादधत् ॥ १९ ॥
तोमरं पटटिदं चर्म कपाठं तजनी ।
(३)शक्तिः परशुकं वामहस्ते सन्धारयत्यसौ ॥ २० ॥
इत्यदिः [९] |
विूयाकषस्ततः खड्गं शूलं उमरुमङ्कराम् ।
= सर्षञ्चक्रं गदामक्षसूतं बिभ्रत् करटकः ॥ २१ ॥
लेटे खट्ज्गशक्तिच्च परशं तजनीधरम् ।
ण्टाकपारुकं चेति वामोध्वीदिकराष्टकेः ॥ २२॥
इति विरूपाक्षः [१०||
बहुखूपो दधद् दक्ष डमरं च सुदशनम् ।
सपं शरूलाङ्कशौ कुम्भं कौसुदीजयमालिका् ॥ २२ ॥
घण्टाकपारुखटङ्गतजनीकुण्डिकां धनुः | ` .
पर (४)पञ्िकं चेति वामोध्वीदिक्रमेण हि ॥ २४ ॥
इति बहुरूपी खदारिवः [११||
| तयम्बकोऽथ दधचकं डमरुं मुद्गरं शरम् ।
(=चूलङ्कशान्यक्षसूत्रं दक्षोध्वदिक्रमेण हि ॥ २५ ॥
पि
|
(१) “वक्लंः इति स्यात्| (र) “मखाश्च इति स्यात्| (३) शाक्त ८
इति स्यात् । (४) द्द" इति स्यात् । (५) श्यूलङ्कंशावकषसूलं' इति स्यात् ।
१
सूपमण्डने
गदाखयाङ्गपाव्ाणि कार्पकं तभनीधरो
पर पड चेति (१)वामाधांदिकराष्टके
इति च्यम्रकः [१२]
| इति द्वादश स्द्राः।
उमामहेश्वरं वक्ष्ये उमया सह राङ्करः ।
(२)मातुलिङ्ग विद्यूख् धरते दक्षिणे करे ॥ २७ ॥
आलिङ्गितो वामहस्ते (र)नगेन्द्रं द्वितीये करे ।
` हरस्कन्ध उमाहस्ते दर्पणो द्वितीये करे ॥ २८ ॥
अधस्ताद् वृषभं कुयात् कुमारच्च गणेश्वरम् ।
भृह्धिरीरं तथा(४)कुयांनिमंसिन्नृत्यसं स्थितम् ॥ २९ ॥
इति उमामहेशवरः।
कार्यो («)हरिहरस्यापि दक्षिणं सिवः सदा |
हषीकेदाश्च वामर्थे शवेतनीराङ्कती क्रमात् ॥ ३० ॥
वरं विदुख्चक्राठजधारिणो बाहुका क्रमात्
| दक्षिणे वृषभः पावे वामे विहगराडिति ॥
इति हरिहरमूतिः।
एकपीटसमारूढमेकदेहनिवासिनम् ।
षडूभुजच्च चतुवैक्लं सवैरुक्षणसंयुतम् ॥ २३२ ॥
अक्षमाखं चिश्ूखच्च गदां कुर्याच दक्षिणे ।
कमण्डटु्च खराङ्ग चक्रं वामसुजे तथा ॥ ३२ ॥
इति हरपितामहः |
उमान्च द्विजां (६)कु्यीहृक्ष्मीनीरायणाधिता ।
देवं शतैः स्वकीयैश्च गरुडोपरि संयतम् ॥ २४ ॥
(१) '्ामेर््वादि- इति स्पात् । (२) "मतङ्गः इति स्यात्। (३) ननजेन््रोः
इति स्थात् ।
स्यात् । (£) कुर्याछक्ष्मीं नारायणाभिताम्ः इति स्यात् ।
व
चतुर्थोऽध्याय क
दक्षिणः कण्ठरूनोऽस्या वामो हस्तः सरोजधक् ।
विमोवीमकरो रण्षम्याः कुक्षिमागस्थितः सदा ॥ ३५ ॥
सर्वेषामेव देवानां युग्मं युग्मं विधीयते। `
तेषां शक्तिः प्रथग्रूपा तदखवाहनाश्ृति८) ॥ ३६ ॥
| इति युग्मम् ।
अथ लिङ्गानि ।
स्थिरलक्ष्मीपदं हैमं (१)तारजच्व राजतम् ।
प्रजावृद्धिकरं (२)ताग्रं वङ्गमायुर्विवधेनम् ॥ ३७॥
(इ)विशेषकारकं कांस्यं पित्तं सुक्तिमुक्तिदम् ।
सीसकं (४)चङ्ृद्धिज्गमायसं (“)पुरिनाश्नम् ॥ ३८ ॥
अष्टलोहमयं लिङ्ग कृष्ठरोगक्षया(ई&)पहम् ।
त्रिरोहसम्भवं लिङ्गमन्तधानप्रसिद्धिदम् ॥ ३९ ॥
[ इत्यषटलोहलिद्गसरम् ] ह
युष्यं हीरकं छिङ्गं भोगदं मोक्तिकद्धवम् ।
सुखछघत् पुष्परागोस्थं वेदृयं सलुमदैनम् | ४० ॥
श्रीप्रदं पद्मरागञ्च इन््रनीरं यशःपदम् |
लिङ्गं मणिमयं पुष्टये स्फटिकं सर्वकामदम् ॥ ४१॥
| [ इत्यष्टरललिद्धफरम् |
रलरिङ्क द्विधा स्यातं स्वपीटं धातुपीटकम् ।
धाठुज्ञ तु स्वयोनिस्थं सिद्धिरक्तिप्रदायकम् ॥ ४२ ॥
प्रज पुष्परागस्य सफिकस्य तु (७)राजितम् ।
ताम्रजं मोक्तिकस्यापि रोषाणां देमज मतम् ॥ ४३ ॥
1 [ इति पीठविधिः ] |
नभिः ५४७५०१०१०.७०८१२० भम ८
(१) 'राजतञ्ैव राज्यदम्' इति स्यात् । (२) शराङ्ग ताम्रमायुःप्रवधनम् इत्याकरे |
(३) ¶विद्ेष- इति स्यात् । (४) व्वंशङ्छिङ्ग इति स्यात् । (५) “रिपु इति
(६) “वहम्? इति स्यात् । (७) "राजतम्. इति स्यात् | |
श्प. ~
५ व | (
समस्तमणिजातीनां ()दीप्सानिध्यकारकम् ।
( मनोसानं प्रमाणानि तेषु माद्यं नवाम्बुदेः १) | ४५ ॥#
[ दति शिङ्धोचिता प्रणयः |
रटेयं मोगदं रिङ्ग मन्मयं सर्वकामदम् |
दारुजं वपुसिद्धयथं सर्वमेतच्चलाचरम् |! ४५ ॥
[ इति चरचरूडिडम् ]
एकाङ्कुखादिपञ्चान्तं चरुख्िडि्च कन्यसम् ।
षट्पमोदिदलान्तच्च मध्यमेकादसादितः ॥ ४६ ॥
` [ इति चररिङ्गम् | `
नेकहस्तादधो(र)वाचं प्रासादे स्थिरतां नयेत् । `
स्थिरं तत् स्थापयेद् गेहे (गग्रण्यां हे दूरकरद् यतः ॥ ५७ ॥
[ इति स्थिरलिङ्गम् ]
(४)वाणरक्षणदीनेऽपि यल वे रोचते मन
तत्र पूजां प्रकुर्वीत धर्मकामा्थमोक्षदम् ॥ ४८ ॥
| [ इति रश्षणादिहीनल्यापि पूल्यत्वम् ]
रलमेकाङ्कुलं रिङ्गमङ्गखङ्कु्डद्धितः ।
नवान्तं नवि बृद्धिवी सुदृगमानिका ॥ `
[इति रलङिङ्गमानम् ]
धातोरष्टाङ्ुरु पूवैमष्टाषटङ्गुख्वधेनात्
` तरहस्तान्तं नवेव स्युरिज्गानि चं यथाक्रमम् ॥ ५० ॥
{इति धातुरिङ्गमानम् ]
| इढकाष्ठमयं रिग कत्तव्य षोडशाङ्ुरम् ।
षोडयाङ्कुसिका बृद्धिः पट्करान्तं नवेव हि ॥ ५१ ॥
[ इति दारवलिद्धमानम् ] अ
(९) श्दीत्तिः सान्निध्यकारणम् इति स्यात्। (२) शिङ्ग इति स्यात्|
(२) श्दिद्रकृद्ः इति स्यात् | (४) व्वर्ण- इतिस्यात्}
9०१ र
क तामा नतानभ
किन
ता तत न 0 ~न ~+ ~
। कातता तिक
# अकत्राऽऽदर्ञंः चतुश्वत्वारिंशसंख्यावोधकोऽङ्खो नोपरम्यते, तत्संख्याकः शेक
पतितो न वेति चिन्तनीयम् |. अस्माभिस्तु यथाक्रममेवाङ्का निवेदिता 01 ध
चतु्ाऽभ्यायः २७.
हसतादिनवहस्तान्तं यरं िङ्गं विधीयते
हस्तबुद्धयी नवव स्यु्मध्ये वृद्धियरच्छय ॥ "५२
| | [ इति रेररिङ्मानम् 1]
म्रहारुखेहशेखानां देध्यं मक्त जिनांश॒कैः [२४
कुयात् षटूसाघसप्ता्टनवांरे (१)स्तरं शुभम् ॥ ५२ ॥
| | [ इति छिङ्गमानम् ] |
श्रीपर्णी (२)श्ंदुपाशोकरिरीषः (३)खादिनोऽजजनः |
चन्दनः श्रीफल निम्बो रक्तचन्दनवीजकें ॥ ५४ ॥
कुरो देवदारुश्च चन्दनः पारिजातकः ।
चम्पको मघुव्क्षश्च हिन्तास्धागुरः शमाः ॥ ५५ ॥
[ इति शिद्धघष्षाः ]
(9ोनिर््ेणाः >८०८८ सवे लिङ्गार्थे सौख्यदायकाः ।
मन्थिकोटरसंयुक्तान् शाखोद्भूतान् परिल्जेत् ॥ ५६ ॥
[ इति व्रक्षरक्षणम् |] |
निर्यं दारुलिङ्गानामिष्टकादारुज शुभम् ।
रेज धतुरलानां स्वह्पं चाधिकं शमम् ॥ ५७ ॥ _ -
[ इति द्षव्तदिलि्नोचितः प्रासादाः}
धातुजे रलजे बाणे दाश्जे च स्वयम्भुवि ।
(५ )गरृहनूनाधिकं वाऽपि (ह)वक्तलिङ्धिषु पार्थिवः ॥.५८ ॥
इस्तमानं मवेषिङ्गं बेदहस्ते सुराख्ये ।
(अ)ग्येष्ठलिङ्गे तु वेदांशे षटूत्रिदं नवदस्तकम् ॥ ५९. ॥
पृञ्चादिमूतवेदांसे प्रासादे हस्तसंख्यया । `
मध्यमः पञ्चमांदोन हस्तादिनवहस्तकम् ॥ ६० ॥
पा ताना तातान तारि
“वित्रं इति स्यात् । (२) शिशपाऽ्योकः' रिद्यकाऽशोकः' इति वा ` `
(र) श्लादिरो- इति स्यात् । (४) ननिर््रणाः इयनन्तर खुद्दा इति
ं (५) श्यं न्यूनाधिकं इति स्यात्) (&) शवक्त्लिङ्िषुं पा वे ।
(७) भ््येष्टकिङ्गन्॒ वेदांरो षट्र्तिशेः इति स्यात् ।
षृष्ठारोन प्रकर्तव्यं हस्तादिनवहस्तकम्
(क्ृलादियुगख्लान्तं 9हस्तसंख्ये हिवाख्ये ।
॥ ६१॥
(१)कनिषठाज्यषठरिष्गेषु मध्यमामध्यमेषु च
प्रासादाः कन्यसे उयेष्ठाः सीमामानमिदं स्मृतम् ॥ ६२ ।
मर प्शवांशके तयेरो ज्यष्टलिङ्गं तु मध्यमम्
नवांश पञ्चभागं स्याद् गभाधं कन्यसीदयस्
६३.
[ इति प्रासादमानेन शिङ्खमानम् }
पशं शङ्खो ध्वजा छत्रं (२)खड्गरक्तिकचामरे ।
वजं (३)दण्डोद्धमागच्च चक्रं मसस्यो घटः उुभः ॥ ६४ ॥
सौख्यदं चिह(४)मित्यायामावर्ता दक्षिणेऽपि यः ।
श्वेतरक्ता पीतङ्ष्णा रेखा वर्णेषु सौरूयदा ॥ ६५५ ॥
[इति शिद्गे ्॒मचिह्वानि |]
्रह्मराश्चतुरस्रोऽधो मध्येऽ्टा्ष्तु वैष्णवः ।
पूनामागः सुवृत्त८ः) स्यात् पीटोद्धं शङ्करस्य च ॥ ६६ ॥
[ इति शङ ब्रह्मादिमागाः ]
पूजायामे करांरो च (५)िङ्ञचितरे दशांशः ।
पीटप्य द्विमागे च रेला कार्या पदक्षिणे ॥ ६७ ॥
(मस्तकं मानमध्ये तु बिऽङ्गे रष्टूविभ्रमः 1 £)
(दोच्न्ाममष्टमांशेन ()साषे दरयंशषडज्गके ॥ ६८ ॥
च्पुषाम विस्तराषं कुक्कुटाण्डं शिरो मतम् ।
५ त्रिभागे सिङ्गविस्तारे एकांरोनाधचन्द्रकम् ॥ ६९ ॥
इति स्यात् ।
0 सधैत्यंशेन तुल्यं याद्ट्े बुदूबुदाकृति८) ।
उद्भषोमध्यहीनं यहिङ्गं नाशकरं भवेत् ॥ ७० ॥
(कनिष्ठ इति स्यात् | (२) (लड्गः इति स्यात्। (३). ष्दण्डोऽधै.
चन्द्रश्च इत्यन्यत्र । (४) “मित्यायमावत्तौ' इति स्या । (५) लिङ्ग चिहधं' `
(६) छत्राममि'ति स्यात् । (७) (वाद्ये षडंशकेः इति स्यात्!
. चतु्थाऽष्यायः = 6 6 ५ |
दीर्घे वा सन्धिरेखाभिर्यक्तकाकपदाकृति (£)
रङ्गं नान्याधितं रिङ्गमाधिताः सर्वदेवताः । ¢
स्थापयन्सुख्यदेवस्य (१)स्कन्दमेदान्तरे सुरान् ॥ ७१ ॥ `
इति घरितरललिङ्गलक्षणम् । 44
वाराणस्यां प्रयागे च गङ्गायाः सङ्गमेषु च । `
दुरक्षत्र सरस्वत्यां बाणरिङग ुलावहम् ॥ ७२ ॥
यानि वरै नर्मदायाञ्च अन्तरवेचाञ्च सङ्गमे ।
केदारे च प्रभासे च बाणलिङ्गं ुखावहम् ॥ ७३ ॥ `
[ इति अणोतपत्तिस्थानम् 1 |
तरिपञ्चवारं यस्यैव तुखसाम्यं न जायते ।
तदा बाणः समाख्यातः शोषं पाषाणसम्भवस् ॥ ७४ ॥
| [ इति बाणपरीश्षा ]
स्थरं (२)खण्डच्च दीधेञ्च स्फुरितं छिदरसंयुतम्। `
निन्दुयुक्त चं शखर कृष्णं च चिपिटं तथा ॥ ७५ ॥
(इ)चक्रन्च मध्यदीनश्च बहुव्णैश्च यद् मवेत् ।
वजयेन्मतिर्मोलिङ्ग सर्वदोषकरं यतः ॥ ७६ ॥
[ इति वर्यंरिङ्गानि 1
अन्थान्तरे ;--
महानदीसमुद्(४)भूतसिद्धक्षतादिसम्भवम् ।
पाषाणं परया भक्त्या छिङ्गवत् पूजयेत् सुषीः ॥ ७७ ॥
सदोषं गुणसंयुक्तं बाणे पूज्यं हि नित्यशः ।
` बलाहक्मीं समङ्ष्य मुज्यते बाणलिङ्गतः ॥ ७८ ॥ `
(4 सवै त्रततयो दानं तीं देवेषु यत् फकम् । =
तत् एरं कोरिगुणितं प्राप्यते लिङ्गपूजनात् ॥ ५ |
(१) :्कन्ध-2 इति स्यात् । (र) श्र्वः इति स्यात्। (३) ` चक्रञ्च |
त | | . इति स्यात् । (४) “यूतमिःति स्यात्। (५) श्वर्त्रततपोदानतीथेदेवेषु" इति स्यात् । । |
~ शतवारं स्पते सहसत जवीज्छे। = ` ४.
रक्षवारं नर्मदायां कोटिं च कुरजङ्गकरे ॥ ८० ॥ `
कला खानं तथा पिण्डं होमं दानं च भोजनम् ।
(गुणिते कोविवारच्च सवैुण्यं लमेन्नरः ॥ ८१ ॥
(२) प्त्रे मै शतदस्तेषु (३)बाणेषु च शतेषु च ।
स्वयम्भुवि सहस्रान्तं रिवतीर्थोदकं स्मरतम् ॥ ८२ ॥
[ इति बाणषिङ्गप्रशंसा }
चिङ्गायामसमेो दैर््ये उच्छायः पीठिकासमः ।
(४)समभागयतो व्रष्र()पन्चमागोचनतो भवेत् ॥ ८३ ॥
वाणलिङ्गे रषं कुर्यात् (“)स्वयम्मूमखसून्मये
शते सहसलिङ्गे च वृषं न्युनाधिकं विदुः ॥ ८४ न
| [ इति वाहनविधिः ] . |
विस्तारस्य विभगेण प्रणारं चाधिकं मतम् ।
(६)तदर्धे न्मविस्तारं त्रिमागो जख्वाहकः ॥ ८५ ॥
इति लिङ्घानि। |
पथत्वं पीरिकायास्तु लिङ्गायामसमं भवेत्
उदयो विष्णुभागान्ते उमावतर् पीठिका स्पृता ॥ ८& ॥
` जाययेकया विधातम्यं (७)नित्यमन्यन्योसंकुरम् |
आहुः शैरुदुमे केचित् पीठं फकेषटकामयम् ॥ ८७ ॥
उप्ुषरि पीठानां सन्धिरङ्गावसानके ।
` (<)जारु्य मध्यमध्ये च कर्णे सन्धि न सन्धयेत् ॥ ८८ ॥ `
चतुरसरादिवृत्ान्ता पीठिका दशधा स्पृता ।
उन्नता दपंणाकारा बाह्ये मेखर्याऽस्विता ॥ ८९ ॥
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४
|
|
(१) गुणितः इति स्यात् । (२) "धातवे इति श्वटे वैः इतिवास्यात्। |
(३) ध्वाणे पञ्चशतेषु चः इति स्यात् । (८) सममागायतो इषः इतिस्यात् | ¦
(५) श्वयग्भूमुल इति स्यात्! (द). ततद्धनाशरविस्तारंः इति स्फत् । |
(७) -नेषठमन्योन्यः' इति स्यात् । (<) ^नाठस्यः इति स्यात् । 0
चत्ोऽष्यायः ३१
(१)जिचोदंशस्तु पीण्ड्याश्च जगरथाश्च परिष्िपेत् 4 |
ऊद्धाधो (जाव्यकुम्भस्य १) तन्मध्ये कनकं भवेत् ॥ २० ॥
(द्धौ ९) देष्थ॑समा दर्ये लिङ्ञायामायता भवेत्
यस्य देवस्य या पली पीठे तां परिकस्पयेत् ॥ ९.१
| इति पीठिका ।
मुखणिङ्गं त्रिवक्त्रं वा एकवक्लञ्चतुयखम् ।
सम्मुखं चेकववत्रं स्यात्तिवक्तरे पृष्ठतो नहि ॥ ९२ ॥
` पृश्िमास्यं सितं शम् कुङ्कमामं तथोत्तरम् । `
, याम्यं कृष्णं करार स्यात् प्राच्यां दीप्ाथिसन्निभम् ॥ ९३ ॥
, सयो वामं तथाऽघोरं तल्ुरषं चतुथैकम् ।
पञ्चमञ्च तथानं योगिना(२)मथ गोचरम् ॥ ९४ ॥
न | इति म॒खलिङ्गम् ।
(4५4१ वामे गणाधिपः स्थाप्यो दक्षिण पर्वती तथा।
(9 नेकैत्ये भास्करं विद्याद् वायग्ये च जनार्दनम् ॥ ९५ ॥
5 मातृभिमीतृकास्थानं कारयेदक्षिणां दिशम् । `
सौम्ये शान्तिगृहं कुयाद् यक्षाधीशांस्तु पश्चिमे ॥ ९& ॥
इत्येकद्वारशिवायतनम् । |
(३) वामहस्ते गृहं कुयाद् यशोद्रारच्च दक्षिणे । `
मध्ये रुद्रः प्रतिष्ठाप्यो मातृस्थानश्च दक्षिणे ॥ ९७ ॥
वामे देवी महारक्ष्मीर्मा (४) > भेरवस्तथा ।
(~त्रह्मविष्णस्तथा शद्रः प्ष्ठदेो तु कारयेत् ॥ ९८॥ `
इन्द्रादित्यो च (६)कणे। च आग्नेयां स्कन्द एव च ।
ईने ()विघ्नराजस्य धूम्र दैसानगोचरे ॥ ९९ ॥
इति. चतुमखशिबायतनम् ।
“(2 शतिशदंशन्त॒ पिण्ड्याञ्चः इति स्यात् । (२) “~मप्यगोचरम्' इत्यन्यत्र ।
(३) वामे स्नानण्दंः इति स्यात् । (४) बुटितस्थाने श्वः षवे वा स्यात्। |
(५) '्रह्मविष्ण् तथा रुद्र इति स्यात् । (£) प्कृरणी च आग्नेय्यां दति स्यात् । ९५ | |
(७) विन्नरजोऽस्य' इति स्वार | . ~ = : | |
` मातुरिङ्गश्च नागेन्द्रं डमरं बीजपूरकम् ।
नन्दी मुकुरशोभाव्यः (१)सवभरणभूषितः ॥ १०० ॥
साङ्ग कारश्च डमरं बीनपूरकम्
द॑ष्टाकराख्वदनो महाकारप्तु दक्षिणे ॥ १०१ ॥
इति पूर्वधरतिहारौ । `
तजनी च त्रिशूलञ्च डमरं गजमेव च॑
हेरम्बो वामभागे स्याद् भृङ्गी दक्षिणतः स्मृतः ॥ १०२ ॥
, गजं डमरुखटाङ्ग तजेनीं वामहस्ततः ।
उमो च दक्षिणे द्वारे भङ्गी दक्षिणतः स्मृतः ॥ १०३ ।
इति दक्षिणप्रतिहारो ।
वियु उमरु्चेव खग्ग च कपालकम् !
कपारं डमर दन्तं वीजपूरं तथा दधत् ॥ १०४ ।
दुमखः पश्चिमे वामे पण्डुरो दक्षिणे तथा |
५ | [ इति पश्चिमप्रतीहारो ]
मातुरि्ग मृणारुशच सद्ग पद्द्डकौ ॥ १०५ ॥
| सितो वामेऽसितो दक्षे उत्तरद्रारसखितौ ।
पद्मदण्डञ्च सङ्ग मृणालं बीजपूरकम् ॥ १०६ ॥
[ इत्युत्तरपरतीहारो ] |
इति (२)रिवप्रतिहारो ।
इति श्रीसूत्र >< >‹ मण्डन विरचिते वास्वुशाखे रूपमण्डने शिवमूिरिवलिङ्क
रुश्चणाधिकारश्चतुथांऽध्यायः ॥ ४ ॥
जिनाति मनना ५ क ०११०.
(९) “स्पौमरण-' इति स्यात् । (२) च 1 त तीडाराः' इति स्यात् ।
क
[ चाक्ताधिकारः
जथ गौर्याः प्रवक्ष्यामि प्रमाणे मूरतिनिर्णयम्
चतुभज चरिनेता या सवीभरणमूषणा ॥ १ ॥
| [ इति गोरीमूर्चः क्षामान्यरक्षणम् ]
अक्षसूवाम्बुज धत्ते दर्षणञ्च कमण्डटम् ।
उमा-नाक्नी भवेनमूरिरवन्दिता त्रिदशैरपि ॥ २॥ `
| [ इत्युमा |
(१)अक्षसूत्रां शिषां देवीं गणाध्यक्षकमण्डटुम् ।
पक्षद्रयेऽथिकुण्डच्च पार्वैती पर्वैतोद्भमवा ॥ ३ ॥
। (4 क [ इति पावती ]
। अक्षसूत्र तथा पद्ममभयञ्च वरन्तथा। ०
| गोधासना(र)प्रियामरिगंहे पूज्या धिये सदा ॥ ४॥
त [ इति किया ]
कमण्डस्वक्षसूत्रच्च विभ्राणा वजमङ्कुशम् ।
गजासनयिता रम्भा कत्ततथा सवेकामद्ा ॥ ५५ ॥
[इतिरम्मा]
शूलाक्षतूलदण्डच्च विभ्राणा चेव चामरम् । `
| तोता कथिता चेयं स्वैकोपप्रणारनी | ६ ॥
11. ५ [ इति ततल ]
(4 नागपाश्चङ्कलौ (द)चेव भयदं वरदं करम् ।
ज्रिपुरा नाम सा पूञ्या वन्दिता तिदशरपि ॥ ७॥
४. [ इति श्िषुरा ]
इति गोयां मृत्तयः। `
कनन
त
| ॥ इति स्यात्। (३) श्चैवाभयद् इति स्यात् |
५ सपु ~ |
(१) "अक्षू शिवं देवं गणाध्यक्षः इति देवतामूत्तौ (८) । (२) शिवाः 4
4. ॥
. = वक्ष्यामि (१)गोयायतनं देवतानामनुक्रमात्
वामे सिद्धिः धिया याम्ये सावित्री चैव पश्चिमे ॥ ८ ॥
पृष्ठकर्णद्वये काथ भगवती सरस्वती । |
$शाने तु गणेशः स्यात् कुमारो चाथिकोणके ॥ ९ ॥
कुण्डरभ्यामरुद्रता चेश्वरस्य सदा प्रिया ।
मध्ये मौरी प्रतिष्ठाप्या सवीमरणमूषिता ॥ १० ॥
इति गौर्यायतनम् ।
अमया्कुरपाशदण्डेजैया नैव तु पूरवैतः ।
सन्यापसन्ययोगेन विजया (र)तामसा मवेत् ॥ ११॥
अमयान्बुन(३)षोदण्ड अजिता चापराजिता ।
` अमयवज्ाङ्कुशदण्डेविसक्ता (४)मण्डखऽपि च | १२ ॥
अभयं शङ्खपदमदण्डेर्मोहिनी स्तम्भिनी तथा ।
जया च विजया चेव अजिता त्वपराजिता ॥ १३ ॥
विभक्ता (५)विमस चैव मोदिनी स्तम्भिनी तथा
गौया आयतने श्रष्ठा(६)अष्टा स्युद्ररपारिका८) ॥ १५ ॥
। ति मोयौ अशे द्वारपाक्िका | |
दन्तच्च परशुं पञ्मं मोदकञ्च गजाननः । `
| गणेशो मूषकाूढो बिभ्राणः सर्वकामदः ॥ १५
५ इति गणेश्षः |
वरं तथाऽङ्कुशं दन्तं दक्षिणे (ॐ)पार्धधाभयो ।
वामे कपाङं बाणाक्ष पचे (<८)कोमोदकीं तथा ॥ १६ ॥
माननम
(१) शगोयायतनदेवतानामनुक्रमम्ः इति स्यात् । (२) नाम साः इति स्यात्
। (ड) (पाश्चदण्डेरनिताः इति स्वात् । (४) सङ्गलाः इति स्यात् । (५) पूर्वर (श्र) `
। | भङ्गलाः मण्डलाः वतयुपलम्मादव्ापि तयोरन्यतरदेष नाम स्वात्। (६) अष्ट `
८ ५ 4 अष्ट ५ वा स्यात् । (७) धपश्वधाभयेः इति स्यात् 9 ` एवश्चात्र प्रश्वषशब्द्ः "पद्यु - 4
शब्दवत् परपयाय रवयः । (८) मोदकी) इति चाघुः ¦
म ६
धारयन्तं करे रम्यैः पञ्चवक्तं विरोचनम् । `
हेरम्बं मूषकाखूदं कुयैत् सवीथेकामदम् ॥ १७ ॥
इति हेरम्बः $
छम्बोद्रं तिनयनं पाराङ्कधरं परम् ।
वरदाभयहस्तश्च (१)रुसत्कणे सचामरम् ॥ १८ ॥
[ इति षक्ूतण्डः ] =
वामाङ्गे गजकणं तु सिद्धि दाच दक्षिणे।
पृष्ठकर्णे तथा द्वो च धूमको बारुचन्द्रमाः ॥ १९ ॥ `
उत्तरे तु सद। गौरी याम्ये चैव सरस्वती
पश्चिमे यक्षराजश्च बुद्धिः पूरवे सुसंस्थिता ॥ २० ॥
इति गणेशायतनम् ।
सर्वे च वामनाकाराः सौम्याश्च पुरुषाननाः |
तञनीपरद्ुपद्ममविन्नो दण्डहस्तकः ॥ २१ ॥
तनीदण्डापसम्ये स भवेद् विघ्राजकः ।
तजनीखड्गखेरञ्च दण्डहस्तः सुवक्तकः ॥ २२ ॥
तजनीदण्डापसव्ये दक्षिणे बख्वान् भवेत् ।
तजनीवाणचापञ्च दण्डञ्च गजकणैकः ॥ २३ ॥
तजनीदण्डापसव्ये गोकर्णः पश्चिमे स्थितः |
(र)तजैनीपदमा्ङ्कं दण्डहस्तः सुसोम्यकः ॥ २४
तञनीदण्डापसव्ये स चैव शुमदायकः।
= पक्षदरारादिके सवे प्राच्यादिष्वष्ट संस्थिताः ॥ २५ ।
| ति गणेश्ग्रतिहायः
कारिकेय प्रवक्ष्यामि तणादित्यसननिमम् ।
कृमकोदरणीमं कुमारं सुकुमारकम् ।॥ २६ ॥
(१) "चङूत्कणैः इ्युचितः पाठो देषतामूत्तौ (अ० ८; ° २५ ) |
(२) (्तजेनीपद्माङ्कट च” इति देवतामूतों ( अ° ८; ° ३३) ।
= गण्डकीरकेर्यक्तं मयूरवरवाहनम् ।
(१)स्थापनीयाखेटनगरे अजन् दश्च कल्पयेत् ॥ २७ ॥
चतुभजः (२)क्ैटे स्याद् बने भ्रमे द्विवाहुक |
दक्षिणे शक्तिपाराश्च खड्गे वाणे लिदयुरुकम् ॥ २८ ॥
द)षरदैशकहस्तस्यादथवाऽमयदो भवेत्
एते दक्षिणतो ज्ञेयाः केयूर्(४)वनकोज्ञ्वलखः ॥ २९ ।
` धनुः पताका मुष्टिश्च तर्जनी तु प्रसारिता ।
(५)खेटकं ताप्रचडञ्च वामहस्तेषु समस्यते (च
(६)द्विुजश्च करे शक्तिवोम ऊर्वे च (७)कर्कुटम् |
चतुभज शक्तिपाशो वामतो दक्षिणे खसिः ॥ ३१ ।
व्रदोऽमयदो वाऽपि (<)दक्षिणस्यत्तरीयकम् } `
कार्तिकेयममं शुभ्र कर्तव्यं सर्वकामदम् ।॥ ३२ ॥
इति कातिकेयः |
अक्षसूतरग्ुपात्रे च अधोहस्ते प्रकारयेत्
स्वासामीदशो हस्तौ द्वावृष्वौं कथयाम्यथ ॥ ३३ ॥
पन्च युमे रस्या स्याही पञ्मं च पुस्तकम् ।
। ठीलङ्गी पास्षपद्ाभ्यां रलिता वज्रमङ्कशम् ॥ २४
प्रशङ्कौ टीखवती ठीर्या(८) पञ्च कीतिता८) ।
८, इति पञ्च टीला
बरं त्रिश सेर पानपात्रं च भिन्नती।
नीरकण्ठं तथा नागा महारक्षमीः प्रकीतिता ॥ २५ ॥
1 [ इति महार्ष्मीः ] 4
फलिता ११५५५१५
(१) श्थानीयखेट-' इति स्यात्! (२) “लर्वटेः इति स्यात्| (३) ध्वर्दश्चक- ` |
खेटकस्ताम्रचूडश्चः इति साधुः|
द्वः इति स्यात् । (४) “कनकोज्न्वला इति “कटकोज्जवलाः इति वा स्यात् । `
1 (4, ५ द्विभुजस्य य इति स्यात् । (७) च्छट (1 |
इति साधुः। (८) दक्षिणः स्वाज्ञरीयकः इति स्वात् ।, ‰ ` ‰ ,
; म् द७
वरं तरद्रूरं सेटश्च पानप।त्श्च विभ्रती ।
क्षेमङ्करी तदा नाम क्षेमारोग्यपदायिनी ॥ ३६
` [ इति केमङ्करी ]
कमण्डटुञ्च खड्गञ्च (१)मरं पानञ्च पातकम्
हरसिद्धिस्तदा नाम सर्वेषां सिद्धिहेतवे ॥ २७ ॥ `
„५ [ इति हरसिद्धिः ]
| इति दुगा मूतैयः ।
गोधासना भवेद् गोरी ङीर्या हंसवाहना८) ।
सिंहारूढा भवेद् दुगी मातरः स्वस्ववाहनाः ॥ ३८ ॥
[ इति गो्यादीनां वाहनानि ]
चण्डिका क्रूररूपा च पिङ्गकेशा कशोदरी ।
रक्ताक्षी (२)मयनेल्ञा च निमांसा विछतानना ॥ २९ ।
(३)चण्डिका कृरख्पा च पिज्गकेशा कशोदरी ।
व्याघ्रचगंपरीधाना सुजज्ञभरणान्विता ॥ ४० ॥
केपार्माछिनी कृष्णा रावारूढा भयावहा ।
व्रिद्यूरं खेटकं खड्गं धनुः पाशाङ्कुश यरः ॥ ४१ ॥
कुठारो दर्पणं षण्डा शङ्कं वस्रं गदा प्विः।
दण्डमुदूर इत्येतेयथास्थानायुधेथता ॥ ४२ ॥
बाहुषोडश्स॑युक्ता चण्डयुण्डविधातिनी ।
| इति चण्डा
खड्गं पात््च सुरं छङ्गरुच्च बिमर्ति सा । ध.
आख्याता रक्तचायुण्डा देवी योगेश्वरीति च ॥ ४३ ॥ |
अधीते य इमं नित्यं रक्तदन्द्या वपुस्तवम्
4 ५ ` ते सा परिचरदेषी पतिं ्रियमिवाङ्गना ॥ ४४ ॥
[ इति रक्तचायुण्डा. |
नि 0 तातान ज ११८१०१०१
1 ५५११५१५५
(१) डमरं पानपाज्रकम्ः इति स्यात् । (२) “मीमनेलाः इति स्यात्|
(३) इदम सम्पातायातं स्यात् ।
र । | (८११७) पाडः। (५
। अथ (शकात्यायिनीं वक्ष्ये (२)दशस्तां महज् ।
तेजःपरतापदां नित्यं वृपाणां सुखबोधिनी(मू) ॥ ४५ ॥
त्रिभङ्गीस्थानसंस्थानां महिषासुरसूदनीम् ।
(३)दकषत्रिश्ूर खड्गञ्च चक्रं बाण चं शक्तिकाम् ॥ ४६ ।
खेटकं पूणेचपञ्च पाशमङ्कशमेव च
घष्टाञ्च वामतो दाद् दैत्यसूषैजघृकराम् ॥ ४७ ॥
हृदि शूलेन निमित्त तिर्गदन्तविभूषितम् |.
रक्तरकीङृताङ्गश्च रक्तविस्फारितेक्षणम् ॥ ४८ ॥
वेष्टितं नागपाशेश्च भृकुदीमीषणाननाम् ॥ ४९ ॥
देष्यास्ु दक्षिणं पादं समं सिंहोपरि स्थितम् ।
किच्चिदूष्वे तथा (छ)वाममङ्कषठो महिषोपरि ॥ ५० ॥
हति भरीकात्यायनीमूर्तिं |
चण्डिकाया प्रतीहारान् कथविष्याम्यनुक्रमात्
वेताक()करस्थेव पिङ्गालो भृकुरिस्तथा ॥ ५१ ॥
पुष्कः कङ्कदश्चैव रक्ताक्षश्च सुरोचनः।
ष्टाननविक(५)स्यसरपुरदशनोञ्ज्वलः ॥ ५२ ॥
बबेरीव्यक्तदेहश्य रक्ताक्षश्च महाबरः |
तनी चेव सटाजञमूध्वं उमरुदण्डकोौ ॥ ५३ ॥
नेतारः सुसमाख्यातोऽपसम्ये करटः पुनः ।
` अभयं खड्गसेरच्च दण्डः पिङ्गलखोचनः ॥ ५४ ॥ `
| (ोवामापसव्ययोगेन भवेद् भूकुटिनामकः |
= तनी च तिश्ूख्च खट्ग दण्ड एव च ॥ ५५ ॥
८. 1 ~
1 ग ध पि
(१) कात्यायनी इति साधुः! (२) ्दशहस्तां सुदुजयाम् इति स्यात्
(३) दक्षः इति स्यात् । (४) '्वाममह्षठः इति मातूस्ये (२६०।६५) देवतामूक्तौ चं
(५) “-टास्यः संस्फु त इति स्यात्| (€) षवामेऽपसव्य
| 4 पक्चमोऽभ्यायः (4 3
१ | रकतक्षो (श्वाम मेदोऽसो वामे दक्षे विरोचनः। `
9.६४ „थ दिगृद्धारपक्षयुग्मे च परशस्ता विश्ननाशनाः ॥ ५६ ॥
इति चण्डिकाष्टकप्रतिहाराः ।
अष्टपश्रा्बुजस्योध्वं रक्ष्मीः िंहासने शमे ।
बिनायकवदासीना सवामरणभूषिता ॥ ५७ ॥
ऊर्णवहस्तो प्रकम्य देव्याः पडकजधारिणौ | |
(२)वामे धृतघटं धत्ते दक्षिणे मातुलिङ्ककम् ॥ ५८ ॥
| इति रक्ष्या मूर्तिः | ~.
` क्षेत्रे कोह्ा(३)पुरे देये महारक्षमीर्यदाऽच्यते ।
रक्ष्मीवत् सा सदा कायां ूपाभरणभूषिता ॥ ५९ ॥
दुक्षिणाधःकरे पत्रमूव कौमोदकी भवेत् ।
वामेव खेटकं धत्ते ्ीफं तदधःकरे ॥ ६० ॥ `
| | इति महारश्ष्मीः । च
॥ एकवक्त्रा चतुर्हस्ता सुकुटेन विराजिता ।
| प्रभामण्डरुसंयुक्ता कुण्डखान्वितरोखरा ॥ ६१ ॥
अक्षाठ्जवीणा पुस्तकं महाविद्या परकीतिंता
[ इति महाविद्या ]
वराक्षान्जं पुस्तकञ्च सरस्वती शुभावहा ॥ ६२ ॥
[ इति सरस्वती ] (
हंसारूढा परकर्तन्या साक्चसूवकमण्डटः 0
युवं च पुस्तकं धत्ते उष्वहस्तद्रये शुमा ॥ ६२ ॥
५ एति ब्राह्यी । न ।
मादेश्वरी प्रकर्तय्या वृषमासनसंखिता ।
कपार्दूडख्खट्राङ्गवरदा च चतुभुजा ॥ ६५ ॥
| | इति माहेश्वरी ।
(1 (१) भनामः इति स्यात् | (२ वामेऽमृतघटः इति स्वात् । (३) “युरदन्येः
इतिस्यातू। 1 3;
४०
कुमार्या कौमारी मय॒रवरवाहना ।
|
रक्तवखधरा तद्वच्छट्रक्तिगदाधरा ॥ ६५ ॥
इति कौमारी
वैष्णवी विष्णुसदश्ची गरडोपरि संवित ।
चतुबीहुश्च वरदा शाङ्कखवकरगदाधरा ॥ ६६ ॥
इति वैष्णवीं
वाराहीं तु प्रवक्ष्यामि महिषोपरि संखिताम् ।
(शोवाराहसद्दी षण्टानादा चामरधारिणी ॥ ६७ ॥ `
गदा चक्रगदा तद्वहानवेन्द्रविघातिनी । `
टोकाना्च हिताथय सर्वैव्याधिबिनारिनी ॥ ६८ ॥
इति वारारी |
इन्द्राणी विन्द्रसदश्ी वज्ररारखुगदाधरा ।
गजा्नगता देवी रोचनेैहुमिरवृता | ६९
५ ©
इति इन्द्राणी ।
॥ = दंष्टाख क्षीणदेहा च गत्ाक्षा भीमरूपिणी ।
40 दिगृबाहुः क्षामकुक्षिश्च सुशं चक्रमार्गणो ॥ ७० ॥
अङ्कं बिभ्रती खड्गं दक्षिणेष्वथ वामतः |
1 खेटं पाश धनुदेण्ड कुठारं चेति बिभ्रती ॥ ७१ ।
चामुण्डा प्रेतगा रक्ता विङ्कता(२)स्यादिमूषणा
॥ द्विमुजा वा प्रकर्तव्या ( कृततिकाकार्यरन्विता १ ) ॥ ७२ ॥
इति चामुण्डा |
वीरिरस्तु भगवान् दषारूढो धुरः
बौणाहसतं त्रिशूल मातृणाम्रतो भवेत् |
| मध्ये च मातृका कायां अन्ते (रै)तेषां विनायकः ॥ऽ२॥
'वराह- इति स्यात् । (२) “स्याहिमूषणाः इति स्यात् |
८ ध इति सप्त मातरः।
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पञ्चमोऽध्यायः ४१
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्षे्तपारो विधातव्यो दिगृवासा घण्टभूषितः
कर्तिकां डमरं बिश्रदक्षिणे तु करद्वये ॥ ७४
वमि शूलं कपारच्च मुण्डमालोपवीतकम् | `
(१)करोतिकटितोदारसर्षमन्थितशेखरः ॥ ७५ ॥
इति क्षेत्रपाः |
खटाज्मसिपाशञ्च शूर दधतः कर
इडमरुश्च कपार्च्च वरदं भुजग तथा ॥ ७६ ॥
आस्मवणेसमोपेतसारमेयसमन्वितम् । 9
त्वा जपेत् घुसंदृष्टः स्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ ७५७ ॥
इति बटुक भरवः |
9
इति शीसू्रधारमण्डनविरचिते रूपमण्डने वास्वुशाच्रे गोयाः
प्रमाणमूर्तिलक्षणाधिकारः पञ्चमोऽध्यायः
(९) करोयिनिकरेदार-' इति देवतामू्तौ पाठः ( अ० ८} शछो० ६०) | ` ध ।
अथ जेैनमूर्सिलक्षणाधिकारप्रारम्भः | ५
एतस्या(श)मिषस्पिण्या ऋषभोऽ(२)जिनसम्मवः । ` + =
अभिनन्दस्तु (र)घुमूतिस्ततः प्चप्रमामिधः॥ १॥ ५
` पुपाश्चश्न्द्र(प्रमेव(५स्तुविचिस्याथ रीतर |
(श्रियो वास्पूज्यश्च विमलोऽनन्ततीथ्ृत् ॥ २ ।
धर्यु्ान्ति()कुप्यरोममदिश्च सुनि(८)ुश्रृतः ।
(र)नेमि-नेमि-पाश्च-वीरश्तुर्विशति अहताः & ॥ ३ ॥
[ जिनानां वर्णः]
(१०)स्को च पद्म(११)रभु-.-"मवा पूरय
(१२) च चन्द्रपरमपुष्पदन्तो नि
दष्णौ पुनर्नमि(१ शोषुगुणविलीने `
(१४)श्ीमद्िः पां कनकखिषोऽन्ये
४ { [ यथाक्रमं जिनानां घ्वजाः | ।
वृषो गजोऽदव(१ ५)जो मृगवक्तो चोभ्जः स्वस्तिकः शशी ।
मकरवरसखङ्गीरमहिषः शरकरस्तथा ॥ ५ ॥
श्येनो वज्ञे (१६)मृगछ्ागो नन्वावत्तां घटोऽपि च ।
( कूर्मो नीरोलरं शङ्ख निश (थी विदा वा (१७)फाणी पिंहोऽदैतां ध्वजाः ॥ ६ ॥
८) भष र: मवस्िणया् इति स्यात् । (२). (नित इति स्ात् (श)श्वमतिः `
ध कतिः स्वात् । (८). शम, इति स्वात् । (५) भ्ुविचिश्वाथः इति स्यात् ।
(& भ्र्ासोः इति स्यात् | (७) “कुन्थारयोः इति स्यात् । (८, “उतरत इति दयात् । ^.
6) नभिः ति स्यत्. (१९) सौ इति स्यात् । (११) भ्रभवादपूच्यौ"
| ॥ इति स्वति ८ र) शोः इति स्यात् । (१३) “मुनी च नीलो" इति स्यत् ।
| (४) श्रीमल्पार्थोः इति स्यात्| (१५) “शः छवगः क्राजचोऽन्ज इति स्यत् ४
(१६) “मृग्छागो' इति साघु | (१७)..फणी इति स्यात् |
न वष्ठोऽध्याथः | । । | । घ
अथनक्षत्राणि `
उत्तराषादरोहिण्यौ सृगदीषं पुनर्वसुः ।
भवा चिला विशाखा चानुराधा मूलमेव च ॥ ७ ॥
पूवैषादा श्रुतिशवैव शतमिषोत्तरं पदम् । `
रेवती पष्यभरणी इृत्तिका रेवती कमात् ॥ ८ ॥ `
अश्िनी श्रवणाधिन्यो तथा चिता विशाखिका
उत्तरया फल्गुनी चेति जिनानां जन्ममानि वे ॥ ९ ॥
| अथ राशय ~
धनुर्षोऽथ (१)मिथुनो मिथुनं सिंह(र)कन्यकैः |
तुखबृधिकचापानि धनुमकर(र)कुम्भकैः ॥ १० ॥
(४)मीनामीने ककमेषा वृषो मीनोऽप्यजः क्रमात् ।
मकरो मेष-कन्ये तु तुख कन्येति राशयः ॥ ११ ॥
[ जिनोपासकयश्चनामानि ]
(यक्षिणी स्याद् गोमुखो महायक्षक्िमुखो यक्षनायकः ।
तुम्बरु; कुठमश्वापि मातङ्गो विजयो जयः ॥ १२ ॥
ब्रह्मा यक्िट् कुमारः षण्युखपातारकिनराः ।
गर्डो गन्धर्वो यक्षद् कुबेरो वरुणोऽपि च ॥ १३ ॥
` भृकुरि(क्)र्गोऽभिधः पार्थे वा मातङ्ञोऽहेदपासकाः ,
कर [ जिनानां श्षासन्देवताः] = `
` चक्रश्च(<)यजिनबल दुरितारिश्च कारिका ॥ १४॥
महाकाटी(८)श्मा शांता (र)भृगुढयश्च सतारका ।
अशोका मानवी चण्डी विदिता चाङ्कसी तथा ॥ १५ ॥ `
पादाता । माना भ्ण ०७१५५
(९) मिथुनः इति स्यात्। (२) “कन्यके इति स्यात्। (३) “कुम्भको इतिः
स्यात्|. (४) मीनो मीन- इति स्यात्] (५) अच्र यक्षिणीति सम्पातायातं स्यात् ; ` ` ध | |
श्स्याद् मोमुखो महायक्ष इतिक्रमेण पाख्चम् । (६) “गोमेषपाश् मातङ्कोऽ इति `
स्यात्| (७) ^यनितवखाः इति देवतामृत्तौ (७।१४) । (८) श्यामा इति स्यात् | . |
(५) ्यिश्रः इतिस्यात्! ॥ 1:
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॥ 1
कन्दपीं नि्वीणी बाला धारिणी (होषरणाप्रिया ।
नादरक्ता च गन्ध्वीऽम्बिका (२)पद्मवती तथा|
सिद्धायका चेति जेन्यः(३)क्रमा वासवदेवताः ॥
दति जिनानां (कयक्षणीनामानि |
{तेषां लक्षणम् , तत्र गोखुखः |
(“)रिषमो गोमुख यक्षो(&)हेमवणा गजानना
(जोवराक्षसूत्रमाशाश्च उभवीजपुरेषु च ॥ १७ ।
त [ चक्रेरवरी |
चक्रेश्वरी हेमवणी। ताक्यारूढाऽष्टबाहुका
व॒रं बाणं (“चक्रं ( शक्तिश्रूरमनाकुरम् £) ॥ १८ ॥#
[ अम्बिका] |
सिंहारूगऽम्बिका पीता(मडवि 2नागपारकम् ।
अङ्कश्च तथा(९)पुत तथा हस्तेष्वनुक्रमात् ॥ १९ ॥
[ पाश्वेः |
(१ ०)पार् स्यात् पाश्चनानाथास्य दूमीरूढा गजजानना ।
वीजपूरोरगं नागं नकुं इयामव्ैकेः ॥ २० ॥
| [ पावती ]
(१ शरक्तायसावती पणी कुकुटोरगचतुभना
(१ र)पद्मपाशशो बीजपूरं हस्तेषु कारयेत् ॥ २१ ॥
| (१) श्वरणगप्रिया" इति स्योत् } (२). पद्मावती इति साधु । (३) क्रमान्
स शासनदेवता इति स्यात् | (४) '्यक्षयक्चिणी इति स्यात् । (५) ऋषमे' इति `
, स्यात्। (६) श्देमवणों गजाननः" इति स्यात्] (७) (वरोऽक्षसूलं पाशञ्च बीजपूरं
५ ध करेषु चः इति स्यात् । (८) भाशचक्रः च्वक्रपाशः वा स्यात् | (९) पल्ल इति
१६॥
1 , वती रक्तवर्णां कुक्छुटश्या' इति स्यात् । (१२) भद्र पाक्चाङ्कशो इति स्यात्
नाति ा ाा् ाान
* अन्नेतदनन्तरं नेमिनाथोपासकल्य "गोमेवण्यक्षल्य र्षणं लेखकप्रमादात् प्रटितम् इति
८. सम्भाव्यते । यतोऽन्न ध ग्रन्थक्ता संक्षेषनुद्धया जिनोपासकानां यक्षाणां यक्षिणीनाच्च तावन्ति
सिण आदिनाथ( वषम )-नेमिनाथ-पाश्वंनाथ-महावीराणासुपासकछान्, गोुसल-गोमेष-
स्यात् । (१०) 'पाश्वः स्यात् पाश्चनाथस्य कूर्मारूढो गजाननः" इति स्यात्} (१९) पञ्चा-
नमिधाय "वतलरोऽतिक्चयेयंक्तास्तासां पूल्या विशेषतःः ( २९) इत्यग्रिमप्रतिन्ञाग्रन्थानु- ` „
[ माङः |
महावीरस्य मातङ्गो (१)गजाशूढो मितो भवेत्
दक्षिणे नकर हस्ते वामे स्याद् बीजपूरकम् ॥ २२।
[ सिद्धायका ]
` सिद्धायका। नीख्वण (र)सिद्धाखढाश्चतुमजा ।
पुस्तक चाभय (२)दत्ते बाणे वे मातुलिङ्क ॥ २६ ।
अथ द्वितीयमेदेन चक्रेशवरी `
` द्वादशमुजाष्टचक्राणि वज्ञयो्हरयमेव च |
मातुलिङ्ग[भये चेव पदस्या गरुडोपरि ॥ २४ ॥ `
[ जिने चतुणों प्राधान्यकथनम् ]
जिनस्य मूरयोऽनन्ताः पूजिताः (४)सौख्यसवैद् ।
चतसरोऽतिरयेयुक्तास्तासां पूथ्या विरोषतः ॥ २५
[ एषां नामानि ]
श्रीआदिनाथो नेमिश्च (५)पर्वे वीरचतुथेकः ।
। (६)चकरे चर्याम्िका पद्मावती सिद्धायकेति च ॥ २६ ॥ ति
कैलासं सोमशरणं सिद्धिवतिं सदाशिवम्
सिंहासनं धमेचक्रमुपरीन्द्रातपतकम् ॥ २७ ॥
[ जिनप्रतीहरनामानि]
इन्द्र इन्द्रजयश्चेव माहेन्द्रो विजयस्तथा ।
धरणेन्द्रः प्मकश्च सुनाभः सुरदन्दभिः ॥ २८ ॥
इत्य्टो च प्रतीहारा वीतरागे तु शान्तिदाः।
[ प्रतीहाराणामायुघानि ]
फं वजङ्कतौ दण्डमिन्र(७)मिन्दनयस्तथा ॥ २९ ॥ `
द्धौ बजी फल्दण्डश्च माहेन्द्रो विजयोद्धव
(दा युद्धयोगाद्धवा तरिपञ्चादिफणोद्धंगाः १) ॥ ३०॥ ` 0
दति स्यात् ।
[1
गजारूढः सितोः इति स्यात् । (२) "सिदहारूढा चद॒भृन
(१
ततता ५ ~
(३) '"धत्तेः इति स्यात् | (४) स्सर्वं सौख्यदा इति स्यत् |
वीरशथवुधेकः' इति स्यात् । (६) च्वक्रेश्वयस्विका इति ` स्यात् । (७)
| ध इति स्यात् |
(५) भपाश्ों
'इन्द्रजय- `
इति स्यात् । (४) “युतम् इति स्यात् । (५) गोरसिंहे |
` (&) भेद इति स्यात् । (७) शेलाख्योऽभूत्! इति स्यात् । (८) श्ष्ठोऽष्यायः `
` इत्येतन्मालं साधु। ध 4
४ | 1; हेपमण्डने ~ | |
धरणेन््रः पद्मश्च सर्वे शान्तिकराः स्पृताः । 1
यक्षह्पाधिकारार्च निषिहस्ताः (१)गुभोदराः ॥ ३१ । द
(रोचनाभ्यो दुन्दुभद्चैव क्रमेणाष्टो प्रकीर्तिताः । व
इत्यष्टो च प्रतीहारा वीतरागाः प्रकीर्तिता ॥ " +
(२)नागरादिपूरमामे सवे विश्वभणाशनाः |
छत्रलयं जिनस्थेव रथिकामिक्लिभि(*)यताः ॥ ३३ ॥
अदोकद्रमपत्रेरच देवदुन्दुमिवादिकै
= सिंहासनमसुरा्ो गजसिंहा विमूषिताः ॥ ३४ ॥
मध्ये च कर्मचक्रं च ततूपश्वयोरच यक्षिणी ।
द्विताख्विस्तराः काया बहिः परिकरस्य तु ॥ ३५ ॥
देये तु प्रतिमा तुल्या तयोरूध्वे तु तोरणम् ।
वाहिकाबाह्यक्षे तु (“)गोसिरैररुकृताः ॥ ३६ ॥ |
कर्तव्या द्वारशाखा च तत्तममूर्तिगसंयुता । ६
तोरणं पञ्चधा प्रोक्तं रथिकाये च देवता ॥
रुछितं चेतिकाकारं त्रिरथ वरितोदरम् ।
श्रीपं पच्चरथिकं सप्तावानन्दवधेनम् | ३८
रथिकायां भवेद् ब्रह्म विष्णुरीशदच चण्डिका
जिनो गोरी गणेश्व स्वे स्वे स्थाने सुखावहाः ॥ ३९ ॥
0 | इति परिकरः । |
श्रीमदेशे (६)मेदपाठाभिधाने (जक्षि्ास्येऽभूत् सूत्रधारो वरिष्ठः । 1
पुत्रो जयेष्ठो मण्डनस्तस्य तेन परोक्तं शाखं मण्डनं खूपपूर्वम् ॥ ४० ॥ ^.
इति श्रीसूलधारमण्डनविरचिते वास्वशासतरे रूपमण्डते (८)षष्मोऽध्यायः समासतः । = `
। ॥ समाषठश्वायं अन्धः ॥
(१) श्मोदयाः" इति स्यात् । (२) श्वुनामोः इति स्यात् । (३) (नगरादिषुर-
समट्कृताः इति स्यात्
कपमण्डने
( ©
श्मो°
तौ स्याख्यातानां सरूपाणां
दैववामूर्तौ
०
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शछौ०
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क्पथण्डने
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द्विरूपाणाश्च रूपमण्डनीयपदयानां निर्वेशः
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। देवतामूत्तपिकर स्य
शब्दसूची
णी ज
९९ `
अ
१५६
शब्डाः पत्राङ्ञाः | शब्दाः पत्राः
अश्चमाला ९१०६२१६९९३०१०१,१४९, कपाङ ९९११००,१०३११४९
अक्षसूत्र ५९१६ १,६२,६४,९९११००११०१, | कपालिन् दद्
१०२११०३१ १०४११३७११७०१४ १; | कृमण्डडु ९९.६ १,६३०६९,७ १,७२.८९
१४४१९०१, १४६ ९४,१०२११०३०१७४.१४९.१४६.१६१
अधो | | ९८ करा . ` ४४
अङ्का ६१,६४,७१०९४,१०३१ १०४११३७, | कल्पान्त १६८
| १३८,१३९,१४० | कार्सिकेय १९२
अद्ूलर ६९ | कालक ४७
अङ्कु १६५ । काल्य १०
अण्डज्ञ ५१ | किन्नर १३९
भतसी ९८ | ङक ७दर्
अनिर्द ७९,८० । कुण्डल ९७,९८,१००,१०१,१४७
भनुलेपन ९७,९८ | कुण्डिका
नान्तरीयक ८० | कुमार १०९१
अपस्य ६७,६९,९६, १०७, १५१,१५२ | कृष्णाजिन ८९, १६१
अभय ९७,९९ । केतु्ंस्थान् ६७
अधंनारीम्वर १०० | केयुर ७११०२
अष्टरोह २१,१०९ | केरव २६
आमलकी ७८ | करोष्धापुर १६४
` उपवीत ८९ | क्रर ११८.
उमा १००१५४४ | क्षिप्रगणाधिप
उल्का २६ | कषत्रपारु १५६
उष्णीष | ९८ | खदाङ् ९९११००,१०२११०३११०४
ऋण ` ९९७ | खड्ग. ९८,९९,१०३,१०४
कज ५. 4 ९९७ ॥ खवर
कटिसूत्र ति ९८ = १ १२४
शृण
गदा
गदड
गर्भगृह
गोधासनं
गौरी
चक्र
चक््त
` चण्डमेरव
चण्डिका
चतुःल
चतुष्की
` चाप
चामुण्डा
` विपि
¦ छाया ~
जटा
जया
जराघयुज
क्न
जेन
(1
0.2
< स्कर
काच्रचूह
॥.
पत्राङ्काः
७०,७१.७२,९०,९६१९८१९९१ १०३
१३७०१३८११५२
१२६४१२७
६६,६९,७०,७२१८९१९ १५९२१९४
९६११०२४१०४
१०१
२०
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त्रिविक्रम ७९
चिश्यू ६२६६७३९९ १०१११०२११०३
` तिद्ूक १२७
दणड ७२,१४८, १९१५१११५
दशावतार | ९५
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द्राविड ११४
५, धनं | १९७
धातुर १०६ १०८
ध्वज व १०१११३३
ध्वजपताक ७२
नट | | ७ध्र
नन्दी | १२८
111 | ॥ १५९
नगपाक् १३८,१९४०
नागर ११३ .
नारसिंह | ३
नेमिनाध | १४१
परि | ४ १०४
पतका 5.
परश्च | ९९,१०
पश्च ` ६४,६९०७२,९९
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1 ६९ | पुरपीत्तम
पिण्डिका ^ १२४
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स ~ त-न
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प्रदक्षिण
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बोद्ध
ब्रह्मसूत्र
भद्रकाली
भरतागम
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टि
च्धिरी
द्धी
मधुपक
महरण्डा
महाकाल
महाकाली
महामष्टिष
अहारकष्मी
मातु
मात्
मावृयम
मवृ्प
माधव
खंड
युण्डमारा
[ ३]
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२८ विनायक
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३९ | शारिग्राम्
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३१ श्रोत्रिय
२२ पटलं
६० सङ्ध्पण |
२१,२३ सावित्री
१९ | सिद्धाय
३७ | खुदुशंन
१० | हिरण्यगमं
& | दरक
९१ | हपीकेद
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पनर;
` विष्णुधमोत्तरम् ( पुराणम् )
मत्स्यपुराणप्
अथ्िपुराणत्
बृहत्संहिता ( ज्योतिषग्न्थः )
दक्रनीतिसारः
पयमतम् ( शिस्पराखम् )
कार्यपरिद्पप् +
समराङ्गणसूत्रधारः +
दिष्परत्नम् ( पू्वात्तर-भागद्रयात्मकम् ) ,
रूपमण्डनप
रूपावतार
प्राणतोषणी ( तत्त्रम् )
श्रीत्वचिन्तामणिः ( तन्त्र् )
शिखचक्राथवोधिनी
वीरमित्रोदयः `
जेनयपद्यपुराणम्
चतुर्वि शतिजिनस्तुतिसंम्रहः ।
परे अध्याये श्ोकाङ्कः अद्ुद्धः
५७ इव २७ | नैछतास्यो
६२ थथं ८ पुधिक्रायां °
ॐ ॐ ६२९ नवतुरहस्ता
९४ ५ २० युष्पिकाय। °
६९ ` १ ४६ पुष्पिक्ायं ०
८० ५म २७ (रः १ ल्म)
८३९ ¢ ४१ एकपद्या
८४ +: 4: कलाधिका
र्दः
नैकऋष्यास्यो
इति ब्रह्मायतने द्वारदेवताः |
चतुदस्ताः
इति ब्रह्मणः प्रतीहाराः |
दति सू्ग्रतीदह्ाराः।
(ल्म श्रः)
एको पद्या
फलटाधिक्रा |
अणु (दी)
गुल्फ (०)
९२ प्रष्टे ८७ सप्तालीतितमशछछोकस्योत्तरार्धं एकपादोऽस्यः इत्यनन्तरम्--
“कृतैम्यो क्युस्ङ्गगतः प्रभो; । तथाऽपरश्च'! इति पाच्यम् ।
९३ देषठ 9. तुङ्गं
१०० रेष्ठ २१. चित्रचन्दर
त ९९१ परण्डच्चामयकं)
११९ ऽ“ + ५ .&& रिवारो
१२९ > श्६३ इति पश्चिमप्रतीहरो
दद छम. १ शमाः
र 1 समानाश्च
1 ५ 1 18 गन्धायधिका
ङ्ग
चिलवस््र |
` पण्डञ्चा )मयकं
कलार (दी°)
[इति पश्चिमप्रतीहारो]
ऋषम- |
समानाकृतथः (दी°)
गान्धायम्विका |
। ९४१६ »» ५७ बरद चाक्सं रि्ूलञ्च वरदं चाशषसूलश्च विय
द. दम १२. (-किवण्डश ण्डं).
लिल(ण्ड ष्ठा)